मंजिल से आगे का रास्ता

हिमांशु शेखर

संभवतः देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है कि खुद को सामाजिक कार्यकर्ता कहने वाले कुछ लोग मिलकर कोई पार्टी बनाएं और साल भर के भीतर ही वह पार्टी चुनाव लड़कर सरकार भी बना ले. अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में आम आदमी पार्टी ने ऐसा कर दिखाया है. इस लिहाज से कह सकते हैं कि 26 दिसंबर, 2013 को अरविंद केजरीवाल द्वारा दिल्ली के रामलीला मैदान में राष्ट्रीय राजधानी के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेना ऐतिहासिक है.

आज अरविंद केजरीवाल जहां खड़े हैं, वहां पहुंचने के लिए उन्होंने लंबी दूरी तय की है. सूचना के अधिकार से लेकर जनलोकपाल और इसके बीच न जाने कितने अन्य मुद्दों को समय-समय पर उठाते रहने, उन्हें जनता के बीच सही ढंग से पहुंचाते रहने और फिर इसे एक सफल अभियान के रूप में तब्दील कर देने से जो चीज निकलती है, वह है आम आदमी पार्टी की सरकार. लेकिन इस सरकार के गठन ने केजरीवाल को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां उनके पास पाने के लिए बहुत कुछ है और जनता के पास खोने के लिए बहुत कुछ है.

अरविंद केजरीवाल जिस तरह के वादों के सहारे सत्ता तक पहुंचे हैं, अगर वे उन्हें पूरा करने में कामयाब हो जाते हैं तो वे इतिहास पुरूष बन जाएंगे. उनके सामने खुद को एक ऐसे नेता के तौर पर स्थापित करने का अवसर है, जिनका इस समय पूरे देश में घोर अभाव हो चला है. वे अमर हो सकते हैं, अगर उन्होंने सिर्फ उन्हीं बातों को लागू कर दिया जिनका जिक्र उन्होंने अपने चुनावी घोषणा पत्र में किया है. यकीन मानिए, अगर वे ऐसा कर दिखाते हैं तो पूरे विश्व राजनीति में उन्हें एक अलग स्थान मिलेगा.

लेकिन संकट यही है. अगर आप आम आदमी पार्टी के घोषणा पत्र को देखेंगे तो पता चलेगा कि जो वादे उन्होंने किए हैं, उन्हें पूरा करना आसान नहीं है. यह भी कहा जा सकता है कि ये वादे यह मानकर किए गए थे कि वे सरकार नहीं बना पाएंगे. लेकिन अब उन्हें सरकार बनानी पड़ रही है. अब उनके काम का आकलन उनके घोषणा पत्र में दर्ज हर्फों के चश्मे से होगा, अब उन्हें हर पल परीक्षा से गुजरना होगा, उनके हर कदम पर टीका-टिप्पणी होगी.

अपने वादों को पूरा करने के लि केजरीवाल को बेहद ताकतवर कॉरपोरेट घरानों से टकराना पड़ेगा. बिजली की कीमतों की कमी के मामले में उनका सामना रिलायंस और टाटा जैसे औद्योगिक साम्राज्यों से होगा. इन्हीं दोनों कंपनियों के हाथ में दिल्ली की बिजली वितरण व्यवस्था है. हर रोज 700 लीटर पानी मुफ्त देना भी ऐसा ही दुश्कर लक्ष्य है क्योंकि दिल्ली में पानी की आपूर्ति का बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश और हरियाणा की कृपा पर निर्भर है. इन हालात का सामना अरविंद कैसे करते हैं इस पर सबकी निगाहें ररहेंगी. अभी तक अरविंद केजरीवाल ने अपनी सूझबूझ से सबको चैंकाया है. अगर इन मसलों पर भी वे कोई चैंकाने वाला समाधान ले आएं तो वे भारतीय राजनीति पर गहरी छाप छोड़ेंगे.

कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने की वजह से अरविंद केजरीवाल पर अवसरवाद का आरोप लग रहा है. कहा जा रहा है कि उन्हें लोगों ने कांग्रेस के खिलाफ जनादेश दिया था और अब वे उसके साथ मिलकर सरकार बना रहे हैं. कुछ लोग इसे सुविधा की राजनीति कह रहे हैं. कुछ उसी तरह से जिस कांग्रेस, भाजपा, सपा और बसपा जैसी पार्टियां लंबे समय से करती आ रही हैं. अरविंद पर इस तरह के आरोप लगने स्वाभाविक हैं. अरविंद केजरीवाल इन दलों पर इसी तरह के आरोप लगाते आए हैं . अरविंद पर अवसरवाद के आरोप इसलिए भी लगाए जा रहे हैं क्योंकि चुनाव के दौरान उन्होंने बार-बार कहा था कि किसी भी कीमत पर वे भाजपा और कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करेंगे. लेकिन अब उनकी पार्टी कांग्रेस के बाहरी सहयोग से सरकार बनाने जा रही है. हालांकि इस मुकाम तक पहुंचने के दौरान घटी घटनाओं को समझना भी जरूरी है. दिल्ली के नतीजे किसी के पक्ष में नहीं थे. विधानसभा में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी थी इसके बावजूद उसने सरकार बनाने का दावा पेश नहीं किया. कांग्रेस ने आप को समर्थन की पेशकश की. इसके बाद भाजपा और कांग्रेस ने एक सुर से अरविंद की इस बात के लिए आलोचना शुरू कर दी कि वे सरकार बनाने से पीछे भाग रहे हैं. अरविंद ने इस आरोप का हल जनमत संग्रह के रूप में निकाला. जनता के साथ तमाम तरीकों से संवद के बाद आप ने पाया कि जनता कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने के पक्ष में थी. बावजूद इसके इतना तो तय है कि अरविंद ने अपने मौलिक सिद्धांत से समझौता कर लिया है.

केजरीवाल की यह सरकार कांग्रेस की बैसाखी पर टिकी है. दोनों पार्टियों की मानसिकता और आपसी रिश्तों को देखते हुए इस सरकार के दीर्घजीवी होनो की संभावना क्षीण है. जब तक कांग्रेस की राजनीति के हिसाब से इस सरकार का चलना ठीक रहेगा तब तक यह सरकार चलेगी.1989 में जब वीपी सिंह की सरकार भाजपा ने गिरा दी थी तब राजीव गांधी ने कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर की सरकार बनवाई थी. उस वक्त उनसे पत्रकार वार्ता में एक सवाल पूछा गया था. सवाल यह था कि आप चंद्रशेखर की सरकार कब तक चलाएंगे. जवाब में राजीव गांधी ने कहा था कि वीपी सिंह की सरकार से एक महीने ज्यादा. लेकिन जब कथित जासूसी का आरोप चंद्रशेखर की सरकार पर लगा तो उन्होंने अपने सरकार की बलि चढ़ा दी. बहुत कम लोगों को मालूम है कि प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने से पहले जब चंद्रशेखर लोकसभा में बोल रहे थे तो उनके पास राजीव गांधी ने तीन बार पर्चा भेजकर इस्तीफा नहीं देने का आग्रह किया था. लेकिन चंद्रशेखर ने अपने मूल्यों के आगे प्रधानमंत्री पद पर बने रहने के लोभ को तरजीह नहीं दिया. आने वाले दिनों में केजरीवाल को भी ऐसी ही कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ेगा.

जिन लोगों के साथ अरविंद केजरीवाल ने अपने सामाजिक जीवन के शुरुआत में काम किया है, वे केजरीवाल को एक महत्वकांक्षी व्यक्ति के तौर पर देखते हैं. यही वजह है कि अमेरिकी नीतियों का विरोध करते-करते अरविंद केजरीवाल फोर्ड फाउंडेशन से आर्थिक मदद भी ले लेते हैं और मौका पड़ने पर अमेरिकी हितों को संवर्धित करने वाले कॉरपोरेट घरानों और सरकारों के खिलाफ हल्ला भी बोल देते हैं. दरअसल, आज अरविंद केजरीवाल एक ऐसी पहेली हैं जिसके बारे में पक्के तौर पर कुछ भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता है. केजरीवाल समर्थकों को यह रोमांचक लग सकता है लेकिन अगर निष्पक्ष होकर सोचेंगे तो यह खतरनाक प्रवृत्ति है.

सुविधा के हिसाब से परिस्थितियों को मोड़ने की अपनी कला का नमूना अरविंद ने दिल्ली पुलिस को लिखे अपने उस पत्र में दिया है जिसमें उन्होंने पुलिस सुरक्षा से इनकार किया है. वे लिखते हैं, ‘उनका भरोसा भगवान पर है इसलिए उन्हें सुरक्षा नहीं चाहिए लेकिन हो सके तो कुछ स्थानों पर ‘भीड़’ से उन्हें बचाने के लिए बंदोबस्त किए जाएं. यह अरविंद केजरीवाल के शब्द हैं जो चुनाव से पहले तक इस भीड़ को जनसैलाब और आम आदमी कह रहे थे. अरविंद केजरीवाल के समर्थकों द्वारा सिरफिरा करार दिए जाने का जोखिम उठाते हुए कहना पड़ेगा कि संकेत ठीक नहीं हैं.

दरअसल, यह भारतीय राजनीति की त्रासदी है कि देश के सियासी फलक पर उन्हीं नेताओं का उभार दिखता है जो अच्छे से मुद्दों की मार्केटिंग करना जानते हैं. आज राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा दो नेताओं नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल की हो रही है. इन दोनों नेताओं के उभार को देखने पर पता चलता है कि दोनों मार्केटिंग के धुरंधर हैं. दोनों में कई स्तर पर समानता दिखती है. दोनों के समर्थक उन्मादी हैं. आलोचना इन्हें रास नहीं आती. आलोचना करने पर ये तुरंत निजी हमले पर उतर जाते हैं. आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में भी यह अवगुण दिखता है. जब मीडिया उनकी खबरों को न दिखाए तो वे इसे कॉरपोरेट जगत का दलाल कहने लगते हैं और जब दिखाए तो इसे बहुत बड़ी ताकत. कम्युनिस्ट इसी प्रवृत्ति को फासीवाद कहते हैं. जिस तरह से अरविंद केजरीवाल के आस-पास आम आदमी पार्टी की सारी गतिविधियां घूम रही हैं, उसे अधिनायकवाद भी कहा जाता है. इस लिहाज से देखा जाए तो आम आदमी पार्टी भी दूसरी राजनीतिक पार्टियों की तरह ही दिखती है लेकिन उनसे अपेक्षाकृत थोड़ी ज्यादा साफ-सुथरी.

केजरीवाल समर्थक कह सकते हैं कि आम आदमी पार्टी में सारे फैसले आम आदमी की राय पर होते हैं. सरकार बनाने को लेकर भी उनका तर्क होगा कि एसएमएस और ईमेल के आधार पर मिली राय के बाद ही सरकार बनाने का फैसला हुआ है. लेकिन राजनीति को गंभीरता से समझने वालों के लिए ये सब नए जमाने की राजनीति के नए सियासी स्टंट हैं. अरविंद केजरीवाल ने नए और पुराने स्टंट का ऐसा घालमेल तैयार किया है इसमें आम आदमी की नजरें चैंधिया गई हैं. सरकारी घर, सुरक्षा, लाल बत्ती जैसी चीजों से इनकार प्रतीकात्मक राजनीति मानी जा सकती है, लेकिन हमारे राजनीतिक जीवन में फैली वीआईपी संस्कृति को चोट पहुंचाती है तो इस प्रतीकात्मकता का स्वागत होना चाहिए. मौजूदा दौर में इस तरह की सुविधाएं लेने से इनकार करने वाले कई मुख्यमंत्री हैं- माणिक सरकार, ओमैन चांडी और मनोहर परिकर आदि. इनका क्षणिक प्रभाव हो सकता है लेकिन अरविंद की असली परीक्षा उन वादों को लेकर होगी जिन्हें पूरा करने का वादा उन्होंने अपने घोषणा पत्र में किया है.

अगर अरविंद केजरीवाल भी अन्य दलों की तरह ही सत्ता में रच-बस जाते हैं और घोषणा पत्र को सिर्फ चुनावी ही रहने देते हैं तो उनका कोई खास नुकसान तो नहीं होगा लेकिन आम आदमी एक बार फिर से ठगा हुआ महसूस करेगा. केजरीवाल की सरकार से जनता को कुछ उसी तरह की उम्मीदें है जिस तरह की उम्मीद आजादी के बाद बनी पंडित जवाहरलाल नेहरू की सरकार और आपातकाल के बाद बनी मोरारजी देसाई की सरकार ने जगाई थी. लेकिन अगर आम आदमी पार्टी आम आदमी की स्थिति सुधारने में नाकाम रहती है तो देश का आम आदमी लगातार राजनीतिक छल झेलते-झेलते मजबूरी में ही सही इतना सहनशील तो हो ही गया है कि एक झटका और झेल ले.

आजादी के बाद उसे कांग्रेस के नाम पर ठगा गया.फिर जनता शब्द फैशन में आया तो जनता पार्टी बनाकर आम लोगों को ठगा गया. आजकल ‘आम आदमी’ फैशन में है. ऐसे में अगर आम आदमी पार्टी भी एक बार लोगों को ठग ले तो कुछ सालों बाद कोई नया शब्द आएगा और फिर जनता उससे इसी तरह की उम्मीदे लगाएगी. उम्मीद की जानी चाहिए कि ‘आम आदमी’ के नाम पर और यहां तक पहुंचने के लिए दिए गए अपने बयानों को याद करके अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वैसे ही रहेंगे, जैसा वे दिखते हैं.

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