लाचार सरकार

हिमांशु शेखर

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी के रवैये से परेशान कांग्रेस की अगुवाई वाली केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजों से यह उम्मीद लगा रखी थी कि उसके लिए लखनऊ से कोई राहत की खबर आएगी. लेकिन देश के सबसे बड़े प्रदेश के चुनावी नतीजों ने देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की केंद्र सरकार के लिए सबसे मुश्किल दिनों की शुरुआत कर दी. जब नतीजे आए तो देश की राजनीति को जानने-समझने वाले कई लोगों ने कहा कि अब केंद्र की सरकार महीनों और सालों में नहीं चलेगी बल्कि यह अब हफ्तों में चलने वाली सरकार साबित होगी. हर तरफ से संप्रग के दूसरे कार्यकाल की मनमोहन सिंह सरकार की उम्र को लेकर सवाल उठने लगे. हालत यह हो गई कि खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को बाहर आकर यह कहना पड़ा कि संप्रग को कोई खतरा नहीं है. इसके बाद कांग्रेस नेता जयंती नटराजन ने भी सोनिया की हां में हां मिलाते हुए यही बात दोहराई.

हालांकि, कांग्रेस प्रमुख और अन्य कांग्रेसी नेता जो कह रहे हैं उसे सच्चाई से मुंह छुपाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है. क्योंकि अगर सब कुछ ठीक होता तो सोनिया गांधी के बयान के अगले ही दिन केंद्रीय रेल मंत्री और तृणमूल के प्रमुख नेता दिनेश त्रिवेदी इंडियन एक्सप्रेस को यह नहीं कहते कि वे चाहते हैं कि लोक सभा चुनाव जल्दी हो जाएं क्योंकि ऐसा होने पर तृणमूल की सीटों में बढ़ोतरी होगी. बाद में जब कांग्रेस की तरफ से हो-हल्ला मचा तो त्रिवेदी ने यह कहकर सुलगती चिंगारी पर थोड़ी सी राख डालने की कोशिश की कि यह उनकी निजी राय है. त्रिवेदी अभी रेल मंत्रालय संभाल रहे हैं और उनके मंत्रालय के अधिकारियों का मानना है कि त्रिवेदी ऐसे नेता नहीं हैं जो इस तरह का बयान बगैर सोचे-समझे दे दें. इन अधिकारियों की मानें तो त्रिवेदी ऐसा कोई भी बयान नहीं देते हैं जिसकी राजनीतिक सहमति ममता बनर्जी के साथ नहीं हो. कुछ ही दिनों पहले राहुल गांधी से मिलने उनके घर चले जाने की वजह से त्रिवेदी को ममता के गुस्से का शिकार होना पड़ा था और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने उन्हें आगे से ऐसा नहीं करने की हिदायत दी थी. रेल मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि इस घटना के बाद तो इस बात की संभावना और भी कम हो जाती है कि त्रिवेदी कोई इतना बड़ा बयान बगैर ममता के हरी झंडी के दे दें. इन अधिकारियों का कहना है कि मंत्रालय में त्रिवेदी की पहचान ‘दस्तखत मंत्री’ की है और यह इसलिए बनी है कि हर छोटे-बड़े फैसले की मंजूरी कोलकाता से लेनी होती है.

इसका मतलब यह निकलता है कि आने वाले दिनों में तृणमूल का रवैया आक्रामक रहेगा और ऐसे में मनमोहन सिंह सरकार के लिए कोई भी बड़ा फैसला लेना आसान नहीं होगा. क्योंकि तृणमूल की समर्थन वापसी का खतरा हर वक्त इस सरकार के सर पर मंडराता रहेगा. तृणमूल के अलावा कई और क्षेत्रीय पार्टियां हैं जो लोक सभा चुनावों के लिए 2014 तक का इंतजार नहीं करना चाहती हैं. इनमें तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की एआईएडीएमके, प्रकाश सिंह बादल की शिरोमणि अकाली दल और मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी. ये सभी अपने-अपने राज्यों की विधानसभा चुनावों में मिली सफलता से उत्साहित हैं और इन्हें उम्मीद है कि अगर लोक सभा चुनाव जल्दी होते हैं तो इनकी सीटें बढ़ेंगी.

भाजपा की ओर से लोक सभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने चुनाव परिणाम के दिन ही यह संकेत दिया कि देश में आम चुनाव हो सकते हैं. लेकिन पार्टी सूत्रों की मानें तो जल्दी चुनाव के मसले पर भाजपा दो धड़े में बंटी है. एक धड़ा वह है जो लालकृष्ण अडवाणी के साथ है. ये लोग और खुद अडवाणी भी चाहते हैं कि जल्दी चुनाव हो जाएं. क्योंकि अगर जल्दी चुनाव होते हैं तो अडवाणी को प्रधानमंत्री बनने के अपने सपने को पूरा करने का एक मौका और मिलेगा और चुनाव 2014 में होते हैं तो तब तक उनके खुद ही प्रधानमंत्री पद की दौड़ से बाहर हो जाने का खतरा है. वहीं एक दूसरा धड़ा जल्दी चुनाव नहीं चाहता है. क्योंकि इसे यह लगता है कि संप्रग की यह सरकार जितने दिनों और चलेगी उतनी ही अधिक इसकी फजीहत होगी और फिर जो चुनाव होंगे उनमें भाजपा और उसके घटक दलों को कहीं अधिक फायदा मिलेगा. भाजपा के इस धड़े को उम्मीद है कि इस रणनीति के बूते उन्हें दस साल बाद केंद्र की सत्ता वापस मिल सकती है.

कांग्रेस और मनमोहन सिंह सरकार की मुश्किलें कम होती इसलिए भी नहीं लग रही हैं कि कई क्षेत्रीय पार्टियां मिलकर एक नया राजनीतिक विकल्प खड़ा करने की कोशिश में जुट गई हैं. इसकी धुरी में उड़ीसा के मुख्यमंत्री और बीजू जनता दल के प्रमुख नवीन पटनायक हैं. वे अभी न संप्रग में है और न ही भाजपा की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में. उनका साथ खुलकर आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और तेलगूदेशम पार्टी के प्रमुख चंद्रबाबू नायडू दे रहे हैं. जबकि अंदर-अंदर इस कोशिश को संप्रग और राजग के कई घटकों का सहयोग मिल रहा है. इस कोशिश का ममता बनर्जी और जयललिता का साथ तो मिल ही रहा है लेकिन खबर तो यह भी है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख व केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार भी इस नए विकल्प को खड़ा करने में चुपचाप रहते हुए सतर्क सहयोग दे रहे हैं.

उत्तर प्रदेश चुनावों में बेहद मजबूती के साथ उभरे मुलायम सिंह यादव और पंजाब में दोबारा जीतकर वापस सत्ता में लौटे प्रकाश सिंह बादल को भी इससे जोड़ने की कोशिश चल रही है. ममता बनर्जी को शपथ ग्रहण समारोह के लिए बादल और मुलायम सिंह यादव द्वारा भेजे गए निमंत्रण को नए राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है. हालांकि, इस नए विकल्प को लेकर यह बात भी चल रही है कि नीतीश कुमार, प्रकाश सिंह बादल और शरद पवार जैसे लोग चुनाव से पहले ऐसे किसी विकल्प में खुले तौर पर शामिल होने से बचेंगे लेकिन चुनाव के बाद ये पास आ सकते हैं. इस नए विकल्प की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इनमें प्रधानमंत्री पद के कई दावेदार हैं और कांग्रेस इस बात से संतुष्ट हो सकती है कि यही टकराव नए विकल्प के बिखराव की वजह बन सकता है.

इन सबके बीच एक बात तो यह है कि मनमोहन सिंह सरकार के लिए कोई भी बड़ा फैसला करना अब आसान नहीं होगा. नीतियों के स्तर पर बड़े फेरबदल की तैयारी मनमोहन सिंह यह सोचकर कर रहे थे कि उत्तर प्रदेश चुनावों के बाद राज्य में कांग्रेस की समर्थन से समाजवादी पार्टी की सरकार बनवाकर उन्हें केंद्र में लाएंगे और तृणमूल की धमकी से मुक्ति पाएंगे. इसी आत्मविश्वास में प्रधानमंत्री ने कुछ दिनों पहले यह भी कह डाला था कि पांच राज्यों के चुनावी नतीजों के बाद वे एक बार फिर खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को मंजूरी दिलाने की कोशिश करेंगे. लेकिन नतीजों से जो स्थिति उभर रही है उससे साफ है कि प्रधानमंत्री के इस मंसूबे पर पानी फिर गया है. वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘नीतियों के स्तर पर जो ठहराव इस सरकार में आ गया है उसे तोड़ना अब मनमोहन सिंह के लिए बहुत मुश्किल है. क्योंकि क्षेत्रीय पार्टियों को मिली मजबूती से साफ है कि वे राष्ट्रीय पार्टियों के साथ अपनी शर्तों पर काम करेंगी.’ वरिष्ठ पत्रकार और गठबंधन राजनीति पर चर्चित किताब ‘डिवाइडेड वी स्टैंड’ लिखने वाले परंजय गुहा ठाकुरता कहते हैं, ‘अब कई उन नीतियों पर भी क्षेत्रीय दल अड़ंगा लगाएंगे जिनको लेकर ऊपरी तौर पर एक सहमति दिख रही थी. क्योंकि इन दलों को यह पता है कि मनमोहन सिंह सरकार की जितनी अधिक फजीहत होगी चुनावों में उन्हें उतना अधिक फायदा होगा. लोक सभा और राज्य सभा में कांग्रेस की कमजोर स्थिति का फायदा ये दल हर मोड़ पर उठाने की कोशिश करेंगे.’

क्षेत्रीय पार्टियों के आक्रामक रवैये के बीच जब भी मनमोहन सिंह सरकार किसी महत्वपूर्ण विधेयक को संसद से पारित करवाना चाहेगी तो उसे विपक्ष का साथ अनिवार्य तौर पर चाहिए होगा. जिस दिन चुनावी नतीजे आ रहे थे उसी दिन राज्य सभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने भी कहा था कि अब संप्रग सरकार विपक्ष के सहयोग के बिना न तो राष्ट्रपति का चुनाव करा सकती है और न ही कोई बड़ा नीतिगत फैसला ले सकती है. संसद के बजट सत्र में ही महत्वपूर्ण 30 विधेयक आने हैं. अभी के सियासी समीकरण में अब विपक्ष के पास यह ताकत आ गई है कि वह किस विधेयक को आगे बढ़ने दे और किसे रोक दे. खाद्य सुरक्षा, लोकपाल और जमीन अधिग्रहण समेत कई ऐसे विधेयक हैं जिन्हें पारित करवाकर कांग्रेस अगले लोक सभा चुनाव की अपनी तैयारियों को मजबूती देना चाहती है. लेकिन इन चुनावी नतीजों के बाद के समीकरण ने देश की सबसे पुरानी पार्टी को इतना लाचार बना दिया है कि उसे अब हर कदम पर विपक्ष की बैसाखी का ही आसरा रहेगा. भाजपा की अगुवाई वाले गठबंधन राजग ने 2जी मामले पर केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम का संसद के अंदर का बहिष्कार खत्म करके कांग्रेस को एक तात्कालिक राहत तो दी है लेकिन जो सियासी समीकरण अभी उभरते दिख रहे हैं उनमें यह कहना मुश्‍किल है कि विपक्ष द्वारा संप्रग सरकार का सहयोग कितने दिनों तक जारी रहेगा.

इन सबके बीच चौधरी यह मानती हैं कि अगर कांग्रेस अब भी अच्छे राजनीतिक प्रबंधन का परिचय दे तो यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर सकती है. चौधरी कहती हैं, ‘मायावती राज्य की सत्ता से बाहर हो गई हैं. वैसे वे पहले से भी केंद्र सरकार का समर्थन कर रही हैं लेकिन अगर कांग्रेस के लोग चाहें तो उनके साथ वे एक ऐसा संबंध विकसित कर सकते हैं कि नीतिगत मसलों पर वे कांग्रेस का साथ दें. मायावती के लिए भी यह जरूरी है कि अगर वे राज्य की सत्ता से बाहर हो गई हैं तो केंद्र की सत्ता से थोड़ी नजदीकी बढ़ाएं.’ वे कहती हैं, ‘अब मनमोहन सिंह सरकार का भविष्य पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि कांग्रेस का राजनीतिक प्रबंधन कैसा रहता है.’

कांग्रेस के राजनीतिक प्रबंधन का सबसे बड़ा इम्तहान होने जा रहा है राष्ट्रपति चुनाव में. विधायकों और सांसदों के वोटों के आधार पर होने वाले इन चुनावों में जीत के लिए जरूरी वोट कांग्रेस और संप्रग के पास नहीं हैं. मार्च के आखिरी दिनों में राज्य सभा की जिन 58 सीटों के लिए चुनाव होना है उसमें एक तरफ जहां कांग्रेस की सीटें घट रही हैं तो दूसरी तरफ इस केंद्र सरकार के लिए खतरा बने तृणमूल और सपा की सीटें बढ़ रही हैं. ऐसे में प्रतिभा पाटिल की तरह अपनी पसंद का राष्ट्रपति नियुक्त करना इस बार कांग्रेस के लिए असंभव सरीखा है. क्योंकि इस चुनाव के कुल 10.98 लाख वोटों में से कांग्रेस के पास महज 30.7 फीसदी वोट हैं. इनमें संप्रग के सहयोगी दलों को जोड़ें तो यह आंकड़ा 40 फीसदी के पास पहुंचता है. मतलब साफ है कि कांग्रेस को कोई ऐसा उम्मीदवार तलाशना होगा जिस पर आम सहमति बने या फिर जिसका विरोध करना किसी भी दल के लिए राजनीतिक तौर पर आसान नहीं हो.

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