विलुप्ति से गड़बड़ाएगा प्राकृतिक चक्र

हिमांशु शेखर

पर्यावरण के मसले पर पूरी दुनिया चिंतित दिख रही है। प्रदूषण के मामले में भारत भी पीछे नहीं है। यहां भी काफी तेजी से प्रदूषण बढ़ रहा है। इसका नकारात्मक असर कई तरह से पड़ रहा है। बढ़ते प्रदूषण की वजह से इंसानों का जीवन तो मुश्किल होता ही जा रहा है साथ ही साथ दूसरे जीवों के लिए भी खुद को बचाए रख पाना बेहद मुश्किल होता जा रहा है। हालत यह है कि दुनिया की कई प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई हैं। भारत की भी कई प्रजातियां विलुप्त होने के मुहाने पर खड़ी हैं।

वैश्विक स्तर पर इंटरनेशनल यूनियन फार कजर्वेशन आफ नेचर नाम की एक संस्था पर्यावरण से जुड़े विभिन्न मसलों पर काम करती है। इस संस्था ने हाल ही में एक रपट जारी की है। इस रपट में दुनिया की वैसी प्रजातियो के बारे में बताया है जो विलुप्त होने की कगार पर हैं। इस रपट में यह बताया गया है कि भारत के 687 प्रजातियां विलुप्त होने के खतरे को झेल रही है। इनमें जानवरों और पौधों की प्रजातियां हैं। बताते चलें कि 2008 में यह संख्या 659 थी। यानी एक साल के दौरान खतरे के दायरे में आने वाली प्रजातियों की संख्या में 28 का इजाफा हुआ।

इससे साफ है कि सरकार इन प्रजातियों को बचाने के प्रयासों में किस कदर लापरवाही बरत रही है। जिन देशों की सबसे ज्यादा प्रजातियां विलुप्त होने के खतरे को झेल रही हैं, उन शीर्ष दस देशों में भारत भी शामिल है। भारत में विलुप्त होने के कगार पर खड़े प्रजातियों में जानवरों की 96 प्रजातियां हैं। वहीं ऐसी पक्षियांे की प्रजातियों की संख्या 67 है। लुप्त होने के खतरे को झेल रही 46 प्रजातियां मछलियों की हैं। इसके अलावा पौधों की 217 प्रजातियां अपने अस्तित्व खोने के मुहाने पर खड़ी हैं। इसी से हालत की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है। पर इन्हें बचाने के लिए या विलुप्त होने की कगार पर खड़ी प्रजातियों की संख्या कम करने के लिए सरकारी स्तर पर कोई प्रयास नहीं हो रहा है। लापरवाही का आलम तो यह है कि विलुप्त हो रही प्रजातियों पर परिणामकारी चर्चा भी नहीं हो रही है। कुछ खास प्रजातियों पर मंडरा रहे खतरों पर कहीं-कहीं चर्चा जरूर होती है लेकिन जिस व्यापक फलक की जरूरत इस मसले को है, उसका स्पष्ट अभाव दिखता है।

मालूम हो कि पिछले एक साल में भारत की 28 नई प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर खड़े प्रजातियों की सूची में शामिल हो गई हैं। आश्चर्यजनक बात यह है कि इसमें से 24 प्रजातियां मछलियांे की है। इससे साफ है कि देश में जल प्रदूषण काफी तेज गति से बढ़ रहा है। दरअसल, देश में अभी भी शहरों में पैदा हो रहे कचरे और औद्योगिक कचरे के निस्तारण को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। इस तरह के कचरों के लिए सबसे आसान ठिकाना किसी नदी को बना दिया जाता है। इसका असर यह होता है कि वह नदी कुछ ही दिनों में नदी नहीं रहती है बल्कि नाले में तब्दील हो जाती है। गंगा और यमुना का उदाहरण सबके सामने है। दिल्ली की यमुना को देखकर तो यह यकीन करना भी बेहद मुश्किल है कि यह कोई नदी है। इसी तरह गंगा का मामला है। पहाड़ों से निकलकर गंगा जैसे ही मैदानी क्षेत्र में उतरती है उसमें कचरे का अंबार समाहित होने लगता है।

बहरहाल, इस संस्था ने दुनिया भर की 47,677 प्रजातियों का अध्ययन किया है। इसमें से संस्था ने पाया कि एक तिहाई से ज्यादा यानी 17,291 प्रजातियां विलुप्त होने के मुहाने पर खड़ी हैं। इस संस्था ने पिछले साल 44,828 प्रजातियों के अध्ययन के आधार पर अपनी रपट तैयार की थी। संस्था ने बताया था कि इसमें से 16,928 प्रजातियों पर खतरा मंडरा रहा है। यानी दिनोंदिन खतरे का दायरा बढ़ता जा रहा है। पर वैश्विक स्तर पर इन प्रजातियों को बचाने के लिए किसी ठोस और परिणामकारी मुहिम नहीं दिखती है। भारत में भी सरकारी या गैर सरकारी स्तर पर विलुप्त होने की कगार पर ऐसी कोई ठोस मुहिम नहीं दिखती है।

खतरे के दायरे में आने वाली प्रजातियों की बढ़ती संख्या को सीधे तौर पर बढ़ते प्रदूषण से जोड़कर देखा जाना चाहिए। इस बात को स्वीकार करने में किसी को कोई हिचकिचाहट नहीं होना चाहिए कि प्रदूषण का स्तर दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन की बात भले ही चल रही हो लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ हो नहीं रहा है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि कई प्रजातियां बढ़ते प्रदूषण के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रही हैं। क्योंकि उनकी प्राकृतिक बनावट इस तरह की है कि दूषित पर्यावरण के साथ उनके लिए सामंजस्य बैठा पाना असंभव सरीखा है।

यही वजह है कि उनकी संख्या घटती ही जा रही है। प्रदूषण रोकने के लिए जिस स्तर पर प्रयास होना चाहिए, वह हो नहीं रहा है। औद्योगिक प्रदूषण को रोकने की बात तो होती है लेकिन तेजी से बदलती जीवनशैली की वजह से फैल रहे प्रदूषण को कम करने की बात कहीं नहीं हो रही है। इंसानी जीवन उपयोग के बजाए उपभोग पर आधारित हो गया है और यही वजह है कि सुविधा वाली तमाम तरह की प्रौद्योगिकी अस्तित्व में आ रही है। पर ऐसी प्रौद्योगिकी की वजह से इंसानी जीवन तो सुविधा संपन्न हो रहा है लेकिन इसकी वजह से फैल रहा प्रदूषण अभी तो विलुप्त होने की कगार पर खड़ी प्रजातियों के लिए परेशानी का सबब बन रहे हैं लेकिन वह दिन दूर नहीं जब इंसानों पर भी इनका स्पष्ट असर देखने को मिलेगा।

दरअसल, प्रजातियों के विलुप्त होने के बेहद नकारात्मक असर पड़ रहे हैं और दिनोंदिन इसके और भयानक परिणाम सामने आएंगे। प्रजातियों के विलुप्त होने का सीधा सा मतलब है पारिस्थितिक तंत्र का गड़बड़ हो जाना। क्योंकि ये प्रजातियां प्रकृति के एक पूरे चक्र का निर्माण करती हैं। इस पूरे चक्र में से अगर कोई एक चीज भी खत्म होती है तो पूरा का पूरा चक्र बैठ जाएगा। बजाहिर, इसका खामियाजा सबको भुगतना होगा। इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि लुप्त होने की कगार पर खड़े प्रजातियों को बचाने के लिए विशेष और परिणामकारी मुहिम चलाई जाए। इसके लिए जिस राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है, उसका अभाव स्पष्ट तौर पर दिखता है। पर समय रहते अगर इन्हें बचाने की दिशा में ठोस कदम नहीं बढ़ाए गए तो पछताने के अलावा और कोई चारा नहीं बचेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *