संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन क्यों अपना दूसरा कार्यकाल पूरा नहीं कर सकती

हिमांशु शेखर

एम. करुणानिधी ने जैसे ही यह घोषणा की कि द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ;डीएमकेद्ध मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार से समर्थन वापस लेगी वैसे ही हर तरफ केंद्र सरकार के असमय विदा होने को लेकर हर तरफ तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे। एक तरफ डीएमके सांसद रात के करीब 11 बजे राष्टपति भवन जाकर समर्थन वापसी की चिट्ठी दे रहे थे तो दूसरी तरफ खबरिया चैनलों पर मुलायम सिंह यादव की अगुवाई वाली समाजवादी पार्टी के दूसरी पंक्ति के नेता यह कहकर लगातार भ्रम बढ़ा रहे थे कि बदली सियासी परिस्थितियों में केंद्र सरकार को समर्थन बरकरार रखने से संबंधित फैसला पार्टी और मुलायम सिंह यादव बैठक के जरिए करेंगे।

पलटमार राजनीति के महारथी मुलायम सिंह यादव ने अगले दिन यह कहकर और भ्रम बढ़ा दिया कि पार्टी इस बारे में कोई फैसला संसदीय बोर्ड की बैठक में लेगी। लेकिन अगले दिन जब बैठक हुई उसके पहले मुलायम सिंह यादव समेत पूरे देश तक यह खबर पहुंच गई थी कि डीएमके नेताओं के घरों पर सीबीआई के सर्वेक्षण छापे पड़े हैं। इसके बाद मुलायम सिंह ने एक बार फिर ‘सांप्रदायिक ताकतों’ कों केंद्र की सत्ता से बाहर रखने का वास्ता देते हुए संप्रग सरकार को समर्थन बरकरार रखने की घोषणा कर दी। सीबीआई छापों के लिए समय के चयन पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने सार्वजनिक तौर पर खेद जरूर जताया लेकिन इसका फायदा उनकी सरकार को सपा के समर्थन के तौर पर मिल गया था। सपा से कांग्रेस में आकर मंत्री बने बेनी प्रसाद वर्मा ने मुलायम सिंह यादव के बारे में जो बुरा-भला कहा था उसे भी सपा ने भुला दिया। अब ऐसे में यह अहम सवाल हर तरफ बना हुआ है कि यह समर्थन कब तक है और सपा-बसपा की बैसाखी पर यह सरकार कब तक चलेगी। सपा-बसपा की राजनीति और उनके वोट बैंक को समझने वाले लोग यह तो साफ तौर पर नहीं बता पा रहे हैं कि यह सरकार कब तक चलेगी लेकिन दावे के साथ यह जरूर कह रहे हैं कि संप्रग की दूसरी सरकार अपना कार्यकाल तो पूरा नहीं करेगी।

अब ऐसे में इस पहेली को समझना जरूरी हो जाता है कि सपा और बसपा के समर्थन से चलने वाली बहुमत की यह सरकार आखिर अपना कार्यकाल क्यों नहीं पूरा कर पाएगी? कांग्रेस के लोग औपचारिक तौर पर इस बात को यह कहते हुए खारिज कर रहे हैं कि जब ममता बनर्जी की पार्टी केंद्र सरकार से निकली थी तो उस वक्त भी इसी तरह के कयास लगाए जा रहे थे लेकिन सरकार गिरी नहीं और अब भी चल रही है और डीएमके के जाने के बाद भी चलती रहेगी। लेकिन दूसरी तरफ तथ्य यह भी है कि राहुल गांधी पार्टी संगठन की जितनी भी बैठकें कर रहे हैं, सभी में वे पार्टी पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं से चुनाव के लिए तैयार रहने को कह रहे हैं। खुद कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी ने इसी तरह की बात कही है।
सच्चाई तो यह है कि खुद कांग्रेस को उत्तर प्रदेश के दोनों सहयोगियों मुलायम सिंह यादव और मायावती पर भरोसा नहीं है। जब ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार से अपनी पार्टी का समर्थन वापस लिया था तो उस वक्त कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता और दो बड़े राज्यों में पार्टी के प्रभारी नाम नहीं छापने की शर्त पर तहलका से जो कहा था, वह सपा-बसपा को लेकर कांग्रेस की राय को समझने के लिए प्रासंगिक है। वे कहते हैं, ‘उत्तर प्रदेश में हम मुलायम सिंह यादव और मायावती के खिलाफ विधानसभा चुनावों में लड़े थे। अब ये दोनों हमारा साथ दे रहे हैं। कांग्रेस के कई नेता और खास तौर पर राहुल गांधी यह मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति सुधारे बगैर पार्टी को केंद्र की राजनीति में और मजबूत नहीं किया जा सकता।

इसलिए मुलायम और मायावती का साथ कांग्रेस के लिए कोई लंबी अवधि की रणनीति का हिस्सा नहीं हो सकता। अभी प्राथमिकता सरकार को बचाते हुए बचे कार्यकाल में मौजूदा नकारात्मक माहौल को बदलने की है इसलिए हम इनका साथ ले रहे हैं।’ वे आगे कहते हैं, ‘हमें पता है कि मुलायम आधे-अधूरे मन से हमारा समर्थन कर रहे हैं। उन्हें आज इस बात का भरोसा हो जाए कि उनके समर्थन वापस लेने से यह सरकार गिर जाएगी तो आज वे ऐसा कर दें। लेकिन उन्हें पता है कि उनके समर्थन वापस लेते ही मायावती हमारी सरकार को बचा लेंगी। मुलायम चाहते नहीं हैं कि केंद्र की सत्ता में हिस्सेदारी लेकर मायावती मजबूत हों। उनकी रणनीति मायावती को सत्ता से दूर रखते हुए उत्तर प्रदेश की उन योजनाओं के लिए धन निकालने की है जिसकी घोषणा उन्होंने चुनावों के दौरान किया था। इसलिए हमें चिंता सपा-बसपा की नहीं बल्कि अन्य सहयोगियों की है।’ यह बात तब की है जब डीएमके केंद्र सरकार के साथ थी और सपा-बसपा में से किसी एक के सहयोग से भी सरकार बच जाती। लेकिन आज स्थितियां अलग हैं। आज केंद्र सरकार को अपना बचा हुआ कार्यकाल पूरा करने के लिए इन दोनों धुर विरोधियों का साथ चाहिए।

अब ऐसे में सवाल यह उठता जब दोनों में से एक के अलग होने से केंद्र की सरकार गिर जाएगी तो फिर दोनों केंद्र सरकार के साथ क्यों बने हुए हैं। जानकार इस सवाल के जवाब में दो वजह गिनाते हैं। माना जाता है कि मुलायम और मायावती को धमकाने के लिए कांग्रेस बार-बार सीबीआई के डंडे का इस्तेमाल करती है। मुलायम द्वारा कांग्रेस को साथ दिए जाने को सीधे तौर पर इससे जोड़कर ही देखा जाता है। मायावती भी आय से अधिक संपत्ति मामले में फंसी हुई हैं। उन्होंने कई बार यह सार्वजनिक तौर पर भी कहा है कि केंद्र सरकार सीबीआई का दुरुपयोग करती है। इसलिए उन्हें यह पता है कि केंद्र सरकार सीबीआई के जरिए उनके लिए मुश्किलों का पहाड़ खड़ा कर सकती है। इसलिए मायावती कोई ऐसा कदम उठाने से बचती रही हैं जो मनमोहन सिंह सरकार को अस्थिर करे।

कुछ लोग यह कह सकते हैं कि दोनों में से किसी एक के हट जाने से केंद्र की सरकार गिरती दिख रही है तो फिर सीबीआई का डर इन दोनों पार्टियों को नहीं होना चाहिए। लोकसभा के संख्या बल को अगर देखा जाए तो मौजूदा परिस्थितियों में यह बात साफ है कि दोनों में से किसी एक के हटते ही मनमोहन सिंह सरकार गिर जाएगी। लेकिन यहां यह समझना होगा कि सरकार गिरने से मुलायम सिंह यादव और मायावती के मुकद्दमे खत्म नहीं होगें और न ही इसे कमजोर करवाया जा सकेगा। ऐसे में इन दोनों की रणनीति यह होगी कि केंद्र के साथ कुछ समय तक रहते हुए और केंद्र सरकार की कमजोरी का फायदा उठाया जाए और अपने मुकद्दमों को कमजोर करवाया जाए। एक ऐसी परिस्थिति में जब केंद्र सरकार मुलायम-माया के समर्थन के बिना एक दिन भी नहीं चल सकती, मनमोहन सिंह सरकार को इन दोनों की कई जायज-नाजायज मांगों को मानना मजबूरी है। ऐसे में मुलायम और माया की रणनीति इस मजबूरी का फायदा उठाने की है।

सपा द्वारा तुरंत समर्थन वापसी का फैसला नहीं लिए जाने की एक और बड़ी वजह यह है कि पार्टी अभी चुनावों के लिए तैयार नहीं है। सपा समेत किसी भी राजनीतिक दल को यह अंदेशा नहीं था कि डीएमके इस तरह से केंद्र सरकार से समर्थन वापसी का फैसला कर लेगी। हालांकि, यह बात कांग्रेस समेत हर सियासी दल को पता था कि डीएमके में समर्थन वापसी को लेकर बातचीत पिछले एक साल से चल रही है। करुणानिधी के उत्तराधिकारी माने जा रहे उनके पुत्र स्टालिन उस धड़े की नुमाइंदगी कर रहे थे जो केंद्र सरकार से समर्थन वापसी के पक्ष में था। लेकिन करुणानिधि की पहचान एक ऐसे नेता के तौर पर रही है जो संबंधों को निभाने के लिए जाना जाता है। यह करुणानिधि ही हैं जिनकी वजह से अब तक डीएमके सरकार के साथ बनी रही। नहीं तो तकरीबन साल भर पहले ही डीएमके केंद्र सरकार से अलग हो जाती। तमिलनाडु में जयललिता की बढ़ती ताकत और केंद्र सरकार की नाकामियों ने प्रदेश में डीएमके के लिए अपनी ताकत को बनाए रखना मुश्किल कर दिया था। जयललिता जब केंद्र पर निशाना साधतीं तो लगे हाथ डीएमके को कोसने से भी परहेज नहीं करतीं। जब दिल्ली में आयोजित राष्टीय विकास परिषद की बैठक बीच में छोड़कर जयललिता निकलीं तो तमिलनाडु में जाकर उन्होंने इस मामले को प्रदेश के मुख्यमंत्री या यों कहें कि प्रदेश के लोगों के अपमान के तौर पर पेश किया। वे डीएमके पर यह कहते हुए निशाना साधने से नहीं बाज आईं कि जिस केंद्र सरकार ने ऐसा किया वह हमारे ही प्रदेश की पार्टी डीएमके के समर्थन से चल रही है। अब जब श्रीलंका में तमिलों के खिलाफ हो रहे अमानवीय बर्ताव के मुद्दे ने तूल पकड़ा तो जयललिता ने फिर से डीएमके पर हमलों की बरसात कर दी। यह मुद्दा तमिलनाडू में भावनात्मक है। यही वजह है कि डीएमके नेताओं को यह लगा कि केंद्र सरकार से अलग होने के लिए इससे अच्छा मौका और मुद्दा नहीं मिल सकता।

हालांकि, इस बार भी करुणानिधि समर्थन वापसी के पक्ष में नहीं थे और उन पर दबाव बनाने के लिए स्टालिन को यह धमकी तक देनी पड़ी कि अगर आप समर्थन वापसी का फैसला नहीं लेते तो मैं पार्टी पदाधिकारी पद से इस्तीफा दे दूंगा। इसके बाद ही करुणानिधि ने केंद्र सरकार से समर्थन वापसी का फैसला लिया। सच्चाई तो यह है कि केंद्र सरकार ने संयुक्त राष्ट मानवाधिकार परिषद में श्रीलंका के खिलाफ वोट देने की करुणानिधि की मांग मान ली थी। लेकिन स्टालिन के दबाव में करुणानिधि ने केंद्र के सामने लोकसभा में प्रस्ताव पास कराने की नई मांग रख दी। जब तक केंद्र सरकार इस बारे में कोई अंतिम फैसला करती तब तक डीएमके समर्थन वापसी का अंतिम फैसला ले चुकी थी।

यह बात हर राजनीतिक दल समझ रही है कि डीएमके ने केंद्र से समर्थन वापसी सरकार को गिराने के मकसद से नहीं बल्कि तमिलनाडु में अपनी जमीन को बचाने के मकसद से लिया है। ऐसे में कोई भी दल जल्दबाजी में चुनाव में नहीं जाना चाहता। समाजवादी पार्टी की भी अपनी मुश्किलें हैं। उत्तर प्रदेश के लोगों की भारी उम्मीदों पर सवार होकर अखिलेश यादव 224 सीटें लेकर विधानसभा पहुंचे। प्रदेश के लोगों को उम्मीद थी कि पंचम तल पर अखिलेश के आते ही सूबे में बदलाव की बयार बहेगी। लेकिन हो उलटा रहा है। कानून-व्यवस्था की बदहाली किसी से छिपी हुई नहीं है। अखिलेश सरकार की नाकामियों को विस्तार से तहलका ने अपने पिछले अंक की आवरण कथा ‘चैपट राजकुमार’ के जरिए लोगों के सामने लाया। ऐसे में प्रदेश में सपा के खिलाफ नकारात्मक माहौल बना है। इस स्थिति में चुनाव के लिए जाना सपा के लिए काफी जोखिम का काम है। यही वजह है कि मुलायम सिंह यादव कुछ समय तक केंद्र के साथ रहकर प्रदेश के लिए बड़ा आर्थिक पैकेज लेने की कोशिश करेंगे और फिर उसके जरिए सूबे में कुछ काम करवाने की कोशिश करेंगे। उन्हें उम्मीद होगी कि इससे राज्य में सपा के प्रति लोगों के मन में पैदा हुआ नकारात्मक भाव थोड़ा कम होगा और चुनावों में उन्हें फायदा होगा।

लेकिन मुलायम सिंह से लेकर मायावती को भी यह पता है कि केंद्र में कांग्रेस के साथ रहते हुए वे प्रदेश के चुनावों में नहीं जा सकते हैं। क्योंकि प्रदेश में चार सियासी धु्रव हैं और इसमें कांग्रेस, सपा और बसपा तीनों एक-दूसरे से समान दूरी पर हैं। इसलिए अपने खिलाफ चले रहे मुकद्दमों के कमजोर करवाने का काम मुलायम सिंह यादव और मायावती को जल्दी ही करवाना होगा। वहीं केंद्र से उत्तर प्रदेश के लिए आर्थिक पैकेज झटकने का काम भी मुलायम-अखिलेश की जोड़ी को जल्द से जल्द करना होगा। क्योंकि अगर आम चुनाव तय वक्त पर भी होते हैं तो इसमें बमुश्किल साल भर का वक्त बचा है। ऐसे में दिल्ली में एक ही टीम का हिस्सा दिख रहे सपा और बसपा को न सिर्फ एक-दूसरे के खिलाफ बल्कि कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए कम से कम छह महीने का वक्त तो चाहिए ही। तब ही तो वे लोगों के बीच जाकर एक बार फिर से एक-दूसरे को उसी तरह से गाली दे पाएंगे जिस तरह से उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों में दे रहे थे।

कांग्रेस के रणनीतिकारों को भी ये परिस्थितियां अच्छी तरह से मालूम हैं। लेकिन उनकी रणनीति इन्हीं बैसाखियों के जरिए कार्यकाल पूरा करने की है। कांग्रेस यह सुनिश्चित करने में भी लगी है कि सपा और बसपा में यह आत्मविश्वास पैदा नहीं हो पाए कि उनमें से किसी एक के हटने से केंद्र की सरकार गिर जाएगी। यही वजह है कि जब डीएमके ने समर्थन वापसी का फैसला किया तो कांग्रेस ने कमलनाथ के जरिए ममता बनर्जी से संपर्क साधा। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि ममता बनर्जी और कमलनाथ के बीच अच्छे संबंध हैं। कांग्रेस ने मुलायम को यह संदेश देने की कोशिश की कि अगर वे हटते हैं तो ममता बनर्जी सरकार को बचा सकती हैं। डीएमके नेताओं के यहां सीबीआई अधिकारियों का जाना ने मुलायम को संभावित खतरों का अहसास भी करा दिया। उधर ममता भी यह नहीं चाहती हैं कि आनन-फानन में केंद्र से समर्थन वापसी लेकर और मनमोहन सिंह सरकार को गिराकर मुलायम सिंह नायक बन जाएं। क्योंकि सभी क्षेत्रीय सियासी खिलाड़ियों में इस बात को लेकर संघर्ष चल रहा है कि गैर कांग्रेस और गैर भाजपा धड़े में सबसे बड़ा नेता कौन है। कोई नहीं चाहता कि केंद्र सरकार को गिराने का श्रेय किसी और को मिल जाए। मुलायम द्वारा तुरंत समर्थन वापसी का फैसला नहीं लिए जाने को भी कई राजनीतिक जानकार इससे जोड़कर ही देख रहे हैं। क्योंकि मुलायम अगर अभी ऐसा करते तो भी सरकार गिराने का श्रेय डीएमके को मिल जाता। शह और मात के इसी खेल में ममता बनर्जी ने एक और सियासी चाल चली और श्रीलंका मुद्दे पर यह कहकर मुलायम पर दबाव बना दिया कि उनकी सरकार यह मानती है कि विदेश मामलों में केंद्र सरकार को ही फैसला करना चाहिए और केंद्र सरकार जो भी फैसला करेगी उसे तृणमूल का समर्थन हासिल होगा। मतलब साफ था कि अगर मुलायम सिंह अभी सरकार गिराएंगे तो ममता यू टर्न भी ले सकती हैं।

ऐसे में सवाल यह है कि अगर सरकार के जाने की कोई स्थिति कुछ महीने बाद पैदा होती है तो क्या क्रांतिकारी अंदाज में केंद्र सरकार से अलग हुईं ममता बनर्जी कांग्रेस का साथ देंगी? जो लोग ममता बनर्जी और बंगाल की राजनीति को समझते हैं, वे इसका नकारात्मक जवाब देते हैं। छोटे बचत पर जिस तरह से केंद्र सरकार ने ब्याज दर घटाने का फैसला किया और ममता बनर्जी ने इसे जनविरोधी बताया उससे साफ है कि केंद्र की नीतियों से ममता का सामंजस्य बैठना मुश्किल है। इसके अलावा और भी कई मुद्दे हैं जिस पर कांग्रेस और ममता में गहरे मतभेद हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल में हुए उपचुनावों में तृणमूल की हार ने यह संकेत जरूर दिया है कि प्रदेश में ममता के लिए अकेले चलने की राह उतनी आसान नहीं है जितना वह समझ रही थीं। राजनीतिक जानकारों की मानें तो ऐसे में ममता की रणनीति यह होगी कि वे कांग्रेस से अलग रहते हुए भी अपने संबंध ठीक-ठाक रखें ताकि अगले लोकसभा चुनावों के बाद राजनीतिक समीकरणों को दोनों दल अपने पक्ष में मोड़ सकें। क्योंकि ममता के लिए सबसे बड़ी चुनौती है वाम दलों को पश्चिम बंगाल की सत्ता से बाहर रखना। लेकिन इसका मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि अगले कुछ महीनों में अगर मनमोहन सिंह सरकार जाती है तो फिर इसे बचाने के लिए ममता आगे आएंगी। क्योंकि ऐसा करते ही ममता अपनी उस ‘आम आदमी समर्थक’ छवि को खो देंगी जो उन्होंने खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के मसले पर केंद्र से अलग होकर गढ़ी है।

मुलायम और मायावती को अपने साथ यथासंभव बनाए रखने के मकसद से केंद्र सरकार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर भी डोरे डाल रही है। पिछले दिनों नीतीश कुमार ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने के मसले पर दिल्ली में बड़ी रैली को संबोधित किया। केंद्र सरकार ने यह संकेत देना शुरू किया है कि वह बिहार सराकर की इस मांग पर विचार कर सकती है। कांग्रेस के रणनीतिकार यह संकेत देकर मुलायम सिंह और मायावती को यह बताना चाहते हैं कि अगर उन्होंने बाएं-दाएं किया तो विशेष राज्य का दर्जा देकर वे नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड का समर्थन हासिल कर लेंगे। लेकिन सच्चाई यह है कि बिहार के विशेष राज्य के दर्जे के मसले पर कांग्रेस और जदयू दोनों अपनी-अपनी सियासी चाल चल रहे हैं और दोनों को यह पता है कि उनके लिए एक राजनीतिक मंच पर खड़ा होना काफी मुश्किल है। कांग्रेस को यह पता है कि विशेष राज्य का दर्जा बिहार को देने के लिए संविधान संशोधन करना होगा और ऐसा करते ही उड़ीसा और पश्चिम बंगाल भी विशेष राज्य का दर्जा मांगेंगे। ऐसे वक्त में जब देश का वित्तीय घाटा जीडीपी का 5.2 फीसदी हो, केंद्र सरकार कोई भी ऐसा कदम उठाने से बचेगी जिससे केंद्र पर और आर्थिक बोझ बढ़े। क्योंकि अगर वित्तीय घाटा और बढ़ता है तो वैश्विक रेटिंग एजेंसियां भारत की रेटिंग नीचे करेंगी और फिर मनमोहन सिंह की सुधारवादी साख को देश के बाहर और झटका लगेगा। नीतीश से भविष्य की संभावित करीबी दिखाकर कांग्रेस न सिर्फ मायावती और मुलायम सिंह को सरकार गिराने से रोकना चाहती है बल्कि भाजपा जिस तरह से नरेंद्र मोदी को लेकर आक्रामक हो रही है, उसे भी कांग्रेस थोड़ा धीमा करना चाहती है। ताकि अगला चुनाव मोदी बनाम राहुल गांधी न बन सके।

वहीं नीतीश कुमार भविष्य में कांग्रेस के करीब आने की संभावनाओं के जरिए न सिर्फ नरेंद्र मोदी को भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का औपचारिक उम्मीदवार बनने से रोकना चाहते हैं बल्कि लालू प्रसाद यादव को भी कांग्रेस के करीब नहीं आने देना चाहते हैं। नीतीश की कोशिश यह है कि वे कांग्रेस को इस झांसे में रखें कि चुनाव के बाद वे उसके साथ आ सकते हैं और इस झांसे में कांग्रेस लालू यादव के साथ मिलकर प्रदेश में लोकसभा का चुनाव नहीं लड़े। क्योंकि नीतीश कुमार को यह पता है कि उनकी पार्टी और लालू यादव की पार्टी राष्टीय जनता दल के बीच मत प्रतिशत के मामले में बहुत अधिक फर्क नहीं है। नीतीश यह भी जानते हैं कि अगर कांग्रेस, राजद और रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी प्रदेश में मिलकर चुनाव लड़ेगी तो चुनावों में उनके लिए मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। क्योंकि तीनों के एक साथ आते ही जो वोट बैंक बनता है वह जदयू-भाजपा गठबंधन को काफी परेशान करता है।

2004 के चुनावों में जब तीनों एक साथ आए थे तो जदयू-भाजपा गठबंधन पूरी तरह चित हो गई थी। वहीं 2009 में कांग्रेस अलग हुई और भाजपा-जदयू गठबंधन को भारी सफलता मिली। कांग्रेस को झांसे में रखकर नीतीश अपने कई काम भी केंद्र सरकार से निकलवा रहे हैं। प्रदेश में राज्यपाल रहे देवानंद कुंवर से नीतीश सरकार के मतभेद कई मौकों पर दिखे। नीतीश कुमार ने इसे प्रतिष्ठा का मामला बना लिया और कांग्रेस की मजबूरी का फायदा उठाते हुए उन्होंने यह दबाव बनाया कि राज्यपाल को बदला जाए। नीतीश इसमें कामयाब भी हुए और कांग्रेस को राज्यपाल बदलने के लिए बाध्य होना पड़ा।

भले ही कांग्रेसी यह सपना देख रहे हों कि नीतीश कुमार उनके साथ आ जाएंगे और नीतीश कुमार भी अपनी सियासी चालों के जरिए ऐसा संकेत दे रहे हों लेकिन बिहार की राजनीति को जानने-समझने वाले लोग ऐसी किसी भी संभावना को सिरे से खारिज करते हैं। बिहार में आज कांग्रेस लगभग खत्म हो गई है। ऐसे में नीतीश कांग्रेस के साथ गठबंधन करके प्रदेश में आखिरी सांसे गिन रही कांग्रेस को फिर से जिंदा करने की गलती नहीं करेंगे। आज बिहार में नीतीश कुमार की यह हैसियत तो है कि उनके साथ कांग्रेस के आने के बाद इसकी सीटों में अच्छा-खासा इजाफा हो जाएगा। लेकिन नीतीश कुमार बिहार में एक और पार्टी नहीं खड़ा करना चाहेंगे। इसलिए अगर कुछ महीने में केंद्र की सरकार गिरती है तो इसे नीतीश कुमार जीवनदान देंगे, यह संभावना तो दूर-दूर तक नहीं दिखती। जो लोग यह कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी के मसले पर नीतीश कांग्रेस के साथ आ सकते हैं, उन्हें यह समझना होगा कि नीतीश को आपत्ति नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने को लेकर है न कि भाजपा की अगुवाई वाली सरकार बनने को लेकर। ऐसे में भाजपा चुनाव से पहले मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके अपने राजनीतिक सहयोगियों को अलग करने की गलती नहीं करेगी। कांग्रेस वाले भले ही इस बात को लेकर मुगालते में रहें लेकिन नीतीश यह बात अच्छे से जानते हैं। नीतीश को यह बात अच्छे से मालूम है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने को लेकर उन्हें जितनी आपत्ति है उससे कम आपत्ति भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं को नहीं हैं। इसलिए यह संभावना तो बिल्कुल नहीं दिख रही नीतीश भाजपा-जदयू गठबंधन तोड़कर मनमोहन सिंह सरकार को बचाने के लिए सामने आएंगे।

भाजपा भी तुरंत चुनाव नहीं चाहती। यह बात तब साफ हो गई जब डीएमके के समर्थन वापसी की घोषणा के तुरंत बाद भाजपा की ओर से यह बयान आने लगा कि वह सरकार को अस्थिर नहीं करना चाहती लेकिन सरकार अगर अपनी मौत मरती है तो वह कुछ नहीं कर सकती। पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर कहते हैं, ‘भाजपा ने कभी भी इस सरकार को अस्थिर नहीं करना चाहा। लेकिन यह सरकार किस तरह से काम कर रही है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इनके सहयोगी एक-एक करके इनका साथ छोड़ रहे हैं। ऐसे में अगर यह सरकार कुछ महीनों में अगर खुद ही गिर जाएगी तो हम क्या कर सकते हैं।’ यह पूछे जाने पर कि क्या भाजपा चुनाव के लिए तैयार है, वे कहते हैं, ‘बिल्कुल, हम तैयार हैं। लेकिन देखने वाली बात यह होगी कि यह सरकार कब तक और चलेगी।’ लेकिन सच्चाई यह है कि भाजपा भी तुरंत चुनाव नहीं चाहती।

पार्टी के एक नेता कहते हैं, ‘पार्टी में दो राय है। एक तरफ नरेंद्र मोदी और प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करने वाले लोग हैं। इन लोगों का यह मानना है कि तुरंत चुनाव होते हैं तो पार्टी के सामने मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचेगा। मोदी को भी लगता है कि चुनाव में जितनी देरी होगी, उतना ही अधिक वक्त उनके विरोधियों को पार्टी के अंदर गोलबंद होने का समय मिलेगा। वहीं दूसरी तरफ मोदी विरोधी धड़ा है जो तुरंत चुनाव के खिलाफ है। यह धड़ा इस राय का है कि मध्य प्रदेश चुनाव में एक बार फिर शिवराज सिंह चैहान के जीतने की संभावना है। इसलिए अगर चुनाव देर से होते हैं तो पार्टी मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने से बच जाएगी।’ वे कहते हैं, ‘भाजपा चुनाव के लिए इसलिए भी थोड़ा वक्त चाहती है ताकि नए अध्यक्ष राजनाथ सिंह जो टीम बनाने जा रहे हैं उसे जमने के लिए थोड़ा समय मिल जाए। अभी तो पार्टी की नई टीम भी नहीं बनी है और ऐसे में अगर चुनाव में उतरना पड़ता है तो मुश्किल तो होगी ही।’

अलग-अलग दलों के सांसदों से बात करने पर यह पता चलता है कि कोई भी सांसद कम से कम अगले छह महीने तक चुनाव नहीं चाहता। भाजपा के एक लोकसभा सांसद कहते हैं, ‘देखिए, यह बात तो हर किसी को पता है कि चुनावों का खर्चा किस तरह से बढ़ गया है। इतना पैसा खर्च करके अगर कोई चुनाव जीतता है तो वह चाहता है कि उसे पूरा कार्यकाल मिले। अभी तो तकरीबन साल भर का कार्यकाल बचा हुआ है। यह महीना मार्च-अप्रैल का है। सांसद विकास निधि के तहत पांच करोड़ रुपये का जो सालाना फंड मिलता है उसका पैसा अप्रैल से ही रिलीज होना शुरू होगा।’ वे कहते हैं, ‘ऐसे में अगर अभी तुरंत चुनाव की घोषणा हो जाती है तो कोई भी सांसद इस पैसे का इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। वहीं अगर छह महीने का भी वक्त मिल जाता है तो इस फंड के बड़े हिस्से का इस्तेमाल सभी सांसद अपने क्षेत्र के विकास के लिए कर सकते हैं और चुनावी साल में किया गया काम ज्यादा वोट दिलाते हैं। इन्हीं बातों को देखते हुए मुझे नहीं लगता कि किसी भी दल के सांसद तुरंत चुनाव के लिए तैयार हैं। लेकिन सभी को यह भी पता है कि यह सरकार कभी भी जा सकती है। इसलिए न सिर्फ सांसद अपने फंड का तेजी से इस्तेमाल करेंगे बल्कि अपनी चुनावी तैयारियों में भी तेजी लाएंगे।’

ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब परिस्थितियां इस ओर स्पष्ट इशारा कर रही हैं कि यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं करने जा रही है तो फिर चुनाव कब होंगे? राजनीतिक जानकारों की मानें तो सबसे अधिक संभावना इस बात की है कि सितंबर-अक्टूबर में जब मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और दिल्ली में विधानसभा चुनाव होंगे तो उसी वक्त लोकसभा के चुनाव भी हो जाएं। इसकी एक बड़ी वजह यह बताई जा रही है कि इन चार राज्यों में से तीन में भाजपा की सरकार बनने की संभावना है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की वापसी को लेकर कोई बहुत अधिक दिक्कत नहीं दिख रही। वहीं राजस्थान में कांग्रेस की सरकार जिस तरह से एक के बाद एक विवादों मंे घिरी है और भाजपा ने वसुंधरा राजे को कमान सौंपकर जिस तरह से तैयारियांे को आगे बढ़ाया है उससे प्रदेश में कांटे की टक्कर की उम्मीद है। अनुमान लगाया जा रहा है कि शायद राजस्थान में भाजपा जीत हासिल कर ले। वहीं दिल्ली में कांग्रेस को बहुत अधिक चुनौती देती भाजपा दिख नहीं रही। ऐसे में जब स्कोर 3-1 के साथ भाजपा के पक्ष में होगा तो पार्टी इसका इस्तेमाल कांग्रेस विरोधी माहौल बनाने के लिए करेगी। इसलिए संभव है कि कांग्रेस अगले छह महीने में अपनी सरकार को लेकर बने नकारात्मक माहौल को कम करने की कोशिश करे और अपनी तैयारियों को मजबूत करते हुए इन चारों राज्यों के विधानसभा चुनावों के साथ आम चुनाव कराने का जोखिम उठाए।

अगर कांग्रेस ने ऐसा नहीं भी किया तो सपा और बसपा के लिए अक्टूबर के बाद कांग्रेस के साथ रह पाना मुश्किल होगा। क्योंकि उसके बाद बमुश्किल छह महीने का वक्त बचेगा और इन दोनों पार्टियों को उत्तर प्रदेश में न सिर्फ एक-दूसरे के खिलाफ बल्कि कांग्रेस के खिलाफ भी अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए कम से कम छह महीने का वक्त तो चाहिए ही होगा। और अगर इन दोनों में से कोई भी उस वक्त अलग हुआ तो फिर मनमोहन सिंह सरकार को संजीवनी देने कोई भी क्षेत्रीय दल उस समय आगे नहीं आएगा। कहना गलत न होगा कि ये दोनों दल संप्रग की दूसरी सरकार की नैया डुबाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं और इस बात के संकेत इससे भी मिलते मिलते हैं कि दोनों दलों के शीर्ष नेता यानी मुलायम सिंह यादव और मायावती पार्टी फोरम पर बार-बार अपने कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों से लोकसभा चुनाव के लिए तैयार रहने को कह रहे हैं।

कुल मिलाजुलाकर देखा जाए तो लोक सभा चुनावों के समय को लेकर स्थिति भले न साफ हो लेकिन यह बात तो बिल्कुल साफ हो गई है कि संप्रग की दूसरी सरकार अपनी मियाद नहीं पूरा करने जा रही है।

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