सवाल नीयत में खोट का

हिमांशु शेखर

प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद एक मर्तबा फिर आत्मनियमन की बात मीडिया में चलने लगी है। खुद मीडिया के लिए और लोकतंत्र के लिए भी किसी तरह का सरकारी नियंत्रण तो नहीं ही ठीक होगा लेकिन आत्मनियमन की बात से पहले कुछ बुनियाद बात जरूरी है। अभी जिस तरह से मीडिया और खास तौर पर खबरिया चैनलों के जरिए जिस तरह से गंध घोला जा रहा है, उसी पर बहस आकर रूक जाती है। जबकि मीडिया में व्याप्त अराजकता के सवाल को एक बड़े फलक पर ले जाया जाना चाहिए। खबरिया चैनलों की बात करते हुए इस बात को भूल जाया जा रहा है कि पत्रकारिता के बुनियादी लक्ष्यों और उसूलों का क्या हश्र हुआ। इसलिए अगर सही मायने में आत्मनियमन या आत्मानुशासन की बात को कहने से आगे ले जाकर लागू करना हो तो बातचीत के दायरे को बढ़ाने की जरूरत महसूस होना स्वाभाविक है।
अमेरिका के प्रख्यात लेखक आर्थर मिलर ने अखबारों की बाबत एक बार कहा था कि सही मायने में समाचार पत्र कहलाने का अधिकार उसे ही है जिसमें देश खुद से बात करता हुआ दिखे। आर्थर मिलर की इस बात को एक पश्चिमी लेखक की सोच कह कर खारिज नहीं किया जा सकता। इस संदर्भ में तो यह तर्क भी नहीं चलेगा कि अमेरिकी मीडिया और हिंदुस्तानी मीडिया की प्रकृति में काफी अंतर है। इसलिए आर्थर मिलर की बात का भारत में कोई महत्व नहीं है। दरअसल, आर्थर मिलर ने जो बात कही है उससे दुनिया के किसी भी देश की पत्रकारिता मुंह नहीं मोड़ सकती। भारत की पत्रकारिता की जो परंपरा रही है, उसमें तो उनकी बाद खांटी हिंदुस्तानी मालूम पड़ती है।
बहरहाल, जब आर्थर मिलर की इस कथन की कसौटी पर देखा जाए और खुद से पूछा जाए कि क्या भारत में कोई भी ऐसा अखबार है जिसमें देश खुद से बात करता हुआ दिखता है तो जवाब नकारात्मक ही होगा। यानी यहां तक बात पहुंचने के बाद निष्कर्ष साफ है कि भारत में मुख्यधारा का कोई भी अखबार इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता है। कहना न होगा कि समाज को एक दिशा देने में कम से कम भारत में समाचार पत्रों की बेहद अहम भूमिका रही है। इससे यह बात भी निकलकर सामने आ रही है कि आत्मनियमन और आत्मानुशासन की दरकार का दायरा सिर्फ खबरिया चैनलों तक ही सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। दुर्भाग्य से अब तक होता यह रहा है कि खबरिया चैनलों ने इतना उत्पात मचाया कि उसके शोर में अखबारों का अपराध दब गया। अखबारों की सामाजिक प्रासंगिकता के बारे में वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी की एक टिप्पणी भी सकारात्मक बदलाव की सोच रखने वालों को एक दृष्टि दे सकती है। उन्होंने कहा था कि अगर अखबार समाज से कट जाएंगे तो उन्हें मरने से कोई नहीं बचा सकता है। इस आधार पर अगर देखा जाए तो समाचार पत्रों की उल्टी गिनती शुरू हो गई है।
इस बात की झलक उस वक्त भी मिलती है जब आम पाठक ही अखबारों में प्रकाशित हर्फों को संदेह की निगाह से देखने लगता है। वह दौर ज्यादा पुराना नहीं है जब लोग अखबार में छपे हर शब्द को सत्य मानते थे। पर अगर आज विश्वसनीयता का संकट पैदा हुआ है तो पूरी पत्रकार बिरादरी को खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्या यही करने के लिए वे पत्रकारिता में आए थे? जब ऐसे सवालों पर विचार किया जाता है तो पहली बात जो स्पष्ट तौर पर उभर कर सामने आती है वो यह कि जब इस क्षेत्र में कदम रखा था उस वक्त तो लक्ष्य बड़े थे। पर समय के साथ लक्ष्य संकुचित होता गया और अर्थोपार्जन तक सिमट कर रह गया।
ऐसा हो जाने के बाद एक खास तरह की मानसिकता पैदा होती है, जो पत्रकारिता को भी अन्य पेशों की तरह ही मानने लगती है। यहां पर आकर सामाजिक सरोकारों और जिम्मेदारियों की बात बेमानी लगने लगती है। इसके बाद यह मानसिकता हर किसी को अपने अनुरुप ढालना चाहती है। इसका विस्तार इस रुप में देखा जा सकता है कि जब नए लोग पत्रकारिता में कदम रखते हैं तो उनके लक्ष्य बड़े होते हैं लेकिन समय के साथ उनकी धार को भी कुंद कर दिया जाता है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि पत्रकारिता में एक ऐसी व्यवस्था कायम हो गई है जो विचारों को बाजारवादी मीडिया के पक्ष में मोड़ने में सक्षम है। इसका खामियाजा विश्वसनीयता के संकट के तौर पर भुगतना पड़ रहा है। हां, यह बात अलग है कि पैसा को ही अपना माई-बाप समझने वाले मीडिया मालिकों का मुनाफा लगातार बढ़ता जा रहा है और उनके लिए अखबार या कोई भी मीडिया संस्थान चलाना एक दुकान चलाने की तरह ही है।
इसी के परिणाम के तौर पर यह देखा जा सकता है कि अखबारों, पत्रिकाओं और खबरिया चैनलों के साथ वेब जैसे नए समाचार माध्यमों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही। पर सामग्री के स्तर पर जो दिवालियापन दिख रहा है। संख्या तो बढ़ रही है लेकिन सामग्री से आत्मा गायब दिखती है। यहीं पर ‘आज’ के संस्थापक संपादक बाबूराव विष्णु पराड़कर की वह बात जेहन में कौंधती है जिसमें उन्होंने कहा था कि समाचार पत्र सर्वांग सुंदर तो होंगे लेकिन उसमें आत्मा नहीं होगी। दशकों पहले कही गई यह बात आज बिल्कुल सही मालूम पड़ती है। अखबार रंगीन हो गए हैं। उनकी छपाई में व्यापक बदलाव हो गया है। आर्थिक मंदी की वजह से थोड़े दुबले होने के बावजूद अखबारों की बाहरी सुंदरता में कोई कमी नहीं आई है लेकिन सामग्री के स्तर पर दिनोंदिन गिरावट ही देखी जा सकती है। इसलिए सामग्री के दिवालिएपन भी सवाल उठाए जाने की जरूरत है।
इस तरह की बात करने पर बड़े मीडिया समूहों के संपादकों का पहला तर्क यही होता है कि हम तो वही पाठकों तक पहुंचा रहे हैं, जो वे चाहते हैं। वे कहते हैं कि हम कौन होते हैं तय करने वाले कि क्या प्रकाशित किया जाए या फिर क्या प्रसारित किया जाए। वे यह भी जोड़ते हैं कि अखबार या खबरिया चैनल वे खुद के लिए नहीं चला रहे हैं बल्कि दर्शकों-पाठकों के लिए चला रहे हैं। सतही तौर पर देखने के बाद ये बातें किसी को प्रभावित कर सकती हैं। इस संदर्भ में प्रख्यात अमेरिकी पत्रकार जेम्स कैरी ने कहा था कि हमलोगों ने ऐसी पत्रकारिता विकसित कर ली है जिसमें हम हर चीज को जनता के नाम पर सही ठहराते हैं। पर इस पत्रकारिता में जनता की कोई भूमिका नहीं होती सिवाए दर्शक, स्रोता या पाठक बनने के। जेम्स कैरी की बातों को विस्तार दिया जाए तो यह स्पष्ट है कि मीडिया जो कुछ भी परोसती है, उसमंे जनता की कोई भूमिका नहीं होती है। हर मीडिया संस्थान में मोटी पगार पाने वाले बड़े ओहदों पर बैठे लोग ही यह तय कर लेते हैं कि क्या दिखाना है या प्रकाशित करना है और क्या नहीं दिखाना है या नहीं प्रकाशित करना है। इसके बाद अपने स्वार्थ साधने के वास्ते लिए गए निर्णयों को जनता की इच्छा कहकर सही ठहरा दिया जाता है। इस चाल को समझने की जरूरत है।
खबरिया चैनलों के पास खुद के द्वरा फैलाई गई खबरिया अराजकता को सही ठहराने के लिए टीआरपी का हथियार भी हर समय मौजूद रहता है। वे यह बताते हुए नहीं अघाते कि जिन चीजों को दिखाने पर सबसे ज्यादा आलोचना होती है उसकी टीआरपी यानी टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट सबसे अधिक होती है। पर टीआरपी तय करने की व्यवस्था ही बेहद दोषपूर्ण है। इस बात को लेकर संसदीय समिति की एक एक रपट भी बीते दिनों संसद में आई है। इसमें भी उन कमियों को रेखांकित किया गया है जिन पर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं। अब यह बात तय हो गई है कि टीआरपी की व्यवस्था चैनलों की दर्शक संख्या तय करने वाली सही व्यवस्था नहीं है। यहां यह बताते चलें कि टीआरपी नापने का काम मुंबई की एक एजेंसी टैम यानी टेलीविजन आॅडिएंस  मेजरमेंट करती है। इसने देश के महनगरों में सात हजार बक्से लगा रखे हैं। इन्हीं सात हजार बक्सों के मार्फत पूरे देश के टेलीविजन दर्शकों की पसंद-नापसंद को तय कर दिया जाता है। टीआरपी नापने वाला कोई भी बक्सा पूर्वोत्तर के राज्यों या फिर बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में नहीं लगा हुआ है। इस टीआरपी व्यवस्था से जुड़ा एक सवाल ये भी है कि महानगरों के किन घरों में ये बक्से लगते हैं उससे कम से कम आम नागरिक और एक हद तक खुद को खास नागरिक कहने वाले भी बेखबर हैं। टैम का दावा है कि बक्से लगाने वाले घर हमेशा बदलते रहते हैं लेकिन जमीनी अनुभव को देखते हुए इस दावे पर भी संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।
अगर सही मायने में पत्रकारिता की प्रासंगिकता को बनाए रखना है तो नियत में बदलाव की दरकार है। पहले पत्रकारों को ही तय करना होगा कि वे बदलाव चाहते हैं। जो हो रहा है, वही ठीक है कि सोच के साथ काम करने के साथ पत्रकारिता तो अप्रासंगिक और अविश्वसनीय तो होती ही जा रही है साथ ही साथ खुद पत्रकारों की साख पर भी इसका नकारात्मक असर हो रहा है। अगर नियत में खोट रहेगा तो आत्मनियमन और आत्मानुशासन की व्यवस्था को बनाए रखकर भी पत्रकारिता के साख को बरकरार नहीं रखा जा सकता है। पहले से बनी आचार संहिताओं के हश्र में हर कोई वाकिफ है। यह बताने की जरूरत नहीं है कि प्रेस परिषद द्वारा तय किए गए दिशानिर्देशों का कितना पालन किया गया। यह भी याद दिलाने की आवश्यकता मालूम नहीं पड़ती कि खुद को विश्वस्तरीय और बेहद पेशेवर मानने वाली संस्थाओं ने खुद के लिए जो दिशानिर्देश तय किए उसका क्या हुआ। इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार को अपना खुला खेल खेलने देने की वकालत की जाए। बल्कि अपनी पुरानी गलतियों से सबक लेकर एक ऐसी व्यवस्था कायम की जाए जो सही मायने में हर माध्यम की पत्रकारिता में आत्मनियमन और आत्मानुशासन को जमीनी स्तर तक ले जाए। इसी में सबकी भलाई है।

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