सुरक्षित नहीं है जैव ईंधन

हिमांशु शेखर
वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों की जब भी बात चलती है तो जैव ईंधन का नाम भी स्वभाविक तौर पर जेहन में कौंधता है। शुरुआत में इसे लेकर पूरी दुनिया में उत्साह का माहौल रहा। धीरे-धीरे इसकी कलई खुलती गई और लोगों का इससे मोहभंग होता गया। पर अभी भी दुनिया में कई ऐसे देश हैं जहां जैव ईंधनों के उत्पादन को बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। पश्चिमी देश इस मामले में अभी आगे चल रहे हैं क्योंकि वहां प्रदूषणकारी गैसों का उत्सर्जन भी ज्यादा है और इस पर लगाम लगाने के लिए दबाव भी अधिक है। जट्रोफा और मक्के के जरिए ईंधन बनाने की तकनीक अपनाने के प्रति हर देश मोहग्रस्त है। भारत में भी जैव ईंधनों के उत्पादन को बढ़ावा देने वाले प्रयासों में तेजी लाने की बात की जा रही है। पर जैव ईंधन के मसले पर हालिया दिनों में हुए अध्ययन के नतीजे चैंकाने वाले हैं। इंग्लैंड के पर्यावरण विभाग के वैज्ञानिकों ने शोध के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि दुनिया जैव ईंधन के उत्पादन के पीछे पगलाई जा रही है लेकिन इससे कार्बन उत्सर्जन में कमी आने की संभावना कम ही है।

जैव ईंधन के उत्पादन के मामले में ब्राजील और अमेरिका अगली कतार में हैं। ब्राजील में अमेजन के जंगल को बहुत विशाल कहा जाता है। इसकी सहायता से वहां के पर्यावरण में संतुलन कायम रहा करता है। पर जैव ईंधन के उत्पादन के लिए इन जंगलों का विनाश किया जा रहा है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है। वहां की सरकार ने यह एलान किया है कि इस साल जंगलों को उजाड़ने की गति को दुगना कर दिया जाएगा। यहां यह बताना लाजिमी है कि पेड़ों की कटाई से भारी मात्रा में कार्बन का उत्सर्जन होता है, जो पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचाता है। कार्बन उत्सर्जन के मामले में वैश्विक स्तर पर ब्राजील का स्थान चैथा है। इसके बावजूद जैव ईंधन के उत्पादन के लिए पेड़ों की कटाई करके कार्बन उत्सर्जन को कम करने के बजाए बढ़ाया ही जा रहा है।

ब्राजील के वुडस होल रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों का मानना है कि जिस तरह अमेजन के जंगलों को उजाड़ने के लिए वहां आग लगाई गई उससे इस क्षेत्र की पारिस्थितिक तंत्र गड़बड़ होगी जिसके परिणामस्वरूप कुछ सालों बाद यह इलाका रेगिस्तान में भी तब्दील हो सकता है। आग लगाए जाने की वजह से वहां के कई ऐसे पौधे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं जिनका इस्तेमाल औषधियों के उत्पादन में होता था। यूनिवर्सिटी आफ मिनेसोटा के वैज्ञानिकों का अध्ययन बताता है कि जिस तरह से वैकल्पिक ईंध्न के उत्पाद के लिए जमीन तैयार की जा रही है उससे होने वाले कार्बन उत्सर्जन के नुकसानों की भारपाई करने में तकरीबन चार सौ सालों का वक्त लग जाएगा।

विश्व बैंक की एक रपट ने इस बात को हाल ही में उजागर किया है कि खाद्य पदार्थों की कीमतों में वैश्विक स्तर पर तकरीबन पचहतर फीसद की बढ़ोतरी के लिए जैव ईंधन ही जिम्मेवार है। यह रपट उस अमेरिकी दावे को खारिज करती है जिसमें बताया गया था कि जैव ईंधनों की वजह से अनाज की कीमतों में महज तीन फीसद की तेजी आई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आक्सफैम नामक संस्था को काफी विश्वसनीयता हासिल है। इसने भी अपने अध्ययन में बताया है कि जैव ईंधन का मॉडल असफल साबित हो चुका है लेकिन सरकार पूंजीपरस्त ताकतों को खुश रखने के लिए इसके उत्पादन को बढ़ावा दे रही है। यहां यह बताना जरूरी है कि अनाज की बढ़ती कीमतों ने दस करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से नीचे धकेल दिया है। यह अनुमान भी विश्व बैंक का ही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तो इसे भूमंडलीकरण के बाद का पहला वास्तविक आर्थिक संकट बताया जा रहा है।

बहरहाल, वैकल्पिक ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले ईथाइल अल्कोहल के उत्पादन को अमेरिका ने दुगना कर दिया है। वहां की सरकार ने एक दशक के अंदर इसे पांच गुना करने का लक्ष्य रखा है। इस मामले में ब्राजील अमेरिका से आगे है। वहां किसी भी पेट्रोल पंप पर सादा गैसोलिन अब मिलता ही नहीं है। ब्राजील की सड़कों पर दौड़ने वाली 45 फीसद कारों में वैकल्पिक ईंधन का इस्तेमाल किया जा रहा है। जैव ईंधन के उत्पादन में पूरी दुनिया में 1995 में पांच करोड़ डालर का निवेश हुआ था। आज यह बढ़कर 38 करोड़ डालर हो गया है। 2010 तक इस क्षेत्र में लगी पूंजी को 100 करोड़ डालर के आंकड़े को पार कर जाने की संभावना बाजार के जानकार जता रहे हैं।

पूंजी के दबाव में ही इंडोनेशिया में जंगलों को नष्ट करने के लिए आग लगा दिया गया ताकि उस जमीन से बायोडीजल का उत्पादन किया जा सके। अब इससे भविष्य में पर्यावरण को कितना लाभ पहुंचेगा यह बता पाना तो शायद किसी के लिए संभव नहीं है लेकिन इतना तो तय है कि पेड़ों को जलाने से भारी मात्रा में कार्बन का उत्सर्जन हुआ। जिससे पर्यावरण का सेहत बिगड़ने के अलावा सुधर तो नहीं ही सकता है। वैसे भी इंडोनेशिया प्रदूषण फैलाने के मामले में वैश्विक स्तर पर तीसरा स्थान रखता है। जबकि पहले वह इस मामले में 21वें पायदान पर था। मक्के से बनाए जाने वाले इथनाल को तो बहुत पहले से ही पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला बताया जाता है। पर अब सेलुलोज से बनाए जा रहे इथनाल पर भी सवालिया निशान वैज्ञानिक लगा रहे हैं।

वैसे जैव ईंधन के चलन में लाने के लिए काफी हद तक पूंजीवादी लॉबी जिम्मेवार है। पूंजीपतियों के लिए जैव ईंधन में निवेश करना फायदे का सौदा साबित हो रहा है। इन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि इससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा। इन्हें तो बस अधिक से अधिक मुनाफा कमाना है। इस  मसले पर तो कई देशों की सरकारें भी खुद पूंजीपतियों को निवेश करने के लिए प्रोत्साहन दे रही हैं। दुनिया के कई हिस्सों में उत्पन्न हुए अनाज संकट के बाद तो जैव ईंधन के उत्पादन पर सबसे ज्यादा सवालिया निशान लगे। पर इसके बावजूद कहीं से भी जैव ईंधन के उत्पादन पर लगाम लगाने के लिए आधिकारिक आवाज उभर कर सामने नहीं आई। कहने को तो पूरी दुनिया बिगड़ते पर्यावरण को लेकर चिंतित नजर आती है। पर ज्यादातर देशों के नीति निर्धारक वैसी ही नीतियों को अमली जामा पहना रहे हैं, जो पर्यावरण के लिहाज से भी ठीक नहीं है। यह तो पता नहीं है कि ऐसा कब तक चलता रहेगा लेकिन पर्यावरण संरक्षण के साथ- साथ अनाज उपलब्धता की दृष्टि से भी जैव ईंधन के उत्पादन को बढ़ावा देना सही नहीं है। तेजी से बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए ऊर्जा के और भी वैकल्पिक साधन हैं। आज उन साधनों से बडे़ पैमाने पर ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।

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