‘संप्रग-2 आजाद भारत की सबसे नाकाम सरकार है’

यशवंत सिन्हा भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे हैं. राजनीति में आने के बाद वे देश के वित्त मंत्री और विदेश मंत्री भी रहे हैं. पिछले कुछ समय से उन्होंने अपनी पहचान आर-पार की राजनीति करने वाले नेता की बनाई है. झारखंड के हजारीबाग से लोकसभा चुनाव जीत कर आने वाले यशवंत सिन्हा अच्छे वक्ता भी हैं. हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में वे अपनी बात बेबाकी से रखते हैं. वे भाजपा के एक ऐसे नेता हैं जो सरकार पर हमला करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ता. मनमोहन सिंह सरकार की नाकामी और इससे संबंधित अन्य मुद्दों पर यशवंत सिन्हा से हिमांशु शेखर की विस्तृत बातचीतः

भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों के बीच आप संप्रग-2 सरकार को कैसे देखते हैं?
जब से हम स्वतंत्र हुए हैं तब से कोई न कोई भ्रष्टाचार का मामला सामने आता रहा है लेकिन इतनी भ्रष्ट सरकार आजाद भारत में इससे पहले कभी नहीं आई.. चाहे वह सरकार जवाहरलाल नेहरू की हो, इंदिरा गांधी की हो, राजीव गांधी की हो या फिर पीवी नरसिंहा राव की हो. लेकिन मनमोहन सिंह सरकार जितनी भ्रष्ट सरकार अभी तक नहीं दिखी. इस सरकार के जितने मंत्री भ्रष्टाचार के तरह-तरह के आरोपों से घिरे हुए नजर आते हैं उतने किसी भी सरकार के मंत्री इससे पहले घिरे हुए नजर नहीं आए. ऐसा माहौल दिखता है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का अपने मंत्रियों पर कोई नियंत्रण नहीं है. इसलिए ही यह स्‍थिति पैदा हुई है. मनमोहन सिंह पिछले आठ साल से सरकार चला रहे हैं लेकिन उनके मंत्रियों पर लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा.

क्या आपको लगता है कि यह सरकार भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने का काम भी करती है?
भ्रष्टाचार से बड़ी चिंता की बात इस सरकार को लेकर यह है कि यह सरकार भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की कोशिश आखिर तक करती रहती है. ए. राजा के मामले में पूरे देश ने यह देखा कि कैसे सरकार उन्हें आखिरी तक बचाने की कोशिश करती रही. सुरेश कलमाड़ी के मामले में भी ऐसा ही हुआ. अब पी. चिदंबरम को सरकार लगातार बचाने की कोशिश कर रही है. प्रधानमंत्री उनके बचाव में खड़े नजर आ रहे हैं. इसका मतलब यह हुआ कि यह इस सरकार की फितरत है कि जब भी कोई मामला सामने आए तो पहले उस पर पर्दा डालने की कोशिश करो और अगर कोई मामले को संसद में उठाता है तो उसे सिरे से खारिज करो. यह सरकार सिर्फ न्यायपालिका के सामने जाकर झुकती है. जब न्यायपालिका से आदेश आता है तब सरकार कार्रवाई शुरू करती है. 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) की सिफारिश के बावजूद सीबीआई जांच के आदेश नहीं दिए गए. इस निर्देश के एक साल के बाद जब कोर्ट का डंडा पड़ा तब जाकर यह मामला सीबीआई को जांच के लिए मिला. इससे साफ है कि यह सरकार किस हद तक जाकर भ्रष्टाचार के हर मामले पर पर्दा डालने की कोशिश करती है. इससे हर स्तर पर भ्रष्टाचारियों को बढ़ावा मिलता है. अर्थशास्‍त्र में यह माना जाता है कि भ्रष्टाचार से विशिष्ट उपभोग (conspicuous consumption) पैदा होता है. क्योंकि भ्रष्टाचार का पैसा लोग रोजमर्रा के कामों पर तो खर्च करते नहीं. देखा जाए तो बेलगाम होती महंगाई के पीछे सबसे बड़ा कारण भ्रष्टाचार है.

तो क्या आपकी बातों का मतलब यह निकाला जाए कि मनमोहन सिंह सरकार पूरी तरह से नाकाम हो गई है?
मैंने लोकसभा में भी कहा था कि सरकार जब नाकाम होती है तो हर मोर्चे पर नाकाम हो जाती है. इस सरकार की सबसे ज्यादा असफलता आर्थिक मोर्चे पर दिखती है. जबकि इस सरकार से सबसे ज्यादा उम्मीदें आर्थिक मोर्चे पर ही थीं. आर्थिक मामले पर यह सरकार पूरी तरह से नाकाम हो गई है और आज सब कुछ बिखर गया है. जो हम लोग संजोकर गए थे उसमें से एक-एक चीज बिखर गई है. रुपये के अवमूल्यन से लेकर विकास दर और राजकोषीय घाटे तक के मोर्चे पर हालत खस्ता है. इससे यह लगता है कि आर्थिक मामलों पर से सरकार ने पूरी तरह से नियंत्रण खो दिया. अर्थव्यवस्‍था की यह बदहाली प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आंखों के सामने हुआ.

लेकिन कांग्रेस तो उन्हें नई अर्थव्यवस्‍था का जनक मानती है. इस बारे में आपका पक्ष क्या है?
मनमोहन सिंह ने बतौर वित्त मंत्री 1991 में जो पाठ पढ़ाया था उससे आज वे स्वयं हट गए हैं. उन्होंने जिस रास्ते की बात उस वक्त की थी उससे विपरीत रास्ते पर आज वे खुद चल रहे हैं. उस वक्त उन्होंने कहा था कि महंगाई से सबसे ज्यादा मार गरीब पर पड़ती है. लेकिन आज उन्हें अपनी वह बात याद नहीं है. यह स्‍थिति कोई तीन या छह महीने से नहीं है बल्‍कि महंगाई की यह स्‍थिति तो पिछले तीन-चार सालों से बनी हुई है और इस पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है. दुनिया की बड़ी आर्थिक एजेंसियां और आर्थिक पत्र-पत्रिकाएं आर्थिक मामलों को लेकर आज हिंदुस्तान की भर्त्सना कर रही हैं. हाल ही में दुनिया की एक प्रमुख पत्रिका ‘टाइम’ ने भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ‘अंडरअचीवर’ का तमगा दे डाला. इससे पूरी दुनिया में एक सामान्य संदेश यह गया है कि भारत के विकास की जो कहानी थी वह खत्म हो गई है. लोग तो यह भी कह रहे हैं कि भारत की विकास की कहानी अस्‍थायी थी और उसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा था और आज यह समाप्त हो गई है.कहा जा रहा है कि यही भारत की नियती है और इसलिए ऐसा हो रहा है.

बतौर वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के कार्यकाल को आप कैसे देखते हैं?
बतौर वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी पूरी तरह से असफल रहे हैं और वे अर्थव्यवस्‍था को गंभीर संकट में छोड़कर गए हैं. आज हर ‌आर्थिक संकेतक नकारात्मक स्‍थिति की पुष्‍टि कर रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद सरकार स्‍थिति से निपटने के लिए जरूरी कदम उठाने के बजाए इनकार की मुद्रा अपनाए हुए है. सरकार रेटिंग एजेंसियों समेत उन सभी लोगों को गलत ठहरा रही है जो अर्थव्यवस्‍था की बदहाली की बात उठा रहे हैं. अब इस सरकार के समझ में यह नहीं आ रहा है कि जब तक समस्या को समझेंगे नहीं तब तक उसका समाधान कैसे होगा.

आप वित्त मंत्री भी रहे हैं. ऐसे में बढ़ते सरकारी घाटे को आप कैसे देखते हैं?
जब केंद्र में राजग सरकार थी तो उस दौरान फिसकल रेस्पांसिबिलिटी ऑफ बजट मैनेजमेंट एक्ट पास हुआ. इसका मकसद था सरकारी घाटे को नियंत्रण में रखना. संप्रग की पहली सरकार ने सत्ता में आने के बाद इसे अधिसूचित किया. इस कानून में यह प्रावधान था कि राजस्व घाटे को शून्य पर लाएंगे और वित्तीय घाटे को दो-तीन प्रतिशत के आसपास लाएंगे. 2008-09 में राजस्व वित्तीय घाटे का 75.2 फीसदी हो गया और 2009-10 में 80.7 फीसदी. वित्त मंत्री ने अब इसे 72.5 पर लाने की बात कह रहे हैं. यह है अर्थव्यवस्‍था की हालत. यह बात हर औसत समझ वाला व्यक्‍ति भी जानता है कि राजस्व खर्च अनुत्पादक होता है और उससे उत्पादन नहीं बढ़ता है. उत्पादन बढ़ता है पूंजीगत व्यय से. ऐसे में राहत पैकेज के तहत अगर सरकार ने सिर्फ राजस्व खर्च बढ़ाया तो उससे उत्पादन तो बढ़ा नहीं. राजस्व खर्चे के तौर पर सरकार ने जो दो लाख करोड़ रुपये का खर्च बढ़ाया वह दूसरी तरह से वापस हो गया. महंगाई बढ़ने की वजह से लोगों की जेब से हर साल दो लाख करोड़ रुपये निकले. हालांकि, यह पैसा सरकारी खजाने में नहीं गया बल्‍कि यह जमाखोरों, रिश्वतखोरों, कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों के पास गया.

निवेश को लेकर बने नकारात्मक माहौल की बाबत आप क्या कहेंगे?
अर्थव्यवस्‍था की हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2010-2011 में 44 अरब डॉलर भारत के उद्योगपतियों ने देश के बाहर निवेश किया. जबकि इसी दौरान देश में निवेश हुआ सिर्फ 27 अरब डॉलर. अब देश का उद्योगपति देश में निवेश नहीं कर रहा है. देश का उद्योगपति अपने धन को बाहर ले जा रहा है. आज हमें इस बात की तकलीफ हो रही है कि देश में निवेश नहीं हो रहा है. देश के धन का निवेश बाहर हो रहा है. इस पर सरकार को विचार करना चाहिए. अगर कुछ बंदिशें लगाने की जरूरत पड़े तो लगाया जाना चाहिए. उदारीकरण का यह मतलब नहीं है कि देश गरीबी में गोते खाता रहे और अमीरी हमारे देश के बाहर जाए. यह हमें स्वीकार्य नहीं है.

महंगाई के मोर्चे पर मनमोहन सिंह सरकार की नाकामी को आप कैसे देखते हैं?
महंगाई से लोग बेहाल हैं और यह सरकार बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण नहीं कर पा रही है. जब संसद में महंगाई पर चर्चा चल रही थी तो उस वक्त मैंने कहा था कि रसोई में आग लग गई। अब कोई कहे कि रसोई में आग नहीं जलेगी तो खाना कैसे बनेगा। इसलिए रसोई में आग तो जलेगी। आग जलने और आग लगने में अंतर है क्योंकि आज गृहिणी आग जला नहीं रही है, उसकी रसोई ही जल गई। रसोई की हर चीज उसकी पकड़ से बाहर हो गई है। यहां तक कि आग जलाने वाली चीज एलपीजी भी महंगी हो गई है। 2009 के दिसंबर में संसद की वित्त समिति ने महंगाई के बारे में कांप्रीहैन्सिव फूड प्राइसिंग एंड मैनेजमैंट पालिसी तैयार करने की सिफारिश की थी. उस सिफारिश का अब तक कुछ नहीं हुआ. अर्थशास्त्र में महंगाई को गरीबों के ऊपर सबसे घटिया किस्म का टैक्स कहा गया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इतने बड़े अर्थशास्‍त्री हैं और वे इस बात को समझते होंगे लेकिन इसके बावजूद महंगाई रोकने की कोशिश सरकार नहीं कर रही है. गरीबों के ऊपर महंगाई की मार सबसे भयानक होती है। भारत सरकार का कुल कर राजस्व है तकरीबन 6.64 लाख करोड़ रुपये. दो साल पहले यह साढ़े चार लाख करोड़ रुपये था.

आप आर्थिक मामलों के अच्छे जानकार हैं. आपके हिसाब से महंगाई से देश के आम लोग कितनी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं?
आर्थिक विषयों पर शोध करने वाली एजेंसी ‘क्रिसिल’ की एक रिपोर्ट बताती है कि पिछले तीन सालों यानी 2008-09 से 2010-11 तक महंगाई के चलते देश के लोगों ने तकरीबन छः लाख करोड़ रुपये अधिक खर्चा किए. इसका क्या मतलब हुआ? मतलब यह हुआ कि अगर महंगाई को हमने पांच फीसदी पर नियंत्रित किया होता तो यह भार उनके ऊपर नहीं पड़ता। लेकिन महंगाई इन तीन वर्षों में आठ प्रतिशत या उससे ऊपर रही। वह 20 प्रतिशत तक भी गई. महंगाई दर में यह जो तीन प्रतिशत का अंतर आया, इस वजह से आपकी जेब, हमारी जेब और गरीबों की जेब से छः लाख करोड़ रुपया अधिक खर्चा हुआ यानी दो लाख करोड़ रुपया प्रति वर्ष। सरकार साढ़े छः लाख करोड़ रुपये बतौर कर वसूल रही है. यानी दो लाख करोड़ रुपये हर साल. इसका मतलब यह हुआ कि सरकारी राजस्व का लगभग एक तिहाई महंगाई के चलते इस देश के लोगों को अतिरिक्त देना पड़ रहा है। कुछ महीने पहले एशियन डेवलपमेंट बैंक की एक रिपोर्ट आई थी और इसमें कहा गया है कि भारत में 20 महीनों में जिस दर की महंगाई रही है और खासकर जैसे खाद्यान्नों की महंगाई रही है, उसके चलते पांच करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गए। हम आज प्रतिवर्ष आठ-नौ प्रतिशत की दर से विकास कर रहे हैं. विकास से गरीबी और गरीब की संख्या घटेगी. लेकिन अगर हमने महंगाई पर नियत्रण नहीं पाया तो उसका यही नतीजा होगा जो एशियन डेवलपमेंट बैंक ने कहा है. यानी और अधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे जाएंगे, गरीबी घटेगी नहीं।

जब भी महंगाई की बात चलती है तो सरकार विकास दर की बात करती है. क्या सरकार ऐसा अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए करती है?
खुद इसी सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण कहता है कि देश की आबादी में सबसे कम आमदनी वाले नीचे के 20 प्रतिशत लोग अपनी आमदनी का 67 प्रतिशत खाने-पीने की चीजों पर  खर्च करते हैं. अब अगर रसोई में आग लगी हो तो उस 20 प्रतिशत की क्या हालत होगी? हम ऊपर के 20 प्रतिशत को भूल जाएं, बीच के 20 प्रतिशत को भूल जाएं, ये जो नीचे के 20 प्रतिशत लोग हैं, वे आज महंगाई की मार सहते-सहते मिट्टी में मिल रहे हैं। इन लोगों को यह नहीं कहा जा सकता है कि आज देश जो आठ फीसदी की दर से विकास कर रहा है तुम उसी को खाकर अपनी भूख मिटा लो. लेकिन यह कैसी विकास दर है जो खुद लोगों को ही खा रही है। मैं सिरे से इस थ्योरी को खारिज करता हूं कि किसी भी कीमत पर विकास होना चाहिए। अगर विकास का मतलब महंगाई है तो ऐसे विकास का कोई मतलब नहीं है.

तो क्या आप यह कहना चाह रहे हैं कि सरकार जान-बूझकर महंगाई पर नियंत्रण नहीं कर रही है?
बीच-बीच में सरकार में बैठे जिम्मेदार लोग इस तरह के बयान देते हैं जिससे महंगाई नियंत्रित होने के बजाए और बढ़ जाती है. प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, कृषि मंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष हर दो महीने बाद कहते हैं कि अगले दो महीने में हम महंगाई को नियंत्रित कर लेंगे. इसके दो महीने बाद फिर कहते हैं कि अगले दो महीने में हम महंगाई नियंत्रित कर लेंगे. इन बयानों के बाद जो मुनाफाखोर हैं, वे सोचते हैं कि फिर दो महीने की मोहलत मिल गई है और अब जैसे चाहेंगे वैसे लोगों को चूसेंगे। महंगाई को लेकर सरकार कितनी असंवेदनशील है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि तेजी से बढ़ती महंगाई के बावजूद सरकार ने बार-बार पेट्रोल, डीजल, केरोसिन और रसोई गैस के दाम बढ़ाए. सरकार को इस बात को समझना होगा कि खाने-पीने की चीजों की महंगाई बढ़ेगी तो बाकी चीजों की कीमतों में भी वृद्धि होगी. विनिर्माण क्षेत्र इससे बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है. लेकिन संप्रग सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी हुई है.

आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर मनमोहन सिंह सरकार के अब तक के काम को आप कैसे देखते हैं?
प्रधानमंत्री ने खुद कहा है कि सबसे बड़ी चुनौती आज हमारे लिए आंतरिक सुरक्षा है. उन्होंने माओवाद को सबसे बड़ी चुनौती बताया है. लेकिन इसके बावजूद माओवाद के ऊपर कहीं कोई नियंत्रण नजर नहीं आ रहा है. हमें यह समझना चाहिए कि माओवाद किसी एक सूबे की समस्या नहीं है बल्‍कि यह पूरे देश की समस्या है. इससे निपटने में सरकार की जो भूमिका दिखनी चाहिए वह नहीं दिख रही है. जो कदम उठाए जाने चाहिए थे, वे कदम मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली दोनों सरकार ने पिछले आठ साल में नहीं उठाए हैं. अगर प्रधानमंत्री यह मानते हैं कि आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा माओवाद है तो आज सच्चाई यह है कि यह खतरा घटा नहीं है बल्‍कि यह कहीं और बढ़ गया है. इसमें भी सबसे तकलीफ की बात यह है कि आंध्र प्रदेश में तो सरकार ने माओवादियों से समझौता किया और असम में उल्फा से समझौता किया. उल्फा को खदेड़कर असम से बाहर किया गया था. इसका मतलब यह हुआ कि जहां इस सरकार को राजनीतिक लाभ लेना होता है वहां ये माओवादियों से समझौता कर लेते हैं. एक तरफ तो ये समझौता करके चुनाव जीतते हैं और दूसरी तरफ इन्हें आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा भी बताते रहते हैं.

सरकार दावा करती है कि आतंकवाद से निपटने के लिए उसने बहुत काम किए हैं. क्या आप इससे सहमत हैं?
बाहरी आतंकवाद से निपटने में भी यह सरकार नाकाम दिखती है. अब भी हम देश को ऐसे सुरक्षा कवच में नहीं डाल पाए हैं जो जरूरी है. अमेरिका पर एक आतंकी हमला हुआ और उसके बाद उसने खुद को ऐसे सुरक्षा कवच में डाला कि वहां आतंकवादी उसके बाद अपने मंसूबों को पूरा करने में कामयाब नहीं हो पाए हैं. जबकि भारत में स्‍थिति इसके उलट है. यहां एक के बाद एक लगातार आतंकी हमले होने के बावजूद अब तक कोई चाक-चौबंद व्यवस्‍था विकसित नहीं हो पाई है. स्‍थिति ऐसी है कि जो जब चाहे तब भारत पर हमला कर सकता है. भारत पर आतंकवादी खतरा अब भी बरकरार है और मुंबई में जिस तरह का हमला 2008 में हुआ था उस तरह के हमले की आशंका लगातार बनी हुई है.

आप विदेश मंत्री भी रहे हैं. मनमोहन सिंह सरकार की विदेश नीति को आप कैसे देखते हैं?
विदेश नीति के मोर्चे पर भी इस सरकार की नाकामी बिल्कुल साफ है. विदेश नीति के मामले में देखें तो इस सरकार का बहुत ज्यादा झुकाव अमेरिका की तरफ है. जब हमारी सरकार केंद्र में थी तो कांग्रेस हम पर लगातार आरोप लगाती थी कि हम अमेरिका के हिसाब से अपनी विदेश नीति का निर्धारण कर रहे हैं. जब 2004 में कांग्रेस की अगुवाई में केंद्र में सरकार बनी तो उस वक्त जो न्यूनतम साझा कार्यक्रम इन लोगों ने बनाया था उसमें यह कहा गया था कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने विदेश नीति में अमेरिका के प्रति जो झुकाव दिखता था उसे हम दुरुस्त करेंगे. जबकि हुआ यह कि संप्रग सरकार की विदेश नीति राजग सरकार की तुलना में कहीं अधिक अमेरिका के पक्ष में झुकी नजर आती है. अमेरिका के साथ 2005 में जब परमाणु समझौता हो रहा था तो उस वक्त लोगों को सरकार ने सब्जबाग दिखाया कि बस कल ही आपके घर में बिजली पहुंचने वाली है. लेकिन उस समय से लेकर अब तक सात साल गुजरने के बावजूद उस समझौते के आधार पर एक मेगावॉट बिजली का उत्पादन नहीं हो पाया है. वहीं दूसरी तरफ परमाणु ऊर्जा को लेकर देश का अपना जो शोध है उसे उस ढंग से इस सरकार ने बढ़ावा नहीं दिया जिस तरह से मिलना चाहिए था. परमाणु समझौते को लेकर जिस तरह का रवैया इस सरकार ने कदम-कदम पर दिखाया उससे अमेरिका के प्रति इस सरकार का झुकाव स्पष्ट दिखता है.

ऐसा लगता है कि ईरान और रूस के साथ भारत के संबंध अब उतने अच्छे नहीं रहे. क्या आप इसे संप्रग सरकार की नाकामी मानते हैं?
आज ईरान के साथ हम लोगों को मित्रता का भाव रखना चाहिए. ईरान ही एक ऐसा देश है जिसके जरिए हम अफगानिस्तान और मध्य एशिया जाते हैं. ईरान से भारत को काफी तेल मिलता है. लेकिन ईरान को भारत ने नाराज किया. अब अमेरिका के दबाव में आकर हम उसकी शर्तों के मुताबिक ईरान से तेल खरीद कम कर रहे हैं. इसके बाद भारत सरकार अमेरिका को कहती है कि हमने आपके कहने पर ईरान से तेल खरीद में कटौती कर दी है और अब हमें छूट दे दीजिए. वहीं दूसरी तरफ रूस से संबंधों को लेकर भी यह सरकार नाकाम दिख रही है. रूस के राष्ट्रपति ब्लादमीर पुतिन का पाकिस्तान जाना भारत के लिए चिंता का एक बड़ा संकेत है. क्योंकि रूस को भारत हमेशा से अपना सबसे अच्छा मित्र मानता रहा है. लेकिन आज हमारा सबसे अच्छा मित्र हमारे सबसे बड़े दुश्मन के यहां जा रहा है. इससे पहले कभी कोई रूस का राष्ट्राध्यक्ष पाकिस्तान नहीं गया. आज रूस ऐसा इसलिए कर रहा है क्योंकि वह देख रहा है कि भारत अमेरिका के साथ अपने सांठगांठ बढ़ा रहा है. अमेरिका के साथ भारत की गलबहियां को देखते हुए रूस ने भी अब स्वतंत्र तौर पर दूसरे देशों के साथ अपने संबंधों को नए सिरे से देखना शुरू कर दिया है.

रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार के मामलों में भी यह सरकार सवालों के घेरे में है. आप क्या कहेंगे?
सुरक्षा के मामले में देश की जो कमजोरी है उसे पूर्व सेनाप्रमुख जनरल वीके सिंह ने उजागर किया. रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार की स्‍थिति पूरे देश के सामने है. हाल ही में अभिषेक वर्मा नाम के एक व्यक्‍ति की गिरफ्तारी हुई है. यह व्यक्‍ति बहुत दिनों से स्वतंत्र चल रहा था. लेकिन अब जाकर उसकी गिरफ्तारी हो पाई है. उसकी गिरफ्तारी इस बात का प्रमाण है कि रक्षा सौदों में कितने बड़े स्तर पर दलाली का काम चल रहा है. वॉर रूम लीक जैसी गंभीर घटनाएं भी इस सरकार की नाकामी को ही दिखाती है. कुल मिलाकर देखा जाए तो आज हर सुरक्षा सौदे में कहीं न कहीं भ्रष्टाचार है. इसका सबसे बुरा असर देश की रक्षा तैयारियों पर पड़ रहा है.

नीतियों के स्तर पर मनमोहन सिंह की सरकार कितनी अक्षम दिखती है?
नीतियों के स्तर पर दो बातें हैं. एक बात तो यह है कि आप कोई नीति बनाएं और फिर उसे लागू करें. ऐसा करने पर देश में नीतियों को लेकर भरोसा बढ़ेगा. लेकिन यहां तो कोई नीति ही नहीं बन पा रही है. नीतियों के स्तर पर संप्रग सरकार को उम्मीद तो बड़ी बंधाती है लेकिन हकीकत में कुछ कर नहीं पाती. अभी हाल में रुपये के अवमूल्यन और महंगाई को लेकर जब हर ओर से सरकार पर दबाव बना तो प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्री तक ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक इस बारे में बड़ी घोषणाएं करने वाला है. इससे हुआ यह कि सबकी उम्मीदें बढ़ गई. लेकिन रिजर्व बैंक ने जो घोषणाएं कीं वे खोदा पहाड़ और निकली चुहिया की तरह थीं. इससे हुआ यह कि रुपया डॉलर के मुकाबले कहीं अधिक कमजोर हुआ और शेयर बाजार का सूचकांक भी नीचे गया. इस सरकार की आदत में यह शामिल हो गया है कि आशाएं बंधाओ और उस पर खरे नहीं उतरो. पेंशन बिल एक उदाहरण है. इसका ममता बनर्जी ने विरोध किया है. उनकी विरोध की वजह से यह बिल नहीं आया. सरकार ने भाजपा से बात कर ली थी और हमने कहा था कि हम इस बिल का समर्थन करेंगे. लेकिन ममता बनर्जी के विरोध की वजह से सरकार इस बिल को लाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. बजट सत्र के बाद सरकार ने यह घोषणा की कि यह बिल कैबिनेट के एजेंडे में आ गया. इसके बाद ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल के दूसरे नेता और रेल मंत्री मुकुल रॉय ने चिट्ठी लिख दी और पेंशन ‌बिल का विषय कैबिनेट के एजेंडे से हटा दिया गया. इस तरह की बातों से ज्यादा परेशानी होती है कि आप कह रहे हों कि हम फैसला करने जा रहे हैं लेनिक आप फैसला कर नहीं पा रहे हैं. सरकार के इस तरह के रवैये से निवेशकों को ज्यादा निराशा होती है और सरकार के बारे में कोई स्पष्ट राय नहीं बन पाती. आज अर्थव्यवस्‍था को लेकर सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह विश्वास के संकट से जूझ रही है.

रोजगार सृजन के मोर्चे पर सरकार के प्रदर्शन पर आप क्या कहेंगे?
जब यह सरकार बनी थी तो उस वक्त यह दावा किया गया कि रोजगार के करोड़ो अवसर पैदा होंगे. लेकिन अब इस मामले में जो वैश्‍विक रिपोर्ट आ रही है और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण रिपोर्ट भी बता रही है कि रोजगार सृजन के मामले में हालत खराब है. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में रोजगार सृजन का काम हो ही नहीं रहा है.

केंद्र सरकार पर संघीय ढांचे को चुनौती देने का आरोप लगाना कितना वाजिब है?
मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यह सरकार संघीय ढांचे को भी चुनौती देती दिख रही है. कई मामलों में केंद्र सरकार अपना निर्णय राज्यों पर थोपने का काम कर रही है. यही वजह है कि ज्यादातर राज्य केंद्र सरकार से नाराज हैं. राज्यों और केंद्र के बीच टकराव का वातावरण बना हुआ है. यह भारत की संघीय ढांचे के लिए बहुत अशुभ संकेत है. सबसे बड़ी बात यह है कि कोई भी सरकार जो नुकसान करके जाती है उसे ठीक करने में कई साल का वक्त लगता है. इन नुकसानों की भरपाई के लिए अगली सरकार को बहुत मेहनत करनी पड़ती है.

गैर कांग्रेस शासित कई राज्य केंद्र सरकार पर भेदभाव का आरोप लगा रहे हैं. इन आरोपों में आपको कोई दम दिखता है?
आज कई राज्य केंद्र सरकार पर भेदभाव करने का अरोप लगा रहे हैं. यह सरकार उन राज्यों की ओर से उठ रही मांगों को अधिक तवज्जो देती है जहां की कोई क्षेत्रीय पार्टी इनकी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी हो. लेकिन जिन राज्यों में विपक्षी पार्टियों की सरकारें हैं, उन राज्यों को लेकर इस सरकार का रवैया बिल्कुल अलग होता है. केंद्र सरकार का यह रवैया संघीय ढांचे के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तो उस समय केरल में माकपा की सरकार थी. मुख्यमंत्री थे ईके नयनार. उस वक्त मैं केंद्रीय वित्त मंत्री था. उस दौरान नयनार ने मुझे एक पत्र लिखकर केंद्र की ओर से की गई मदद के लिए आभार जताया और कहा कि भाजपा की अगुवाई वाली सरकार ने माकपा की केरल सरकार के साथ कोई भेदभाव नहीं किया. वह पत्र आज भी वित्त मंत्रालय में कहीं न कहीं पड़ा होगा. बतौर केंद्रीय वित्त मंत्री जब मैं मूल्यवर्धित कर (वैट) सुधार की बात कर रहा था तो उस वक्त मैंने पश्‍चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु के नेतृत्व में पहली समिति बनाई. इसके बाद बंगाल के वाम मोर्चे के सरकार के के वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता की अगुवाई में राज्यों के वित्त मंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति इस मसले पर बनाई. ऐसा इसलिए किया ‌कि हम लोग संघीय ढांचे में विश्वास रखते थे और भेदभाव की नीति कहीं नहीं चलती थी. ये दो उदाहरण मैं इसलिए दे रहा हूं कि क्योंकि माकपा से बड़ा भाजपा का राजनैतिक विरोधी कोई नहीं है. इसके बावजूद हमने केरल और पश्‍चिम बंगाल की वामपंथी सरकारों के साथ बिल्कुल वैसा ही व्यवहार रखा जैसा व्यवहार अपनी पार्टी की सरकारों के साथ रखते थे. जबकि मौजूदा सरकार कई राज्यों के साथ भेदभाव कर रही है. यह रवैया सरकार की संकीर्ण मानसिकता को दिखाता है.

संवैधानिक संस्‍थाओं से सरकार के बढ़ते टकराव के बारे में आप क्या कहेंगे?
यह सरकार संवैधानिक संस्‍थाओं से टकराने में भी बिल्कुल हिचकिचा नहीं रहा है. अल्पसंख्यकों के आरक्षण का ही मामला लीजिए. इस मामले में सरकार चलाने वाले लोग जानते हैं कि जो बात वे अल्पसंख्यकों के आरक्षण को लेकर वे कह रहे हैं वह असंवैधानिक है. इसके बावजूद सरकार के अलग-अलग मंत्री इस मसले पर बयानबाजी कर रहे हैं. आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने इस मामले में जब सरकार के खिलाफ फैसला दे दिया तो फिर फटकार सुनने के लिए केंद्र सरकार उच्चतम न्यायालय गई. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को डांट लगाई. यह सरकार सिर्फ और सिर्फ वोट के लिए जानबूझकर गैरसंवैधानिक कार्य कर रही है. यह सरकार महालेखा नियंत्रक एवं परीक्षक (सीएजी), चुनाव आयोग, अदालत और लोक लेखा समिति (पीएसी) से अनावश्यक टकरा रही है. संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के मामले में भी सरकार का यही रवैया है. आज प्रधानमंत्री यह क्यों नहीं कहते कि मैं जेपीसी के सामने जाऊंगा. वे जानते थे कि पीएसी के पास यह अधिकार नहीं है कि वह किसी मंत्री को बुलाए. इसलिए उन्होंने कहा कि मैं पीएसी के सामने जाने के लिए तैयार हूं. आज जब जेपीसी में आने की मांग उठ रही है तो वे चुप्पी साधे हुए हैं.

आखिर क्या वजह है कि सरकार की हर मामले में फजीहत हो रही है?
इस सरकार के ज्यादातर मंत्री बहुत दंभी हैं. उनके मन में यह भाव पैदा हो गया है कि उनके जैसा दुनिया में और कोई है ही नहीं. मनमोहन सिंह के बारे में आम धारणा यह बना दी गई है कि वे बहुत सरल, सहज और सभ्य हैं. लेकिन इनकी सच्चाई को समझने के लिए एक घटना का जिक्र करना जरूरी है. 2004 के मई में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने और जुलाई में बजट आया. बजट के बाद संसद में फायनांस बिल पर विवाद चल रहा था. इस संबंध में हम लोग एक कागज देने मनमोहन सिंह के पास गए. जो लोग प्रधानमंत्री के पास गए थे उनमें जनता दल यूनाइटेड के वरिष्ठ नेता जॉर्ज फर्नांडिस, लालकृष्‍ण आडवाणी और मैं भी था. जॉर्ज फर्नांडिस ने कागज मनमोहन सिंह के हाथ में दिया और उन्होंने सबके सामने ही वह कागज उठाकर फेंक दिया. उस वक्त जॉर्ज फर्नांडिस ने यह भी कहा था कि मनमोहन सिंह ने अपने पुराने संबंधों को भी खयाल नहीं रखा. मनमोहन सिंह जब अधिकारी होते थे तो उन्होंने जॉर्ज फर्नांडिस के अंडर भी काम किया था. यह घटना प्रधानमंत्री की सरलता, सहजता और सभ्यता के दावों की पोल खोलती है. इस घटना से मनमोहन सिंह ने न सिर्फ अपने आचरण को दिखाया बल्‍कि दूसरे मंत्रियों को भी ऐसा ही व्यवहार अपनाने को प्रेरित किया. आज यही मंत्रियों के दंभी रवैये के रूप में सबके सामने आ रही है.

मनमोहन सिंह सरकार पर जनभावनाओं की कद्र नहीं करने के आरोप को आप कितना सही मानते हैं?
यह सरकार जनभावना की बिल्कुल कद्र नहीं करती. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि प्रधानमंत्री खुद अनिर्वाचित हैं. जो जनता के बीच जाते ही नहीं हैं, उन्हें तो यह भी पता नहीं चलेगा कि जनभावना भी क्या चीज होती है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का हाल यही है. हम जैसे चुनाव लड़ने वाले लोग जब अपने निर्वाचन क्षेत्र में जाते हैं तो हर रोज सैंकड़ो लोगों से मिलते हैं और गांव-गांव घूमते हैं. मनमोहन सिंह का न तो कोई निर्वाचन क्षेत्र है और न ही उनसे उनके मतदाता मिलते हैं और न ही वे किसी गांव में जाते हैं. जनता दरबार ही लगा लिया होता! लेकिन ऐसा भी नहीं है. इसलिए जनभावना के प्रति उपेक्षा का भाव तो उनके लिए स्वाभाविक ही है. इस सरकार में तो जिनके हाथ में भी फैसला करने का अधिकार है वे सब आराम से  अपनी-अपनी जगह बैठे हुए हैं. इस सरकार के दंभी स्वभाव और जनभावना की उपेक्षा की बात को ही तो दिखाता है.

मनमोहन सिंह के व्यक्‍तिगत प्रदर्शन को आप कैसे देखते हैं?
जब 2004 में संप्रग की सरकार बनी तो उस वक्त ये कहा गया कि मनमोहन सिंह जैसा अर्थशास्‍त्री प्रधानमंत्री होगा, जो सिर्फ सरकार चलाएंगे. वहीं सोनिया गांधी संप्रग की अध्यक्ष होंगी और वे राजनीति देखेंगी. उस समय मीडिया में जमकर यह चला था कि यह बहुत बढ़िया व्यवस्‍था है और इससे अच्छी व्यवस्‍‌था पहले कभी नहीं बनी. कुछ लोग कहने लगे कि मनमोहन सिंह सीईओ (मुख्य कार्यकारी अधिकारी) की तरह सरकार चलाएंगे और देश बहुत तेजी से तरक्की की राह पर बढ़ेगा. तरक्की की कयासबाजियों को इस बात ने भी बल दिया कि प्रधानमंत्री की पहचान बड़े अर्थशास्‍त्री के तौर पर थी. कहा गया कि प्रधानमंत्री को चुनाव भी कहीं से नहीं लड़ना है इसलिए वे चुनावी राजनीति के दबावों से मुक्त होकर काम कर सकेंगे. हम जैसे लोग जो चुनाव लड़ते हैं उनके पास उनके संसदीय क्षेत्र से विभिन्न मसलों पर लगातार फोन आते हैं. लेकिन मनमोहन सिंह के पास कोई फोन नहीं आता क्योंकि उनका कोई संसदीय क्षेत्र ही नहीं है.

क्या आप मनमोहन सिंह के चुनाव नहीं लड़ने को ही इस सरकार की जनविरोधी नीतियों की वजह मानते हैं?
दुनिया की बड़ी पत्रिकाओं में ‘दि इकॉनोमिस्ट’ को शुमार किया जाता है. इस पत्रिका ने हाल में यह कहा कि पिछले आठ साल से भारत पर अनिर्वाचित प्रधानमंत्री शासन कर रहा है. बाहर वाले भी देखते हैं कि प्रधानमंत्री ने कभी चुनाव लड़ा नहीं. एक दफा दक्षिणी दिल्ली से चुनाव लड़े भी तो हार गए और उसके बाद कभी लड़े ही नहीं. मनमोहन सिंह ने तो संविधान की धज्‍जियां उड़ा दी. संविधान में यह नहीं लिखा हुआ है कि प्रधानमंत्री लोकसभा का ही होना चाहिए. लेकिन संविधान की मर्यादा का तकाजा है कि प्रधानमंत्री लोकसभा का हो. जब प्रणव मुखर्जी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार कांग्रेस ने बना दिय तो उनके सामने इस बात के लाले पड़ गए कि किसे सदन का नेता बनाएं. देश का प्रधानमंत्री पूरे देश का नेता होता है. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कम समय के लिए प्रधानमंत्री बना है या फिर अधिक समय के लिए. जो अपनी पार्टी का भी सर्वोच्‍च नेता नहीं है उसे देश या फिर देश के बाहर के लोग भारत का नेता कैसे मानेंगे.

मनमोहन सिंह की नेतृत्व क्षमता के बारे में आप क्या कहेंगे?
इस सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हमारी व्यवस्‍था को ही संप्रग के अनिर्वाचित प्रधानमंत्री के तरीके ने खंडित कर दिया. मनमोहन सिंह भले ही प्रधानमंत्री के पद पर बैठे हुए हों लेकिन उनके पास कोई ताकत नहीं है. ताकत है सोनिया गांधी के पास लेकिन उनके पास कोई जिम्मेदारी नहीं है. मनमोहन सिंह के पास जिम्मेदारी तो है लेकिन ताकत नहीं है. संप्रग का यह प्रयोग ही देश की अभी की सारी दिक्कतों की जड़ में है. क्योंकि हर जगह नेतृत्व का अभाव दिखता है. ममता बनर्जी और डीएमके तो अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में भी सहयोगी थे. ये दोनों इस सरकार में भी हैं. लेकिन जो स्‍थितियां आज पैदा हो रही हैं वे हमारे समय में तो नहीं हो रही थीं. हमने इन दोनों को ठीक ढंग से साथ लेकर चलते रहे. संप्रग से कहीं अधिक सहयोगी दलों को साथ लेकर चलने का काम राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने किया था. राजग ऐसा इसलिए कर पाया क्योंकि उसके पास अटल बिहारी वाजपेयी जैसा नेतृत्व था. जबकि मनमोहन सिंह के पास नेतृत्व की क्षमता नहीं है.

कुछ लोग कहते हैं कि मनमोहन सिंह के पास असली ताकत नहीं और सरकार दस जनपथ से चलती है. आपकी क्या राय है?
मनमोहन सिंह के पास न नैतिक ताकत है, न राजनीतिक ताकत है और न सरकारी ताकत है. प्रधानमंत्री के पास कोई ताकत नहीं है. इस वजह से जिस नेतृत्व की आवश्यकता इस देश को अभी है, वह नहीं मिल पाया. इस सरकार के शुरुआत के दो-तीन साल तो यह सोचते हुए कट गए कि प्रधानमंत्री बहुत ईमानदार हैं इसलिए सब ठीक चलेगा. लेकिन कहीं न कहीं तो इसे बिखरना ही था और अब संप्रग-2 में यह बिखराव बिल्कुल साफ दिख रहा है. यह सरकार नेतृत्व और विश्वसनीयता के गंभीर संकट से गुजर रही है. जब प्रणव मुखर्जी सरकार के हिस्से थे तो सारी जिम्मेदारी उन पर छोड़ रखी थी.

संसद में प्रधानमंत्री की अपेक्षाकृत कम मौजूदगी को आप किस तरह देखते हैं?
देश के प्रधानमंत्री को जब भी समय मिलता है तो वह संसद के सदन में आकर बैठता है. चाहे वह लोकसभा में बैठे या राज्य सभा में. जब संसद में प्रश्नकाल चल रहा होता है तब मनमोहन सिंह सदन में आते हैं. इसके बाद शून्य काल शुरू होता है और सांसद कहते रह जाते हैं कि मैं प्रधानमंत्री जी को यह बताना चाहूंगा, वह बताना चाहूंगा लेकिन मनमोहन सिंह इन बातों की अनदेखी करते हुए सदन से उठकर चले जाते हैं. संसद की इतनी अवज्ञा और किसी शासन में नहीं हुई जितनी मनमोहन सिंह सरकार के दौरान हुई है. मनमोहन सिं की संसद में कोई दिलचस्पी ही नहीं है. जो संसद में पला-बढ़ा उसे तो इसकी कार्यवाही में दिलचस्पी है लेकिन जिसका कोई संबंध ही नहीं रहा उसकी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है. प्रधानमंत्री का संसद में रुचि नहीं होना देश की एक सबसे बड़ी समस्या है.

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