रेल मुनाफे का अहसास

हिमांशु शेखर
इस मर्तबा के अंतरिम रेल बजट में भी रेल मंत्री लालू यादव ने रेल के मुनाफे का राग एक दफा फिर से अलापा है। कई अखबारों में बड़ी-बड़ी विशेष रपट छापकर यह बताया गया कि आखिर कैसे घाटे में चलने वाली रेल जबर्दस्त मुनाफे में आ गई। रेल मंत्री के मुनाफे के खेल को पिछली रेल यात्रा में मैंने भी महसूस किया।
डेढ़ साल बाद बीती दिवाली को घर जाने के लिए तकरीबन ढाई महीने पहले टिकट करवाया था। दिल्ली में कुछ साल रहने के बावजूद अभी भी घर जाने के नाम पर जाने वाले दिन की उलटी गिनती शुरु हो जाती है। 6:10 पर खुलने वाली गाड़ी के लिए मैं पांच बजे ही स्टेशन पहुंच गया। वहां पहुंच कर फोन पर बात करते हुए भी सामने चल रही एलसीडी घड़ी पर बार-बार निगाह जा रही थी। हर घोषणा को बड़े गौर से सुन रहा था। अचानक घोषणा हुई कि नई दिल्ली से पटना जाने वाली संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस रद्द है। आप अपना टिकट लौटा दें। कोई पैसा नहीं काटा जाएगा। आपको हुई असुविधा के लिए खेद है। असुविधा के लिए खेद जताकर रेलवे ने तो अपना पल्ला झाड़ लिया लेकिन मेरे लिए असुविधा की शुरूआत हो गई थी। राज ठाकरे द्वारा मुंबई में लगाई गई आग की लपट बिहार तक पहुंच जाने की वजह से गाड़ी रद्द हो गई थी।
गुस्सा होने के बावजूद टिकट लौटाने के अलावा कोई चारा नहीं था। अपनी व्यवस्था में इस तरह के अपराध के लिए किसी शिकायत का प्रावधान तो है नहीं। जब आपके पास करने के लिए कुछ नहीं बचे तो धैर्य का सहारा लेना ही एकमात्र रास्ता बच जाता है। पर यहां तो धैर्य की परीक्षा भी बार-बार होती है। मन ही मन राज ठाकरे को  और भारतीय रेल को गरियाते हुए जब टिकट लौटाने पहुंचे तो पता चला कि सामान क्लॉक रूम में रखकर अंदर जाना पड़ेगा। क्लॉक रूम पर सामान रखने पहुंचे तो बताया गया कि यहां सामान रखने की जगह नहीं है। मालूम पड़ गया कि आवश्यक सुविधाओं का बिना विकास किए रेल को मुनाफे में दिखाने वाले रेल मंत्री के दावे में कितना दम है।
दूसरे दिन प्रेस क्लब से टिकट रद्द करवाने के बाद नया टिकट लेने की बात करने पर बताया गया कि सभी गाड़ियों में नो रूम है। सो, टिकट मिलने की संभावना नहीं है। किसी तरस जुगाड़ करके संसद से दो दिन बाद का संपूर्ण क्रांति का वेटिंग टिकट लिया। कोटा से दो लोग आ रहे थे। तय हुआ कि उसी दो बर्थ पर तीन लोग चले जाएंगे। स्टेशन पहुंचे तो 6:10 पर खुलने वाली संपूर्ण क्रांति के बारे में आठ बजे तक कोई घोषणा नहीं हुई। फिर बताया गया कि गाड़ी जाएगी। राहत मिली। उस प्लेटफार्म से खुलने वाली दूसरी गाड़ियों के लोग भी आ गए थे। भारी भीड़ के बीच जब साढ़े नौ बजे गाड़ी आई तो अफरा-तफरी का माहौल बन गया। कुछ साल पहले इसी स्टेशन पर छठ के समय ही इसी तरह की अफरा-तफरी में कुछ लोगों के काल के गाल में समा जाने की घटना याद आई। गाड़ी में पहुंचने के बाद राहत मिली।
भूख लग गई थी और हम तीनों इंतजार कर रहे थे कि कब कोई खाना वाला आए और पेट पूजा हो। ग्यारह बजे तक जब कोई नहीं आया तो रसोई यान की ओर बढ़े। वहां पहुंचने पर पता चला कि खाने के लिए कुछ नहीं सिर्फ पीने के लिए मिनरल वाटर मिल सकता है। दो बोतल पानी लेकर मैं वापस अपनी बर्थ पर आ गया। एक बार फिर लालू जी के मुनाफा कमाने की तकनीक से साबका हो गया था। पूरी रात भूखे ही रहे। सुबह जब गाड़ी मुगलसराय पहुंची तब ही कुछ खाने को मिल पाया। गाड़ी नौ घंटे लेट हो गई थी और मिनरल वाटर भी खत्म हो गया था। भूख और प्यास के मारे हमारे चेहरे सूख रहे थे। जब बर्दाश्त नहीं हुआ तो उपर वाली बर्थ पर पेट दबाकर लेट गए। सुबह पौने नौ बजे पहुचने वाली संपूर्ण क्रांति साढ़े चार बजे शाम को जब पटना स्टेशन पहुंची तो उतरते वक्त अपनापे के एक खास अहसास के साथ भूख और प्यास के मारे ये पता ही नहीं चल रहा था कि पांव कहां पड़ रहे हैं। स्टेशन से बाहर निकलकर महावीर मंदिर के पास पानी पीने के बाद रिक्शा से जब मैं बुआ के घर पहुंचा तो सामने टेबल पर पडे़ अखबार के पहले पन्ने पर ही लालू यादव की तस्वीर मौजूद थी। पता चला कि वह भी मुनाफे वाली खबर थी।

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