हक की हुंकार

हिमांशु शेखर

झारखंड और पश्‍चिम बंगाल के कुछ जिलों में स्‍थापित दामोदर घाटी परियोजना में बनने वाली बिजली से दिल्ली के कई घरों का अंधियारा दूर होता है. अब तक सिर्फ इस परियोजना से बिजली ही दिल्ली तक पहुंचती थी. लेकिन अब इस परियोजना के विस्‍थापित भी दिल्ली पहुंचकर अपने हक की मांग कर रहे हैं. राष्ट्रीय राजधानी में धरना-प्रदर्शन का पर्याय बन चुके जंतर-मंतर पर इस परियोजना के सैंकड़ों विस्‍थापित 17 अक्टूबर से बैठे हुए हैं. इनमें से 11 लोग 20 अक्टूबर से भूख हड़ताल पर बैठ गए. इनके समर्थन में जंतर-मंतर पर सिविल सोसायटी के कई जाने-माने लोग भी आए और इनकी लड़ाई में कंधा से कंधा मिलाकर साथ देने का भरोसा दिलाया. समर्थन करने वालों में नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर, पूर्व न्यायाधीश राजेंद्र सच्चर, वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर, सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्‍निवेश और जदयू के राज्यसभा सांसद अली अनवर प्रमुख हैं.

आज जो संघर्ष पश्‍चिम बंगाल और झारखंड से बरास्ते रांची और कोलकाता दिल्ली तक पहुंची है उसके बीज तब ही बो दिए गए थे जब 1953 में दामोदार घाटी प्राधिकरण ने सिंचाई और बिजली परियोजना के लिए 41,000 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था. इस परियोजना को न सिर्फ इलाके के लिए बल्‍कि पूरे देश के लिए बेहद अहम माना गया था. यहां से आसपास के क्षेत्र के अलावा देश के कई राज्यों को बिजली मिलती है. इस परियोजना की वजह से 4,000 से ज्यादा घर उजड़ गए थे और तकरीबन 70,000 लोग विस्‍थापित हुए.

प्रभावितों में ज्यादातर घटवार आदिवासी हैं. जंतर-मंतर पर बैठे प्रदर्शनकारियों में भी ज्यादा संख्या इन्हीं की है. प्रभावितों के बीच समन्वय का काम कर रहे और खुद परियोजना से प्रभावित रामाश्रय सिंह कहते हैं, ‘जब परियोजना पर काम शुरू हुआ था तो उस वक्त यहां के लोगों को लगा कि उनके जीवन में अब खुशी ही खुशी होगी. अच्छा मुआवजा मिलेगा और हर परिवार से एक को सरकारी नौकरी मिलेगी. लेकिन नौकरी की उम्मीद धरी की धरी रह गई. अपने हक के लिए आज विस्‍थापितों की तीसरी पीढ़ी संघर्ष कर रही है. अब तो हमें हमारा हक मिल ही जाना चाहिए.’

सिंह बताते हैं, ‘1953 से लेकर 1976 तक सिर्फ 350 लोगों को मुआवजा के साथ-साथ नौकरी मिली. कुछ लोग मुआवजा से भी वंचित रह गए. एक ही परियोजना के प्रभावितों के बीच भेदभावपूर्ण रवैया अपनाना बिल्कुल न्यायसंगत नहीं है. जिन्हें नौकरी नहीं मिली उन लोगों में से कुछ ने अदालत का दरवाजा खटखटाया. 1992 में मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा और अदालत ने भी माना कि परियोजना के लिए जमीन लेते वक्त प्रभावित परिवारों को नौकरी देने की बात कही गई थी. अदालती आदेश के बाद 91 लोगों को नौकरी मिली. इसी आधार पर बाकी के प्रभावित परिवारों को भी नौकरी मिलनी चाहिए थी लेकिन अब तक इनकी खबर लेने कोई नहीं आया.’

दामोदर घाटी निगम (डीवीसी) और सरकार द्वारा बात नहीं सुने जाने पर संघर्ष को सुनियोजित ढंग से आगे बढ़ाने के लिए प्रभावितों द्वारा 2006 में घटवार आदिवासी महासभा का गठन किया गया. 2006 से लेकर 2009 के बीच प्रभावित कई बार भूख हड़ताल पर बैठे. अपनी आवाज सत्ता प्रतिष्ठानों तक पहुंचाने के लिए प्रभावितों ने सड़क जाम और रेल रोको अभियान का भी सहारा लिया. 24 अगस्त 2009 को रांची में राजभवन के सामने हजारों की संख्या में प्रभावितों ने प्रदर्शन किया. 3 मार्च, 2010 को पश्‍चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के नेतुरिया ब्लॉक में होली के दिन प्रभावितों ने भूख हड़ताल किया.

12 अगस्त को परियोजना प्रभावितों ने बड़ी संख्या में जमा होकर धनबाद में प्रदर्शन शुरू किया. इस प्रदर्शन के दौरान प्रशासन ने 52 प्रदर्शनकारियों को जेल में डाल दिया. हालांकि, बाद में ये सभी छूट गए. इसके बाद 2011 में प्रभावितों ने न्याय की उम्मीद में आसनसोल से प्रभावितों ने पद यात्रा शुरू की और 12 अप्रैल को कोलकाता में राजभवन पहुंचे. सिंह बताते हैं कि राज्यपाल ने हमें आश्वासन देकर वापस लौटा दिया. इसके बाद फिर कुछ नहीं हुआ तो फिर परियोजना प्रभावित 9 अगस्त को कोलकाता में मुख्यमंत्री कार्यालय रॉयटर्स बिल्‍डिंग के सामने जमा हुआ और उन्हें एक बार फिर आश्वासन का झुनझुना थमा दिया गया.

सिंह बताते हैं, ‘हमें आश्वासन तो लगातार मिले लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. इसलिए हम सब ने मिलकर तय किया कि अब दिल्ली में अपनी आवाज उठानी चाहिए और 17 अक्टूबर से हम दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरने पर बैठ गए.’ दिल्ली में परियोजना प्रभावितों के अभियान का समर्थन नैशनल अलायंस फॉर पीपुल्स मूवमेंट (एनएपीएम) भी कर रही है. जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की भीड़ में बैठे जामताड़ा जिले के बुजुर्ग सुरेश पाल कहते हैं कि हम यहां से तब तक नहीं उठेंगे जब तक हमारी मांगें नहीं मानी जाएंगी.

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