मेधा के बहाने जनांदोलनों का सफर

हिमांशु शेखर

पुस्तकः मेधा पाटकर- नर्मदा आंदोलन और आगे
लेखकः अरुण कुमार त्रिपाठी
मूल्यः 250 रुपये
पृष्ठः 208
प्रकाशकः प्रकाशन संस्‍थान

मेधा पाटकर की अगुवाई में शुरू हुए ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ की उम्र 25 साल हो गई है. भूमंडलीकरण के दौर में जब हर चीज काफी तेजी से बदल रही हो तो ऐसे में किसी आंदोलन का 25 साल तक टिके रहना और वह भी मजबूती के साथ कई सारे संकेत देता है. जब मेधा के इस आंदोलन की उम्र चौथाई सदी से पार कर रही हो तो ऐसे में इस आंदोलन और खुद इसकी नेता की अब तक की उपलब्‍धियों, संबंधित मुद्दों की सामाजिक व राजनीतिक स्वीकार्यता और आगे की योजना के मूल्यांकन का सही अवसर पैदा होता है. अरुण कुमार त्रिपाठी की यह किताब इन पहलुओं की पड़ताल तो करती ही है साथ में जन आंदोलनों की पूरी कहानी बयां करने और इनकी आगे की संभावनाओं की टोह भी लेती है. यह पूरी पड़ताल इसलिए भी ज्यादा विश्वसनीय लगती है कि बरास्ते ‘जनसत्ता’, ‘इंडियन एक्सप्रेस’, ‘हिंदुस्तान’, अभी ‘आज समाज’ में संपादक (विकास) की भूमिका निभा रहे अरुण कुमार त्रिपाठी की पहचान एक ऐसे पत्रकार की रही है जिन्होंने जन आंदोलनों पर काफी लिखा है और खुद भी राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय रहे हैं.

कहना गलत नहीं होगा कि शुरुआत से ही मेधा पाटकर और नर्मदा बचाओ आंदोलन एक-दूसरे के पर्याय हैं. यहां यह भी ध्यान रखना चाहिए कि नर्मदा बचाओ आंदोलन सिर्फ विस्‍थापन और पुनर्वास का संघर्ष नहीं बल्‍कि विकास को लेकर अपनाई जा रही नीतियों और सरकारी दृष्‍टिकोण पर सवाल खड़े करने वाला आंदोलन है. यह आंदोलन कितना सफल रहा, इसे लेकर हर किसी के पास अपने तर्क हो सकते हैं. लेकिन इतना तो तय है कि भूमंडलीकरण और बाजारवाद की आंधी में अगर आदिवासियों, जमीन, जल, जंगल, विस्‍थापन और पुनर्वास जैसे मुद्दे जिंदा हैं तो इसमें इस आंदोलन और मेधा की भी बड़ी भूमिका रही है. क्योंकि ऐसे समय में टिके रहना भी आसान काम नहीं है जब बांध का विरोध करने पर आप पर विकासविरोधी, देशद्रोही और विदेशी एजेंट होने का तोहमत सरकार और सरकारी ताल पर थिरकने वाले अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता दे दें. अगर कोई भी स्‍थापित राजनीतिक व्यवस्‍था के खिलाफ आवाज उठाता है तो उसके खिलाफ विचारधाराओं को दरकिनार करके सारे दल एक होकर हल्ला करते हैं. मेधा ने इन चुनौतियों को झेलते हुए हमेशा आंदोलन को गति देने की कोशिश की है. मेधा और नर्मदा बचाओ आंदोलन के इस पूरे संघर्ष को इस पुस्तक में बखूबी बयां किया गया है.

यह किताब बताती है कि कैसे शांत और अंतर्मुखी लड़की के तौर पर जानी जाने वाली मेधा ने इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया. यह पुस्तक उस पूरे सफर को बखूबी बयां करती है कि मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में पढ़ने वाली और जींस पहनने वाली मुंबईया लड़की किस तरह से आदिवासियों की नेता बनकर उभर जाती है और कैसे वह आदिवासियों के बीच जाकर उन्हीं की तरह न सिर्फ बोल-चाल करती है बल्‍कि उन्हीं के बीच उनकी ही जीवनशैली को भी अपनाती है. मणिपुरी नृत्य और एकल अभिनय करने वाली मेधा मराठी में कविताएं भी लिखती थीं और उनकी सामाजिक और राजनीतिक चेतना को एक नया आयाम देने में कहीं न कहीं उनके घर पर अक्सर आने-जाने वाले वरिष्ठ समाजवादी नेता मधु लिमये और जॉर्ज फर्नांडिस के असर की बात भी किताब करती है. मेधा के जीवन और कार्य से जुड़े कई वैसे पहलू इस किताब में है जिससे अब तक काफी लोग अनजान हैं और जिन्हें जानकर मेधा और उनके आंदोलन को समझने में सहूलियत होगी. सही मायने में देखा जाए तो यह किताब मेधा के बहाने भारत में जनांदोलनों के सफर को बयां करती है.

मेधा पाटकर के अंतर्विरोधों की पड़ताल भी यह किताब करती है. मेधा अक्सर विश्व बैंक व अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का और इनकी योजनाओं का विरोध करती हैं लेकिन अपने आंदोलन और तर्कों को मजबूती देने के लिए वे इन संगठनों के आंकड़ों का भी इस्तेमाल करती हैं. मेधा पर एक आरोप यह भी लगता है कि वे छोटे विषय को भी बड़ा बनाने के लिए अपने अंतरराष्ट्रीय संपर्कों का इस्तेमाल करती हैं. उन पर यह आरोप भी है कि उन्होंने इस आंदोलन में नेतृत्व की दूसरी पंक्‍ति नहीं विकसित होने दी. सबसे बड़ा आरोप मेधा पर यह है कि वे चलाती तो हैं आदिवासियों का आंदोलन लेकिन आदिवासी नेतृत्व 25 साल गुजरने के बाद भी विकसित नहीं कर पाई हैं. इन आरोपों की पड़ताल तथ्यों के सहारे इस किताब में की गई है. इन आरोपों के बावजूद मेधा पाटकर का लगातार पुलिस प्रताड़ना झेलने और गुजरात में भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा थप्पड़ खाने के बावजूद नर्मदा से लेकर सिंगुर, नंदीग्राम, पॉस्को, दादरी, भट्टा-पारसोल और अब अन्ना हजारे के आंदोलन में खड़ा रहना उन्हें असाधारण बनाता है.

जब किसी खास व्यक्‍ति या आंदोलन पर पूरी किताब लिखी जाए तो खतरा यह होता है कि कहीं ‘वस्तुनिष्ठता’ खतरे में नहीं पड़ जाए. हालांकि, पूरी दुनिया में पत्रकारिता और लेखन को लेकर जो अब तक जो बहस चली है उसमें इस बात पर आम राय बनी है कि एब्सोल्यूट ऑब्जेक्‍टिविटी (सौ फीसदी खरी वस्तुनिष्ठता) जैसी कोई चीज नहीं होती लेकिन यहीं पर किसी पत्रकार या लेखक की असली परीक्षा भी होती है और इसी के आधार पर विश्वसनीयता तय होती है. अरुण कुमार त्रिपाठी को इस मोर्चे पर सफल इसलिए कहा जा सकता है कि उन्होंने मेधा और उनके आंदोलन से जुड़ी आलोचनाओं को न तो नजरंदाज करने की कोशिश की है और न ही बचाव करने की.

चाहे वह आदिवासियों का आंदोलन होने के बावजूद आदिवासी नेतृत्व विकसित नहीं कर पाने का विषय हो या फिर खुद मेधा के निजी जीवन की परेशानियों की वजह से उनकी सामाजिक सक्रियता का. हर जगह लेखक ने तथ्यों के आधार पर मुद्दे की पड़ताल करने की कोशिश तो की है लेकिन बगैर कोई फैसला सुनाए निर्णय का अधिकार भी बड़ी खूबसूरती से पाठकों पर छोड़ा है. कई बायोग्राफी में इसी मोर्चे पर लेखक मात खाते हुए दिखे हैं और अंततः ऐसी बायोग्राफी महिमा मंडन का औजार बनकर रह जाती है. हालांकि, तकनीकी तौर पर अरुण कुमार त्रिपाठी की यह किताब बायोग्राफी नहीं बल्‍कि मोनोग्राफ है. लेखन की इन दो विधाओं में बुनियादी भेद यह है कि बायोग्राफी में संबंधित शख्‍सियत की व्यक्‍तिगत बातों पर अधिक जोर होता है जबकि मोनोग्राफ में उसके सार्वजनिक कार्यों पर.

जब किसी व्यक्‍ति या आंदोलन को केंद्र में रखकर कोई किताब लिखी जाए तो चुनौती यह भी होती है पूरी यात्रा सिर्फ एक मनभावन कहानी के तौर पर नहीं चल सकती. क्योंकि इस यात्रा में आंकड़ों की शक्ल लिए कई तथ्य भी होते हैं और कई सियासी तिकड़म भी. लेकिन यहीं चुनौती खड़ी होती है कि कैसे पूरे सफर को बयां किया जाए कि एक बार अगर कोई किताब पढ़ना शुरू कर दे तो फिर वह फिर अंत तक पहुंचे. इस मामले में लेखक की कामयाबी इस किताब को उस श्रेणी में ला खड़ा करती है जिसे अगर कोई पत्रकार या पत्रकारिता का छात्र बायोग्राफी या मोनोग्राफ लिखने से पहले पढ़ता है तो वह अपना काम ज्यादा प्रभावी ढंग से कर पाएगा.

1 thought on “मेधा के बहाने जनांदोलनों का सफर

  1. आदिवासियों के लिए काम करने वाले समाजसेवकों को शुरू से सरकारी विरोध और प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा है। आज भले ही वह आदिवासियों का आंदोलन होने के बावजूद आदिवासी नेतृत्व विकसित नहीं कर पाई हो लेकिन अभी भी वह इस कार्य में प्रयासरत है।
    अरूण कुमार त्रिपाठी की पुस्तक मेधा पाटकर- नर्मदा आंदोलन और आगे को उन्होंने जिस निष्पक्षता से लिखा है। उसी तरीके इस पुस्तक की समीक्षा भी बेहतर तरीके से की गई है। इस समीक्षा में पुस्तक के सभी पक्षों को उभारने का प्रयास किया गया है।

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