सहायता राशि की सियासत

हिमांशु शेखर

बीते दिनों ऑक्सफैम ने एक रपट जारी की। ऑक्सफैम कई वैसी संस्थाओं का समूह है जो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सकारात्मक सामाजिक और आर्थिक बदलाव के लिए काम कर रहे हैं। ऑक्सफैम की इस रपट में यह चेतावनी दी गई है कि अगर गरीब देशों को जलवायु परिवर्तन से लडऩे के लिए अतिरिक्त धन नहीं दिया गया तो इन देशों के 45 लाख बच्चे काल की गाल में समा जाएंगे। यह कोई छोटी संख्या नहीं है।

यह संख्या इतनी बड़ी है कि इस पर विश्व के नेताओं को चिंतित होना चाहिए और ऐसी स्थिति पैदा नहीं हो पाए इस दिशा में आवश्यक कदम उठाना चाहिए। बताते चलें कि मंदी की वजह से जलवायु परिवर्तन की कोशिशों को धक्का लगने की बात वैश्विक स्तर पर की जा रही है। कहा जा रहा है कि अमीर देशों से गरीब देशों की मिलने वाली सहायता कम की जा सकती है।

इन अनुमानों के बीच ऑक्सफैम की रपट इससे उपजने वाली भयावह हालत का अहसास कराती है। दुनिया भर में जितना प्रदूषण है, उसमें सबसे ज्यादा हिस्सेदारी अमीर देशों की ही है। इन्हीं देशों के नेता वैश्विक स्तर पर अहम फैसले लेते हैं। इसलिए मंदी की वजह से ये दूसरे देशों को अलग-अलग मद में दिए जाने वाली सहायत रकम में कटौती की बात कर रहे हैं।

इसका सीधा असर उन देशों पर पड़ेगा जिनकी माली हालत ठीक नहीं है लेकिन एक वैश्विक व्यवस्था के तहत उन्हें अभी तक मदद मिलती रही है। पूरी दुनिया पर्यावरण की बिगड़ती हालत को लेकर चिंतित है। यही वजह है कि जलवायु परिवर्तन से उपजने वाली स्थिति से निपटने के लिए दुनिया के अलग-अलग देशों में अलग-अलग रणनीति अपनाई जा रही है। जाहिर है कि हर देश को इससे निपटने के लिए पैसे की जरूरत है। अमीर देशों में प्रदूषण का स्तर ज्यादा है। इस वजह से उन्हें जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ रहा है।

पर इस वजह से गरीब देशों को मिलने वाली सहायता में कटौती करने के खतरनाक परिणामों के प्रति ऑक्सफैम ने आगाह किया है। इस पर समय रहते ध्यान दिया जाना बेहद आवश्यक है। ऐसा नहीं किए जाने पर इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। 45 लाख बच्चों के काल कवलित हो जाने की संभावना को जिस गंभीरता के साथ लिया जाना चाहिए था, उस तरह इसे वैश्विक स्तर पर लिया नहीं जा रहा है। यह बेहद चिंताजनक है।

ऑक्सफैम की इस रपट में यह भी बताया गया है कि अगर जलवायु परिवर्तन से लडऩे के लिए गरीब देशों को अतिरिक्त पैसा नहीं दिया गया तो 7.5 करोड़ बच्चे स्कूल शिक्षा से दूर हो जाएंगे। इसके अलावा गरीब देशों को अभी मिल रही सहायता रकम को अगर जलवायु परिवर्तन से निपटने में लगा दिया गया तो 86 लाख लोगों को एचआईवी एड्स से निपटने की सुविधाओं से दूर होना पड़ेगा। मिलेनियम डेवलपमेंट गोल के तहत अमीर देशों की तरफ से आर्थिक सहायता मिलती रही है।

इसके तहत दुनिया भर के गरीब देशों के लिए सालाना 50 अरब डॉलर का बंदोबस्त किया गया है। ऑक्सफैम का कहना है कि मिलेनियम डेवलपमेंट गोल के तहत मिल रही सहायता की वजह से दुनिया के कई देशों में बड़े बदलाव हुए हैं। बताते चलें कि 2000 में मिलेनियम डेवलपमेंट गोल संयुक्त राष्टï्र ने तय किए थे। इसके तहत आठ बिंदुओं पर काम किया जा रहा है और इन्हें 2015 तक पूरा किया जाना है।

इसके तहत मिल रही सहायता की वजह से कई देशों में स्कूल जाने वालों बच्चों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई। कई देशों में गरीबी की मार झेल रहे लोगों की संख्या में गिरावट आई यानी वहां के लोगों की आमदनी बढ़ी। कुल मिलाजुला कर कहा जाए तो मिलेनियम डेवलपमेंट गोल के तहत हो रहे काम दुनिया के कई देशों और वहां के लोगों के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो रहे हैं। पर अब मिलेनियम डेवलपमेंट गोल के फंड को जलवायु परिवर्तन से निपटने में लगाए जाने की बात हो रही है।

इस वजह से कई लक्ष्य अधर में लटके हुए नजर आ रहे हैं। कहना न होगा कि फंड को यहां से वहां करने वाले अमीर देश ही प्रदूषण के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेवार हैं। सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन इन्हीं अमीर देशों द्वारा किया जा रहा है। इस वजह से इनकी जिम्मेदारी बनती है कि ये जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटने के लिए विशेष बंदोबस्त करें।

इसके लिए पहले से ही तय मिलेनियम डेवलपमेंट गोल के पैसे का इस्तेमाल करना सही नहीं है। अमीर देश गरीब देशों को तो इस बात पर हमेशा हड़काते रहते हैं कि वे प्रदूषण के स्तर को नियंत्रित रखें लेकिन खुद ये किसी भी तय नियम को नहीं मानते। अपने यहां के उद्योग-धंधे की सेहत खराब नहीं हो इसलिए ये तमाम प्रदूषण मानकों की उपेक्षा खुद करते हैं। ऐसा करने के बाद जाहिर है कि प्रदूषण से उपजने वाली हालात से निपटने में इन्हें ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ेगा लेकिन इसके लिए ये गरीब देशों को मिल रही सहायता में कटौती की बात कर रहे हैं।

सवाल यह उठता है कि आखिर यह कहां का नियम है कि खुद ही जान-बूझकर गलती करो और उससे अगर खराब स्थिति पैदा हो तो दूसरों का हक मार लो। कई देशों का कहना है कि मंदी की वजह से उनकी माली हालत खराब है, इसलिए वे ऐसा करने को मजबूर हैं। पर मिलेनियम डेवलपमेंट गोल के तहत मिलने वाला पैसा एक बड़े तबके के लिए जीवन और मौत का विषय बन गया है।

जाहिर है कि दुनिया भर में आई आर्थिक मंदी के लिए कम से कम यह तबका तो जिम्मेवार नहीं ही है। ऐसे में अहम सवाल यह है कि इन लोगों का क्या होगा और इनकी क्या गलती है? मंदी की आड़ में एक बड़े तबके को बुनियादी सुविधाओं से भी महरूम कर देना कहां का न्याय है?

मंदी की वजह से कई देशों में उत्पादन में कमी आई है। क्योंकि लोगों के पास पैसा नहीं होने की वजह से उन देशों में मांग घट गई और इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ा। इस वजह से कई देशों में कार्बन उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम हुआ। इसके बावजूद मंदी का बहाना बनाकर विकसित देशों द्वारा गरीब देशों को मिल रही सहायता में कटौती करने को सही नहीं कहा जा सकता है। ऐसा करना उन गरीब देशों के लोगों के साथ तो अन्याय तो होगा ही साथ ही साथ अमीर देशों के लिए भी यह अपनी जिम्मेवारियों से मुंह मोडऩे सरीखा होगा।

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