मंसूबे और मुश्किलें

हिमांशु शेखर

12वीं पचवर्षीय योजना बनकर तैयार है। राष्ट्रीय विकास परिषद ;एनडीसीद्ध से मंजूरी मिलने के बाद अब संसद से इसे मंजूरी दिलाने की औपचारिकता भर बची है। यह योजना बनी तो है 2012 से 2017 के लिए लेकिन लागू हो रही है साल भर की देरी से। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि इसे संसद से मंजूरी दिलाना बस औपचारिकता मात्र है। क्योंकि इसके मसौदे के आधार पर ही विभिन्न मंत्रालय अपनी योजनाएं बना रहे हैं और इस साल का बजट भी इसे आधार बनाकर ही तैयार किया जा रहा है। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि देश के विकास के खातिर पांच साल के लिए जो रणनीति बनाई गई है, वह कैसी है। साथ ही यह जानना भी आवश्यक है कि पिछली पंचवर्षीय योजना यानी 11वीं योजना कितनी सफल साबित हुई और इसमें कहां-कहां कमी रह गई।

इस पंचवर्षीय योजना में सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि विकास दर को कैसे बनाए रखा जाए। 2008-09 की मंदी से उबरने की कोशिशों के बावजूद अब भी दुनिया के बड़े देशों की अर्थव्यवस्था का हाल बुरा है। शुरुआत में तो भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं ने तो नकारात्मक वैश्विक आर्थिक परिदृश्य की मार को झेल लिया लेकिन आउटसोर्सिंग से मिलने वाले काम और निर्यात ऑर्डरों पर टिकी भारतीय अर्थव्यस्था अब मुश्किलों का सामना कर रही है। ऐसे में नौ फीसदी की विकास दर को हासिल करने वाले भारत के लिए अब पांच फीसदी की विकास दर बनाए रखना भी मुश्किल हो गया है। खुद भारत सरकार ने चालू वित्त वर्ष यानी 2012-13 के लिए विकास दर के अनुमान को घटाकर पांच फीसदी कर दिया है। इतने नकारात्मक माहौल में लागू हो रही पंचवर्षीय योजना में 8.2 फीसदी की औसत विकास दर हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है।

जब 12वीं पंचवर्षीय योजना तैयार करने के लिए काम शुरू हुआ था तो उस वक्त देश की अर्थव्यवस्था नौ फीसदी की दर से आगे बढ़ रही थी। उसी उत्साहजनक माहौल में योजना आयोग इसे बढ़ाकर 10 फीसदी तक ले जाने की बात कर रहा था। लेकिन अब आठ फीसदी का लक्ष्य हासिल करना भी मुश्किल लग रहा है। 11 वीं पंचवर्षीय योजना में औसतन नौ फीसदी की विकास दर हासिल करने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन इस दौरान देश की अर्थव्यवस्था की विकास दर रही 7.9 फीसदी। ऐसे में कई जानकार 12वीं पंचवर्षीय योजना के लिए 8.2 फीसदी के विकास दर के लक्ष्य को भी अव्यावहारिक मान रहे हैं।

इसका सीधा सा गणित यह है कि अगर चालू वित्त वर्ष में विकास दर पांच फीसदी रहती है तो अगले चार साल में औसतन 9 फीसदी की विकास दर हासिल करनी होगी तब जाकर 8.2 पQीसदी का लक्ष्य हासिल किया जा सकेगा। लेकिन पांच फीसदी का विकास दर हासिल करने को जूझ रही अर्थव्यवस्था से कोई भी जानकार यह उम्मीद लगाने को तैयार नहीं है अगले चार सालों में इसमें इतनी तेजी आ जाएगी।
योजना से संबंधित दस्तावेजों को पढ़ने से यह पता चलता है कि सरकार को इस बात का अंदेशा यह है कि 8.2 फीसदी का विकास दर हासिल करना भी मुश्किल हो सकता है। इसलिए मसौदे में साफ तौर पर यह लिखा गया है, ‘हमारा जोर सिर्फ जीडीपी के विकास पर नहीं होना चाहिए। बल्कि हमारी कोशिश एक ऐसे विकास प्रक्रिया को हासिल करने की होनी चाहिए जिसमें समावेशी विकास हो। यानी विकास का लाभ हर किसी को मिले। उदाहरण के लिए अगर खेती में तेजी से विकास होता है और खास तौर पर उन इलाकों में जहां बारिश कम होती है तो यह जीडीपी के उस विकास की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी होगा जो निर्यात के लिए होने वाले खनन पर आधारित है।’ कल तक इसी सरकार के नीति निर्धारक जीडीपी के आंकड़े गिनाते हुए नहीं अघाते थे और महंगाई की समस्या को भी जीडीपी के आंकड़ों से ढंकने की कोशिश करते थे। अब जब यह लग रहा है कि विकास दर को बनाए रखना मुश्किल है तो समावेशी विकास का हवाला देकर नीतिगत खामियों और अपनी गलतियों को छुपाने की तैयारी अभी से शुरू हो गई है।

योजना दस्तावेज में इसका संकेत एक जगह और मिलता है। यहां लिखा गया है, ‘हमारी अर्थव्यवस्था में नौ पQीसदी की विकास दर हासिल करने की क्षमता है। लेकिन यह लक्ष्य चरणबद्ध तरीके से ही हासिल किया जा सकता है। क्योंकि हमारी योजना काल के शुरुआत के ढाई साल में वैश्विक अर्थव्यवस्था के कमजोर बने रहने की आशंका है। इस बात को ध्यान में रखते हुए हमें कोशिश यह करनी चाहिए कि योजना के आखिरी दो साल में नौ फीसदी का विकास दर हासिल किया जाए। तब जाकर 8.2 फीसदी का औसत विकास दर हासिल किया जा सकेगा। लेकिन यह लक्ष्य हासिल करना कई बातों पर निर्भर करेगा। इनमें सबसे अहम है वैश्विक अर्थव्यवस्था का हाल।’ तहलका से बातचीत में क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री धर्मकीर्ति जोशी कहते हैं, ‘सवाल यह उठता है कि यह दर आखिर कैसे हासिल किया जाए? क्योंकि औद्योगिक विकास की हालत चिंता में डालने वाली है। इस विकास दर को हासिल करने के लिए बुनियादी ढांचे पर निवेश बढ़ाना होगा। ऐसा नहीं करने पर न तो हम यह विकास दर हासिल कर पाएंगे और न ही रोजगार के अवसर पैदा होंगे।’ वे आगे कहते हैं, ‘विकास दर हासिल करने के लिए निवेश के माहौल को भी सुधारना होगा। कई वजहों से निवेश के माहौल में स्थिरता नहीं रह पा रही है। इस मोर्चे पर सुधार के उपाय करने होंगे।’

बहरहाल, यहां यह समझना जरूरी है कि अगर विकास दर में कमी आती है तो अलग-अलग क्षेत्रों के लिए विकास के जो लक्ष्य रखे गए हैं उन पर नकारात्मक असर पड़ेगा। क्योंकि विकास दर घटने के बाद इन क्षेत्रों के लिए प्रस्तावित आवंटन में कमी आएगी। सरकार ने योजना के मसौदे में यह दावा किया है कि योजना तैयार करने की प्रक्रिया में 900 से अधिक सिविल सोसाइटी संगठनों से विचार-विमर्श किया गया। लेकिन अगर आम लोगों से संबंधित क्षेत्रों को लेकर योजना में अपनाए गए रवैये को देखा जाए तो यह पता चलता है कि सरकार ने फैसले एकतरफा किए हैं।

कृषि के लिए 12वीं पंचवर्षीय योजना में चार फीसदी का विकास दर हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन योजना के पहले साल यानी 2012-13 में इसके 1.8 फीसदी पर रहने का अनुमान खुद सरकारी एजेंसियां लगा रही हैं। यह दर 2011-12 के 3.6 फीसदी की तुलना में आधी है। 11वीं पंचवर्षीय योजना में भी कृषि क्षेत्र के लिए चार फीसदी की विकास दर का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन इस दौरान किसानी की विकास दर रही 3.3 फीसदी। कृषि को महंगाई से जोड़कर देखने की वकालत करते हुए जोशी कहते हैं, ‘महंगाई और कृषि देश के लिए सबसे बड़ी चिंता है। 12वीं पंचवर्षीय योजना में इन दोनों मसलों पर खास ध्यान दिया जाना चाहिए। महंगाई रोकने के लिए जरूरी उपाय करने चाहिए। क्योंकि खाने-पीने की चीजों की बढ़ती महंगाई से पूरे आर्थिक माहौल पर नकारात्मक असर पड़ता है और कई मोर्चे पर गड़बड़ियां शुरू हो जाती हैं। वहीं कृषि क्षेत्र में देखा जाए तो उत्पादन में बढ़ोतरी नहीं हो रही है। इसे बढ़ाने के लिए जरूरी उपाय किए जाने चाहिए। खेती की लागत बढ़ती जा रही है लेकिन आमदनी नहीं बढ़ रही है। 12वीं पंचवर्षीय योजना में इस ओर सरकार को खास तौर पर ध्यान देना चाहिए।’

अब बात शिक्षा की। सरकार दावा करती है कि आज जीडीपी का चार फीसदी शिक्षा पर खर्च हो रहा है। इसके बावजूद अगर शिक्षा क्षेत्र से संबंधित आंकड़ो को देखा जाए तो एक नकारात्मक तस्वीर स्पष्ट तौर पर उभरकर सामने आती है। आजादी के साठ साल से अधिक का वक्त गुजरने के बावजूद आज भी भारत का एक बच्चा औसतन 5.12 साल की ही स्कूली शिक्षा हासिल कर पा रहा है। यह विकासशील देशों के सामूहिक 7.09 फीसदी के औसत से भी काफी कम है। जिस चीन से मुकाबला करने की बात आज हर मंच पर होती है वहां के बच्चे औसतन 8.17 साल की स्कूली शिक्षा हासिल कर रहे हैं। औसत स्कूली शिक्षा के मामले में भारत की बुरी हालत का सीधा मतलब यह है कि जो बच्चे देश की शिक्षा व्यवस्था में शामिल हो भी रहे हैं, वे भी बहुत जल्दी इस व्यवस्था से निकल जा रहे हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि शिक्षा के मामले में देश की हालत क्या है। इस समस्या से निपटने के लिए योजना दस्तावेजों में यह कहा गया है कि दाखिला सुनिश्चित करने और इसके बाद बच्चों का स्कूल नहीं छोड़ना सुनिश्चित करने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएंगे। लेकिन इसके लिए स्पष्ट रणनीति का अभाव साफ तौर पर योजना दस्तावेजों में दिखता है। योजना दस्तावेज से यह लगता है कि सरकार यह लक्ष्य सर्व शिक्षा अभियान और शिक्षा के अधिकार के जरिए हासिल करना चाहती है। लेकिन इन दोनों योजनाओं के क्रियान्वयन में अब तक जिस तरह से हीलाहवाली बरती गई है उससे इस लक्ष्य को हासिल करने को लेकर भी संदेह पैदा होता है।

जहां तक सवाल उच्च शिक्षा का है तो योजना बनाने वाले इस बात को लेकर बड़े चिंतित दिखते हैं कि दुनिया के चोटी के 200 विश्वविद्यालयों में भारत के किसी एक विश्वविद्यालय को भी जगह नहीं मिल पाई। इसलिए योजना बनाने वालों ने यह लक्ष्य रखा है कि 12वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक इस सूची में भारत के पांच विश्वविद्यालय होने चाहिए। इसके लिए सरकार की योजना यह है कि देश के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की पहचान की जाए और फिर उन्हें हरसंभव मदद देकर विश्वस्तरीय बनाया जाए। विश्वविद्यालयों को विश्वस्तरीय बनाने की मकसद से सरकार ने एक ऐसी योजना शुरू करने का मन बनाया है जिसके तहत दुनिया के प्रमुख विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के अस्थाई तौर पर भारत के विश्वविद्यालयों में बुलाया जाएगा। इसके अलावा सरकार ने उच्च शैक्षणिक संस्थानों के सीटों में 20 लाख की बढ़ोतरी करने की भी योजना बनाई है। जाहिर है कि इससे छात्रों को काफी फायदा होगा लेकिन जितनी तेजी से आबादी बढ़ रही है, उसे देखते हुए यह कदम ऊंट के मुंह के जीरा के समान ही लगता है। इस क्षेत्र के जानकार यह मानते हैं कि इस समस्या का समाधान तो बड़ी संख्या में स्तरीय उच्च शैक्षणिक संस्थान खोलकर ही किया जा सकता है।

देश के आम लोगों की जिंदगी की औसत मियाद अभी 67 साल है। यह कई देशों की तुलना में काफी कम है। भारत इस मामले में 136 वें स्थान पर है। यहां तक की नेपाल, बांगलादेश और श्रीलंका जैसे भारत के पड़ोसी भी इस मामले में भारत से अच्छी स्थिति में हैं। इसके बावजूद अगर कोई योजना दस्तावेजों में इस बुरी स्थिति को इस ढंग से पेश किया गया है कि पढ़ने वाले को एकबारगी यह लगेगा कि देश ने वाकई कितनी तरक्की की है। इसमें लिखा गया है, ‘जब देश आजाद हुआ था तो उस वक्त लोग औसतन 32 साल की उम्र तक जी पाते थे। लेकिन अब यह बढ़कर 67 साल हो गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो आजादी के वक्त एक आम भारतीय जितने साल जिंदगी जीने की उम्मीद कर सकता था अब वह उसकी तुलना में दोगुना जिंदगी जीने की उम्मीद पाल सकता है! हालांकि, अब भी यह कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कम है। इसलिए यह जरूरी है कि इसके लिए ठोस रणनीति बनाई जाए।’देश के आजाद होने के 66 साल बाद भी अगर इतना बुरा हाल हो और देश के नीति निर्धारक इसे अपने ढंग से तोड़मरोड़कर इसे कामयाबी के तौर पर पेश कर रहे हों तो फिर इन योजनाओं से भरोसा उठना स्वाभाविक ही है।

12वीं पंचवर्षीय योजना में शिशु मृत्यु दर को घटाकर 28 पर लाने का लक्ष्य रखा गया है। अभी यह 47 है। इसका मतलब यह हुआ कि देश में जो भी हजार बच्चे पैदा होते हैं उनमें से 47 नहीं बच पाते। वहीं मातृत्व मृत्यु दर के मामले में अभी हालत यह है कि बच्चे को जन्म देने वाली 1000 महिलाओं में से चार को मौत का मुंह देखना पड़ रहा है। सरकार ने पंचवर्षीय योजना के अंत तक इस संख्या को चार से घटाकर एक पर लाने का लक्ष्य रखा है। यूनिसेफ की मानें तो गर्भावस्था या फिर बच्चे को जन्म देने के दौरान हर साल भारत में 1.3 लाख महिलाएं काल के गाल में समा जा रही हैं। भारत ने सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों के तहत यह वादा किया था कि वह 2015 तक इस संख्या को घटाकर हजार में एक तक ले आएगा लेकिन अब यूनिसेफ कह रही है कि भारत के लिए इस लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल है। क्योंकि 2015 में अब सिर्फ दो साल का ही वक्त बचा है। योजना दस्तावेजों में इस मामले में महत्वकांक्षी लक्ष्य तो रखा गया है लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कोई ठोस रणनीति नहीं दिखती है।

12वीं पंचवर्षीय योजना के हजार पन्नों से अधिक के दस्तावेज में कई पन्नों में पर्यावरण की समस्या और इससे पैदा होने वाले खतरों की बात की गई है। यह विस्तार से समझाया गया है कि पर्यावरण की सेहत सुधारे बगैर टिकाऊ विकास हासिल करना मुश्किल है। लेकिन अगर कोई यह जानना चाहे कि सरकार पर्यावरण की सेहत सुधारने की के लिए क्या रणनीति अपनाने वाली है तो योजना दस्तावेजों में उसे कोई स्पष्ट रणनीति नहीं दिखेगी। समस्या के विभिन्न पक्षों को तो समझाया गया है लेकिन जहां समाधान की बात आती है तो दस्तावेज में नीति निर्धारक यह कहकर निकल जाते हैं कि नीतियों के क्रियान्वयन में इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि कार्बन उत्सर्जन में कमी आए। लेकिन यह काम कैसे होगा, इस बात को लेकर यह दस्तावेज चुप है। हालांकि, योजना के दौरान हर साल हरित पट्टी में दस लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी करने का लक्ष्य जरूर रखा गया है।

इसके अलावा अगली पंचवर्षीय योजना में सबसे ज्यादा परेशानी रोजगार सृजन के लिए किए जाने वाले उपाय पर होने की उम्मीद है। इस मोर्चे पर पूरी दुनिया परेशान है। पर भारत के लिए अच्छी बात यह है कि यहां अब भी कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां विकास को गति देकर रोजगार के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं। लघु एवं मझोले उद्यमों के विकास पर खास ध्यान नहीं दिया गया। अभी हालत यह है कि देश में महज आठ फीसदी लोगों को ही संगठित क्षेत्रों में काम मिला हुआ है और 92 पQीसदी लोग असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे हैं। ठेके पर काम करने वाले मजदूरों की संख्या बढ़ी है। हालांकि, सरकार ने 12वीं योजना में कृषि क्षेत्र के अलावा पांच करोड़ नए रोजगार के सृजन का लक्ष्य रखा है। इसका मतलब यह हुआ कि हर साल एक करोड़ नए रोजगार। अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालत और सरकारी नीतियों के अब तक के अनुभव के आधार पर यह लक्ष्य भी अव्यावहारिक ही मालूम पड़ता है। धर्मकीर्ति जोशी कहते हैं, ‘रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए रोजगार गारंटी योजना जैसे उपाय लंबी अवधि में बहुत कारगर नहीं साबित होने जा रहे हैं। इसके बजाए सरकार को बेरोजगारों और खास तौर पर युवाओं को जरूरी प्रशिक्षण देने का ढांचा विकसित करना चाहिए। ताकि उनके अंदर खास योग्यता पैदा हो और वे खुद रोजगार हासिल कर सकें।’

12वीं पंचवर्षीय योजना में बिजली उत्पादन क्षमता में 88,000 मेगावाॅट बढ़ोतरी करने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन 11वीं पंचवर्षीय योजना में सरकार के प्रदर्शन को देखते हुए इस लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल लगता है। 78,7000 मेगावाॅट के लक्ष्य के मुकाबले 11वीं योजना में सरकार बिजली उत्पादन क्षमता में 54,964 मेगावाॅट ही बढ़ोतरी कर पाई। 12वीं पंचवर्षीय योजना में अगर विकास दर में कमी आती है तो फिर बिजली के उत्पादन में बढ़ोतरी के इस लक्ष्य को हासिल करना और भी मुश्किल हो जाएगा। अच्छी बात यह है कि योजना के दौरान वैकल्पिक ऊर्जा माध्यमों के जरिए 30,000 मेगावाॅट बिजली उत्पादन में बढ़ोतरी करने का लक्ष्य रखा गया है।

12वीं पंचवर्षीय योजना के लिए सरकार ने 25 संकेतक निर्धारित किए हैं। इन्हीं के आधार पर यह पता लगाया जा सकेगा कि योजना का क्रियान्वयन सही ढंग से हो पा रहा है या नहीं। इनमें से कुछ प्रमुख संकेतक हैं:

1. 8.2 फीसदी की विकास दर
2. कृषि की विकास दर चार फीसदी
3. विनिर्माण क्षेत्र की विकास दर दस फीसदी
4. खेती से इतर पांच करोड़ रोजगार अवसरों का सृजन
5. हर राज्य का विकास दर 11वीं पंचवर्षीय योजना के विकास दर के मुकाबले अधिक होना चाहिए
6. औसत स्कूली शिक्षा बढ़कर सात साल तक पहुंचे
7. उच्च शैक्षणिक संस्थानों में 20 लाख सीटें बढ़ाकर उच्च शिक्षा तक छात्रों की पहुंच बढ़ाना
8. योजना के अंत तक स्कूलों के दाखिले में लैंगिक और सामाजिक भेदभाव मिटाना
9. शिशु मृत्यु दर को घटाकर 25 पर और मातृत्व मृत्यु दर को घटाकर एक पर लाना। साथ ही योजना के अंत तक छह वर्ष तक के आयु वर्ग में लैंगिक अनुपात को प्रति हजार में 950 पर लाना
10. योजना के अंत तक बुनियादी ढांचा में निवेश को बढ़ाकर जीडीपी के 9 फीसदी तक ले जाना
11. सिंचित क्षेत्र को नौ करोड़ हेक्टेयर से बढ़ाकर 10.3 करोड़ हेक्टेयर करना
12. देश के हर गांव तक बिजली पहुंचाना
13. योजना के अंत तक हर गांव को ऐसी सड़कों से जोड़ना जिनके जरिए हर मौसम में वहां तक पहुंचा जा सके
14. ग्रामीण इलाकों के 70 फीसदी लोगों तक फोन की सेवा पहुंचाना
15. योजना के दौरान हर साल हरित पट्टी में दस लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी करना
16. योजना के दौरान वैकल्पिक ऊर्जा माध्यमों के जरिए 30,000 मेगावाॅट बिजली उत्पादन में बढ़ोतरी करना
17. 12वीं योजना के अंत तक देश के 90 फीसदी लोगों तक बैंकिंग सेवाएं पहुंचाना

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