मजबूरी के नाथ

हिमांशु शेखर

यह बात कम लोगों को ही मालूम है कि नितिन गडकरी को पहली दफा भाजपा अध्यक्ष बनवाने में पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की अहम भूमिका रही थी. 2009 में संघ ने दिल्ली के डी-4 यानी सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, वैंकैया नायडू और अनंत कुमार को पार्टी की कमान सौंपने से साफ तौर पर मना कर दिया था. उस वक्त जो नाम अंतिम तौर पर चले उनमें से गडकरी पर मुहर लगाने का काम आडवाणी ने ही किया था.

जब गडकरी पार्टी में आए तो उन्हें शुरुआत में ही इस डी-4 से कई मोर्चों पर मात खानी पड़ी थी. तब पार्टी की जो नई कार्यकारिणी बनी उसमें ऐसे लोगों को शामिल किया गया जो दिल्ली की राजनीति में पहले से स्थापित ‘राष्ट्रीय नेताओं’ के करीबी थे. इनमें से किसी का अपने-अपने राज्यों में कोई खास जनाधार नहीं था. यही एक ऐसी कमजोर कड़ी थी जिसे आधार बनाकर गडकरी ने इन लोगों से स्वतंत्र होकर निर्णय लेने की शुरुआत की. लेकिन गडकरी को नाकाम बनाने का जो खेल डी-4 और उनके कई भरोसेमंद कर रहे थे उसके बारे में आम धारणा यह रही कि इसे आडवाणी का संरक्षण प्राप्त है. धीरे-धीरे स्थिति इतनी बिगड़ती चली गई कि 2012 में मुंबई में हुई पार्टी कार्यकारिणी को बीच में ही छोड़कर आडवाणी और स्वराज दिल्ली वापस आ गए. मिला-जुला कर स्थिति यह हो गई कि कभी गडकरी के नाम पर मुहर लगाने वाले आडवाणी उनके खिलाफ खड़े हो गए.

इसके बावजूद गडकरी का रास्ता साफ माना जा रहा था क्योंकि उनके पक्ष में संघ खड़ा था. हालांकि, संघ में कुछ लोग गडकरी को दूसरा कार्यकाल देने को लेकर सवाल उठा रहे थे लेकिन जो लोग वहां फैसला करते हैं, वे गडकरी के साथ थे. गडकरी को दूसरा कार्यकाल देने की पूरी तैयारी हो गई थी. पार्टी के  संविधान में संशोधन करवा लिया गया था. आधे से अधिक राज्य इकाइयों के चुनाव करवा भी लिए गए थे. यहां तक कि जिस दिन गडकरी को दोबारा अध्यक्ष चुने जाने की औपचारिकता पूरी होनी थी उस दिन के लिए प्रदेश इकाइयों के पदाधिकारियों को दिल्ली भी बुला लिया गया था. गडकरी को बधाई देने वाले होर्डिंग तक तैयार हो गए थे.

इन तैयारियों के बीच अचानक टीवी चैनलों पर यह खबर चलने लगी कि गडकरी की पूर्ति समूह की कंपनियों पर आयकर के छापे पड़ रहे हैं. इसके बाद पार्टी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा और महेश जेठमलानी की वजह से यह माहौल बना कि यदि  जरूरत पड़ी तो इस पद के लिए चुनाव होगा. तेजी से बदलते इस घटनाक्रम के बीच जब इस संवाददाता ने पार्टी के एक सचिव से वस्तुस्थिति जाननी चाही तो उनका सीधा जवाब था, ‘नहीं-नहीं, कोई दिक्कत नहीं है. ये सब नाटक तो पहले भी हुए हैं. गडकरी का दोबारा अध्यक्ष बनना तय है. थोड़ी देर बाद रविशंकर प्रसाद प्रेस वार्ता करके स्थिति साफ करेंगे.’

लेकिन कुछ ही घंटों के अंदर मुंबई में एक अहम बैठक हुई जिसमें यह निर्णय ले लिया गया कि भाजपा अब आगे का सफर गडकरी के नेतृत्व में नहीं बल्कि राजनाथ सिंह के नेतृत्व में तय करेगी. मुंबई की बैठक में गडकरी, आडवाणी और संघ की तरफ से भैयाजी जोशी और सुरेश सोनी शामिल हुए. भाजपा में जो चर्चा चल रही है उसके मुताबिक इस बैठक की पृष्ठभूमि तैयार करने का काम पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने किया था. इस नेता का नाम भी आखिर तक अध्यक्ष पद के लिए चल रहा था. कहा जा रहा है कि पार्टी के इसी वरिष्ठ नेता ने भारत सरकार के एक मंत्री से बात करके यह सुनिश्चित करवाया कि चुनाव के ठीक एक दिन पहले गडकरी की कंपनियों तक आयकर अधिकारी पहुंचें. गडकरी को कमजोर करना या यों कहें कि विपक्षी दल की आपसी फूट का फायदा भला कौन सत्ताधारी दल नहीं उठाना चाहेगा! यह रहस्य तो बाद में खुला कि जिसे खबरिया चैनल आयकर का छापा बताकर प्रसारित कर रहे थे वह तो आयकर का सर्वेक्षण था. लेकिन इन तकनीकी बातों में न तो आडवाणी जाना चाहते थे और न ही संघ यह साहस दिखा पाया कि इन खबरों के बीच भी वह अपने फैसले पर कायम रहे.

मुंबई में जो बैठक हुई उसमें गडकरी ने इन तकनीकी बातों को उठाया और खुद को पाक-साफ बताया. लेकिन आडवाणी उनके नाम पर तैयार नहीं थे. यह फॉर्मूला भी सुझाया गया कि अभी गडकरी को अध्यक्ष बनने दिया जाए और कुछ दिनों के बाद गडकरी खुद यह कहते हुए इस्तीफा दे देंगे कि जब तक वे जांच में निर्दोष नहीं साबित हो जाते तब तक वे इस पद से दूर रहेंगे. ऐसे में पार्टी का कामकाज चलाने के लिए एक कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर लिया जाएगा. लेकिन आडवाणी के रवैये की वजह से कार्यकारी अध्यक्ष वाला फार्मूला आगे नहीं बढ़ पाया. आडवाणी बार-बार संघ के पदाधिकारियों को समझाते रहे कि अगर वे गडकरी पर अड़े रहे तो यशवंत सिन्हा चुनाव लड़ेंगे और इससे संघ और पार्टी की और अधिक किरकिरी होगी. आडवाणी यह संकेत भी दे रहे थे कि ऐसी स्थिति में उनके सामने यशवंत सिन्हा को समर्थन देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचेगा. इस स्थिति में संघ के पदाधिकारियों को इस बात के लिए तैयार होना पड़ा कि दूसरे विकल्पों पर विचार किया जाए.

आडवाणी जो नाम सबसे प्रमुखता से नए अध्यक्ष के तौर पर आगे कर रहे थे, जानकारों के मुताबिक भाजपा के उसी वरिष्ठ नेता पर गडकरी को शक था कि उन्होंने भारत सरकार के एक प्रमुख मंत्री से बात करके यह सब करवाया है. अब अड़ने की बारी गडकरी की थी. फिर तीन नाम अंतिम तौर पर विचार करने के लिए तय किए गए – मुरली मनोहर जोशी, वैंकैया नायडू और राजनाथ सिंह. इनमें से वैंकैया नायडू तो डी-4 की वजह से बाहर हो गए. जोशी पर भी संघ का वही उम्र वाला फाॅर्मूला लागू होता है जिसे आधार बनाकर आडवाणी को सलाहकार की भूमिका में सीमित कर दिया गया है. इसके बाद राजनाथ सिंह का नाम गडकरी ने प्रस्तावित किया और सुरेश सोनी और भैयाजी जोशी सहमत हो गए. मजबूरी में आडवाणी को भी तैयार होना पड़ा.

अगले दिन राजनाथ सिंह को औपचारिक तौर पर एक बार फिर से पार्टी की कमान सौंप दी गई. इसी दिन गडकरी के दिल्ली के आवास पर लोगों की भारी भीड़ लगी. इन लोगों में कई अलग-अलग राज्यों से आए हुए लोग थे. संदेश साफ था कि भाजपा नेताओं को मालूम है कि गडकरी संघ के नुमाइंदे हैं और भले ही वे अध्यक्ष नहीं बन पाए हों लेकिन उन्हें चुका हुआ नहीं माना जा सकता. यह चर्चा भी चलने लगी कि क्लीन चिट मिलते ही गडकरी की वापसी बतौर अध्यक्ष एक बार फिर से हो सकती है क्योंकि राजनाथ सिंह की पहचान एक ऐसे नेता की नहीं है जो संघ की तरफ से मिलने वाले निर्देशों की अनदेखी कर दे.

अब सवाल यह उठता है कि क्या राजनाथ सिंह पार्टी को केंद्र की सत्ता में वापस लाने में मददगार साबित होंगे. जिस दिन राजनाथ सिंह को अध्यक्ष बनाया गया, उस दिन की टीवी रिपोर्टिंग को अगर किसी ने देखा हो तो उसे याद होगा कि खबरिया चैनलों के तमाम पत्रकार राजनाथ सिंह की तमाम खूबियों को गिनाते हुए यह बताने में लगे थे भाजपा ने कितना बड़ा मास्टर स्ट्रोक खेला है. अंग्रेजी की एक बड़ी पत्रकार ने तो उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार भी बता दिया. कोई राजनाथ को गठबंधन की राजनीति का महारथी बता रहा था तो कोई उन्हें कुशल प्रशासक बताते हुए उत्तर प्रदेश के उनके मुख्यमंत्रित्व काल के किस्से सुना रहा था. लेकिन कोई यह सवाल नहीं उठा रहा था कि अगर राजनाथ सिंह इतने ही योग्य थे तो उन्हें 2009 में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाया क्यों गया था.

इसी सवाल के जरिए अगर राजनाथ सिंह के प्रदर्शन को समझने की कोशिश करें तो उनकी क्षमताओं का अंदाजा लगता है. इससे धुंधली ही सही लेकिन एक तस्वीर उभरती है कि आगे वे कितने प्रभावी साबित होंगे. 2004 में भाजपा की हार के बाद आडवाणी पार्टी अध्यक्ष बने थे. लेकिन पाकिस्तान में मुहम्मद अली जिन्ना की मजार पर उन्होंने जो बातें कहीं उसने वक्त से पहले ही अध्यक्ष पद से उनकी विदाई करवा दी. उस वक्त वाजपेयी भी सक्रिय थे और प्रमोद महाजन पार्टी में एक बड़ी ताकत थे. परिस्थितियां ऐसी बनीं कि संघ को भी अपने हिसाब का एक आदमी चाहिए था और महाजन को भी एक ऐसा व्यक्ति चाहिए था जो उनके लिए खतरा न बन सके. राजनाथ सिंह दोनों पक्षों को मुफीद लगे. इसके छह महीने के अंदर ही प्रमोद महाजन की असमय मौत हो गई और राजनाथ सिंह का कद बड़ा लगने लगा.

बतौर भाजपा अध्यक्ष अगर राजनाथ सिंह का पहला कार्यकाल देखें तो पता चलता है कि वे कामयाबी के आस-पास भी नहीं रहे. उनके समय में सक्षम नेताओं का पार्टी छोड़ने का सिलसिला काफी तेज हुआ. झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने पार्टी छोड़ी. उस वक्त उन्होंने जो पत्र सार्वजनिक किया उससे पता चला कि राजनाथ सिंह ने उन्हें किस तरह से परेशान किया. राजनाथ के पहले कार्यकाल में पार्टी में झगड़ा और गुटबाजी सतह पर दिखने लगी. यह साफ-साफ दिखने लगा कि फलां नेता इस खेमे का है तो फलां नेता उस खेमे का है. 2007 में जब राजस्थान में विधानसभा चुनाव हुए तो उसमें जिन उम्मीदवारों को वहां की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने टिकट दिए उनमें से ज्यादातर जीते लेकिन जिन लोगों को टिकट राजनाथ सिंह ने दिए उनमें से ज्यादातर को हार का मुंह देखना पड़ा. उस वक्त तो भाजपा में लोग यह भी कह रहे थे कि स्वभाव से अंधविश्वासी राजनाथ सिंह ने हर वैसा काम किया जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि वसुंधरा राजे की सरकार दोबारा राजस्थान में नहीं बने. राजनाथ सिंह ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पार्टी के दो महत्वपूर्ण पदों से हटाकर उनके भी पर कतरने की भरसक कोशिश की. उनके ही समय में पार्टी का बीजू जनता दल के साथ लंबे समय से चला आ रहा गठबंधन भी टूट गया.

अगर चुनावी नतीजों को ही आधार बनाएं तो उस मामले में भी राजनाथ सिंह अपने पहले कार्यकाल में नाकामयाब ही साबित हुए हैं. उनके अध्यक्ष रहते उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव 2007 में हुए. इसमें पार्टी के विधायकों की संख्या 88 से घटकर 51 रह गई. इससे पहले 2002 में जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हुए थे तो उस वक्त राजनाथ सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. लेकिन उनके नेतृत्व में लड़े गए चुनाव में भाजपा 176 से सिमटकर 88 सीटों पर पहुंच गई थी. 2009 में भाजपा ने लोकसभा चुनाव राजनाथ सिंह के नेतृत्व में लड़ा, लेकिन इसमें भी पार्टी की सीटों की संख्या 2004 के 138 के मुकाबले घटकर 116 रह गई. राजनाथ की अगुवाई में लड़े गए 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का मत प्रतिशत 2004 के 22.16 प्रतिशत के मुकाबले घटकर 18.80 प्रतिशत रह गया था.

चुनावी राजनीति और संगठन चलाने के मोर्चे पर राजनाथ की नाकामी ने ही 2009 में उनकी विदाई करवाई थी, लेकिन किसी नए को अवसर देने के बजाय अपने एक नाकाम मोहरे को दोबारा मौका देकर भाजपा और संघ ने यह साबित किया है कि या तो उसके पास विकल्प नहीं है या फिर वे विकल्पों पर गौर नहीं करना चाहते. ऐसे में अगर कांग्रेसी नेता राजनाथ के अध्यक्ष बनने पर खुशी जाहिर करते हुए यह सोच रहे हैं कि अब एक बार फिर से कांग्रेस सत्ता में वापस आ जाएगी तो इसे उनका अतिआत्मविश्वास नहीं कहा जा सकता. सियासी गलियारों में इस बात से हर कोई वाकिफ है कि अपनी गाजियाबाद सीट निकालने के लिए राजनाथ सिंह ने पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वैसे भाजपा उम्मीदवारों को खड़ा किया जिनसे चौधरी अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल के उम्मीदवारों को किसी तरह की मुश्किल न हो. यही वजह है कि भाजपा और भाजपा के बाहर राजनाथ सिंह को अवसरवाद की राजनीति का धुरंधर माना जाता है.

राजनीति में राजनाथ के उभार का श्रेय काफी हद तक कल्याण सिंह को जाता है. कल्याण सिंह जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे उस वक्त उन्होंने ही अपने मंत्रिमंडल में राजनाथ सिंह को मंत्री बनाया था. 1991 में मुख्यमंत्री बनते ही कल्याण सिंह अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ अयोध्या गए थे, और वहां जाकर यह वादा किया था कि राम मंदिर यहीं बनाएंगे तो जो लोग वहां गए थे उनमें राजनाथ सिंह भी शामिल थे. वे उस वक्त शिक्षा मंत्री थे. लेकिन जब वे प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और फिर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष तो अपने उस वादे को भूल गए जिस पर सवार होकर उन्होंने सियासत में अपनी लंबी पारी की बुनियाद रखी थी. 1991 में वे शिक्षा मंत्री बनाए गए थे लेकिन मंत्री रहते हुए भी वे 1993 में लखनऊ की मोहना सीट से चुनाव नहीं जीत पाए. लेकिन संघ के हर बड़े पदाधिकारी के लखनऊ दौरे से संबंधित हर छोटी-बड़ी सुविधाओं का खयाल रखने वाले राजनाथ ने संघ के पदाधिकारियों से ऐसे संबंध बनाए कि 1994 में उन्हें राज्यसभा भेज दिया गया. उस समय उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहे लोग बताते हैं कि संघ के पदाधिकारियों को रेलवे स्टेशन से लाने से लेकर उन्हें हर जगह ले जाने और फिर वापस छोड़ने तक का काम राजनाथ सिंह खुद किया करते थे. जब राजनाथ सिंह दिल्ली आए तो उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु कल्याण सिंह के खिलाफ केंद्रीय नेतृत्व को भड़काना शुरू किया. उस वक्त प्रदेश अध्यक्ष कलराज मिश्र थे और कल्याण सिंह के साथ उनकी बन नहीं रही थी. ऐसे में 1997 में राजनाथ सिंह को प्रदेश भाजपा की कमान सौंप दी गई.

राजनाथ सिंह के साथ उस वक्त भाजपा में काम कर रहे एक नेता कहते हैं, ‘1999 में जब कल्याण सिंह को हटाकर रामप्रकाश गुप्त को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया तो उनके बारे में भी राजनाथ सिंह ने यह प्रचारित करना शुरू कर दिया कि वे अपने अधिकारियों और सहयोगियों का ही नाम भूल जाते हैं.’ संघ ने भी राजनाथ का समर्थन किया और 2000 में उन्हें प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया गया. इसके बाद से उत्तर प्रदेश में भाजपा चुनाव दर चुनाव नीचे जा रही है. राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में राजनाथ के पहले कार्यकाल में भी कुछ ऐसा ही हुआ था. इस बार क्या वे जो अब तक जाने-अनजाने कर चुके हैं उससे कुछ अलग करेंगे? इस सवाल का जवाब कोई साफ हां में देता नहीं दिखाई देता.

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