मोदी की राह में रोड़े बड़े

हिमांशु शेखर

हाल के दिनों में तीन ऐसी घटनाएं हुई जिनके आधार पर लगता है कि भारतीय जनता पार्टी में नरेंद्र मोदी सबसे मजबूत हो गए हैं और वे जिस तरह से चाह रहे हैं पार्टी वैसे ही चल रही है. इनमें सबसे पहली घटना है उन्हें चुनाव प्रचार अभियान समिति का प्रमुख बनाया जाना. गोवा में पिछले महीने भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की  बैठक में इसकी घोषणा हुई थी. इसी दौरान खबर आई कि नरेंद्र मोदी को यह जिम्मेदारी भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की सहमति के बगैर दी गई है. इसके एक ही दिन बाद आडवाणी ने पार्टी के तीन प्रमुख मंचों से इस्तीफा दे दिया. लेकिन मोदी से जिम्मेदारी वापस नहीं ली गई. उलटे आडवाणी को ही अपना इस्तीफा वापस लेना पड़ा. इसके कुछ ही दिनों बाद भाजपा की पुरानी सहयोगी जनता दल यूनाइटेड ने भाजपा की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से बाहर होने का फैसला कर लिया. लेकिन फिर भी भाजपा मोदी के साथ खड़ी दिखी और यह संदेश देने की कोशिश की कि मोदी के नाम पर अब किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता.

इन तीनों घटनाओं से लगता है कि आज की भाजपा में सब कुछ नरेंद्र मोदी के इर्दगिर्द ही घूमता है. लेकिन पिछले कुछ दिनों पार्टी में कुछ ऐसी चीजें भी हुई हैं जो इशारा करती हैं कि इन तीनों घटनाओं के आधार पर जो धारणा बन रही है, स्थितियां बिल्कुल वैसी भी नहीं हैं. इन घटनाओं से यह भी मालूम पड़ता है कि पार्टी मोदी को भले ही आगे कर रही हो लेकिन उन्हें अपने हिसाब से पार्टी को चलाने की आजादी कम से कम अभी तो नहीं मिली है. वहीं दूसरी तरफ पार्टी के अंदर मोदी को रोकने की इच्छा रखने वाली ताकतों की सक्रियता ऊपरी तौर पर कम जरूर हुई है लेकिन ऐसा नहीं है कि ये ताकतें पूरी तरह से परास्त हो गई हैं.

पिछले महीने की 16 तारीख को जनता दल यूनाइटेड ने बिहार में भाजपा से अपना नाता तोड़ लिया. गठबंधन टूटने के बाद जिस दिन भाजपा कार्यकर्ता बिहार में विश्वासघात दिवस मना रहे थे उसी दिन अचानक मोदी ने भाजपा मुख्यालय में महासचिवों की बैठक बुला ली थी. इसके बारे में मीडिया में पार्टी की ओर से यह बताया गया कि चुनावी तैयारियों को लेकर मोदी ने यह बैठक बुलाई है. इस बारे में पार्टी के ही कुछ लोग बताते हैं कि जिस तरह से महासचिवों की यह बैठक मोदी ने बुलाई उससे राजनाथ सिंह खुश नहीं थे. उनका अपने करीबी लोगों से कहना था कि किसी भी संगठन के महासचिव तो अध्यक्ष की टीम का हिस्सा होते हैं तो फिर इनकी बैठक कोई और कैसे बुला सकता है? राजनाथ सिंह के मुताबिक नरेंद्र मोदी सिर्फ चुनाव अभियान समिति के प्रमुख हैं और इस नाते उन्हें समिति का गठन करने और इसकी बैठक बुलाने का ही अधिकार है. वे पार्टी के अन्य पदों पर आसीन लोगों की बैठक कैसे बुला सकते हैं? बताया जाता है कि राजनाथ सिंह ने इसे अपने कार्यक्षेत्र में दखल माना.

इसके बाद जो हुआ उससे लगता है कि मोदी के साथ खड़े दिखने के बावजूद राजनाथ सिंह उन पर अंकुश बनाए रखना चाहते हैं. उन्होंने मुख्तार अब्बास नकवी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन कर उसे अल्पसंख्यकों के लिए विजन डाॅक्यूमेंट तैयार करने की जिम्मेदारी सौंप दी. भाजपा के ही एक नेता कहते हैं कि देखा जाए तो यह काम चुनाव अभियान समिति का है जिसके प्रमुख नरेंद्र मोदी हैं. चुनाव से संबंधित जो भी दस्तावेज तैयार होने हैं, वे सभी चुनाव अभियान समिति के निर्देश पर ही तैयार होने चाहिए. लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ.

जुलाई के दूसरे हफ्ते में दिल्ली में भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक हुई. इसमें नरेंद्र मोदी ने भी हिस्सा लिया. इस बैठक में भी कई चीजें ऐसी हुईं जो भाजपा पर नरेंद्र मोदी के असीमित नियंत्रण की लोगों की धारणा के विपरीत जाती लगती हैं. बैठक में यह तय किया गया कि चुनावों से संबंधित जो भी रणनीतिक फैसले लिए जाएंगे, उन सबके लिए संसदीय बोर्ड की मंजूरी अनिवार्य होगी. यह एक और तरह से मोदी की नई भूमिका को सीमित करने वाला निर्णय है. भाजपा संसदीय बोर्ड ने इस बैठक में यह भी तय किया कि केंद्रीय और राज्य स्तर पर चुनाव से संबंधित समितियों के गठन का काम बगैर समय गंवाए शुरू हो जाना चाहिए. जबकि कुछ ही दिन पहले की अखबारों की सुर्खियां बताती हैं कि मोदी इन समितियों द्वारा किए जाने वाले काम को किसी और तरीके और तंत्र द्वारा करना चाहते थे.

कुछ लोगों को यह लग सकता है कि हाल के दिनों में पार्टी में आडवाणी का प्रभाव कम हुआ है और उन्हें मोदी के पक्ष में समझा लिया गया है. लेकिन वे आज भी मोदी की राह रोकने की दिशा में प्रयासरत दिखते हैं. संसदीय बोर्ड की जिस बैठक की चर्चा ऊपर हुई है उसी में आडवाणी ने यह सुझाव तो दिया कि चुनाव संबंधी समितियों के गठन का काम राजनाथ सिंह और नरेंद्र मोदी को सौंपा जाना चाहिए लेकिन साथ ही उन्होंने यह शर्त भी जोड़ दी कि समितियों पर मुहर तब ही लगेगी जब संसदीय बोर्ड उनके स्वरूप को लेकर हरी झंडी देगा. इसका मतलब यह हुआ कि इन समितियों के गठन में नरेंद्र मोदी की भूमिका सुझाव देने मात्र की रहेगी.

आडवाणी के बारे में यह एक तथ्य है कि 2014 का लोकसभा चुनाव उनके लिए प्रधानमंत्री बनने का आखिरी अवसर है. उन्हें भी पता है कि अगर वे इस बार चूक गए तो अगली बार संभावनाओं को टटोलने के लिए उम्र उनके साथ नहीं रहेगी. ऐसे में दोनों के बीच में एक तरह का टकराव या यों कहें कि शह और मात का खेल चलना स्वाभाविक है. लेकिन मोदी की राह मुश्किल करने वालों में आडवाणी या उनका खेमा सबसे अव्वल नहीं हैं.

ऊपरी तौर पर देखें तो यह लगता है कि भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हैं. ऐसा लगने की ठोस वजहें भी हैं. क्योंकि शुरूआत में जिन तीन घटनाओं का उल्लेख किया गया है उनके जरिए राजनाथ सिंह ने यह दिखाया है कि चाहे कुछ भी हो जाए, वे नरेंद्र मोदी को आगे बढ़ाने पर कोई समझौता नहीं करने वाले. लेकिन भाजपा के ही नेताओं की मानें तो आज की तारीख में मोदी के लिए आडवाणी से बड़ी चुनौती राजनाथ सिंह खुद हैं. मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में यह सुनना थोड़ा अटपटा लगता है कि मोदी के साथ हर मंच पर और हर फैसले में मजबूती के साथ खड़े रहने वाले राजनाथ सिंह ही उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं.

अलग-अलग भाजपा नेताओं द्वारा बताई गई कहानियों को अगर एक साथ जोड़कर देखा जाए तो मोदी के प्रति राजनाथ की सोच बिल्कुल साफ हो जाती है. भाजपा के एक नेता इस साल की शुरुआत की एक घटना के बारे में बताते हैं. इलाहाबाद में कुंभ के दौरान हुई धर्म संसद में देश भर के साधु-संत अपनी ओर से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर नरेंद्र मोदी के नाम की घोषणा करने वाले थे. नरेंद्र मोदी के पक्ष में प्रभावी साधु-संतों को मनाने की मुहिम में योगगुरू स्वामी रामदेव लगे हुए थे. इसके कुछ ही दिनों पहले दिल्ली के रामलीला मैदान में श्री श्री रविशंकर का एक सत्संग कार्यक्रम था जिसके लिए वे नोएडा में ठहरे हुए थे.

श्री श्री के इस कार्यक्रम से एक दिन पहले उनसे मिलने राजनाथ सिंह वहां पहुंचे. दोनों के बीच हुई बातचीत का नतीजा मोदी के लिए चौंकाने वाला था. अगले दिन कार्यक्रम के दौरान श्रीश्री ने यह बयान दिया कि साधु-संतों का काम प्रधानमंत्री का उम्मीदवार तय करना नहीं बल्कि अपने स्तर पर सामाजिक बदलाव लाने की कोशिश करना है. इस बयान के बाद साधु-संत भी दो खेमों में बंट गए और कुंभ के दौरान धर्म संसद ने प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी के नाम की घोषणा नहीं की. उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकारों में मंत्री रहे एक नेता बताते हैं कि पूर्वांचल के विभिन्न जिलों में राजनाथ सिंह के समर्थकों ने ऐसा माहौल बना दिया है कि भले ही नाम नरेंद्र मोदी का चल रहा हो लेकिन चुनाव के बाद राजनाथ सिंह को ही प्रधानमंत्री बनाने को लेकर सहमति बने

गी और उनके ही नाम पर सहयोगी दल भाजपा के साथ आ पाएंगे. उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह की मौजूदगी में वरुण गांधी एक सभा में उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे योग्य उम्मीदवार बता चुके हैं. लेकिन राजनाथ सिंह ने औपचारिकता के लिए ही सही कभी भी इस बात का आगे बढ़कर खंडन नहीं किया कि वे प्रधानमंत्री पद की दौड़ में नहीं हैं.

भाजपा को बहुत करीब से जानने वाले लोग बताते हैं कि जब नरेंद्र मोदी का कद बढ़ने लगा और यह साफ हो गया कि अब मोदी को रोकना मुश्किल है तो पहले राजनाथ सिंह ने उन्हें भरोसे में लेने का काम किया. एक बार जब ऐसा हो गया तो अब राजनाथ सिंह इस कोशिश में लग गए हैं कि पार्टी में सब कुछ एक ही व्यक्ति तय नहीं करे. या यों कहें कि पार्टी की पूरी राजनीति और निर्णय प्रक्रिया एक ही व्यक्ति के आसपास केंद्रित नहीं हो जाए. राजनाथ जाने-अनजाने में इतनी ढील नहीं छोड़ना चाहते कि उनकी भूमिका रबर स्टांप अध्यक्ष के तौर पर सीमित हो जाए.

भाजपा नेताओं से बातचीत में इस बात के भी स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि नरेंद्र मोदी को पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की योजना पर गंभीरता से विचार चल रहा है. पार्टी और संघ में जो लोग निर्णय करने वाले हैं, उनके बीच अब इस बात पर चर्चा हो रही है कि अगर मोदी को उम्मीदवार घोषित किया जाता है तो इसके नफा-नुकसान क्या होंगे. संभव है कि जुलाई अंत तक इस बारे में कोई स्पष्ट राय बने. पार्टी के कई वरिष्ठ नेता यह तो चाहते हैं कि मोदी को आगे करके वोट बटोरे जाएं और सीटें बढ़ाई जाएं लेकिन उन्हें खुली छूट देने के पक्ष में कम ही लोग हैं.

यह मोदी के लिए एक बड़ी चुनौती है. क्योंकि अगर उन्हें छूट नहीं मिली और चुनावी नतीजे उनकी अपेक्षा के मुताबिक नहीं आए तो खतरा इस बात का है कि कहीं लोग और पार्टी उन्हें चुका हुआ न मान लें और उनकी भूमिका गुजरात तक ही सीमित होकर न रह जाए. इस हालत में गुजरात में भी उनकी स्थिति को झटका लग सकता है.

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