मोबाइल टावर की आड़ में

हिमांशु शेखर
बिहार के औरंगाबाद जिले के गुप्तेश्वर सिंह अपनी जमीन में मोबाइल टावर लगवाने के लिए 50 हजार रुपये देने को तैयार हैं लेकिन टावर लगाने के लिए जमीन सर्वेक्षण करने वाली कंपनी के लोग उनसे 80 हजार रुपये की मांग कर रहे हैं। पर वे निराश नहीं है। उन्हें लगता है कि 60 हजार में बात बन जाएगी और उनकी जमीन पर मोबाइल टावर लग जाएगा। अपनी जमीन पर मोबाइल टावर लगावाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाने वाले गुप्तेश्वर सिंह अकेले व्यक्ति नहीं है। बल्कि बिहार के हर जिले में ऐसे हजारों लोग हैं, जो अच्छा-खासा पैसा देकर मोबाइल टावर अपनी जमीन पर लगवाने की जुगत में लगे हुए हैं। क्योंकि बेरोजगारी की मार झेल रहे लोगों को ये मोबाइल टावर आमदनी के बेहतर जरिया लगते हैं।
मालूम हो कि जिसकी भी जमीन पर ये टावर लगाए जाते हैं उन्हें एक निश्चित किराया हर महीने संबंधित दूरसंचार कंपनी से मिलती है। गुप्तेश्वर सिंह बताते हैं कि अगर उनकी जमीन पर टावर लग गया तो उन्हें हर महीने 4 हजार रुपये बैठे-बिठाए मिलेंगे। दरअसल, पैसे लेकर मोबाइल टावर लगाने का बिहार में जोरों पर है। इस पूरी व्यवस्था के कई सतह है। इस बारे में मोबाइल टावर लगाने के लिए सर्वेक्षण करने वाली पटना आधारित एक कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने पहचान उजागर नहीं करने की शर्त पर विस्तार से बताया। उन्होंने बताया कि दूरसंचार कंपनियां मोबाइल टावर लगाने का काम अलग-अलग क्षेत्र के लिए अलग-अलग बड़ी कंपनियों को दे रही हैं। इसके बाद ये कंपनियां अपने से छोटी कंपनियों को दो स्तर पर ठेके देती हैं।
वे कहते हैं कि बड़ी कंपनियां जमीन सर्वेक्षण का काम एक कंपनी को देती है और मोबाइल टावर लगाने का काम किसी और कंपनी को देती है। टावर लगाने का काम तकनीकी काम करने वाली कंपनी को दिया जाता है। इस कंपनी का काम बस इतना है कि उसे जहां टावर लगाने के लिए कहा जाए वहां वह अपनी टीम के साथ पहुंचकर टावर लगा दे। दूसरी तरफ जमीन सर्वेक्षण करने वाली कंपनियों की मौज है। इन्हीं कंपनियों के सर्वेक्षण रिपोर्ट के आधार पर मोबाइल टावर लगाया जाता है। अधिकारी ने बताया कि ये कंपनियां आम तौर पर एक टावर लगाने के लिए 80 हजार रुपये की मांग करती हैं लेकिन हालात के हिसाब से इसे घटाया भी जा सकता है। वे कहते हैं कि कम से कम 50 हजार रुपये तो आसानी से मिल जाता है।
इस गैरकानूनी पैसे के बंटवारे के मसले पर वे बताते हैं कि प्रति टावर 12.5 हजार रुपये वह कंपनी लेती है जिसे दूरसंचार कंपनियां टावर लगाने का ठेके देते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि पहले ये कंपनियां पैसे नहीं लेती थीं लेकिन पिछले कुछ महीने से ये पैसा लेने लगी हैं। हालांकि, इस मसले पर दूरसंचार कंपनियों के अधिकारी कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं है। वे कहते हैं कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि पैसा लेकर टावर लगाया जा रहा है। मालूम हो कि ग्रामीण क्षेत्रों में टावर के लिए जमीन मालिक को हर महीने 4 हजार रुपये किराया के तौर पर मिलता है। वहीं शहरी क्षेत्र के लिए यह किराया 7 से 8 हजार रुपये होता है। जमीन मालिक और दूरसंचार कंपनी के बीच 20 साल का अनुबंध होता है। इस अनुबंध में जमीन के किराये में हर साल 10 फीसदी बढ़ोतरी का प्रावधान है।

6 thoughts on “मोबाइल टावर की आड़ में

  1. mobile ka tower ya electric pole death certificte ke tarah hoga . socho jab tumara son hoga hi nahi .. tum log mobile kya karoge kab tak namard bane rohe.. 50 sal ke bad tumara khandan dhrati me hoga or tum zero ho jaoge..

  2. all tower/finance/jobs related ads in all newspapers like hindustan/dainik jagran n others are totally fraud….print media hindustan ki public ko lootwa rahi hai.. sabse bade lutere h print media wale sawdhan aur dusron ko bhi btaker lutne se bachao

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