रवांडा से भी बदतर हालत में है ‘महाशक्ति भारत’

भय और भूख भारत की नियति बन चुके हैं. विकास की चारमीनार पर चढ़ने का दावा करनेवाले भारत के प्रगति की भूख जितनी विकराल दिखाई देती है उससे अधिक विकराल है भारत में पेट की भूख. ग्लोबल हंगर इंडेक्स बार-बार यह बता रहा है कि भूख के मामले में भारत अपने पड़ोसी पाकिस्तान और नेपाल ही नहीं बल्कि रवांडा से भी बुरी हालत में है. ग्लोबल हंगर इंडेक्स बता रहा है कि भोजन के मामले में भारत अफ्रीकी देशों के ही बराबर खड़ा है.

खाद्यान्न संकट ने भुखमरी की समस्या को और गहरा कर दिया है। इस समस्या को समझने के लिए बीते दिनों इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीटयूट द्वारा जारी ग्लोबल हंगर इंडेक्स काफी सहायक है। इस रपट के भयावह निष्कर्षों के आधार पर यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि अनाज संकट के बाद भुखमरी की समस्या किस कदर गहरा गई है। 88 देशों के इस ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत को 66 वां स्थान दिया गया है। इस रपट के मुताबिक दुनिया के 33 देश ऐसे हैं जहां भुखमरी की समस्या खतरनाक बनी हुई है। दक्षिण एशियाई और अप्रफीकी देशों में यह समस्या काफी गहरी है। इन इलाकों में तेजी से अनाजों के बढ़ते दाम की वजह से लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिल पा रहा है। पहले यहां अनाज की जितनी खपत थी अब उसमें भी कमी आ गई है। इसकी वजह से यहां कुपोषण की समस्या भी विकराल रूप लेती जा रही है। इन क्षेत्रों में लोगों की आमदनी बेहद कम है और रोजगार के अवसर भी नहीं के बराबर हैं। इसलिए इनके लिए अपनी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति असंभव सरीखा हो गया है।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स, 2008 के मुताबिक 1990 से लेकर अब तक दुनिया ने खाद्यान्न सुरक्षा की दृष्टि से अपेक्षित प्रगति नहीं की है। इस वजह से दुनिया भूख की समस्या से निजात पाने की दिशा में जाते नहीं दिख रही है। इसका प्रमाण इस बात से भी मिलता है कि अभी खाद्यान्न संकट के दौरान ही कई देशों में अनाज के खातिर लड़ाई-झगड़े हुए। पेट की आग को शांत करने के लिए हिंसा का सहारा इंसानों को लेना पड़ा। इसमें कुछ जगहों पर कुछ लोगों ने जान भी गंवाई। यह रपट बताती है कि अनाज संकट से पहले ही दुनिया भर में तकरीबन अस्सी करोड़ लोग खाद्यान्न असुरक्षा की मार झेल रहे थे। वहीं दूसरी तरपफ खाद्यान्न सुरक्षा की दिशा में ही काम करने वाले एक अन्य संगठन के मुताबिक पूरी दुनिया में 92.3 करोड़ लोग भूख की समस्या से दो-चार हो रहे हैं। इसमें से 90.7 करोड़ विकासशील देशों में रह रहे हैं। हालांकि, 1990 की तुलना में 2008 में जारी किए गए ग्लोबल हंगर इंडेक्स में मामूली सुधर हुआ है लेकिन हालात अभी भी भयावह बने हुए हैं। 1990 में जहां वैश्विक स्तर पर ग्लोबल हंगर इंडेक्स 18.7 था वहीं यह 2008 में घटकर 15.2 रह गया है। इस रपट में सबसे खतरनाक स्थिती अप्रफीकी देशों की है। इस क्षेत्रा को इस सूचकांक में 23.3 अंक दिया गया है। 23 अंक के साथ दक्षिण एशियाई देशों की हालत भी चिंताजनक बनी हुई है। चिंता की बात यह है कि दुनिया के कुछ खास हिस्से में अमीरी बढ़ती जा रही है और लोगों का जीवन उपयोग के बजाए उपभोग पर आधरित होता जा रहा है जबकि इस रपट के मुताबिक अप्रफीकी देशों में भूख की समस्या गहराती ही जा रही है। ग्यारह अप्रफीकी देशों में तो भुखमरी की मार झेलने वालों की संख्या में साल दर साल ईजापफा होता जा रहा है। वहीं उत्तर कोरिया में आर्थिक विकास की दर में कमी आई है। जिसके परिणामस्वरूप वहां अनाज का संकट गहरा रहा है और लोगों को भर पेट भोजन नहीं मिल पा रहा है। इस वजह से वहां कुपोषण की मार झेल रहे बच्चों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स के मुताबिक सबसे बुरी स्थिती कांगो की है। इस रपट में बताया गया है कि कांगों में अस्थिरता का माहौल होने की वजह से वहां अनाज उपलब्ध्ता पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। वहां चल रहे हिंसात्मक संघर्ष की वजह से जनजीवन पूरी तरह से बदहाल हो गया है और इसका असर हर क्षेत्रा में देखने को मिल रहा है। इस रपट में इस बात का उल्लेख भी स्पष्ट तौर पर उल्लेख किया गया है कि भर पेट भोजन का रिश्ता राजनीतिक स्थिरता से भी है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में बदतर पंद्रह देशों में से हर जगह राजनीतिक अस्थिरता का माहौल है। बजाहिर, राजनीतिक अस्थिरता की वजह से कई दीर्घकालिक नीतियों को अमली रूप दे पाना आसान नहीं होता है। जिसका दुष्परिणाम कई तरह से सामने आता है। जिंबाब्वे का उदाहरण सबके सामने है। भुखमरी की समस्या जहां ज्यादा गहरी है वहां यह भी देखा गया कि लोगों के पास बहुत ज्यादा अधिकार नहीं हैं। यानि एक खास तरह की बंदिश में आज भी उन देशों के लोग हैं।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स से यह बात भी निकल कर सामने आई कि इरीट्रिया के 75 फीसद आबादी को आवश्यक भोजन नहीं मिल पा रहा है। जबकि कांगो के 74 फीसद लोग इस समस्या से दो-चार हो रहे हैं। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में बीस से ज्यादा अंक प्राप्त कर भुखमरी के मामले में खतरनाक देशों में शामिल होने वालों में सुडान, नेपाल, पाकिस्तान, कंबोडिया, भारत, जिंबाब्वे, बांग्लादेश और जांबिया प्रमुख हैं। भारत को इस रैंकिंग में 66 वां स्थान मिला है। जबकि रवांडा, मालावी, नेपाल और पाकिस्तान जैसे देशों की हालत भी इस मामले में भारत से अच्छी है। रैंकिंग के मामले में भारत से अच्छी हालत उन देशों की भी है जिनकी औसत प्रति व्यक्ति आमदनी भारत की औसत प्रति व्यक्ति आय से ढ़ाई गुना तक कम है। इसमें नाइजीरिया, कैमरून, कीनिया और सुडान प्रमुख हैं। भारत की बदहाली को एक बार फिर से दुनिया को सामने रखने वाली इस रपट को भारत सरकार द्वारा मुहैया कराए गए आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर ही तैयार किया गया है। भारत की हालत के आकलन के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण और नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़ों को आधर बनाया गया है। नेपाल 20.6 अंकों के साथ 57 वां स्थान पर है जबकि पाकिस्तान 21.7 अंकों के साथ 61 वें पायदान पर है। इंडेक्स में पहला स्थान मॉरीशस को दिया गया है। जबकि क्यूबा का स्थान तीसरा है। वहीं चीन पंद्रहवें पायदान पर है और भारत को पड़ोसी श्रीलंका 39 वें स्थान पर है। इस रपट में बताया गया है कि दुनिया भर में 96.9 करोड़ लोग अभी भी रोजाना एक डॉलर से कम पर जीवन बसर कर रहे हैं। इसमें से भी सत्राह फीसद आधा डॉलर से भी कम पर गुजारा करने को अभिशप्त हैं। गरीबी की मार झेल रहे इन लोगों को जीने के लिए आवश्यक भोजन भी नहीं मिल पा रहा है। कहा जा सकता है कि गरीबी का सीधा संबंध पेट से है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में अफ्रीकी देशों समेत कई विकासशील देशों की हालत बदतर बताई गई है। उन देशों में गरीबी की समस्या अपने चरम पर है। इस वजह से वहां पर पेट की आग में जलते हुए लोगों की संख्या भी अपेक्षाकृत ज्यादा है। इन देशों में गरीबी और भूख की समस्या के आपसी संबंधें को समझने के लिए ग्लोबल हंगर इंडेक्स तैयार करने वाली संस्था ने एक अध्ययन किया। इस संस्था ने वहां के लोगों को तीन हिस्सों में बांटा। पहले वर्ग में वैसे लोगों को रखा गया, जो अपना जीवन बसर 0.75 डॉलर से एक डॉलर रोजाना के बीच करते थे। दूसरी श्रेणी वैसे लोगों की बनाई गई जिनका रोजाना का खर्च आध डॉलर से पौना डॉलर के बीच था। तीसरे वर्ग में उन लोगों को रखा गया जो हर रोज आध डॉलर से भी कम पर अपनी जिंदगी काट रहे थे।

इसके बाद यह बात सामने आई कि विकासशील देशों में 16.2 करोड़ लोग रोजाना आधा डॉलर से भी कम पर अपना जीवन गुजार रहे हैं। जबकि आधा से पौना डॉलर हर रोज पर गुजारा करने वालों की संख्या 32.3 करोड़ है। वहीं प्रतिदिन एक डॉलर पर जीवन बसर करने वालों की संख्या 48.5 करोड़ है। अब ऐसी हालत में तो यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि यह बड़ी आबादी अपनी आवश्यकता के अनुरूप खाद्य पदार्थों से महरूम रह जाती है। हालांकि, अनाज के संकट से तो यहां उल्लेख किए गए आमदनी वर्ग के अलावा के लोग भी बड़ी संख्या में प्रभावित हुए हैं लेकिन इस गरीब तबके के लिए हर वक्त पड़ा रहने वाला भोजन का संकट और भी गहरा हो गया है। खाने के अलावा यह वर्ग और भी बेहद आवश्यक बुनियादी सुविधओं से कापफी दूर रह जाता है। अनाज संकट के जिस दौर से दुनिया गुजर रही है उससे पार पाने की राह में तेजी से बढ़ती खाद्य पदार्थ की कीमतें कापफी हद तक जिम्मेवार है। 2003 के बाद अब तक सिर्फ चावल के दाम में तीन गुना से ज्यादा की वृद्धि हुई है। वहीं 2003 से लेकर अब तक मक्के की कीमत में चौगुना उछाल आया है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक 1974 से लेकर 2005 के बीच खाद्यान्न की कीमत में 75 फीसद की कमी आई है। वहीं 2005 के बाद अनाज के दाम का बढ़ना तेजी से जारी है। इस बात की पुष्टि संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एवं कृषि संगठन भी करती है। इस संगठन के मुताबिक वैश्विक स्तर पर खाद्यान्न की कीमत में 2006 में नौ फीसद की बढ़ोतरी हुई। 2007 में यह वृद्धि 23 प्रतिशत रही। जबकि मई 2007 से मई 2008 के बीच अनाज के दाम में पचास फीसद से ज्यादा की बढ़त दर्ज की गई। गौरतलब है कि यही वह समय है जब खाद्यान्न संकट पूरी दुनिया में बेहद तेजी से फैला और बाद के समय में उसका विस्तार होता ही गया। अनाज के खातिर विश्व के कई हिस्सों में हिंसा तक हुए। इस तेजी से कोई भी खाद्यान्न बचा नहीं रह सका। गेहूं के दाम दुगना हो गए।

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