मनमोहन सिंह की जानकारी में मची लूट

हिमांशु शेखर

अब तक आपने यह जाना और सुना होगा कि कोई भी कंपनी अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए लागत घटाती है. पर रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) ने इस धारणा को उलट दिया है. इस कंपनी ने यह साबित कर दिखाया है कि लागत जितनी बढ़ेगी मुनाफा भी उतना ही बढ़ेगा. कंपनी ने केजी (कृष्‍णा-गोदावरी) बेसिन परियोजना में गैस निकालने के लिए खर्चे बढ़ाए और जमकर मुनाफा कमाने का रास्ता साफ किया. कंपनी ने यह भी सुनिश्‍चित किया कि उसके इस कदम से सरकार को राजस्व का भारी नुकसान हो और सरकारी कंपनी एनटीपीसी को गैस के लिए ऊंची कीमत चुकानी पड़े. इस पूरे मामले में सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि सरकार को आर्थिक नुकसान पहुंचाने का पूरा खेल आरआईएल ने मौजूदा सरकार के मुखिया डॉ. मनमोहन सिंह की जानकारी में खेला. जानकारी तो उस समय केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा को भी थी लेकिन इस लूट को रोकने के लिए कोई भी कदम नहीं उठाया गया. हाल ही में लीक हुई महालेखा नियंत्रक एवं परीक्षक (कैग) की ड्राफ्ट रिपोर्ट ने भी आरआईएल की इस लूट को साबित करने का काम किया है.

दरअसल, देश में तेल और गैस की खोज के लिए केंद्र सरकार ने कुछ साल पहले देसी-विदेशी कंपनियों से आवेदन आमंत्रित किए थे. कई कंपनियों ने आवेदन किया. आवेदन हासिल करने के बाद सरकार ने कुल 162 ब्लॉक्स में तेल और गैस खोजने का ठेका कंपनियों को दिया. इन कंपनियों में आरआईएल भी है्. आरआईएल ने कनाडा की कंपनी निको रिसोर्सेज लिमिटेड के साथ मिलकर केजी बेसिन के डी-6 ब्लॉक में गैस की खोज की और यहां से उत्पादन शुरू किया. दोनों कंपनियों का जो संयुक्त उपक्रम बना उसमें 90 फीसदी हिस्सेदारी आरआईएल की और दस फीसदी हिस्सेदारी निको की थी. गैस बेचने से संबंधित शर्तों को तय करने के लिए आरआईएल और केंद्र सरकार के बीच एक समझौता हुआ था.

जब आरआईएल को यह लग गया कि इस ब्लॉक में काफी गैस है तो फिर कंपनी ने अपना खेल शुरू कर दिया. आरआईएल ने सरकार के साथ सबसे पहले जो समझौता किया था उसमें यह तय हुआ था कि कंपनी डी-6 से 40 एमएमएससीएमडी गैस का उत्पादन करेगी और इस पर 2.47 अरब डॉलर खर्च आएगा. गैस के अकूत भंडार को देखते हुए कंपनी ने संशोधित प्रस्ताव सरकार के पास भेजा और इसे सरकार ने मंजूरी भी दे दी. कंपनी ने उत्पादन क्षमता को दोगुना 80 एमएमएससीएमडी कर दिया लेकिन असल खेल हुआ लागत में. कंपनी को लागत को तकरीबन साढ़े तीन गुना यानी 8.84 अरब डॉलर कर दिया. इस पूरे मामले में सरकारी मिलीभगत का इशारा इस बात से मिलता है कि दोगुने उत्पादन के लिए खर्च को साढ़े तीन गुना बढ़ाए जाने पर सरकार की तरफ से कोई सवाल नहीं उठाया गया और संशोधित प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई.

आरआईएल और केंद्र सरकार के बीच मुनाफे के बंटवारे को लेकर जो समझौता हुआ था उसमें यह प्रावधान है कि गैस बेचने से होने वाली आमदनी में सरकार को तब तक हिस्सा नहीं मिलेगा जब तक आरआईएल अपनी पूरी लागत वसूल नहीं लेती. ऐसे में साफ है कि आरआईएल खर्च जितना बढ़ाएगी सरकार की आमदनी उतनी ही घटेगी और आरआईएल का मुनाफा उतना ही बढ़ेगा. इस तथ्य को अच्छी तरह से जानने के बावजूद न तो पेट्रोलियम मंत्रालय ने और न ही इस क्षेत्र के नियामक ने इस लूट पर सवाल उठाया. यहां तक कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी इस मामले पर मौन साधे रखना ही ठीक समझा. इतने बड़े लूट में सरकारी चुप्पी सरकार की मंशा की पोल खोलने वाली है.

इस मामले ने एक बार फिर से यह साबित किया है कि संस्‍थागत भ्रष्टाचार में किस कदर मौजूदा सरकार का शीर्ष नेतृत्व शामिल रहा है. जब 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला उजागर हुआ तो उस वक्त पहले तो सरकार ने इसे घोटाला माना ही नहीं. इसके बाद कैग की रपट आई और कहा गया कि स्पेक्ट्रम आवंटन में दूरसंचार मंत्री रहे ए. राजा के फैसलों की वजह से सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. काफी हो-हल्ला होने के बाद प्रधानमंत्री ने मुंह खोला और कहा कि उन्हें इतनी बड़ी गड़बड़ी के बारे में पता नहीं था. पर जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने वे सभी पत्र सार्वजनिक कर दिए जो उन्होंने प्रधानमंत्री को लिखे थे और उन्हें इस गड़बड़ी के बारे में आगाह किया था. कुछ और लोगों ने भी यह बात प्रधानमंत्री तक पहुंचाई थी. धीरे-धीरे सार्वजनिक होती सूचनाओं ने यह साबित कर दिया कि स्पेक्ट्रम आवंटन के नाम पर जो लूट हुई उससे प्रधानमंत्री और उस समय के वित्त मंत्री पी. चिदंबरम समेत सरकार का शीर्ष नेतृत्व पूरी तरह वाकिफ था.

जब स्पेक्ट्रम घोटाला सामने आया तो सरकार की तरफ से कहा गया कि पहले आओ और पहले पाओ की तर्ज पर स्पेक्ट्रम आवंटित कर सरकार ने कोई गलती नहीं की. क्योंकि यह नीति तो अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने लागू की थी. सरकार की तरफ से कहा गया कि हमने तो सिर्फ उस नीति का पालन किया. गैस मामले पर भी पेट्रोलियम मंत्रालय की तरफ से कहा गया कि जिस नीति के तहत आरआईएल को गैस की खोज और उत्पादन का ठेका मिला वह भाजपा की अगुवाई वाली सरकार ने 1999 में तैयार की थी. सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि हमने तो सिर्फ उन नीतियों का पालन किया. जाहिर है कि ऐसा कहकर सरकार पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रही है. क्योंकि अगर सरकार को यह लगता कि पुरानी नीति में कोई गड़बड़ी है तो उसके पास यह विकल्प था कि वह नीति की खामियों को दूर करती. पर ऐसा नहीं किया गया. साफ है कि मामला नीति में खामी का नहीं बल्‍कि नियत में खोट का है. कैग ने ड्राफ्ट रिपोर्ट में इस बात की पुष्‍टि करते हुए कहा कि केजी बेसिन परियोजना के लिए आरआईएल-निको के साथ जो समझौता (प्रोडक्‍शन शेयरिंग कांट्रैक्ट यानी पीएससी) 12 अप्रैल 2000 हुआ था, उसका उल्लंघन कंपनी ने किया. कैग का कहना है कि 19 खोजों में से 13 में कंपनी ने इसका उल्लंघन किया.

ए. राजा के इस्तीफे के बाद दूरसंचार मंत्रालय संभालने वाले कपिल सिब्बल ने उस वक्त भी कहा था कि कैग ने अपनी रिपोर्ट में आर्थिक नुकसान की गलत व्याख्या की है और सही मायने में सरकार को स्पेक्ट्रम आवंटन में कोई नुकसान ही नहीं हुआ. पर जैसे-जैसे मामला उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर आगे बढ़ा, वैसे-वैसे घोटाले की परतें एक-एक कर खुलती गईं. अब केजी बेसिन मामले में आरआईएल द्वारा फायदा उठाए जाने के मामले में भी पूरी कहानी दोहराई जा रही है. केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री एस. जयपाल रेड्डी को इस मामले में कोई गड़बड़ी नहीं दिख रही. कपिल सिब्बल कैग के औचित्य पर ही सवाल उठा रहे हैं. वहीं प्रधानमंत्री सब कुछ जानने के बावजूद चुप्पी साधे हुए हैं. आशंका इस बात की भी है कि कहीं प्रधानमंत्री इस मर्तबा भी कहीं यह बयान न दे डालें कि उन्हें इस मामले में कुछ पता नहीं था.

इस मामले की पड़ताल के दौरान जो दस्तावेज मिले हैं, वे इस बात को साबित करते हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आरआईएल द्वारा सरकारी खजाने को चूना लगाने की तैयारी की जानकारी 2007 के मध्य में ही दे दी गई थी. इसके बावजूद उन्होंने इस मामले में कुछ नहीं किया. पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस पर स्‍थायी संसदीय समिति के सदस्य और माकपा के राज्य सभा सांसद तपन सेन ने 4 जुलाई 2007 को प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर यह बताया था कि आरआईएल केजी बेसिन की डी-6 परियोजना से गैस निकालने की लागत कृत्रिम तौर पर बढ़ा रही है और इस वजह से गैस की कीमतों को बढ़ाने का खेल चल रहा है. सेन ने लिखा, ‘मूल प्रस्ताव को 163 दिनों में डीजीएच ने मंजूरी दी. जबकि बढ़ी लागत वाले संशोधित प्रस्ताव को डीजीएच ने 53 दिनों में ही मंजूरी दे दी. इससे लगता है कि मंजूरी देने में काफी जल्दबाजी की गई.’ यहां ध्यान रखने की बात यह भी है कि सेन एक सामान्य सांसद नहीं बल्‍कि पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस पर संसद की स्‍थायी समिति के सदस्य भी हैं. इससे यह बात साबित होती है कि सेन पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के मामलों में विशेषज्ञता रखते हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो उन्हें ऐसी समिति का सदस्य नहीं बनाया जाता.

13 जुलाई 2007 को सेन ने प्रधानमंत्री को भेजी चिट्ठी में लिखा, ‘मेरी पिछली चिट्ठी के जवाब में प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रधान सचिव द्वारा मुझे पत्र लिखकर बताया गया कि मेरे द्वारा उठाए मामलों को पेट्रोलियम मंत्रालय के पास भेज दिया गया है. मेरी मांग है कि इस मामले की स्वतंत्र जांच कराई जाए.’ सेन ने अपने पत्र के जरिए प्रधानमंत्री को बताया कि आरआईएल डी-6 परियोजना की लागत जानबूझकर बढ़ा रही है और इससे सरकार का काफी नुकसान हो रहा है. प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से सेन का पत्र एक बार फिर उसी पेट्रोलियम मंत्रालय के पास भेज दिया गया जिसके पास पांच पत्र सेन भेज चुके थे और जिन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई थी. इससे यह लगता है कि प्रधानमंत्री इस मामले में गंभीर नहीं थे. क्योंकि अगर वे गंभीर होते तो मामले की जांच करवाते न कि दोबारा उसी मंत्रालय को पत्र भेजते जिसे सेन पांच बार पत्र लिख चुके थे. इसका नतीजा यह हुआ कि लूट जारी रही. बाद की घटनाओं ने इस बात को साबित भी किया.

सेन ने जो सवाल प्रधानमंत्री के सामने अपने पत्रों के जरिए उठाए थे उसकी पुष्‍टि कैग भी अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट के जरिए कर रही है. कैग ने कहा है, ‘शुरुआती प्रस्ताव के मुकाबले संशोधित प्रस्ताव के जरिए लागत में की गई बढ़ोतरी से भारत सरकार को आर्थिक नुकसान हुआ है. हालांकि, अब तक उपलब्‍ध जानकारियों के आधार पर हम नुकसान का आकलन नहीं कर पा रहे हैं. पर कंपनियों के 2008-09 के आंकड़ों के आधार पर आगे जो ऑडिट होगी उससे नुकसान का अंदाजा लग पाएगा.’ यानी कैग अभी यह नहीं बता रही है कि यह घोटाला कितने सौ करोड़ का है लेकिन इस बात की ओर स्पष्ट इशारा कर रही है कि घोटाला बड़ा है.

सेन ने बताया, ‘प्रधानमंत्री को मैंने तीन चिट्ठी लिखी. उन्हें पूरी स्‍थिति से अवगत कराया. पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला. प्रधानमंत्री चुप्पी साधे रहे.’ सेन ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में उन सभी बातों को उठाया जो उन्होंने देवरा तक पत्रों के जरिए पहुंचाई थीं. अगर प्रधानमंत्री ने उस वक्त जरूरी कदम उठाए होते तो संभव है कि यह घोटाला इतना बड़ा आकार नहीं लेता और न ही इसकी जांच पर करोड़ो रुपये खर्च होते. कांग्रेस और इस सरकार के कई मंत्री समेत देश के तमाम आर्थिक विश्लेषक यह कहते हुए नहीं अघाते कि मनमोहन सिंह दुनिया के जाने-माने अर्थशास्‍त्री हैं. पर अर्थशास्‍त्री प्रधानमंत्री को आरआईएल द्वारा देश को पहुंचाए जाने वाला आर्थिक नुकसान या तो दिखा नहीं या फिर उन्होंने आंखें मूंद लीं.

यह पूछे जाने पर कि क्या आप मुरली देवरा को मंत्रिमंडल से हटाए जाने की मांग करेंगे, सेन कहते हैं, ‘सिर्फ देवरा क्यों? मैंने प्रधानमंत्री को तीन पत्र लिखे. उन्होंने भी कुछ नहीं किया. इसलिए गड़बड़ी की जिम्मेदारी तो प्रधानमंत्री को भी लेनी पड़ेगी.’ सेन के पत्रों से यह बात साबित होती है कि प्रधानमंत्री को पूरे मामले की जानकारी थी और उनके कार्यालय से पत्र मिलने की सूचना दिए जाने से इस बात को और बल मिलता है. इस आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा कि प्रधानमंत्री कहीं न कहीं आरआईएल द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार को संरक्षण दे रहे थे. ऐसे में प्रधानमंत्री की जवाबदेही क्यों नहीं तय हो? भारतीय कानून के तहत अपराधियों को संरक्षण देने वाले को भी अपराध का दोषी माना जाता है. ऐसे में आरआईएल के भ्रष्टाचार को संरक्षण देने के लिए मुरली देवरा समेत प्रधानमंत्री को भी क्यों नहीं दोषी माना जाना चाहिए?

कैग की ड्राफ्ट रिपोर्ट में पूरी गड़बड़ी के लिए पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय को दोषी ठहराया गया है. इसका मतलब साफ है कि उस समय इस मंत्रालय को संभाल रहे मुरली देवरा कैग की नजर में दोषी हैं. अभी बहस यह चल रही है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाया जाए या नहीं. पर अगर आरआईएल द्वारा केजी बेसिन परियोजना के जरिए सरकार को चूना लगाने की घटना और इस मामले में प्रधानमंत्री की चुप्पी को देखते हुए यह मालूम पड़ता है कि जो लोग प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में शामिल करने की मांग कर रहे हैं, उनकी बात में दम है.

प्रधानमंत्री को पत्र लिखने से पहले सेन ने देवरा को पांच पत्र लिखे.  देवरा ने सेन को दो जवाबी पत्र भी लिखे. पहले में सेन को यह बताया गया कि उनका पत्र मिल गया और इस मामले को पेट्रोलियम मंत्री देख रहे हैं. इसके बाद सेन के पास हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय (डीजीएच) को भेजा गया. सेन ने बताया, ‘डीजीएच की तरफ से मेरे सामने जो प्रस्तुति दी उसके जरिए उन्होंने परियोजना लागत में बढ़ोतरी को सही ठहराने की भरसक कोशिश की. उन्होंने कहा कि डीजल आदि की कीमतों में काफी बढ़ोतरी हो गई है, इसलिए परियोजना लागत काफी बढ़ गई है.’

सेन ने देवरा को पहली चिट्ठी 21 दिसंबर 2006 को लिखी थी. उनके पास डीजीएच को सरकार का पक्ष रखने के लिए डीजीएच को 22 फरवरी 2007 को भेजा गया. यहां यह याद रखना होगा कि उस वक्त सेन की पार्टी माकपा केंद्र सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी. संभव है कि इस वजह से भी पेट्रोलियम मंत्री ने डीजीएच को सेन के पास सफाई देने के लिए भेजा हो. बहरहाल, जब सेन और डीजीएच की मुलाकात हो गई तो फिर देवरा ने एक पत्र लिखकर सेन को बताया कि डी-6 परियोजना को विकसित करने वाली योजना की जांच का काम सक्षम एजेंसी को सौंप दिया गया है. डीजीएच की तरफ से जांच का काम इस क्षेत्र के विशेषज्ञ पी. गोपालकृष्‍णन और इंजीनियरिंग कंसल्टेंट मुस्तांग इंटरनैशनल का सौंपा गया.

अंततः सरकार अपनी उस धारणा को ही पुष्ट करती रही कि डी-6 परियोजना पर होने वाला खर्च वाजिब है.
सेन ने सबसे पहले इस मामले को 12 दिसंबर 2006 को राज्य सभा में आरआईएल द्वारा खर्चे बढ़ाए जाने के मामले को उठाया था. इसके जवाब में केंद्रीय पेट्रोलियम राज्य मंत्री दिनशा पटेल ने कहा, ‘डी-6 से गैस निकालने वाली कंपनियों के समूह यानी आरआईएल और निको ने सरकार को संशोधित योजना का प्रारूप सौंपा है. इसके मुताबिक उत्पादन क्षमता को दोगुना किया जाना है और लागत 2.47 अरब डॉलर से बढ़कर 8.84 अरब डॉलर होने की बात कही गई है.’

21 दिसंबर 2006 को मुरली देवरा को लिखे पत्र में सेन ने कहा, ‘राज्य सभा में मेरे सवाल के जवाब में जो जानकारी दी गई उससे ऐसा लग रहा है कि परियोजना लागत को कृत्रिम रूप से बढ़ाने (गोल्ड प्लेटिंग) का काम चल रहा है. समझौते के मुताबिक कंपनी मुनाफा सरकार के साथ साझा करने से पहले अपना लागत वसूलेगी.’ उन्होंने इसी पत्र में आगे लिखा, ‘अगर लागत को कृत्रिम रूप से बढ़ाने की बात सही निकलती है तो इससे सरकार को काफी घाटा होगा. इसलिए इस मामले की जांच करवाई जाए.’ उन्होंने यह भी लिखा कि गैस जैसे प्राकृतिक संसाधन की असली मालिक देश की जनता है इसलिए जनता की हितों की कीमत पर किसी कंपनी द्वारा की जा रही कमाई को रोकने के उपाय जल्द से जल्द किए जाएं.

इस बीच डीजीएच ने आरआईएल-निको की परियोजना लागत बढ़ाने वाले प्रस्ताव को मंजूरी दे दी. इसके बाद सेन ने 25 जनवरी 2007 को फिर एक पत्र देवरा को लिखा. इसमें सवाल उठाया, ‘आखिर बगैर जांच कराए आरआईएल-निको के प्रस्ताव को कैसे मंजूरी मिल गई. मैंने अपने पिछले पत्र में ही संशोधित प्रस्ताव की खामियों की बात उठाई थी. मेरी मांग है कि इस मामले में कोई और फैसला लेने से पहले सरकार मामले की जांच करे और डीजीएच के फैसले पर पुनर्विचार करे.’

डीजीएच और आरआईएल के बीच मिलीभगत का संदेह इस बात से भी गहराता है कि लागत बढ़ाने वाले संशोधित प्रस्ताव को डीजीएच ने मंजूरी देने में 53 दिन लगाए. जबकि 2.47 अरब डॉलर के खर्च अनुमान वाले प्रस्ताव को मंजूरी देने में डीजीएच ने 163 दिन लगाए थे. इसमें दो ही संभावना है. पहली संभावना यह है कि डीजीएच ने मूल प्रस्ताव को मंजूरी देने में अधिक वक्त लगाया या फिर दूसरी संभावना यह है कि लागत बढ़ाने वाले संशोधित प्रस्ताव को मंजूरी देने में डीजीएच ने जल्दबाजी दिखाई. दोनों ही स्‍थितियों में डीजीएच की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है. वैसे 2009 में यह बात चल रही थी कि सीबीआई उस आरोप की जांच कर रही है जिसमें यह कहा गया है कि वी.के. सिब्बल की बेटी के लिए मुंबई में आरआईएल ने एक फ्लैट खरीदा है. सिब्बल पर और भी कई तरह से आरआईएल से आर्थिक लाभ लेने का आरोप उस वक्त लगा था. पर तब से लेकर अब तक यह पता नहीं चल पाया कि सीबीआई की इस जांच का क्या हुआ.

दरअसल, इस पूरे मामले में देवरा की भूमिका संदेहास्पद है. कैग की ड्राफ्ट रिपोर्ट में भी कहा गया है कि पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्रालय और डीजीएच ने निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाया. अब अगर कैग मंत्रालय को गुनहगार मान रही है तो इससे साफ है कि मंत्री भी गुनहगार हैं. कैग की ड्राफ्ट रिपोर्ट और सेन के पत्रों पर साधी गई चुप्पी से भी इस बात की पुष्‍टि होती है कि मुरली देवरा कहीं न कहीं इस खेल में संलिप्त रहे. वैसे भी आरआईएल के साथ उनके रिश्ते जगजाहिर हैं.

आरआईएल-निको और भारत सरकार के बीच हुए समझौते में यह तय हुआ था कि रॉयल्टी किस दर पर वसूली जाएगी, यह तय करने का काम दोनों पक्ष मिलकर करेंगे. हालांकि, समझौते के मुताबिक आरआईएल तय दर से अधिक पर भी गैस बेचने को स्वतंत्र है. किसी भी निजी कंपनी को आरआईएल किसी भी दर पर गैस दे सकती है. सरकार का इसमें कोई दखल नहीं होगा. सरकार की तरफ से यह बात संसद में भी कही गई. इसी बात का फायदा उठाते हुए आरआईएल गैस की आपूर्ति में बनावटी कमी और कीमतों में बनावटी तेजी का खेल खेलना शुरू कर दिया.

आरआईएल को मालूम था कि गैस उसके लिए कमाई का अहम जरिया बनने जा रहा है. इसलिए कंपनी ने वैसे बड़े ग्राहकों की तलाश शुरू कर दी जो नियमित तौर पर गैस खरीदें. जब 2004 में एनटीपीसी ने गैस आपूर्ति के लिए वैश्‍विक निविदा निकाली तो आरआईएल ने आवेदन किया. आरआईएल को गैस आपूर्ति का ठेका मिल भी गया. तय हुआ कि आरआईएल 2.34 डॉलर प्रति यूनिट की दर से एनटीपीसी को 1.2 करोड़ क्यूबिक मीटर गैस देगी. ऐसा ही एक समझौता मुकेश अंबानी की अगुवाई वाली आरआईएल और अनिल अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस नेचुरल रिसोर्सेज लिमिटेड (आरएनआरएल) के बीच भी हुआ. इस गैस का इस्तेमाल 8,000 मेगावॉट उत्पादन क्षमता वाली दादरी बिजली परियोजना में होना था. सौदे के तहत दर वही 2.34 डॉलर प्रति यूनिट तय हुई लेकिन आपूर्ति की जाने वाली मात्रा तय हुई 2.8 करोड़ क्यूबिक मीटर.

इन सौदों के बाद वैश्‍विक बाजार में गैस की कीमतों में अचानक तेजी आ गई. इसके बाद मुकेश अंबानी का मन डोल गया और उन्होंने सौदे की शर्तों को दरकिनार करते हुए एनटीपीसी और आरएनआरएल को गैस देने से मना कर दिया. इसके बाद इन दोनों कंपनियों ने मुंबई उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और कहा कि उन्हें सौदे में तय दर पर गैस मिलनी चाहिए. आरएनआरएल के मामले में उच्च न्यायालय ने यह आदेश दिया कि कंपनी को 2.34 डॉलर प्रति यूनिट की दर पर ही आरएनआरएल को गैस की आपूर्ति करनी होगी. इसके बाद मामला उच्चतम न्यायालय के पास पहुंचा. शीर्ष अदालत ने इस मामले में कोई सीधा फैसला न देते हुए 7 मई 2010 को कहा कि दोनों भाइयों को यह मामला आपसी बातचीत के जरिये सुलझाना चाहिए. यह फैसला उस समय के मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालकृष्‍णन की अध्यक्षता वाली पीठ ने दिया था. हालांकि, इस पीठ के अन्य न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी ने फैसला आरएनआरएल के पक्ष में दिया था और कहा था कि समझौते की शर्तों का पालन किया जाना चाहिए.

इससे पहले सरकार एक तरफ तो संसद में यह कहती रही कि वह गैस की कीमतों के निर्धारण में दखल नहीं देगी लेकिन दूसरी तरफ सरकार ने गैस की कीमतों को बढ़ाने का भी काम किया. सरकार ने गैस की कीमतों के निर्धारण के लिए प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता में मंत्रियों की एक अधिकार प्राप्त समिति (ईजीओएम) का गठन किया. इस समिति ने गैस की कीमत 2.34 डॉलर प्रति यूनिट से बढ़ाकर 4.2 डॉलर प्रति यूनिट कर दी. आरआईएल के साथ काम कर चुके एक चार्टर्ड अकाउंटेंट ने नाम नहीं जाहिर करने की शर्त पर बताया कि डी-6 से गैस उत्पादन में कुल खर्च 0.89 डॉलर प्रति यूनिट है. इस व्यक्‍ति ने कहा, ‘मुकेश अंबानी के पक्ष में अब भी कई लोग काम कर रहे हैं. कुछ लोग यह मांग कर रह रहे हैं कि सरकार को प्रतिशत के आधार पर रॉयल्टी वसूलने के बजाए प्रति यूनिट एक निश्‍चित रॉयल्टी वसूलनी चाहिए. ऐसा होने से मुकेश अंबानी को ही फायदा होगा. क्योंकि फिर वे अपनी मर्जी से गैस की दर तय करेंगे और जबर्दस्त मुनाफा कमाएंगे जबकि सरकार को इसका फायदा मिलने के बजाए नुकसान ही होगा. क्योंकि एनटीपीसी जैसी कई सरकारी कंपनियों को बाजार भाव पर आरआईएल से गैस खरीदने को मजबूर होना पड़ेगा.’

जब सरकार ने आरआईएल की बात मानते हुए गैस की कीमतें बढ़ाकर 4.2 डॉलर प्रति यूनिट कर दीं तो इस मसले पर देश की जनता को बेवकूफ बनाने के लिए मुरली देवरा ने यह तर्क दिया कि कीमतों में बढ़ोतरी से सरकार को अधिक रॉयल्टी मिलेगी. पर देवरा यह बताना भूल गए कि कीमतों में बढ़ोतरी से सरकारी कंपनी एनटीपीसी का गैस खरीदने का खर्च तकरीबन दोगुना हो जाएगा. यानी कुछ सौ करोड़ के फायदे के लिए सरकार ने हजारों करोड़ का नुकसान उठाने का विकल्प चुना. इससे साफ है कि मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली सरकार देश की आम जनता के पक्ष में काम कर रही थी या फिर मुकेश अंबानी के कारोबारी हितों का संरक्षण कर रही थी.

इस बारे में सेन ने 27 फरवरी 2007 को मुरली देवरा को लिखा, ‘आरआईएल द्वारा गैस देने के मामले वादाखिलाफी किए जाने के मामले को सरकारी कंपनी एनटीपीसी अदालत में लड़ रही है. इस बीच अब यह जाहिर हो गया है कि सरकारी एजेंसी डीजीएच ने औपचारिक तौर पर यह कहा है कि एनटीपीसी (यानी सरकार का) रवैया कानूनी तौर पर और समझौते के मुताबिक व्यावहारिक नहीं है.’ उन्होंने आगे लिखा, ‘यह सरकार के एकजुट होकर काम करने की क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े करता है. जनहित के मसले पर दो मंत्रालय बिल्कुल अगल ढंग से काम नहीं कर सकते.’ उन्होंने मांग की कि मंत्रालय इस मसले पर अपना रुख स्पष्ट करे और जब तक इस मामले की पूरी तरह से जांच न हो जाए तब तक संशोधित प्रस्ताव की मंजूरी पर रोक लगा दी जाए.

मालूम हो कि उस वक्त ऊर्जा मंत्रालय कांग्रेस नेता सुशील कुमार शिंदे के पास था. शिंदे और देवरा दोनों महाराष्ट्र से हैं. इस पूरे विवाद को उस समय जानकार पेट्रोलियम मंत्रालय बनाम ऊर्जा मंत्रालय देखने के बजाए मुरली देवरा बनाम सुशील कुमार शिंदे के तौर पर देख रहे थे. हालांकि, इस पूरे विवाद से सबसे ज्यादा फायदा आरआईएल को हो रहा था. हालांकि, कॉरपोरेट दुनिया के लोग इस मामले को मुकेश अंबानी बनाम अनिल अंबानी के तौर पर देखते हैं. इन लोगों का कहना है कि देवरा बड़े अंबानी के खास हैं और शिंदे छोटे अंबानी के खास. इसलिए दोनों अपने-अपने अंबानी के पक्ष में काम कर रहे थे.

बहरहाल, डीजीएच द्वारा निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने और सरकारी कंपनियों को नुकसान पहुंचाने का मामला यहीं नहीं थमा बल्‍कि आगे भी चलता रहा. 2007 के फरवरी में जब सरकारी उपक्रम ओएनजीसी ने आंध्र प्रदेश में गैस मिलने की बात डीजीएच के सामने रखी तो उस वक्त डीजीएच रहे वी.के. सिब्बल ने सार्वजनिक तौर पर ओएनजीसी के दावे पर सवाल उठाए जबकि निजी कंपनियों के दावों पर विचार करने की बात कही. इसके बाद ओएनजीसी के शेयर कुछ ही दिनों में 906 रुपये से घटकर 796 रुपये पर पहुंच गए. ओएनजीसी के चेयरमैन आर.एस. शर्मा ने इस बारे में पेट्रोलियम मंत्रालय के पास शिकायत भी दर्ज कराई और यह दावा किया कि सिब्बल के बयान की वजह से कंपनी के शेयरों में कमी आई और इससे ओएनजीसी को कुल 23,527 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.

ध्यान रखने वाली बात यह भी है कि गैस की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर ऊर्वरक और बिजली की कीमतों पर पड़ता है. ऐसे में सरकार ने कीमतों के मोर्चे पर आरआईएल के सामने घुटने टेककर दोहरा नुकसान किया. भारत में ऊर्वरक पर काफी सब्‍सिडी दी जाती है. ऐसे में ऊर्वरक की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ता है. कैबिनेट सचिव रहे के.एम. चंद्रशेखर ने गैस की कीमत तय करने के लिए बनी मंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति (जीओएम) को 31 पन्ने की रिपोर्ट भेजी थी. इसे 2007 की जुलाई में सचिवों की समिति से चर्चा के बाद तैयार किया गया था. इसमें चंद्रशेखर ने कहा था कि गैस की कीमतों में प्रति यूनिट एक डॉलर की बढ़ोतरी से सरकार को सब्‍सिडी के मद में 2,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है. इसके बावजूद मंत्रिसमूह ने गैस की कीमतों को बढ़ाकर 4.2 डॉलर प्रति यूनिट कर दिया.

सच्चाई तो यह है कि सरकार ने डी-6 परियोजना के लिए संशोधित लागत प्रस्ताव को हरी झंडी देकर गैस की कीमतों में बढ़ोतरी का बंदोबस्त खुद ही कर दिया था. सेन ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में इस मसले को उठाते हुए लिखा, ‘गैस की कीमतें बढ़ने से आम लोगों को बिजली के लिए अधिक पैसा चुकाना पड़ेगा और ऊर्वरक पर सरकार को अधिक सब्‍सिडी देनी पड़ेगी.’ उन्होंने इस मामले में प्रधानमंत्री से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हुए यह सुनिश्‍चित करने का आग्रह किया कि ऊर्जा और ऊर्वरक क्षेत्र को सही कीमत पर गैस मिले.

एक तरफ तो देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के नाम पर कई गैरवाजिब शर्तों के साथ अमेरिका के साथ परमाणु समझौता किया गया लेकिन दूसरी तरफ इन जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाने वाली गैस परियोजनाओं में लूट को जारी रहने दिया गया. अगर केजी बेसिन डी-6 परियोजना की लागत कम होती तो बिजलीघरों को गैस सस्ती दर पर मिलती और आम उपभोक्ताओं के साथ-साथ उद्योगों को भी कम कीमत पर बिजली मिल पाती. इससे कहीं न कहीं देश के आर्थिक विकास की दर पर भी सकारात्मक असर पड़ता. पर अर्थशास्‍त्री प्रधानमंत्री को ये फायदे या तो दिखे नहीं या उन्होंने जानबूझकर इनकी अनदेखी की.

दरअसल, गैस के जरिए आरआईएल ने जिस तरह से प्रधानमंत्री या यों कहें कि केंद्र सरकार ने लूट मचाई है, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. 2जी स्पेक्ट्रम मामले में फंसे डीएमके कोटे के मंत्री ए. राजा को हटाने के मसले पर प्रधानमंत्री ने खबरिया चैनलों के संपादकों से मुलाकात में कह डाला था कि गठबंधन राजनीति की कुछ मजबूरियां होती हैं. इसी मामले में फंसे दूसरे मंत्री दयानिधि मारन के मसले पर भी प्रधानमंत्री का वही तर्क लागू होता है.

पर इस बार सवालों के घेरे में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री रहे मुरली देवड़ा आ गए हैं. देवड़ा खुद कांग्रेस पार्टी के हैं. इसलिए इस मामले में कार्रवाई करने के लिए गठबंधन की कोई मजबूरी भी नहीं है. इसके बावजूद मुरली देवड़ा के मामले में प्रधानमंत्री का मौन कहीं न कहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्‍ण आडवाणी की उस बात को साबित करता है कि मनमोहन सिंह अब तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं. अगर किसी सरकार का मुखिया अपने सहयोगी दलों के विवादास्पद मंत्रियों और यहां तक की अपने दल के विवादास्पद मंत्रियों पर भी कोई कार्रवाई न कर पाए तो यह स्वाभाविक है कि सवाल उसके नेतृत्व पर भी उठेंगे.

2जी से लेकर डी-6 गैस विवाद तक में प्रधानमंत्री की ओर से अपेक्षित कदम नहीं उठाया जाना इस बात की ओर भी इशारा करता है कि मंत्रिमंडल से लेकर पार्टी तक मनमोहन सिंह की पकड़ काफी ढीली है. सेन कहते हैं, ‘इस सरकार को कॉरपोरेट ताकतों ने बंधक बना लिया है और उन्हीं के हितों के पोषण के लिए यह सरकार काम कर रही है. हम इस मसले को संसद के मॉनसून सत्र में जोरशोर से उठाने जा रहे हैं. प्राकृतिक संसाधनों की लूट हर हाल में बंद होनी चाहिए.’

इस बीच खबर है कि कैग की ड्राफ्ट रिपोर्ट को आधार बनाकर सीबीआई ने इस मामले की जांच शुरू कर दी है. कहा जा रहा है  कि जल्द ही सीबीआई पूर्व डीजीएच वी.के. सिब्बल, पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारियों और इस मामले में संदेह के घेरे में आ रहे लोगों को तलब करने वाली है. जाहिर है कि इसमें आरआईएल के अधिकारी भी शामिल होंगे. सीबीआई से जो जानकारी मिल रही है उसके मुताबिक वह इन लोगों को तलब करने से पहले उस जवाब का इंतजार कर रही है जो तेल मंत्रालय द्वारा कैग की ड्राफ्ट रिपोर्ट में दिया जाना है.

सीबीआई ने वे तेल मंत्रालय और डीजीएच से वे सारे दस्तावेज मांगे हैं जिनके आधार पर डी-6 के संशोधित प्रस्ताव को मंजूरी दी गई. तेल मंत्रालय जवाब देने में जितना देर लगाएगी उतना ही समय कैग को अंतिम रिपोर्ट तैयार करने में लगेगा. कहा तो यह भी जा रहा है कि तेल मंत्रालय देरी इसलिए लगा रही है ताकि कैग की अंतिम रिपोर्ट संसद का सत्र चलने के दौरान न आ पाए ताकि सरकार की किरकिरी कम हो.

समझौते में ही खोट
आरआईएल और सरकार के बीच जो समझौता हुआ था उसमें यह तय हुआ था कि परियोजना का खर्च जब कंपनी निकाल लेगी तो उसके बाद होने वाली आमदनी में से सरकार को रॉयल्टी मिलेगी. कैग ने इस समझौते यानी पीएससी पर भी सवाल उठाए हैं. कैग ने कहा है, ‘अभी पीएससी का जो स्वरूप है उसे इस तरह से तैयार किया गया है कि निजी कंपनी की लागत जितनी अधिक होगी सरकार को मुनाफा उतना ही कम होगा. यह घटकर 5 से10 फीसदी तक भी पहुंच सकती है. जबकि अगर लागत कम से कम हो तो मुनाफे में सरकार की हिस्सेदारी बढ़कर 85 फीसदी भी हो सकती है.’ कैग ने आगे कहा, ‘भारतीय संदर्भ में स्‍थितियों को देखते हुए हम यह कहने को मजबूर हैं कि पीएससी का मौजूदा स्वरूप भारत सरकार के आर्थिक हितों के संरक्षण में सक्षम नहीं है. ज्यादातर मामलों में यह संभव ही नहीं है कि सरकार को अधिक मुनाफा दिलाने वाली स्‍थिति में परियोजना पहुंचे.’

पीएससी की खामियों को गिनाते हुए कैग ने ड्राफ्ट रिपोर्ट में कहा, ‘ऐसी परियोजनाओं के लिए बांगलादेश और भारत की पीएससी में एक प्रावधान को छोड़कर बाकी सब एक जैसे हैं. बांगलादेश की पीएससी के मुताबिक ऐसी परियोजनाओं में पांच लाख डॉलर से अधिक की खरीदारी पर प्रबंधन समिति की मंजूरी अनिवार्य है लेकिन भारत की पीएससी में ऐसा प्रावधान नहीं है. इससे ऐसी परियोजनाओं पर सरकार का नियंत्रण सीमित होता है.’ कैग ने पीएससी में बदलाव की भी सिफारिश की है.

कैग ने कहा है, ‘निजी कंपनियों अपने फायदे को देखते हुए निवेश करती हैं. इसलिए पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय और डीजीएच को अनिवार्य तौर पर भारत सरकार के आर्थिक हितों का ध्यान रखना चाहिए. भारत सरकार के आर्थिक हितों के संरक्षण के लिए प्रबंध समिति में शामिल सरकारी प्रतिनिधियों को जिम्मेदार माना जाना चाहिए.’ समिति में दो नुमाइंदे सरकार के होते हैं और दो कंपनी के. कैग ने सिफारिश की है, ‘डीजीएच को यह सुनिश्‍चित करने की व्यवस्‍था करनी होगी कि सभी नियमों का सही ढंग से पालन हो और अगर कोई उल्लंघन का दोषी पाया जाता है तो उस पर कानूनी कार्रवाई की जाए. डीजीएच को पीएससी की निगरानी के लिए व्यापक तंत्र विकसित करना चाहिए.’

ऑडिटिंग पर भी उठे सवाल
केजी बेसिन परियोजना में ऑडिटिंग के मोर्चे पर भी आरआईएल ने धांधली की. कैग की ड्राफ्ट रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख है. 12 जुलाई 2007 को आरआईएल ने ऑडिटिंग के लिए तीन कंपनियों से खर्च का ब्योरा (कोटेशन) मंगाया. ये कंपनियां हैं- प्राइसवाटरहाउस कूपर्स, एस.आर. बाटलीबोई ऐंड कंपनी और हरिभक्‍ति ऐंड कंपनी. 28 जुलाई 2007 कोटेशन देने की आखिरी तारीख थी. प्राइसवाटरहाउस ने 27 जुलाई 2007 को कंपनी को कोटेशन भेज भी दिया लेकिन आखिरी तारीख को अन्य दो कंपनियों के मौखिक अनुरोध पर आरआईएल ने कोटेशन देने की आखिरी तारीख दो हफ्ते के लिए बढ़ा दी.

बाद में हरिभक्‍ति ऐंड कंपनी को ऑडिटिंग का ठेका 20 लाख रुपये में मिल गया. इसमें से सिर्फ डी-6 की ऑडिटिंग के लिए 15 लाख रुपये इस कंपनी को दिए गए. कैग ने बताया कि ऑडिट करने वाली कंपनी के अर्हता तय करने का काम निविदा मंगाने के बाद किया गया. आरआईएल ने गलत ढंग से कोटेशन जमा करने की तारीख बढ़ाई. कैग ने इस काम में बड़ी गड़बड़ी को उजागर करते हुए कहा, ‘ऑडिटिंग कंपनियों द्वारा भेजी गई निविदाओं पर आरआईएल के जिस अधिकारी ने दस्तखत किए थे उसमें निविदा पाने की तारीख और निविदा खुलने की तारीख दर्ज नहीं थी.’

बताते चलें कि कैग ने यह रिपोर्ट 2006-07 और 2007-08 के दस्तावेजों के आधार पर तैयार की है. हालांकि, इसमें इस बात का भी उल्लेख है कि जांच के लिए आरआईएल ने कुछ दस्तावेज कैग को मुहैया नहीं कराए. इन्हीं समस्याओं से निपटने के लिए कैग ने 2010 में सरकार से यह अनुरोध किया था कि उसे कुछ और अधिकार दिए जाएं लेकिन अब तक सरकार ने इस प्रस्ताव पर कोई जवाब नहीं दिया है. मालूम हो‌ कि कैग अभी 1971 के ऑडिट एक्ट के आधार पर काम करती है.

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