मासूमों के नाम पर

हिमांशु शेखर
हर रोज तकरीबन साढ़े दस बजे उसकी आवाज आती है। अब तो उसकी पदचाप से ही पता चल जाता है कि वह आ रहा है। हर रोज वह सिर्फ एक ही शब्द बोलता है। वह शब्द है-कूड़ा। उसकी उम्र यही कोई बारह-तेरह साल होगी। सही उम्र उसे भी नहीं पता है। नाम पूछने पर उसने संजय बताया। उम्र पूछने पर वह पता नहीं सर कहता है। लेकिन उसे देखकर उसकी उम्र का आभास होता है। जब एक दिन मैंने उससे बातचीत की और नाम और उम्र के बाद जब मैंने उसके घर-बार के बारे में पूछा तो वह कूड़ा उठाकर चलता बना। बगैर कुछ बोले।
अगले दिन फिर मैंने जानना चाहा लेकिन उसने टाल दिया। आज तक उसने इस बारे में नहीं बताया है। वह इस सवाल पर चुप हो जाता है लेकिन वह ऐसा क्यों करता इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। जाहिर है कि वह अपने घर-बार से दूर होकर, पढ़ाई-लिखाई से दूर होकर एक जलालत भरी जिंदगी जीने को अभिशप्त है। वह अकेला उदाहरण नहीं है बल्कि  ऐसे बच्चों की अच्छी-खासी संख्या है, जो खेलने-पढऩे की उम्र में ही बेहद यातना वाली जिंदगी जीने को मजबूर कर दिए गए हैं।
सरकार और सरकारी विभागों की तरफ से बार-बार कहा जाता है कि बाल मजदूरी बंद करवा दिया जाएगा। कहने को बाल मजदूरी पर प्रतिबंध भी लगा दिया गया है। प्रतिबंध लगाए हुए भी तकरीबन तीन साल हो गए। लेकिन अभी भी मासूमों को मजूरी और यातना के फांस से मुक्त नहीं कराया जा सका है। अब तो सरकार ने चौदह साल से कम उम्र वाले बच्चों की शिक्षा के लिए शिक्षा का अधिकार कानून भी पारित कर दिया है। तो क्या इस कानून के पास हो जाने से संजय जैसे लाखों बच्चे स्कूल के मुंह देख पाएंगे? क्या वे भी बुनियादी शिक्षा हासिल कर पाएंगे? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो उठते तो बार-बार हैं लेकिन इनका सकरात्मक जवाब नहीं मिल पाता है। पिछले अनुभवों के आधार पर जो जवाब उभरकर सामने आता है वह निराशा पैदा करने वाला ही है। अगर सरकारी नाकामी नहीं होती तो शायद लाखों बच्चों को इस तरह की जिंदगी जीने को मजबूर नहीं होना पड़ता।
बच्चों को मेहनत-मजूरी से बचाने और उन्हें बेहतर जिंदगी दिलाने के नाम पर कई गैर सरकारी संगठन भी काम कर रहे हैं। उनका अपना एक अलग अर्थशास्त्र हैं। यो कहें कि भारत में ही इन संगठनों को अलग-अलग स्रोतों से हर साल अरबों रुपये इसलिए मिलते हैं कि वे बच्चों के लिए सही मायने में कुछ करें। ये संगठन कुछ करते भी हैं लेकिन इनका काम जमीन से ज्यादा कागजों पर ही होता है। ऐसा करना इनके लिए फायदेमंद ही है। क्योंकि इसी के आधार पर इन्हें दानदाताओं से पैसा मिलता है और अपनी जुगाड़बाजी से ऐसे संगठन पुरस्कार भी हासिल कर लेते हैं।
बच्चों के कल्याण के नाम पर चलाए जाने वाले इन गैर सरकारी संगठनों ने अब पूरी तरह से कारोबारी रवैया अपना लिया है। जिस तरह से कर्ज और बीमा पॉलिसी के पास टेली कॉलर लोगों के पास फोन करते हैं अब उसी तरह ये संगठन भी अब फोन करवाने लगे हैं। एक दिन मेरे पास एक ऐसे ही संगठन से फोन आया। इस गैर सरकारी संगठन को देश में बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले अहम संगठनों में शुमार किया जाता है। फोन पर बड़े ही मधुर आवाज में यह कहा गया कि सर हम बच्चों के लिए फलां-फलां काम करते हैं, क्या आप बच्चों के लिए कुछ दान करना चाहेंगे? अपना इन संगठनों पर शुरू से ही बहुत भरोसा नहीं रहा है इसलिए स्वाभाविक तौर पर जवाब नहीं में था। इसके बाद बिल्कुल पेशेवर टेलीकॉलर की तरह दूसरी तरफ से आवाज आई कि आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सर।
सवाल यह है कि जब बच्चों के कल्याण के नाम पर सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर ढेर सारे काम होने का दावा किया जा रहा हो इसके बाद भी लाखों मासूम संजय और उससे भी कहीं ज्यादा बुरी जिंदगी जीने को मजबूर हैं। कहीं बच्चों की बदहाली को भी कमाई का जरिया तो नहीं मान लिया गया है? अगर ऐसा नहीं होता तो बच्चों की हालत में सही मायने में सुधार हुई होती लेकिन कोई सुधार दिखता नहीं है। बच्चों के नाम पर सरकारी योजनाओं चलाने वालों और गैर सरकारी संगठनों के कर्ता-धर्ता के मन में किसी कोने में शायद यह बात जरूर है कि अगर इस समस्या का समाधान हो गया तो फिर उनकी कमाई का जरिया ही खत्म हो जाएगा।

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