मारुति समझौताः संघर्ष को दावत

हिमांशु शेखर

मारुति के मानेसर इकाई में पिछले कुछ महीने से चल रहे मजदूरों के अभियान की अगुवाई कर रहे सोनू गुर्जर और शिव कुमार को स्वैच्‍छिक सेवानिवृत्‍ति (वीआरएस) के बहाने कथित तौर पर मोटा पैसा देकर मजदूरों का असंतोष दबाने का कंपनी प्रबंधन का दांव उलटा पड़ता दिख रहा है. मानेसर इकाई के मजदूर अपने पुराने नेताओं पर धोखाधड़ी का आरोप लगाकर नए सिरे से संगठित हो रहे हैं और इन लोगों ने नए मजदूर संगठन के रजिस्ट्रेशन के लिए हरियाणा सरकार के पास आवेदन किया है. वहीं देश के प्रमुख श्रम संगठन मानते हैं कि मारुति ने एक गलत परंपरा की शुरुआत कर दी है और आने वाले दिनों में संभव है कि कंपनी को इसका और अधिक नुकसान उठाना पड़े. मारुति के संस्‍थागत निवेशकों ने भी प्रबंधन द्वारा गुपचुप समझौता कर लेने पर नाखुशी जताई है.

दरअसल, 15 दिनों की हड़ताल जब 21 अक्टूबर को खत्म हुई तो उस वक्त मजदूरों के अभियान का नेतृत्व कर रहे सोनू गुर्जर ने ‘तहलका’ को बताया था, ‘कंपनी ने 64 निलंबित मजदूरों को बहाल करने का फैसला किया. 30 मजदूरों के बारे में कंपनी ने अभी फैसला नहीं किया है. लेकिन इन पर फैसला प्रबंधन और मजदूरों के प्रतिनिधि मिलकर दस दिनों के भीतर लेंगे. ठेके पर काम करने वाले 1,200 मजदूरों को भी कंपनी काम पर वापस रखेगी.’ मजदूर यूनियन की मांग के बारे में उन्होंने कहा था, ‘इस पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ लेकिन एक शिकायत निवारण समिति बनाने पर सहमति बनी है.’ तो क्या अब मारुति में आने वाले दिनों में हड़ताल की आशंका खत्म हो गई, इस पर गुर्जर का कहना था कि सब कुछ प्रबंधन के रवैये पर निर्भर करता है.

सोनू गुर्जर के इन बातों के कहने के दस दिनों के अंदर-अंदर कंपनी प्रबंधन का रवैया तो बहुत ज्यादा नहीं बदला लेकिन गुर्जर और उनके सहयोगी शिव कुमार समेत उनके अन्य 28 साथियों का रवैया बदल गया. मारुति मजदूरों के मुताबिक कंपनी तो पहले भी मजदूर विरोधी थी और अब भी लेकिन कल तक मजदूरों के हक और हितों की रक्षा की कसमें खाने वाले लोगों ने अपने साथियों को छोड़कर कंपनी से खुद ही निकल जाने का रास्ता चुना. वह भी अच्छी-खासी रकम लेकर. कंपनी प्रबंधन, गुर्जर और शिव कुमार तीनों इस रकम को 16 लाख बता रहे हैं. वहीं मारुति के मजदूर इस बारे में अलग-अलग आंकड़े बता रहे हैं. कोई 40 लाख कह रहा है तो कोई एक करोड़ और कुछ लोग तो यह भी कह रहे हैं कि इन दोनों को प्रबंधन ने फ्लैट देने का वादा भी किया है.

हालांकि, शिव कुमार ने इन आरोपों को खाजिर किया. वे कहते हैं, ‘कहने को तो कोई कुछ भी कह दे लेकिन हम जानते हैं कि हमें कितना पैसा मिला है. 30 लोगों ने वीआरएस लिए हैं और हम सभी को 16-16 लाख रुपये मिले हैं. जो इससे ज्यादा रकम मिलने की बात कह रहे हैं वे इसे साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं पेश कर सकते. वे सिर्फ निराधार आरोप लगा सकते हैं.’ अगर शिव कुमार की ही बात को सच माना जाए तो हालिया हड़तालों की वजह से तकरीबन 2,000 करोड़ रुपये का नुकसान झेलने वाली कंपनी मारुति ने 4.8 करोड़ रुपये लेकर न सिर्फ अभी असंतोष को दबाने का काम किया बल्‍कि मजदूरों के बीच भी यह संदेश देने की कोशिश की कि वे जिन नेताओं पर भरोसा करते हैं वे कितने स्वार्थी हैं. जितने दिन हड़ताल चली उतने दिनों की मजदूरी मजदूरों को नहीं मिली और इनके लिए अपना घर चलाना मुश्‍किल हो गया. लेकिन मजदूरों के बूते हीरो बनकर उभरने वालों को कंपनी ने मोटा पैसा दे दिया और इस तरह से वे काफी फायदे में रहे. जबकि मारुति के मजदूर आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं.

यह पूछे जाने पर बिना मजदूरों को भरोसे में लिए हुए कंपनी प्रबंधन से अपने निजी लाभ के लिए समझौता कर लेना उन हजारों मजदूरों के साथ धोखा नहीं है जो आपके अगुवाई में आंदोलन कर रहे थे, शिव कुमार कहते हैं, ‘हम किस परि‌स्‍थिति में थे यह हम ही जानते हैं. प्रबंधन ने 30 को छोड़कर वापस सभी को काम पर रख लिया था और वह भी उन पर से मुकदमे हटाकर. लेकिन हम 30 लोगों पर कंपनी ने गंभीर आपराधिक आरोप लगाए थे और हम लोगों में से कई को लग रहा था कि कानूनी लड़ाई में हम टिक नहीं पाएंगे. 30 में आधे से ज्यादा लोग समझौते के पक्ष में थे ऐसे में हमारे सामने और कोई विकल्प नहीं था. हम अगर समझौता नहीं करते तो कंपनी हमें निकाल देती और हमें जो पैसे मिले हैं, वे भी नहीं मिलते.’

इसका मतलब क्या यह निकाला जाए कि मजदूरों का समर्थन खोने की वजह से सोनू गुर्जर, शिव कुमार और उनके अन्य साथियों ने कंपनी से पैसे लेकर सुरक्षित निकलने का रास्ता चुना? इसका जवाब मारुति मजदूरों के अभियान के लिए बनी समन्वय समिति के सदस्य सुनील दत्त देते हैं. वे कहते हैं, ‘शिव कुमार और सोनू गुर्जर झूठ बोल रहे हैं. मजदूर उनकी एक आवाज पर उनके साथ खड़े हो जा रहे थे. ऐसे में अगर प्रबंधन उन्हें धमका रहा था तो उन्हें मजदूरों के बीच आना चाहिए था न कि बंद कमरे में पैसे लेने का समझौता करना चाहिए था.’ मारुति मजदूरों के अभियान की दिशा की बाबत वे कहते हैं कि हम अपनी मांगों पर कायम हैं और हम नया यूनियन बनाने की दिशा में कोशिशें कर रहे हैं.

जब सोनू गुर्जर और शिव कुमार के पैसे लेकर हट जाने की बात सामने आने के अगले ही दिन मारुति सुजूकी वर्क्स यूनियन के नाम से एक नए श्रमिक संगठन के रजिस्ट्रेशन के लिए हरियाणा के श्रम विभाग में आवेदन किया गया. इसके अध्यक्ष बने राम मेहर सिंह और सचिव सरबजीत सिंह. आश्चर्य की बात यह है कि नए यूनियन के गठन को लेकर कंपनी प्रबंधन ने अब तक कोई आपत्‍ति नहीं जताई है. सोनू गुर्जर और शिव कुमार की अगुवाई में जिस संगठन के रजिस्ट्रेशन की कोशिशें चल रही थीं उसका नाम है मारुति सुजूकी इंप्लाइज यूनियन. ‘तहलका’ से बातचीत में राम मेहर सिंह बताते हैं, ‘हम अपना अभियान जारी रखेंगे. हम यूनियन की मांग कर रहे हैं ताकि प्रबंधन तक मजदूरों की बात पहुंचे और मजदूरों को उनका उचित हक मिले.’ सोनु गुर्जर और शिव कुमार के गुपचुप समझौते के बारे में वे कहते हैं कि हम इससे सबक लेकर अपने अभियान को आगे बढ़ाएंगे.

नए यूनियन पर कंपनी प्रबंधन की तरफ से अब तक आपत्‍ति नहीं जताने पर कुछ लोग यह आरोप भी लगा रहे हैं कि यह यूनियन प्रबंधन के इशारे पर बनाई जा रही है. लेकिन देश के एक प्रमुख श्रमिक संगठन के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ‘तहलका’ से बातचीत में ऐसी किसी आशंका को खारिज करते हैं. वे कहते हैं, ‘अगर ऐसा होता तो नए प्रबंधन के लोग हमारे संगठन या देश के अन्य प्रमुख श्रमिक संगठनों के पदाधिकारियों से मिलकर समर्थन जुटाने की कोशिश नहीं करते.’ वे आगे बताते हैं, ‘नवगठित यूनियन के लोगों के मन में कहीं न कहीं यह आशंका है कि मारुति प्रबंधन मजदूरों के अभियान को कुचलने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है. इसलिए वे अभी से ही प्रमुख श्रमिक संगठनों को भरोसे में ले रहे हैं.’ हालांकि, राम मेहर कहते हैं कि नए यूनियन में सिर्फ कंपनी में काम करने वाले लोग ही होंगे.

मारुति के संस्‍थागत निवेशकों ने भी प्रबंधन द्वारा गुपचुप तरीके से ऐसा समझौता करने पर नाराजगी जाहिर की है. एक अखबार ने मारुति के संस्‍थागत निवेशकों को नाम नहीं छापने की शर्त पर यह कहते हुए उदघृत किया मारुति प्रबंधन ने इस समझौते के बारे में उन्हें अंधेरे में रखा और निवेशकों को भरोसे में नहीं लिया. एक ने कहा, ‘यह एक गलत संकेत है. यह सियासी समझौता लगता है और मजदूरों के असंतोष के समाधान का यह तरीका सही नहीं है. मारुति के कॉरपोरेट गवर्नेंस नीतियों पर इस समझौते का दूरगामी असर पड़ेगा. सोनू गुर्जर ने भी हमारा भरोसा तोड़ा है. हमने उसे बातचीत के लिए बुलाया था लेकिन वह तो प्रबंधन से पैसे लेकर गायब हो गया. आखिर हम किस पर भरोसा करें?’ इससे साफ है कि निवेशकों का भरोसा दोनों पक्षों में तोड़ा है. ऐसे समय में जब 18,000 करोड़ रुपये के निवेश से मारुति गुजरात में नई उत्पादन इकाई लगाने वाली है, निवेशकों का भरोसा टूटना एक शुभ संकेत नहीं है.

श्रमिक संगठनों का मानना है कि मारुति प्रबंधन ने मजदूरों के असंतोष को दबाने के लिए जो तिकड़मी रवैया अपनाया है वह आने वाले दिनों में कंपनी पर भारी पड़ सकता है. ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) के राष्ट्रीय सचिव डीएल सचदेवा ‘तहलका’ को बताते हैं, ‘मजदूर नेताओं को आर्थिक प्रलोभन देकर उन्हें अपने इशारे पर नचाना एक तरह का भ्रष्टाचार है. इस घटना ने कॉरपोरेट क्षेत्र द्वारा अपनाए जा रहे तिकड़मों की ओर एक बार फिर ध्यान आकृष्ट कराया है. इसके लिए जरूरी कानूनी उपाय किए जाने चाहिए.’

उन्होंने मारुति प्रबंधन के इस फैसले की कानूनी वैधता पर भी सवाल उठाया. वे कहते हैं, ‘नियम के मुताबिक कर्मचारियों को वीआरएस का प्रस्ताव देने से पहले सरकार से इसके लिए अनुमति लेनी होती है. प्रबंधन अनुमति लेने की बात स्वीकार कर रही है. नियम ये भी कहते हैं कि जिस पद पर वीआरएस दिया जाएगा उसे खाली रखा जाएगा. क्योंकि वीआरएस तब ही दिया जाता है जब किसी भी कंपनी में जरूरत से ज्यादा कर्मचारी हों. लेकिन मारुति में तो तकरीबन 1,500 ठेके पर काम करने वाले मजदूर हैं. इससे लगता है कि मारुति ने कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन किया है.’ मजदूर आंदोलन पर इस घटना के असर के बारे में सचदेवा कहते हैं, ‘अभी तो यह कहना जल्दबाजी होगी कि इससे देश भर के मजदूर आंदोलनों पर नकारात्मक असर पड़ेगा. लेकिन अगर मारुति के नए यूनियन ने या फिर दूसरी कंपनियों के यूनियन से भी अगर ऐसी खबरें आती हैं तो निश्‍चित तौर पर मजदूर आंदोलनों के लिए यह अशुभ साबित होगा.’

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