रियायत और सियासत

हिमांशु शेखर

इस साल यानी 2013-14 का आम बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने देश के बढ़ते वित्तीय घाटे के लिए कई वजहें गिनाई। उन्होंने आम लोगों को दी जा रही कई तरह की सब्सिडी को सबसे अधिक जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने किसानों को उर्वरकों पर मिल रही सब्सिडी पर भी सवाल उठाए। चिदंबरम ने कहा कि अगर देश के वित्तीय घाटे को कम करना है तो इसके लिए सब्सिडी पर हो रहे सरकार के खर्चे को कम करना होगा। इसका मतलब यह हुआ कि सब्सिडी में कटौती करनी होगी। लेकिन काॅरपोरेट घरानों को मिल रही लाखों करोड़ रुपये की सब्सिडी पर उन्होंने तनिक भी चिंता नहीं जताई। जबकि उर्वरक पर सरकार जितनी सब्सिडी दे रही है उसके तकरीबन दस गुना का राहत सरकार काॅरपोरेट घरानोें को विभिन्न मदों के तहत दे रही है।

किसानों को मिल रही सब्सिडी पर चिंता जताने का काम सिर्फ वित्त मंत्री ही नहीं कर रहे हैं बल्कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी इसे कम करने की आवश्यकता बताई है। बजट के ठीक एक दिन पहले साल 2012-13 की जो आर्थिक समीक्षा आई उसमें भी इस बात को बार-बार दोहराया गया कि उर्वरक समेत किसानों और आम लोगों को विभिन्न मदों में मिल रही सब्सिडी में कटौती किए बगैर देश की आर्थिक सेहत को ठीक नहीं रखा जा सकता। बजट पेश होने के कुछ ही दिनों बाद वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार रघुराम राजन ने भी सार्वजनिक तौर पर सब्सिडी कम करने की जरूरत पर बल दिया।

इसका मतलब यह हुआ कि सरकार ने सब्सिडी कम करने का माहौल हर तरफ से बना लिया है और पेटोल-डीजल से सब्सिडी कम करने का जो सिलसिला शुरू हुआ है और वह आने वाले दिनो में और गति पकड़ सकता है। 2010 में सरकार ने पेटोल की कीमतों के निर्धारण पर से अपना नियंत्रण हटा लिया। डीजल को लेकर आज स्थिति यह है कि तेल वितरण कंपनियों को समय-समय पर कीमतों में ‘मामूली बढ़ोतरी’ करने का अधिकार दे दिया गया है। लेकिन इस मामूली बढ़ोतरी को सरकार ने अब तक परिभाषित नहीं किया है। रसोई गैस पर मिल रही सब्सिडी को लेकर पिछले साल यानी 2012 में जो रार हुआ, वह सबके सामने है। कई बार रसोई गैस के सिलिंडर की कीमतों में बढ़ोतरी करने के बाद भी जब सरकार का मन नहीं भरा तो सरकार ने प्रति परिवार सब्सिडी वाले सिलिंडरों की संख्या सालाना छह पर सीमित कर दी। लेकिन काफी हो-हल्ले के बाद इसे नौ किया गया। किसानों को उर्वरकों पर मिल रही सब्सिडी में भी कटौती की गई।

लेकिन इसके बावजूद वित्तीय घाटा कम नहीं हुआ बल्कि बढ़ता गया। खुद चिदंबरम ने बजट पेश करते हुए बताया कि 2012-13 में वित्तीय घाटा बढ़कर जीडीपी के 5.3 फीसदी पर पहुंच गया है। उन्होंने इसे 2013-14 में घटाकर 4.8 फीसदी पर लाने की घोषणा की है। सरकार आम लोगों को दी जा  रही जिस सब्सिडी को बढ़ते वित्तीय घाटे के लिए जिम्मेदार मानती है और उसमें लगातार कटौती करती है लेकिन इसके बावजूद भी अगर वित्तीय घाटा बढ़ता जा रहा है तो इसका क्या मतलब निकाला जाए। इसका सीधा सा मतलब यह है कि बीमारी कुछ और है और उसके इलाज की कोशिश एक ऐसे दवाई से की जा रही है जो उस बीमारी के लिए बनी ही नहीं है।

खुद सरकार की आर्थिक समीक्षा बताती है कि 2012-13 में काॅरपोरेट टैक्स के तौर पर 57,912 करोड़ रुपये की छूट दी गई। यह 2011-12 के 51,292 करोड़ रुपये की तुलना में तकरीबन साढ़े सात हजार करोड़ रुपये अधिक है। यह हाल तब है जब भारत में काॅरपोरेट टैक्स दुनिया के प्रमुख बड़े देशों के मुकाबले कम है। भारत में अभी यह दर 32.5 फीसदी है। जबकि अमेरिका में 40 फीसदी, जापान में 38 फीसदी, अर्जेंटिना में 35 फीसदी और ब्राजील में 34 फीसदी की दर से काॅरपोरेट घरानों से कर की वसूली की जाती है। लेकिन खुद सरकार के बजट दस्तावेज बता रहे हैं कि भारत के काॅरपोरेट घराने 32.5 फीसदी की दर से भी कर का भुगतान नहीं करते बल्कि ये जो कर चुकाते हैं वह इनकी आमदनी का 22 फीसदी ही बैठता है।अनुमान लगाया गया है कि अगर सभी काॅरपोरेट घराने 32.5 फीसदी की दर पर कर चुकाने लगें तो सरकारी खजाने में 1.90 लाख करोड़ रुपये की सालाना बढ़ोतरी हो सकती है।

उत्पाद शुल्क के तौर पर सरकार ने काॅरपोरेट घरानों को 2.12 लाख करोड़ रुपये की छूट 2011-12 में दी। यह बात भी सरकार के बजट दस्तावेज ही बताते हैं। हालांकि, 2012-13 में इसमें कुछ कमी लाने की बात सरकार करती है और सरकार ने अनुमान लगाया है कि यह घटकर 2.06 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच जाएगा। सीमा शुल्क के तौर पर छूट के मामले में भी कुछ ऐसा ही हाल है। 2011-12 में सीमा शुल्क में 2.85 लाख करोड़ रुपये की छूट काॅरपारेट घरानों को दी गई। 2012-13 में इसके 2.98 लाख करोड़ रुपये पर पहुंचने का अनुमान सरकार ने बजट दस्तावेजों में लगाया है। खुद सरकारी दस्तावेज बता रहे हैं कि कर के तौर पर हासिल होने वाले 100 रुपये के मुकाबले वह कर के तौर पर वसूल की जा सकने वाले 146 रुपये की वसूली नहीं कर पा रही है। बजट दस्तावेजों को देखा जाए और विभन्न मदों में काॅरपोरेट घरानों को दी गई छूट को जोड़ा जाए तो यह 2011-12 के लिए 5.31 लाख करोड़ रुपये बैठता है। 2012-13 में इसके बढ़कर तकरीबन 5.73 लाख करोड़ रुपये पर पहुंचने का अनुमान लगाया गया है।

अब काॅरपोरेट घरानों को मिल रही इन छूटों के मुकाबले किसानों और आम लोगों को मिलने वाली रियायत के आंकड़ों को सामने रखा जाए तो यह तस्वीर साफ हो जाती है कि ‘कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ’ की बात करने वाली यह सरकार किसके साथ है। 2008-09 में उर्वरक पर किसानों को 75,849 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गई थी। सरकार की आर्थिक समीक्षा बताती है कि किसानों को 2011-12 में उर्वरक पर 67,199 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गई थी। जो 2012-13 में घटकर 60,974 करोड़ रुपये पर पहुंच गई। यानी इस मद में सरकार ने 6,225 करोड़ रुपये की कटौती कर दी। फिर भी सरकार का मन नहीं भरा है और वित्त मंत्रालय में बैठने वाले लोग यूरिया पर मिल रही सब्सिडी को काफी कम करने की योजना पर काम कर रहे हैं। पेटोल, डीजल और रसोई के मद में सब्सिडी के तौर पर हो रहे खर्चे को अगर काॅरपोरेट घरानों को मिल रही कर राहत के आंकड़ों के साथ रखकर देखेें तो यह साफ पता चलता है कि सरकार इनकी कीमतों में बढ़ोतरी के लिए किस तरह से कुतर्कों का सहारा लेती है। 2012-13 में सरकार ने इस मद में 43,580 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी। यह सिर्फ काॅरपोरेट टैक्स के मद में मिली 57,912 की छूट के मुकाबले भी काफी कम है।

अगर अभी कोई चिदंबरम से पूछे कि आपका बजट तो अमीरों के लिए है और इससे तो देश के आम नागरिक को तो कुछ नहीं मिला तो जवाब में वे यह कह सकते हैं कि आम लोेगों से जिस दर पर कर लिया जाता है उसमें मैंने कोई बढ़ोतरी नहीं कि वहीं दूसरी तरफ अमीरों पर सरचार्ज लगाया। लेकिन अगर कोई भी व्यक्ति बजट दस्तावेजों को समझने की कोशिश करे तो उसे पता चलेगा कि अमीरों पर सरचार्ज लगाना भी देश के आम लोगों की आंखों में धूूल झोंकने के जैसा है। ताकि आम लोगों को यह लगे कि उन पर तो कर का बोझ नहीं बढ़ा लेकिन अमीरों से अतिरिक्त कर वसूला जा रहा है। चिदंबरम ने अपने बजट भाषण में कहा कि देश में 42,800 लोग ऐसे हैं जिनकी आमदनी एक करोड़ रुपये से अधिक है।

लेकिन आर्थिक तंत्र की मामूली समझ रखने वाले व्यक्ति को भी यह आंकड़ा  वास्तविकता से काफी दूर लगेगा। आर्थिक मामलों पर काम करने वाली एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि देश में करोड़ रुपये से अधिक सालाना आमदनी वाले लोगों की संख्या का आंकड़ा चिदंबरम में आंकड़े से काफी बड़ा है। केपीएमजी इंटरनैशनल ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि भारत में तकरीबन 1.25 लाख लोग ऐसे हैं जिनके पास हर साल 5.5 करोड़ रुपये निवेश की क्षमता है। अब अगर कोई व्यक्ति हर साल 5.5 करोड़ रुपये निवेश कर सकता है तो फिर उसकी आमदनी एक करोड़ रुपये सालाना से कम कैसे हो सकती है! चिदंबरम के आंकड़ों के खोखलेपन को समझने के लिए इस भारत में बढ़ते लक्जरी कारों की बिक्री के आंकड़ों से जोड़कर देखना चाहिए। भारत में हर साल 27,000 से अधिक लक्जरी कारों की बिक्री हो रही  है। किसी भी ऐसे देश में  जहां करोड़ रुपये से अधिक कमाने वाले सिर्फ 42,800 लोग हों वहां हर साल 27,000 लक्जरी कारों की बिक्री नहीं हो सकती है।

2007 में एक पत्रिका को दिए एक साक्षात्कार में चिदंबरम ने कहा था कि गरीबों को मिल रही सब्सिडी जारी रहेगी लेकिन अमीरों को मिल रही छूट को खत्म किया जाएगा। चिदंबरम की राय का समर्थन करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी कहा था कि हमारी कर व्यवस्था में बहुत अधिक छूट का प्रावधान नहीं होना चाहिए। लेकिन ऐसा लगता है कि छह साल में देश के प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री दोनों अपनी ही बात को भूल गए हैं। तब ही काॅरपोरेट घरानों को मिलने वाली छूट 2.35 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 5.73 लाख करोड़ रुपये हो गई है और आम लोगों को पेटोल, डीजल, रसोई गैस आदि और किसानों को उर्वरक पर मिलने वाली सब्सिडी वित्तीय घाटे को कम करने की आड़ में लगातार घटती जा रही है।

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