सांसदों की बढ़ती लापरवाही

हिमांशु शेखर

जनता के नुमाइंदे किस कदर लापरवाह हो चले हैं, इसका एक बेहतरीन नमूना सोमवार को लोकसभा में देखने को मिला। सदस्यों की गैर मौजूदगी की वजह से प्रश्नकाल पूरा नहीं हो सका और सदन की कार्यवाही को तकरीबन आधे घंटे के लिए स्थगित करना पड़ा। प्रश्न काल में सवाल पूछने के लिए 20 सवालों को सूचीबद्ध किया गया था। पर इसमें से सिर्फ तीन सदस्य ही वहां मौजूद थे। सत्रह सवालों को पूछने वाले सांसद लोकसभा से नदारद थे।

गायब रहने वाले सदस्यों में कांग्रेस, भाजपा, माकपा, भाकपा, जनता दल यू, शिवसेना, सपा, एमडीएमके, केरल कांग्रेस (एम), ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुसलमीन के सदस्य थे। इसके अलावा एक निर्दलीय सांसद किरोड़ी लाल मीणा का सवाल भी सूची में था लेकिन सवाल पूछने के वक्त वे गायब थे।

यह घटना कई तरह के सवाल खड़े करती है। पहली बात तो यह कि क्या इस घटना के आधार पर कहा जा सकता है कि जनता की नुमाइंदगी का दंभ भरने वाले सांसद सचमुच बेहद लापरवाह हो गए हैं? अगर ऐसा नहीं होता तो वे अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए लोकसभा में सवाल पूछने के लिए मौजूद रहते।

आखिर जो सवाल उन्हें पूछने थे, उसे संबंधित सांसदों ने ही लिखवाया होगा। किसी और ने तो उनके नाम से लिखवाया नहीं। ऐसे में उनका गायब रहना इस बात को साबित करता है कि वे अपनी जिम्मेदारियों को लेकर गंभीर नहीं है। प्रश्न काल में बेहद अहम सवाल उठाए जाने की परंपरा रही है।

ये सवाल देश की भविष्य से जुड़े होते हैं। प्रश्न काल में पूछे जाने वाले सवाल सीधे तौर पर देश की जनता से जुड़े होते हैं। इसके बावजूद सांसदों का गायब रहन उनकी बढ़ती लापरवाही को ही दर्शाता है। संसद में कई बातें परंपरा के आधार पर होती हैं। सदन को सत्ता-व्यवस्था और समाज से बहुत सम्मान मिलता है।

ऐसे में इन सांसदों का सवाल देकर उसे पूछने के वक्त गायब हो जाने को संसद की अवमानना माना जाना चाहिए और इसे सदन की गरिमा के खिलाफ माना जाना चाहिए। क्योंकि संसद देश की सबसे बड़ी पंचायत है कोई बैठकखाना नहीं कि जब मन हुआ कोई आए और जब मन हुआ कोई चला जाए।

प्रश्न काल को संसदीय कार्यवाही में बड़ा महत्व मिलता रहा है। इस दौरान सांसद सरकार से सवाल पूछते हैं। इसके अलावा संसद की कार्यवाही चलाने के लिए देश की जनता से टैक्स के रूप में वसूला गया पैसा खर्च होता है। इस पैसे की बर्बादी तो देश की जनता के साथ एक तरह का धोखा है। सांसद आखिर मुफ्त में सांसदी नहीं करते। घोषित तौर पर उन्हें पगार दी जाती है और तमाम तरह की और सुविधाएं दी जाती हैं।

इसके बावजूद इस तरह की लापरवाही दिख रही है। दरअसल, सांसदों के इस लापरवाही वाले रवैये की वजहों को तलाशते हुए कुछ बातें साफ होती हैं। देश में लंबे समय तक सियासत को सेवा का जरिया माना जाता था। राजनीति में वही लोग आते थे जो सामाजिक तौर पर सक्रिय होते थे।

पर पिछले कुछ दशकों में देश की राजनीति का चेहरा और चरित्र काफी बदल गया है। अब ऐसे लोग राजनीति में आ रहे हैं जिनके लिए राजनीति अपने दूसरें कामों को आगे बढ़ाने का एक जरिया है। इसके अलावा राजनीति में आने वाले लोगों में ऐसे लोग भी शामिल हैं जिनके लिए राजनीति रसूख पाने का एक रास्ता है।

इन लोगों की प्राथमिकताएं अलग होती हैं। इनकी प्राथमिकता सूची में सदन के प्रश्न काल में सवाल सूची में दर्ज करवाकर मौजूद रहना नहीं है। इन सांसदों की प्राथमिकता सूची में देश की जनता के सरोकार भी नहीं हैं। क्योंकि अगर ऐसा होता तो सीधे तौर पर लोगों के हित-अहित से जुड़े सवालों को सदन में उठाने के वक्त ये सांसद सदन से गायब नहीं रहते।

दरअसल, सदन से गायब रहने की कुप्रथा बहुत पुरानी है। पिछले कुछ सालों से यह देखा जा रहा है कि कई विधेयक बगैर किसी बहस के ही पारित कर दिए जा रहे हैं। इसकी मूल वजह यह है कि सदन की कार्यवाही में सांसदों की दिलचस्पी घटती जा रही है। अहम विधेयकों पर बहस के दौरान भी सदन में सांसदों की संख्या कम ही रहती है।

सदन की कार्यवाही में सांसदों की दिलचस्पी का घटना एक गंभीर मसला है। आखिर यह सांसदों का कत्र्तव्य है कि वे संसद में मौजूद रहें और जनता से जुड़े सवालों पर विचार-विमर्श करके देश चलाने वाली नीतियों का निर्धारण करें। सदन की कार्यवाही के दौरान गायब रहने वाले सांसद किसी एक दल के नहीं हैं। बल्कि ऐसे सांसद हर दल में हैं।

यही वजह है कि किसी भी दल ने इस मसले को संसद में नहीं उठाया। बहरहाल, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उन कांग्रेसी सांसदों के नाम मंगवाए हैं जो संसद से गायब थे। संभव है कि इन सांसदों को फटकार का सामना करना पड़े। पर क्या इससे यह सुनिश्चित हो जाएगा कि आगे से सभी सांसद संसद में मौजूद रहें।

अगर सही मायने में सभी पार्टियां अपने सांसदों की संसद में मौजूदगी को लेकर गंभीर हैं तो उन्हें कोई ऐसा कानून बनवाना चाहिए जिसके जरिए सांसदों की उपस्थिति को अनिवार्य बनाया जा सके। पर सियासी दल ऐसा नहीं करेंगे। क्योंकि आज देश की राजनीति उस मोड़ पर है जहां मुख्यधारा की सियासी दलों में कोई फर्क नहीं रहा है।

विचारधारा के स्तर पर एक-दूसरे से अलग होने का ढोंग भले ही ये दल रचते हों लेकिन हर स्तर पर ये एक जैसे ही हैं। सभी दलों की सांसदों की प्रश्न काल में गैरमौजूदगी से यह बात एक बार फिर साबित हो गई है। अहम सवाल यह है कि क्या ऐसे सांसदों पर कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए?

हर छोटे-बड़े दफ्तर में देर से पहुंचने वालों को अपने बॉस की डांट सुननी पड़ती है। कोई अगर अक्सर ही देर से आए तो उसकी पगार कट जाती है। कोई किसी जरूरी काम के वक्त बगैर बताए गैरहाजिर हो जाए तो उस पर कड़ी कार्रवाई की जाती है। पर क्या इन सांसदों पर सदन कोई कार्रवाई करेगा?

अभी तक के रिकार्ड को देखकर तो इस सवाल का नकारात्मक जवाब ही सामने आता है। क्योंकि वे देश की ऐसी पंचायत में बैठे हैं जहां से वे पूरे देश के लिए कानून बनाते हैं और कोई भी ऐसा काम वे नहीं करेंगे जिससे उन्हें कोई परेशानी हो।

अगर एक बार इन सांसदों के खिलाफ कोई कार्रवाई हो जाए तो फिर आगे से प्रश्न काल में मौजूद रहना सभी सांसदों के लिए अनिवार्य हो जाएगा। इतना तो तय है कि सांसदों के इस लापरवाह रवैये से आम लोगों के मन में राजनीति और राजनेताओं के प्रति उभरे नफरत के भाव और गहरे ही होंगे।

2 thoughts on “सांसदों की बढ़ती लापरवाही

  1. समय पर आना, दफ्तर के नियम कायदे मानना और तमाम तरह के अनुशासनों का पालन करना सिर्फ नीजि संस्थाओं में काम करने वाले लोगों के लिए है। आपके नाम के आगे जैसे ही ‘सरकारी तमगा लगता है आप विशेष हो जाते हैं। आपको नियम कायदे तोडऩे, अनुशासनहीनता और पूर्ण आजादी से काम करने का लाइसेंस मिल जाता है। चाहे वो नेता हो या किसी सरकारी दफ्तर का अदना सा मुलाजिम सरकारी है, बस सरकारी है, यही काफी है।

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