यह लोकतंत्र है या राजतंत्र

हिमांशु शेखर
इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है कि वाईएस राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद आंध्र प्रदेश की राजनीति में एक शून्य उभरा है। पर उनकी मौत के बाद जिस तरह की राजनीति हो रही है, वह तेजी से बदली सियासत के कई चेहरे को सामने ला रही है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस बदलाव की जितनी चर्चा होनी चाहिए उतनी हो नहीं रही है। दरअसल, आंध्र प्रदेश में जिस तरह से राजशेखर रेड्डी के बेटे वाईएस जगनमोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाने को लेकर मुहिम चलाई जा रही है, उसे एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सही नहीं कहा जा सकता है।
सियासत के बदले चेहरे और चरित्र का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राजशेखर रेड्डी का अंतिम संस्कार भी नहीं हुआ था और आंध्र प्रदेश में कांग्रेस का एक खेमा जगनमोहन को अगला मुख्यमंत्री बनाने के प्रति सक्रिय हो गया। इससे कई सवाल उभरते हैं। सबसे बड़ी बात तो यह कि जो लोग जगनमोहन को मुख्यमंत्री बनाने की मुहिम चला रहे हैं, क्या वे सही मायने में राजशेखर के प्रति समर्पित थे। अगर वे सही मायने में वाईएसआर के प्रति समर्पित होते तो कम से कम अपनी मुहिम के लिए वे उनके अंतिम संस्कार तक धैर्य अवश्य रखते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इससे साफ है कि उनकी प्रतिबद्धता वाईएसआर के प्रति न होकर उनके जरिए मिलने वाले खुद के लाभ के प्रति है और उन्हें लगता है कि जगनमोहन को मुख्यमंत्री बनाकर उनके हित सधते रहेंगे।
दरअसल, सवाल बहुत बड़ा है। देश का हर सियासी दल कम से कम सैद्धांतिक तौर पर यह दावा करता है कि उसके लिए व्यक्ति नहीं बल्कि विचारधार प्रमुख है।  या यों कहें कि व्यक्ति से बड़ा दल है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जो लोग जगनमोहन के पक्ष में माहौल बना रहे हैं, वे दल के प्रति प्रतिबद्ध हैं। जाहिर है कि इनकी प्रतिबद्धता दल के प्रति नहीं है और न ही ये विचारधारा को लेकर गंभीर हैं। अगर ऐसा होता तो ये आंध्र प्रदेश की सत्ता को किसी एक परिवार की जागिर बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर नहीं लगाते। ऐसा करना इनके निजी स्वार्थ और अलोकतांत्रिक मानसिकता का ही प्रदर्शन करता है।
इस बात पर भी विचार करना बेहद जरूरी है कि जिस जगनमोहन को मुख्यमंत्री बनाने की मुहिम चलाई जा रही है, उनका राजनीतिक अनुभव कितना है। वे पहली बार सांसद बने हैं और उन्हें सांसद बने हुए सौ दिन से कुछ ही ज्यादा हुए हैं। वे वाईएसआर परिवार की साक्षी टीवी के कर्ताधर्ता हैं। यानी कुल मिलाजुला कर कहा जाए तो उनका अभी तक का अनुभव एक नेता का कम और कारोबारी का ज्यादा है। संभव है कि जगनमोहन में असधारण प्रतिभा हो और उनके समर्थक विशेष दृष्टिï के जरिए यह सब देख पा रहे हों लेकिन यह लोकतंत्र है और यहां जब तक लोग किसी के अनुभव को अपने वोट के जरिए प्रमाणित नहीं करते तब तक उसे मान्यता नहीं मिलती है।
मु_ïी भर लोगों द्वारा अपने स्वार्थ साधने और एक परिवार के प्रति भक्ति दिखाने के फेर में किसी को सत्ता का सिरमौर बना देने को कम से कम लोकतंत्र की सेहत के लिए तो ठीक नहीं ही कहा जा सकता है। दरअसल, आंध्र प्रदेश कांग्रेस में जगनमोहन को मुख्यमंत्री बनाने की जो मुहिम चलाई जा रही उसका सूत्रधार कांग्रेस के प्रमुख सचेतक बट्टïी विक्रमार्का को बताया जा रहा है। कहा जाता है कि वे वाईएसआर के बेहद करीब रहे हैं और अभी वे इसी वजह से जगनमोहन की ताजपोशी की जुगत लगा रहे हैं। इन नेताओं की मुहिम पर अभी कांग्रेस आलाकमान ने आखिरी फैसला नहीं लिया है।
वैसे जिन लोगों को फैसला लेना है वे भी परिवारवाद वाले लोग ही हैं।  कहना न होगा कि इस मामले में अंतिम फैसला सोनिया गांधी लेंगी और सबको पता है कि उन्होंने अपने सियासी सफर परिवारवाद की नाव पर सवार होकर ही तय किया है। वे जिन सलाहकारों से घिरी हुई हैं, वे भी परिवारवाद के कट्टïर समर्थक हैं। इसलिए वे भी वैसा ही सलाह देंगे जो सोनिया गांधी चाहेंगी। हां, यह बात अलग है कि कोई सियासी विवाद नहीं खड़ा हो जाए, इससे डरकर आखिरी समय में वे जगनमोहन के खिलाफ फैसला कर लें।
राजनीति में सही कार्यकर्ताओं के बजाए अपने परिवार के लोगों को आगे बढ़ाने का मामला हर दल में देखा जा रहा है। अभी मुलायम सिंह यादव ने अपनी पुत्रवधु को चुनाव मैदान में उतारा है। यह सीट मुलायम सिंह के पुत्र ने खाली की है। इसलिए उन्होंने अपनी पुत्रवधु को मैदान में उतार दिया। ये वही मुलायम सिंह यादव हैं जो खुद को समाजवादी कहते हुए नहीं अघाते और कुछ साल पहले तक राजनीति में परिवारवाद को जमकर गरियाते थे। पर जब बात खुद के परिवार पर आई तो उन्होंने अपने दल के साथ-साथ खुद के कांग्रेसीकरण से परहेज नहीं किया। कहना न होगा कि भारतीय राजनीति में परिवारवाद कांग्रेस की ही देन है। अब तो कोई भी ऐसा दल नहीं दिखता जहां परिवारवाद को बढ़ावा नहीं दिया जा रहा है।
जिस तरह से हर सियासी दल में परिवारवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है उसे देखते हुए कई बार तो इस बात पर संदेह होने लगता है कि क्या भारत सचमुच एक लोकतंत्र है़? अगर यह लोकतंत्र है तो क्या काफी तेजी से इसे राजतंत्र या यों कहें कि परिवारतंत्र बनाने के प्रक्रिया नहीं चलाई जा रही है? सियासों दलों में बढ़ते परिवारवाद को देखते हुए यह बात तो सच मालूम पड़ती है। अगर ऐसा नहीं होता तो सत्ता को किसी एक परिवार की जागीर नहीं बना दिया जाता।
सही मायने में कहा जाए तो आज हर सियासी दल एक गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। सभी दलों में कार्यकर्ता निर्माण की प्रक्रिया थम गई है। इसके लिए भी परिवारवाद ही जिम्मेवार है। क्योंकि सालों तक विचारधारा से जुड़कर परिश्रम करने वाला कार्यकर्ता जब शीर्ष पर बैठे नेता के परिजनों को बगैर कोई काम किए आगे बढ़ता देखता है तो वह दुखी होता है और ऐसी राजनीति से उसका मोहभंग हो जाता है। इसका असर यह हो रहा है कि सही और सक्षम राजनीतिक कार्यकर्ता सियासी दलों में नहीं आ रहे हैं। साथ ही एक खास तरह का भय दलों में शीर्ष पर बैठे लोगों के मन में भी है। उन्हें एक बार सत्ता मिलती है तो वे इसे हर हाल में अपने पास ही रखना चाहते हैं। उनके अंदर विश्वास की कमी है। यही वजह है कि चुनाव के वक्त जब प्रचार की बागडोर संभालने की बात आती है तो यह जिम्मेवारी किसी सक्षम राजनीतिक कार्यकर्ता को नहीं दी जाती है बल्कि किसी परिजन को दे दी जाती है। 

1 thought on “यह लोकतंत्र है या राजतंत्र

  1. हिमांशु जी
    सादर वन्दे !
    बहुत ही उपयोगी पोस्ट लिखी है आपने, यकीन मानिये इस देश में अभी भी राजतन्त्र ही चल रहा है,
    आजादी के बाद का हाल देखें तो सबसे बड़ा राज परिवार है नेहरू-गांघी परिवार. आज अगर इस परिवार को कांग्रेस से निकाल कर देखें तो यह पार्टी समाप्त हो जायेगी. इसी तरह मुलायम, लालू, करूणानिधि, मायावती, रामविलास पासवान, बालठाकरे और न जाने कितने छोट-बड़े राजा किसी न किसी रूप में इस देश पर राज कर रहे हैं, प्रजातंत्र तो इन्ही के फैलाये सेकुलरिज्म की परिभाषा है जिसे यह राजनीति कहते हैं.
    रत्नेश त्रिपाठी

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