मगध में बदलाव की बयार

हिमांशु शेखर
वैसे तो बिहार के कई जिले नक्सल समस्या से जूझ रहे हैं लेकिन मगध क्षेत्र के जिलों में नक्सलियों का खासा दबदबा रहा है। मगध क्षेत्र के भी तीन जिलों गया, औरंगाबाद और जहानाबाद में नक्सल समस्या की वजह से विकास कार्य बुरी तरह प्रभावित रहा है। जब 2005 में बिहार में नई सरकार सत्ता में आई तो इस क्षेत्र के लोगों को उम्मीद जगी कि उन्हें इस समस्या से मुक्ति मिलेगी और इस क्षेत्र में भी विकास की बयार बहेगी। अब जब नीतीश कुमार की सरकार के चार साल पूरे होने वाले हैं तो इस बारे में दो तरह की राय आ रही है। प्रशासन का कहना है कि विकास की गाड़ी पटरी पर आ गई है लेकिन इस क्षेत्र में सरकारी परियोजनाओं को अंजाम देने वाले ठेकेदारों का कहना है कि स्थितियां बदली जरूर हैं लेकिन पूरी तरह नहीं।
दरअसल, इस क्षेत्र के विकास में सबसे बड़ी दिक्कत सरकारी परियोजनाओं के कार्यान्वयन में नक्सली द्वारा रोड़ा अटकाया जाना रहा है। इसके अलावा इस क्षेत्र की विकास योजनाओं को अंजाम देने वाले ठेकेदारों से नक्सली लेवी भी वसूलते रहे हैं। कुछ साल पहले तक लेवी नहीं दिए जाने पर ठेकेदारों की हत्या और उन्हें अगवा कर लेने की खबरें बेहद आम थीं। अब स्थितियां सुधरी जरूर हैं लेकिन अभी भी माहौल पूरी तरह से भयमुक्त नहीं है। नक्सलियों द्वारा लेवी वसूले जाने के सवाल पर गया से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर सांसद बने हरी मांझी ने बताया कि नक्सलियों द्वारा कम से कम शहरी क्षेत्र की परियोजनाओं पर काम कर रहे ठेकेदारों से तो लेवी नहीं ही वसूली जा रही है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों से अभी भी लेवी वसूलने की कुछ शिकायतें आ रही हैं। उल्लेखनीय है कि उनकी ही पार्टी की गठबंधन सरकार बिहार में पिछले 4 साल से राज कर रही है लेकिन इसके बावजूद वे नक्सलियों द्वारा मनमानी करने को सरकारी नाकामी का परिणाम नहीं मानते हैं। वे कहते हैं कि सरकार इन शिकायतों को काफी गंभीरता से लेती है और इसी का नतीजा है कि अब ऐसी घटनाएं बहुत कम हो रही हैं।
नक्सलियों द्वारा सरकारी योजनाओं में रोड़े नहीं अटाकाए जाएं, इस बात को सुनिश्चित करने के लिए इस क्षेत्र की प्रशासनिक व्यवस्था भी प्रयासरत है। इस बारे में गया के जिलाधिकारी संजय कुमार सिंह ने बताया कि सरकारी एजेंसियां विकास कार्यों पर नजर रख रही हैं और जहां से भी कुछ शिकायतें आ रही हैं, हम उसका समाधान तुरंत कर रहे हैं। वैसे पिछले कुछ दिनों में ऐसी शिकायतें बहुत कम आ रही हैं। उन्होंने कहा कि जहां तक सवाल ग्रामीण इलाकों में नक्सलियों द्वारा लेवी वसूले जाने की हैं तो सरकारी एजेंसियों की गांव-गांव तक पहुंच, प्रशासनिक चुस्ती और विकास योजनाओं में स्थानीय लोगों की भागीदारी से अब इस तरह की शिकायतें नहीं के बराबर आ रही हैं। आखिरी शिकायत आज के आठ-नौ महीने पहले मिली थी। कुछ ऐसी ही बात जहानाबाद की जिलाधिकारी पलका साहनी करती हैं। उल्लेखनीय है कि यह जिला नक्सलियों का गढ़ रहा है। पलका साहनी ने बताया कि नक्सलियों द्वारा लेवी वसूलने की शिकायतें अब नहीं आ रही हैं। इसके लिए वे प्रशासनिक स्तर पर अपनाई जा रही विकास आधारित रणनीति को जिम्मेवार मानती हैं। उनका कहना है कि यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि प्रशासन की पहुंच गांव-गांव तक हो। ऐसा करने से व्यवस्था के प्रति लोगों के मन में विश्वास बढ़ रहा है और वे विकास कार्यों में दिलचस्पी ले रहे हैं और नक्सल समस्या खुद-ब-खुद हाशिए पर जा रही है।
वैसे सरकारी योजनाओं को कागज से जमीन पर उतारने का काम ठेकेदार करते हैं। गया में कई सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में लगे ठेकेदार प्रमोद सिंह ने कहा कि पिछले तीन साल से कम से कम मुझसे तो किसी ने कोई लेवी नहीं मांगा। हां, पहले जरूर इस तरह की घटनाएं होती थीं। हालांकि, ग्रामीण इलाकों की स्थिति के बारे में उन्होंने कहा कि अभी भी लेवी वसूले जाने की शिकायत कुछ ठेकेदार करते हैं। प्रशासनिक सहयोग की बाबत पूछे जाने पर वे कहते हैं कि प्रशासन की तरफ से ठेकेदारों को योजनाओं को समय पर पूरा करने के लिए भरपूर सहयोग मिल रहा है। गया से सटे औरंगाबाद में भी नक्सलियों का खौफ कम नहीं रहा है। यहां की स्थिति के बारे में सड़क निर्माण योजनाओं को अंजाम दे रहे एक ठेकेदार ने बताया कि यह बात सच है कि नक्सलियों द्वारा लेवी वसूले जाने की घटनाओं में कमी आई है लेकिन यह कह देना सही नहीं होगा कि यह पूरी तरह से खत्म हो गया है। उन्होंने कहा कि मोबाइल टावरों को उड़ाए जाने की घटना से अंदाजा लगाया जा सकता है कि नक्सली अभी भी इस क्षेत्र में प्रभावी हैं। हांलांकि, वे भी इस बात को मानते हैं कि अब स्थितियां बदल रही हैं और विकास योजनाओं को गति मिल रही है।

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