सरकार चाहती है मंहगाई बढ़े

हिमांशु शेखर

बीते दिनों देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह बयान दे डाला कि अभी महंगाई और बढ़ेगी, इसका सामना करने के लिए देश के नागरिकों को तैयार रहना चाहिए। मनमोहन सिंह की पहचान एक बेहद प्रतिभाशाली अर्थशास्त्री के तौर पर देश में ही नहीं है बल्कि विदेशों में भी है। उनके विपक्षी भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि वे एक राजनेता की तुलना में बेहतर अर्थशास्त्री हैं। पर उन्होंने महंगाई को लेकर जो बयान दिया है उसकी उम्मीद तो अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह भी नहीं की जा सकती थी। प्रधानमंत्री के तौर पर तो ऐसा बयान देना और भी खतरनाक है।

बहरहाल, उनके दिमाग में चाहे जो भी रहा हो लेकिन उन्होंने एक ऐसा बयान दे डाला है जिसकी मार सीधे लोगों के जेब पर पड़ रही है। जी हां, यह सुनने में आश्चर्यजनक अवश्य लग सकता है लेकिन है यह सोलह आने सच। प्रधानमंत्री के सुर में सुर मिलाते हुए उनके बयान के दो दिनों बाद ही रिजर्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव ने यह कह डाला कि लोेग और अधिक महंगाई झेलने के लिए तैयार रहें। वे यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने यह भी कह डाला कि रिजर्व बैंक महंगाई रोकने के लिए अभी कोई कदम नहीं उठाएगी। बैंक हालत पर नजर बनाए हुए है और समय आने पर उचित कदम उठाएगी।

महंगाई की मार से पहले से ही लोग बेहाल थे उस पर इन दो लोगों के बयान ने जले पर नमक छिड़कने का काम किया है। पहले ही बाजार के धुरंधरों ने भावना के आधार पर महंगाई को हवा दे रखी है। सही मायने में कहा जाए तो महंगाई की कोई वाजिब वजह है ही नहीं। यह बात कई अर्थशास्त्री और बाजार के जानकार कह रहे हैं। मांग और आपूर्ति में कहीं कोई असंतुलन नहीं है। आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन जितना पिछले सीजन में उत्पादन हुआ था, उतना ही इस सीजन में भी हुआ है। इसके बावजूद महंगाई का बढ़ते जाना कई तरह के सवाल खड़े करता है।

बाजार के धुरंधरों ने यह माॅनसून में हुई देरी के आधार पर सबसे पहले भावनाओं को उभारा। इन लोगों ने ऐेसा माहौल बनाया कि माॅनसून में देरी की संभावना का सीधा सा मतलब यह है कि लोगों को उपयोगी उपभोक्ता वस्तुओं के लिए ज्यादा पैसा चुकाना पड़े। इसके बाद इन बाजारवादी ताकतों के पक्ष में एक बात और चली गई कि कुछ राज्यों में सूखा की स्थिति पैदा हो गई। इसका फायदा इन बाजारवादी ताकतों ने खूब उठाया और अभी भी उठा रहे हैं। इन लोगों ने ऐसा माहौल बना दिया कि सूखा की वजह से आपूर्ति चरमरा गई है और मांग बढ़ती ही जा रही है। इस वजह से महंगाई को काबू में रखना संभव नहीं है।

इसी भावना के आधार पर कारोबारियों ने मनमाने तरीके से दाम बढ़ाना शुरू कर दिया है और दाम बढ़ाने का यह सिलसिला थमता हुआ नजर नहीं आ रहा है। यह सब तब किया जा रहा है जब देश के पास चावल और गेहूं का सरप्लस भंडार मौजूद है। दरअसल, इस महंगाई को जमाखोरों और कालाबाजारियों ने पैदा किया है। इन लोगों ने जानबूझ कर बाजार में बनावटी आपूर्ति संकट पैदा किया और उसकी आड़ में मनमाने तरीके से दाम बढ़ाए। इन्हें पता है कि इनके खिलाफ कोई कार्रवाई तो होनेे वाला नहीं है। इसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है।

इन जमाखोरों का मनोबल बढ़ाने का काम प्रधानमंत्री और रिजर्व बैंक के गवर्नर के बयान ने किया। इन बयानों ने इन बाजारवादी ताकतों द्वारा माहौल को मजबूती देने का काम किया है। इनके जरिए अब आम लोगों को भी यह लगनेे लगा है कि जब प्रधानमंत्री ही खुद कह रहे हैं तो बात में कुछ दम है और महंगाई इस समय का सच है। इसका फायदा जमाखोरों को मिल रहा है और वे दामों में अनाप-शनाप बढ़ोतरी करते ही जा रहे हैं। अगर कोई उनसे सवाल उठाने का साहस कर दे तो वे प्रधानमंत्री और रिजर्व बैंक के गवर्नर के बयानों का हवाला देकर उसका मुंह बंद कर देंगे।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब महंगाई के वास्तविक कारण नदारद हैं तो फिर प्रधानमंत्री और रिजर्व बैंक के गवर्नर इस तरह  के बयान क्यों दे रहे हैं? दरअसल, सच तो यह है कि सरकार महंगाई रोकना ही नहीं चाहती है। यह चैंकाने वाली बात है लेकिन हकीकत यही है। अब सवाल उठता है कि आखिर सरकार महंगाई पर काबू क्यों नहीं पाना चाहती है? इस सवाल के जवाब में कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं कि महंगाई के बढ़ने से जीडीपी में बढ़ोतरी होती है और सरकार किसी भी कीमत पर जीडीपी को सम्मानजनक स्तर पर बनाए रखना चाहती है। अगर जीडीपी का स्तर सम्मानजनक रहा तो सरकार वैश्विक स्तर पर यह बात प्रचारित करेगी कि विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के बावजूद हम जीडीपी को बेहतर बनाए रखने में सफल रहें। इसके जरिए सरकार विदेशी निवेश को आकर्षित करने के काम को अंजाम देने की कोशिश करेगी। ऐसा करके सरकार खुद अपना पीठ थपथपाने का काम करेगी।

देविंदर शर्मा तेजी से बढ़ती महंगाई के लिए आर्थिक व्यवस्था की बुनियादी कमी को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका कहना है कि बाजार को इस तरह से खुला छोड़ दिया गया है कि यह बेलगाम घोड़े की तरह भाग रहा है। सही मायने में यह नई आर्थिक नीतियों का दुष्परिणाम है। इन्हीं नीतियों के पैरोकार यह कहते हुए नहीं अघाते कि बाजार को स्वतंत्र छोड़ दो यह खुद को अपने आप सुधार लेगी। इस पर देविंदर शर्मा कहते हैं कि बाजार को खुला छोड़ने का नतीजा हम सब देख ही रहे हैं, इसलिए अब वक्त आ गया है कि बाजार को काबू में किया जाए और इस पर नियंत्रण करने की प्रभावी व्यवस्था विकसित की जाए। ऐसा करने से देश के एक बड़े तबके को बाजारवादी ताकतों के शोषण से मुक्ति मिलेगी।

यह जानना जरूरी है कि आखिर जीडीपी है क्या बला? वैसे तो इसे सकल घरेलू उत्पाद कहा जाता है। इसकी आर्थिक जटिलताओं में न जाते हुए सामान्य शब्दों में इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि अगर एक हाथ से दूसरे हाथ में पैसा जाता है तो जीडीपी बढ़ती है। लोगों के बीच जितना ज्यादा पैसे का लेन-देन होगा और इस लेन-देन में जितने ज्यादा लोग शामिल होंगे उतनी ही जीडीपी बढ़ेगी। अगर यह लेन-देन कम होगा तो जीडीपी में कमी आएगी। बजाहिर, जब महंगाई बढ़ेगी तो ज्यादा पैसे का लेन-देन होगा और इससे जीडीपी के आंकड़ों को सुधारने में सरकार को मदद मिलेगी। यही वजह है कि सरकार महंगाई रोकने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठा रही है और रिजर्व बैंक भी अपने हाथ खड़े कर रहा है।

जिस सूखा को आधार बनाकर महंगाई को बढ़ाया जा रहा है उसका असर दिखने में अभी कम से कम चार महीने लगेंगे। इसके बावजूद उत्पादन में कमी का माहौल बनाकर महंगाई को बेलगाम बढ़ाया जा रहा है। सूखे की वजह से उत्पादन में कमी की आशंका तो जताई जा रही है लेकिन इस बात को आधार बनाकर महंगाई को बढ़ाने वाले इस बात का उल्लेख नहीं कर रहे हैं कि देश के पास अनाज का कितना अतिरिक्त भंडार है। क्योंकि, इससे इन बाजारवादी ताकतों को आर्थिक लाभ मिल रहा है और उन्हें देश की आम जनता के शोषण का अवसर भी मिल रहा है। आश्चर्यजनक बात तो यह है कि सरकारी स्तर पर भी इस बात को बताने का प्रयास नहीं किया जा रहा है। इससे भी लगता है कि सरकार की प्राथमिकता में महंगाई को काबू में करना नहीं है या यों कहें कि सरकार महंगाई पर लगाम कसना ही नहीं चाहती है।

दरअसल, महंगाई को बढ़ाने में वायदा कारोबार भी बड़ी भूमिका निभा रहा है। देश के वायदा कारोबार में बहुत बड़े-बड़े खिलाड़ी शामिल हैं। ये ऐसे खिलाड़ी हैं जो सत्ता से संबंध रखते हैं और ये अपने हितों को साधने वाले नीतियों को आगे बढ़वाने का काम कर रहे हैं। वायदा कारोबारी ने जमाखोरी को जितना बढ़ावा दिया है, उतना किसी और चीज ने नहीं दिया। महंगाई पर काबू पाने के लिए वायदा कारोबार से कृषि उत्पादों को बाहर निकालने की सलाह कई काबिल अर्थशास्त्री लगातार दे रहे हैं लेकिन सरकार इसे बढ़ावा देने का ही काम कर रही है।

केंद्र सरकार राज्यों को दिखावे के लिए सलाह दे रही है कि जमाखोरों के खिलाफ कार्रवाई की जाए लेकिन अहम सवाल यह है कि वह खुद क्या कर रही है? केंद्र जिस तरह से हाथ पर हाथ धरे बैठी है उससे तो यही लगता है कि उसके लिए देश के आम लोगों का हित अहम नहीं है बल्कि उसके लिए कारोबारियों, जमाखोरों, कालाबाजारियों, पूंजीपतियों और विदेशी निवेशकों का हित ही अहम है।

1 thought on “सरकार चाहती है मंहगाई बढ़े

  1. neheru ke samajwadi model ka yahi haal hona tha… in vidhwa vilapo main pahle hi kafi samay barbaad ho chuka hai… baar naar ek baat kahne se behtar hai ki iss ceptlistic model ko sire se toda jaye… bhartiya kheti ke mudde ko sarkaren itni aasaani se nahin hi samjhengii

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