वफादार सिपहसलार

हिमांशु शेखर

राष्ट्रपति के पद के लिए जब से प्रणव मुखर्जी का नाम चलना शुरू हुआ था तब से ही यह लगभग तय माना जा रहा था कि पी चिदंबरम को गृह मंत्रालय से वापस वित्त मंत्रालय में भेजा जाएगा. असली कयासबाजी चल रही थी नए गृह मंत्री और लोकसभा में सत्ताधारी दल के नेता के नाम को लेकर. जब यह पता चला कि कांग्रेस आलाकमान सुशील कुमार शिंदे को ऊर्जा मंत्रालय से गृह मंत्रालय भेज रही है तो उन लोगों को सबसे ज्यादा हैरानी हुई जो सियासत में प्रदर्शन के आधार पर पुरस्कार की बात करते हैं. लेकिन जो लोग देश की सियासी पेचीदगियों से वाकिफ हैं उन्हें अफसोस जरूर हुआ लेकिन आश्चर्य नहीं.

वजह बताते हुए वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘हर कोई जानता है कि सुशील कुमार शिंदे गांधी परिवार के वफादार रहे हैं. गांधी परिवार को कभी उनसे खतरा नहीं लगा. आप अगर गौर से संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की दोनों सरकारों को देखेंगे तो यह पता चलेगा कि गांधी परिवार ने कभी वैसे व्यक्‍ति को गृह मंत्रालय में नहीं लाया जो सरकार में स्वाभाविक तौर पर नंबर दो दिखने लगे. अपने यहां यह माना जाता है कि प्रधानमंत्री के बाद गृह मंत्री ही होता है. अपने सबसे कद्दावर नेता प्रणव मुखर्जी को भी गांधी परिवार ने गृह मंत्री नहीं बनाया. अब जब प्रणव नहीं हैं तो चिदंबरम का कद ना बड़ा हो जाए इस भय से उन्हें वित्त मंत्रालय भेज दिया गया और शिंदे को यहां ले आया गया.’ शिंदे गांधी परिवार के किस कदर वफादार हैं, इसे समझने के लिए दो घटनाओं का उल्लेख करना जरूरी है. बात 2002 की है. उस वक्त केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार चला रहे थे. उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होना था. राजग ने अपना उम्मीदवार भाजपा के वरिष्ठ नेता भैरोसिंह शेखावत को बनाया था. उनकी जीत तय मानी जा रही थी. ऐसे में सोनिया गांधी ने सुशील कुमार शिंदे को कांग्रेस का उम्मीदवार बनाया. कहा जा रहा था कि इसके बाद शिंदे का सियासी करियर इसके बाद खत्म हो जाएगा. खुद शिंदे इस खतरे वे वाकिफ थे. इसके बावजूद वे चुनाव लड़े और हारे.

बगैर कोई सवाल उठाए गांधी परिवार का आदेश मानने का ईनाम शिंदे को छह महीने में ही मिल गया. सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र के तात्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को हटाकर राज्य का मुखिया शिंदे को बना दिया. दूसरी घटना है 2004 की. लोकसभा चुनावों के बाद महाराष्ट्र में विधानसभा के चुनाव हुए. कांग्रेस के लिए यह चुनाव निकालना मुश्‍किल लग रहा था. लेकिन शिंदे की अगुवाई में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के गठबंधन को बहुमत हासिल हो गया. मुख्यमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार सुशील कुमार शिंदे थे. लेकिन गांधी परिवार ने विलासराव देशमुख को राज्य का मुख्यमंत्री बना दिया. शिंदे ने एक बार फिर बगैर कुछ कहे कांग्रेस आलाकमान का यह फैसला स्वीकार कर लिया. इसके बाद शिंदे को आंध्र प्रदेश का राज्यपाल बना दिया गया. यह लगा अब तो शिंदे राज्यपाल बन गए हैं इसलिए उनके राजनीतिक करियर पर फुल स्टॉप लग गया है. लेकिन गांधी परिवार की वफादारी का ईनाम उन्हें दो साल के भीतर ही मिल गया और उन्हें 2006 में हैदराबाद के राजभवन से लाकर दिल्ली के ऊर्जा मंत्रालय में बैठा दिया गया. इससे पता चलता है कि शिंदे के बारे में जब-जब यह माना गया कि उनकी सियासी पारी खत्म होने वाली है तब-तब उन्होंने और मजबूत होकर वापसी की और इसकी प्रमुख वजह रही गांधी परिवार के प्रति उनकी वफादारी.

सियासी जानकार यह मान रहे हैं कि शिंदे को गृह मंत्री का पद भी उन्हें गांधी परिवार के प्रति वफादार होने की वजह से ही मिला है न कि प्रदर्शन के आधार पर. जिस दिन शिंदे को गृह मंत्री बनाने की घोषणा हुई उसी दिन देश ने अब तक का सबसे बड़ा ब्लैकआउट (बिजली कटौती) झेला. देश के तीन प्रमुख ग्रिड फेल होने की वजह से 22 राज्यों के 60 करोड़ से अधिक लोग प्रभावित हुए. जिस मंत्री को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहे था उसे सजा देने के बजाए एक तरह से प्रमोशन दे दिया गया. अगर कोई ऊर्जा मंत्रालय के अधिकारियों से बात करे तो यह पता चलता है कि देश में लगातार दो दिनों तक हुई सबसे बड़ी बिजली कटौती की वजह शिंदे की ढीलीढाली कार्यशैली भी है. ऐसा इसलिए कि केंद्रीय बिजली नियामक आयोग (सीईआरसी) ने जुलाई में ही बताया था कि पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्‍थान अपने कोटा से अधिक बिजली नैशनल ग्रिड से ले रहे हैं. इसके बाद 12 जुलाई को ऊर्जा मंत्रालय ने एक पत्र इन राज्यों को भेजकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान ली. अगर इन राज्यों के साथ उसी वक्त ऊर्जा मंत्रालय थोड़ा सख्ती से पेश आता तो यह संभव था कि इतनी बड़ी बिजली कटौती का सामना नहीं करना पड़ता. हालांकि, ऊर्जा मंत्रालय ने ग्रिड फेल होने की असली वजहों का पता लगाने के लिए एक समिति बनाई है लेकिन शुरुआती जांच में यह बात सामने आई है कि आगरा-दिल्ली और आगरा-ग्वालियर के बीच कहीं पर ओवर लोडिंग होने की वजह से ग्रिड फेल हुआ. इससे भी यह बात प्रमाणित होती है कि अगर सीईआरसी की रिपोर्ट पर ऊर्जा मंत्रालय ने कार्रवाई की होती तो ब्लैकआउट टल सकता था. जब बिजली कटौती से लोग बेहाल थे तो शिंदे इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेने के बजाए यह कुतर्क देते हुए दिखे कि अमेरिका में तो चार-चार दिन तक ग्रिड ठीक नहीं होता लेकिन यहां तो चार घंटे में ही सब ठीक हो गया.

बतौर ऊर्जा मंत्री शिंदे की नाकामी की कहानी यहीं खत्म नहीं होती. जब 2006 में वे ऊर्जा मंत्री बने थे तो उस वक्त उन्होंने कहा था कि सरकार हर घर का अंधेरा दूर करेगी. इसका मतलब यह हुआ कि शत प्रतिशत बिजलीकरण का लक्ष्य रखा गया. लेकिन इस वादे का हश्र किसी से छिपा हुआ नहीं है. 11वीं पंचवर्षीय योजना में यह लक्ष्य रखा गया था कि बिजली उत्पादन की क्षमता में 78,000 मेगावॉट की बढ़ोतरी की जाएगी. लेकिन सुशील कुमार शिंदे के कार्यकाल में बिजली उत्पादन क्षमता में 53,000 मेगावॉट का ही इजाफा हुआ. अभी देश की बिजली उत्पादन की कुल क्षमता है 1.87 लाख मेगावॉट. लेकिन अब भी पीक आवर में आपूर्ति और मांग के बीच 12 फीसदी का फासला है. सुशील कुमार शिंदे के कार्यकाल में सरकारी बिजली कंपनियों का हाल और खस्ता हुआ. इसकी गवाही खुद सरकारी आंकड़े दे रहे हैं. आज हालत यह है कि सरकारी बिजली कंपनियों पर बैंकों का 12,000 करोड़ से ज्यादा का कर्ज है. आर्थिक मामलों का अध्ययन करने वाली संस्‍था क्रिसिल का अध्ययन बताता है कि 2006-07 से 2009-10 के बीच सरकारी बिजली कंपनियों का घाटा 24 फीसदी बढ़कर 27,500 करोड़ रुपये हो गया. क्रिसिल ने अनुमान लगाया है कि अगर 2011 के घाटे को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो घाटा बढ़कर 40,000 करोड़ रुपये पर पहुंच जाएगा. बिजली कंपनियां मुख्य तौर पर कोयले और गैस की कमी की समस्या का सामना कर रहे हैं. इस वजह से ज्यादातर कंपनियां अपनी क्षमता से काफी कम बिजली उत्पादन कर रही हैं. इसके बावजूद बिजली कंपनियों के ईंधन आपूर्ति को आधे पर काम कर रहे हैं. इस समस्या को दूर करने के लिए शिंदे कुछ नहीं कर पाए. आज हालत यह है कि देश की बिजली कंपनियों को जितने कोयले की जरूरत है उसके 60 फीसदी की आपूर्ति ही कोल इंडिया कर पा रही है. जबकि देश के कुल कोयला उत्पादन में कोल इंडिया की हिसेदारी 80 फीसदी है. शिंदे ने कोल इंडिया से आपूर्ति सुधारने की दिशा में कोई खास प्रयास नहीं किया. ऊर्जा क्षेत्र में कई तरह की सुधार की बात सालों से चल रही है. लेकिन शिंदे के छह साल के कार्यकाल में न तो सुधारों की गाड़ी आगे बढ़ी और न ही ऊर्जा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लेकर कोई प्रगति हुई.

इसके बावजूद शिंदे को गृह मंत्री बनाया जाना यह साबित करता है कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व या यों कहें कि गांधी परिवार ने उन्हें याह प्रोन्नति किसी खास रणनीति के तहत दी है. इसमें गांधी परिवार के प्रति वफादारी तो अहम है ही साथ में इस बात को लेकर भी निश्‍चिंतता है कि शिंदे का कद कभी भी उतना बड़ा नहीं हो सकता कि वे गांधी परिवार को चुनौती देते नजर आए. कई राजनीतिक जानकार मानते हैं कि प्रणव मुखर्जी को गृह मंत्री नहीं बनाए जाने की असली वजह गांधी परिवार का यही डर था. ऐसा लगता है कि शिंदे को गृह मंत्रालय में लाकर सोनिया गांधी दलितों को भी एक बार फिर से कांग्रेस के साथ लाने की योजना को आगे बढ़ाना चाहती हैं. इस बात से सहमति जताते हुए नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘दलित सुशील कुमार शिंदे को गृह मंत्री बनाकर सोनिया गांधी ने एक राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है. उन्होंने यह संदेश दिया है कि कांग्रेस ही एक ऐसी पार्टी है जो दलितों का खयाल रखती है. कांग्रेस चाहेगी कि उसे आने वाले चुनावों में इस बात का फायदा मिले.’ वे कहती हैं, ‘आपको याद होगा कि दो साल पहले राहुल गांधी ने भी कहा था कि अगर कांग्रेस को अपने बूते केंद्र की सत्ता में आना है तो उसे दलितों को फिर से अपने साथ लाना होगा. इसके बाद से ही राहुल गांधी का दलितों के घर में जाना और वहां भोजन करने का काम शुरू हुआ था. सुशील कुमार शिंदे को गृह मंत्रालय में लाए जाने को इससे भी जोड़कर देखना होगा.’

यहां सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए कांग्रेस आलाकमान ने गृह जैसा बेहद अहम और संवेदनशील मंत्रालय एक ऐसे व्यक्‍ति के हाथों में सौंप दिया जिसने ऊर्जा मंत्रालय में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया या फिर शिंदे गृह मंत्रालय संभालने में सक्षम हैं? इस सवाल का जवाब समझने में आसानी हो, इसके लिए जरूरी है कि शिंदे की पृष्ठभूमि से संबंधित कुछ और बातों को जान लिया जाए. अगले 4 सितंबर को अपनी जिंदगी के 71 साल पूरे करने वाले शिंदे सात बार विधायक रहे हैं और तीसरी दफा सांसद बने हैं. कोल्हापुर के शिवाजी विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई करने वाले शिंदे ने अपने कामकाज की शुरुआत कोर्ट में बतौर क्लर्क 1957 में की. वे इस नौकरी में 1965 तक रहे. इसके बाद वे पुलिस में सब इंस्पेक्टर बन गए. पुलिस की नौकरी के दौरान ही उन्होंने सीआईडी के लिए भी काम किया. छह साल तक पुलिस की नौकरी करने के बाद 1971 में उन्हें शरद पवार ने राजनीति में लाया. इसके तीन साल बाद सोलापुर के करमला विधानसभा सीट पर उपचुनाव होना था और इसमें कांग्रेस की ओर से शिंदे को टिकट मिला और वे जीतकर पहली बार विधायक बन गए. इसके बाद उनका राजनीतिक ग्राफ लगातार बढ़ता ही गया. विधायक बनने के कुछ ही महीनों बाद उन्हें महाराष्ट्र के वीपी नायक सरकार में राज्य मंत्री बनाया गया. शिंदे महाराष्ट्र में वित्त, योजना, शहरी विकास, उद्योग और परिवहन मंत्रालय संभाल चुके हैं. उन्होंने रिकॉर्ड नौ बार महाराष्ट्र का बजट पेश किया है. वे दो मर्तबा 1990 और 1996 में महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे हैं. 1992 में उन्हें महाराष्ट्र से राज्य सभा के लिए चुना गया. हालांकि, शिंदे को उस वक्त बड़ा राजनीतिक झटका लगा था जब वे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे और उन्होंने सोलापुर की जो लोकसभा सीट छोड़ी थी उस पर उनकी पत्नी उज्जवला चुनाव हार गई थीं. यही वजह है कि जब उसी साल बाद में हुए विधानसभा चुनाव में शिंदे जीते तो सार्वजनिक तौर पर रो पड़े. शिंदे खुद को ऐसा इकलौते दलित नेता के तौर पर प्रस्तुत करते हैं जो सामान्य सीट से चुनाव जीतता है. हालांकि, 2009 में उनकी लोकसभा की सोलापुर सीट आरक्षित हो गई.

शिंदे को राजनीति में आगे बढ़ाने में प्रमुख भूमिका शरद पवार की रही. लेकिन शरद पवार के कांग्रेस के अलग होने से पहले से ही शिंदे गांधी परिवार के करीब हो गए थे. जब सोनिया गांधी ने अमेठी से अपना पहला चुनाव लड़ा तो शिंदे को उन्होंने चुनाव एजेंट बनाया. इसके सहारे गांधी परिवार से शिंदे की नजदीकी और बढ़ी. हालांकि, गृह मंत्री बनने के बाद भी एक दिन शिंदे ने यह बयान दिया कि शरद पवार उनके राजनीतिक गुरू हैं. इस बयान को कांग्रेस और शरद पवार के बीच खराब हो रहे रिश्ते को ठीक करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. जब पिछली बार में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे तो उसी दौरान आदर्श सोसायटी को जमीन आवंटित की गई थी. 2010 में जब आदर्श घोटाला सामने आया तो उससे शिंदे का भी नाम जुड़ा. इस घोटाले की जांच कर रही समिति के सामने भी शिंदे को पेश होकर अपना पक्ष रखना पड़ा. शिंदे आदर्श सोसायटी की गड़बड़ियों से पल्ला झाड़ते हुए सारा दोष महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री विलासराव देशमुख पर मढ़ते हैं.

शिंदे के साथ काम करने वाले लोग उनकी खूबियों को गिनाते हुए उनकी विनम्रता का उल्लेख सबसे पहले करते हैं. हाल तक शिंदे के सहयोगी के तौर पर काम करने वाले एक अधिकारी कहते हैं, ‘वे बहुत विनम्र हैं. वे हर किसी की बात को काफी गंभीरता से सुनते हैं. अगर चपरासी भी कोई बात कहे तो उसे भी वे गंभीरता से सुनते हैं. इसकी एक वजह यह हो सकती है कि उन्होंने खुद कचहरी में चपरासी की नौकरी की है और बाद में पुलिस में बतौर सब इंस्पेक्टर काम किया है. सत्ता और पैसे का मद उनमें नहीं दिखता. इन्हीं योग्यताओं के बूते उन्होंने एक सामान्य चपरासी से लेकर देश के गृह मंत्री तक का सफर तय किया है.’ सुशील कुमार बेटे की तीन बेटियों में एक प्रणिति शिंदे महाराष्ट्र में विधायक हैं. वे अपने पिता की खूबियों को गिनाते हुए कहती हैं, ‘वे कभी भी नाराज नहीं होते. बड़े धैर्य के साथ अपना काम निपटाते हैं. वे हमेशा मुस्कुराते रहते हैं और काफी मेहनत करते हैं.’ प्रणिति से बातचीत में ही यह पता चलता है कि लोक कला और मराठी साहित्य से शिंदे को लगाव है और वे हिंदी और मराठी फिल्मों के पुराने गाने सुनना पसंद करते हैं. विचार वेद के नाम से उन्होंने मराठी में एक किताब भी लिखी है.

लेकिन क्या ये योग्यताएं उन्हें बतौर गृह मंत्री सफल बनाएंगी? ऊर्जा मंत्रालय के उनके कामकाज को देखते हुए इस बात को लेकर कई जानकार आशंका जता रहे हैं कि वे बतौर गृह मंत्री बहुत असरदार साबित होंगे. इंटेलीजेंस ब्यूरो (आईबी) के एक पूर्व प्रमुख कहते हैं, ‘यह बात तो गृह मंत्रालय के अधिकारी भी समझ रहे हैं कि शिंदे को गृह मंत्री क्यों बनाया गया है. गांधी परिवार के करीबी होने की वजह से उन्हें यह पद मिला है. उनके पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि चिदंबरम के शुरू किए गए काम को आगे बढ़ाना भी उनके लिए चुनौती साबित होने जा रहा है. उनकी असल परीक्षा नैशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर (एनसीटीसी), तेलंगाना, माओवाद, कश्मीर और आतंकवाद के मोर्चे पर होने वाली है.’ गृह मंत्रालय में उनके शुरुआती दिनों का कामकाज देखकर मंत्रालय के अधिकारी भी उत्साहित नहीं है. गृह मंत्रालय में ऊंचे ओहदे पर काम करने वाले एक आईएएस अधिकारी बताते हैं, ‘जिस दिन वे गृह मंत्री बने उसी दिन पुणे में विस्फोट हुआ लेकिन वैसी तत्परता नहीं दिखी जैसी चिदंबरम के समय में दिखती थी. गृह मंत्रालय के कामकाज से शिंदे कितने वाकिफ हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें यह जानकर भी आश्चर्य हुआ कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मॉर्निंग मीटिंग के लिए रोज गृह मंत्रालय आते हैं. कार्यभार संभालने वाले दिन शिंदे ने ढाई घंटे तक अधिकारियों की बैठक ली लेकिन इसके बावजूद अधिकारी शिंदे की रणनीति नहीं समझ पाए. अधिकारी आपसी बातचीत में इस बैठक को उबाऊ बता रहे थे.’

मंत्रालय के अधिकारियों में यह बात चल रही है कि कहीं फिर से गृह मंत्रालय में वैसा माहौल न बन जाए जैसा शिवराज पाटिल के कार्यकाल के दौरान था. बताते चलें कि चिदंबरम ने गृह मंत्रालय की कार्यशैली में काफी बदलाव किया था. अधिकारी और अन्य कर्मचारी समय पर आएं, इसके लिए उन्होंने बायोमेट्रीक सिस्टम लगवाया था. चिदंबरम खुद समय से पहले दफ्तर पहुंचते थे. इस वजह से अन्य अधिकारी भी बिल्कुल समय से मंत्रालय आने लगे. मुश्किल परिस्थिति में चिदंबरम ने गृह मंत्रालय संभाला था लेकिन अपने 44 महीने के कार्यकाल में उन्होंने तत्परता से काम करने की संस्कृति इस मंत्रालय में विकसित की. चिदंबरम के कार्यकाल के दौरान तकरीबन दो दर्जन आतंकी योजनाएं पटरी से उतारी गईं. चिदंबरम के कार्यकाल में ही अमेरिका को इस बात के लिए मजबूर होना पड़ा कि वह मुंबई हमले के मुख्य आरोपी डेविड कोलमैन हेडली से भारत को पूछताछ की मंजूरी दे. सऊदी अरब को भी अबु जिंदाल का प्रत्यर्पण करना पड़ा. चिदंबरम के कार्यकाल के दौरान गृह मंत्रालय ने अर्द्धसैनिक बलों की संख्या 45,000 से बढ़ाकर 1.10 लाख की.

भले ही अधिकारी शिंदे की कार्यशैली को लेकर चिंतित हों लेकिन राजनीति को समझने वाले लोग मानते हैं कि शिंदे कुछ मामलों में बतौर गृह मंत्री बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं. नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘एनसीटीसी के मामला राज्यों के विरोध की वजह से आगे नहीं बढ़ पाया. कई क्षेत्रीय दलों के नेता मानते हैं कि चिदंबरम थोड़े जिद्दी नेता हैं और कई बार वे अपने फैसले थोपते हैं. लेकिन शिंदे की छवि टकराव से बचने वाले और सबको साथ लेकर चलने वाले नेता की है. शिंदे ने गृह मंत्रालय संभालते ही यह बयान दिया कि वे राज्यों को साथ लेकर चलेंगे. माओवाद के मसले पर भी उन्होंने कहा कि वे बातचीत शुरू करने के लिए हिंसा रोकने का शर्त नहीं रखेंगे. जबकि चिदंबरम इसके उलट सोचते थे. ऐसा लगता है कि राज्यों के साथ केंद्र के संबंध सुधारने की एक प्रमुख कड़ी साबित होने की कोशिश शिंदे करेंगे.’

हालांकि, गृह मंत्री और लोकसभा में सदन के नेता बनने के बाद चालू संसद सत्र में जब शिंदे पहुंचे तो शुरुआत के दो दिनों में उन्होंने ऐसा प्रदर्शन किया जिसकी आलोचना हर तरफ हुई. जब असम हिंसा पर बहस चल रही थी तो उस दौरान शिंदे ने सवालों का जवाब सीधे-सीधे नहीं दिया. दूसरे दिन तो हद ही हो गई. उनकी किसी बात पर जब फिल्म अभिनेत्री और राज्यसभा सदस्य जया बच्चन ने आपत्‍ति की तो गृह मंत्री ने जया बच्चन को यह नसीहत दे डाली कि गंभीर मामले पर बातचीत हो रही है और यह फिल्म का मामला नहीं है इसलिए चुप हो जाइए. शिंदे की इस बात पर कई सांसदों समेत राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने आपत्‍ति जताई और दबाव में शिंदे को जया बच्चन से सदन में ही माफी मांगनी पड़ी. ये दोनों मामले उन लोगों की बातों को बल दे रहे हैं जो शिंदे की क्षमता पर सवाल उठा रहे हैं.

शिंदे के सहयोगी और देश की राजनीति की बारीक समझ रखने वाले लोग अब यह बात भी कर रहे हैं कि अगर 2014 में किसी तरह फिर से कांग्रेस में कमजोर बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में आती है तो शिंदे प्रधानमंत्री भी बन सकते हैं. क्योंकि कमजोर बहुमत की स्‍थिति में संभवतः राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने से परहेज करें. 2014 में शिंदे की उम्र 73 साल होगी और गांधी परिवार उन्हें शीर्ष पद देकर दलितों की हितैषी होने का संदेश देने की कोशिश कर सकती है. नीरजा चौधरी तो यह भी कहती हैं कि संभव है कि चुनाव से पहले ही दलितों का समर्थन पाने के लिए कांग्रेस ऐसा माहौल बनाने की कोशिश करे कि अगले प्रधानमंत्री शिंदे हो सकते हैं.

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