भ्रष्टाचार अपरंपार

हिमांशु शेखर

सालों तक भारतीय सेना में नौकरी करने के बाद तारा चंद यादव ने साल 2000 में सेना से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी. उस वक्त वे कैप्टन के पद पर कार्यरत थे. तहलका के पास यादव का पेंशन पेमेंट ऑर्डर की प्रति है. इसमें दर्ज है कि यादव जब सेवानिवृत्त हुए थे उस वक्त उन्हें 5000 रुपये का मासिक पेंशन मिलता था. सेवानिवृत्त होने के वक्त वे कैप्टन के पद पर काम कर रहे थे. सेवानिवृत्ति के बाद यादव ने पुनर्वास महानिदेशालय (डीजीआर) की सुविधाएं हासिल करने के लिए आवेदन किया. इसके बाद यादव को एक टोल प्लाजा चलाने का काम मिल गया.

तारा चंद यादव का असल खेल शुरू हुआ इसके बाद. कैप्टन के पद से रिटायर होने वाले तारा चंद यादव ने दूसरा टोल प्लाजा हासिल करने के लिए खुद को कर्नल दिखाया. यानी डीजीआर में एक बार पंजीयन कराके तारा चंद यादव ने दो सुविधाएं हासिल कर लीं. इसके बाद जब इन टोल प्लाजा के प्रबंधन को लेकर कई तरह की शिकायतें हुईं तो यादव से दोनों टोल प्लाजा वापस ले लिए गए. इस बीच यादव ने डीजीआर से कई सुरक्षा एजेंसियों के लिए मान्यता हासिल कर ली और अपने एक प्रशिक्षण संस्थान स्काईलार्क स्कूल ऑफ बिजनेस ऐंड टेक्नोलॉजी के लिए भी मान्यता हासिल करने में कामयाबी पाई. डीजीआर के अधिकारी किस कदर तारा चंद यादव पर मेहरबान रहे, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि तारा चंद यादव ने कुछ सुविधाएं टीसी राव के नाम से भी लीं. यही नहीं कभी तो उन्होंने डीजीआर के पास जमा दस्तावेजों में सेवानिवृत्त मेजर बताया तो कभी कर्नल तो कभी कैप्टन. तहलका के पास ऐसे कई दस्तावेज हैं जो तारा चंद यादव उर्फ टीसी राव की इन अनियमितताओं की गवाही दे रहे हैं.

इन सबका नतीजा यह हुआ कि तारा चंद यादव सैंकड़ो करोड़ के मालिक हो गए. डीजीआर के एक कारण बताओ नोटिस का जो जवाब टीसी राव ने 27 मई, 2010 को लिखा है उसमें इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि वे स्काईलार्क समूह के 12 कंपनियों को चलाते हैं जिनका कारोबार 200 करोड़ रुपये से अधिक है. जबकि स्काईलार्क समूह की वेबसाइट बताती है कि टीसी राव की अगुवाई वाली इस कंपनी का टर्नओवर 250 करोड़ रुपये है. वेबसाइट में ही यह दर्ज है कि साल 2000 में इस कंपनी का टर्नओवर 22 लाख रुपये था. राव की एक सुरक्षा एजेंसी का नाम है स्काईलार्क सिक्यूरिटाज प्राइवेट लिमिटेड. इस कंपनी की वित्तीय वर्ष 2007-08 की बैलेंस शीट बताती है कि उस साल इस कंपनी का टर्नओवर 113.5 करोड़ रुपये है. इस आधार पर डीजीआर के ही कुछ अधिकारी टीसी राव के इस बात पर संदेह जाहिर करते हैं कि अगर सिर्फ एक कंपनी का कारोबार 113.5 करोड़ रुपये 2007-08 में था तो 2010-11 में 12 कंपनियों का कारोबार तो 1,000 करोड़ रुपये से कहीं अधिक होना चाहिए.

जो लोग भी ऐसा संदेह जाहिर कर रहे हैं कि उनकी बातों को बल देने वाले पर्याप्त कारण मौजूद हैं. सेना से ही सेवानिवृत्त कुछ अधिकारियों और जवानों ने टीसी राव को लेकर अलग-अलग सक्षम अधिकारियों और एजेंसियों के पास शिकायतें की हैं. इन शिकायतों में यह बताया गया है कि टीसी राव की सभी कंपनियों के कारोबार को मिला दें तो यह तकरीबन 5,000 करोड़ रुपये के आसपास है और राव अपनी कंपनियों का टर्नओवर कम दिखाकर सर्विस टैक्स की चोरी कर रहे हैं. इन्हीं शिकायतों का नतीजा था कि 28 और 29 मार्च, 2012 को टीसी राव की कंपनी के कार्यालयों पर डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ सेंट्रल एक्साइज इंटेलीजेंस (डीजीसीईआई) ने छापेमारी की. इस छापेमारी से संबंधित आधिकारिक जानकारी खुद भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करके दी. इसमें यह बताया गया कि गोपनीय सूचनाओं के आधार डीजीसीईआई के अधिकारियों ने स्काईलार्क समूह की कंपनियों के दफ्तरों पर छापेमारी की और प्रथम दृष्टया तकरीबन 10 करोड़ रुपये के सर्विस टैक्स चोरी का मामला दिख रहा है. छापेमारी के दौरान 77.5 लाख रुपये नगद बरामद किए गए जिनका कहीं कोई लेखा-जोखा नहीं था. प्रेस विज्ञप्ति में यह भी बताया गया कि इस समूह की कंपनियों की तरफ से की जा रही गड़बडि़यों का मास्टरमाइंट सेवानिवृत्त कैप्टन टीसी यादव है जिसने फर्जी पहचान के आधार पर कई कंपनियां बनाई हैं. पीआईबी की तरफ से यह भी बताया गया कि समूह की कंपनियों ने जिन्हें अपनी सेवाएं दीं उनसे सर्विस टैक्स तो वसूले लेकिन इसका एक छोटा हिस्सा ही सरकार के पास जमा कराया. डीजीसीईआई टीसी यादव की स्काईलार्क स्कूल ऑफ बिजनेस ऐंड टेक्नोलॉजी की ओर से हो रही कर चोरी की भी जांच कर रही है. डीजीसीईआई के मुताबिक यह संस्थान ‘कॉमर्शियल कोचिंग ऐंड ट्रेनिंग सर्विसेज’ की श्रेणी में आता है इसलिए इसे कर चुकाना चाहिए.

डीजीसीईआई से जो रिपोर्ट रक्षा मंत्रालय गई है उससे वाकिफ एक अधिकारी तहलका को बताते हैं कि तारा चंद यादव के कार्यालय पर हुई छापेमारी के दौरान जो दस्तावेज मिले हैं उनसे पता चलता है कि वहां से कम 175 कंपनियां चल रही थीं. इनमें से कुछ तारा चंद यादव के नाम पर हैं तो कुछ टीसी राव के नाम पर. आश्चर्य की बात यह भी है कि कई दूसरे लोगों के नाम पर भी कंपनियों का संचालन भी तारा चंद यादव के स्काईलार्क समूह के कार्यालय से हो रहा है. तारा चंद यादव की कहानी यह साबित करती है कि अगर डीजीआर के अधिकारियों की कृपा बनी रहे तो कायदे-कानून को ठेंगा दिखाकर किस तरह से 5000 रुपये की मामूली पेंशन पाने वाले व्यक्ति को भ्रष्ट तरीकों से सैंकड़ो करोड़ रुपये का आदमी बनाया जा सकता है.

टीसी राव कोई ऐसे अकेले व्यक्‍ति नहीं हैं जो डीजीआर के अधिकारियों के साथ मिलीभगत करके करोड़ों के वारे-न्यारे कर रहे हैं. लेकिन उन लोगों की कहानी पर जाने से पहले डीजीआर के बारे में बुनियादी बातों को समझना जरूरी है. भारत सरकार के मुताबिक सेना से हर साल तकरीबन 60,000 लोग अपेक्षाकृत कम उम्र में सेवानिवृत्त होते हैं. इसे देखते हुए सरकार ने 1992 में रक्षा मंत्रालय के तहत पुनर्वास महानिदेशालय (डीजीआर) की शुरुआत की. इसका मकसद था सेवानिवृत्त अधिकारी और जवानों को रोजगार के वैकल्पिक अवसर मुहैया कराना. इस काम के लिए डीजीआर के तहत कई विभाग बने हुए हैं जिनके तहत तमाम योजनाएं चल रही हैं.

डीजीआर की सुविधाएं हासिल करने के लिए कुछ शर्तों को पूरा किया जाना अनिवार्य है. सबसे पहली शर्त यह कि इन सुविधाओं का लाभ उसी सेवानिवृत्त कर्मचारी को मिल सकता है जिसने पहले ऐसी कोई सुविधा नहीं ली हो. दूसरा सुविधाएं लेने वाला सरकारी, अर्द्धसरकारी या निजी क्षेत्र में कहीं नौकरी नहीं कर रहा हो. तीसरी शर्त यह है कि डीजीआर अपनी सुविधाओं का लाभ उठाने का अवसर उन्हें ही देगी जिन्होंने भारतीय प्रबंध संस्थान या किसी अन्य बिजनेस कॉलेज में सैन्य अधिकारियों के लिए चलने वाले किसी पाठ्यक्रम में हिस्सा नहीं लिया हो. आज जो डीजीआर में चल रहा है, अगर उसे कोई सही ढंग से समझे तो पता चलेगा कि ये शर्तें किस तरह से कागजी बनकर रह गई हैं. इन नियमों की अनदेखी करके एक-एक व्यक्ति को डीजीआर दर्जनों सुविधाएं मुहैया करा रहा है. जो नौकरी कर रहा है, उसे भी सुविधाओं का लाभ दिया जा रहा है.

डीजीआर की पूरी व्यवस्था के मुट्ठी भर लोगों के हाथ का खिलौना बन जाने से कुछ लोगों के लिए सेना की नौकरी से कई गुना अच्छा इनका दूसरा करियर यानी डीजीआर की मदद से रोजगार करना बन गया है. डीजीआर की जिन सुविधाओं पर लोगों का सबसे अधिक जोर होता है उनमें सिक्यूरिटी एजेंसी, पेट्रोल पंप, सीएनजी स्टेशन और कोल लोडिंग व ट्रांसपोर्टेशन प्रमुख हैं. केंद्र सरकार ने खुद कई बार सर्कुलर जारी करके सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (पीएसयू) को कहा है कि वे उन सिक्यूरिटी एजेंसियों की सेवाएं लें जो सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों द्वारा चलाई जा रही हैं. आज ज्यादातर पीएसयू ऐसी ही सुरक्षा एजेंसियों की सेवाएं ले रही हैं. यहां तक तो सब ठीक है लेकिन गड़बडि़यों की शुरुआत क्रियान्वयन के स्तर पर होती है. सबसे अधिक कमाई होने की वजह से ‘कोल लोडिंग ऐंड ट्रांसपोर्टेशन स्कीम’ में लोगों की दिलचस्पी सबसे अधिक रहती है. यही वजह है कि इस स्कीम का फायदा लेने के लिए इंतजार का समय (वेटिंग पीरियड) सात साल है. यह योजना आमदनी की लिहाज से कितनी आकर्षक है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि डीजीआर के पिछले चारों महानिदेशकों ने इसके लिए आवेदन किया था. डीजीआर के ये चार पूर्व महानिदेशक हैं- मेजर जनरल वीएस बुधवार, मेजर जनरल केएस सिंधू, मेजर जनरल हरवंत कृष्ण और मेजर जनरल एसजी चटर्जी. इस योजना के बाद सबसे ज्यादा होड़ टोल प्लाजा के परिचालन का काम हासिल करने के लिए रहती थी. मगर इसमें भ्रष्टाचार के आरोप लगातार लग रहे थे जिस वजह से 2010 में राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने यह काम डीजीआर के हाथों से ले लिया.

डीजीआर के नियमों में इस बात का स्पष्ट प्रावधान है कि डीजीआर से एक सुविधा हासिल कर चुके और कहीं दूसरी जगह पर नौकरी करने वाले को कोई सुविधा डीजीआर से नहीं मिलेगी. लेकिन इन प्रावधानों की अनदेखी के दर्जनों उदाहरण के दस्तावेजी सबूत तहलका के पास हैं. दस्तोवज बताते हैं कि मेजर वीके तिवारी सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद 2002 में छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में जिला सैनिक कल्याण अधिकारी बन गए. 2007 में उनका स्‍थानांतरण बिलासपुर हो गया. इस लिहाज से अगर देखा जाए तो उन्हें डीजीआर से कोई सुविधा नहीं मिलनी चाहिए. लेकिन हकीकत यह है कि वे छत्तीसगढ़ सिक्यूरिटी एजेंसी के नाम से डीजीआर से मान्यता प्राप्त एक सुरक्षा एजेंसी का संचालन कर रहे हैं. तिवारी के मामलों में नियमों को नजरंदाज करने का काम डीजीआर ने न सिर्फ सुरक्षा एजेंसी को मान्यता देने में की बल्‍कि उन्हें दूसरी सुविधा भी दे डाली. उन्हें कोल लोडिंग और ट्रांसपोर्टेशन का काम भी दे दिया गया. तिवारी यह काम ओम साईं ट्रांसपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी बनाकर कर रहे हैं. ऐसा ही मामला सेना से सेवानिवृत्त अधिकारी वीएस तोमर का है. वीएस कोल कैरियर्स प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के जरिए वे कोल लोडिंग और ट्रांसपोर्टेशन का काम कर रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ वे पूर्णा सिक्यूरिटी सर्विस के नाम से सुरक्षा एजेंसी भी चला रहे हैं. डीजीआर से तोमर को मिलने वाली सुविधाओं का सिलसिला यहीं नहीं थमता बल्‍कि उन्हें डीजीआर की कृपा से टोल प्लाजा के प्रबंधन का काम भी मिल गया. वीएस तोमर यह काम विस्टो एंटरप्राइजेज नाम की कंपनी के जरिए कर रहे हैं. एक ही व्यक्‍ति को एक से अधिक सुविधाएं देने के डीजीआर के इस खेल में अगला नाम सेवानिवृत्त मेजर पुनित जैन का है. सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद वे एरिक्सन इंडिया ग्लोबल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी में काम कर रहे हैं. लेकिन यह पुनित जैन के प्रति डीजीआर अधिकारियों की दरियादिली ही है कि उन्हें गाजियाबाद में टोल प्लाजा चलाने का काम दे दिया गया. पुनित जैन को सुविधाएं देने के मामले में डीजीआर यहीं नहीं रुका बल्‍कि उनकी सुरक्षा एजेंसी एएए दीप सिक्यूरिटी सर्विसेज को भी मान्यता दे दी गई. कुछ ऐसा ही मामला सेना से सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल मानवंत सिंह जोहर का है. वे एशिया मोटरवर्क्स लिमिटेड में काम करते हैं और उनका आयकर रिटर्न बताता है कि वे हर महीने वहां से 2.05 लाख रुपये का पगार उठा रहे हैं. इसके बावजूद वे डीजीआर से मान्यता प्राप्त दो सुरक्षा एजेंसियां चला रहे हैं. इनमें से एक है गरुड सिक्यूरिटीज और दूसरी है कीर्ती ऐंड टू ऐंड सॉल्यूशंस.

डीजीआर में हो रही गड़बड़ियों का सिलसिला यहीं नहीं थमता. आम तौर पर होता यह है कि सेना से जो भी अधिकारी या जवान सेवानिवृत्त होता है वह डीजीआर के पास सुविधाओं के लिए आवेदन करता है. इस आवेदन के बाद संबंधित अधिकारी या जवान को एक पंजीयन संख्या मिलता है. इसी को आधार बनाकर डीजीआर संबंधित व्यक्‍ति‌ को सुविधाएं देती है. लेकिन डीजीआर के दस्तावेज यह बता रहे हैं कि एक ही पंजीयन संख्या पर कई तरह की सुविधाएं दी जा रही हैं. डीजीआर के जो दस्तावेज तहलका के पास हैं उनसे यह पता चलता है कि पंजीयन संख्या-1435 पर दो लोगों सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल रजिंदर सिंह यादव और सेवानिवृत्त कर्नल पीएस यादव को टोल प्लाजा चलाने का काम मिला हुआ है. इसी तरह पंजीयन संख्या-1521 पर सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर केएस वर्मा को सिक्यूरिटी एजेंसी, सेवानिवृत्त कैप्टन सुरेश गुलाटी को टोल प्लाजा और सेवानिवृत्त मेजर प्रताप सिंह को टोल प्लाजा चलाने का काम डीजीआर ने दे रखा है. ये तथ्य उन आरोपों को मजबूती दे रहे हैं कि डीजीआर के जरिए लूट के इस खेल में कहीं न कहीं डीजीआर के अधिकारी भी शामिल हैं.

सेना से सेवानिवृत्त होने वाले अधिकारियों और जवानों के प्रशिक्षण के लिए डीजीआर प्रशिक्षण संस्‍थान खोलने की सुविधा भी देती है. तहलका के पास वैसे दस्तावेज हैं जो यह साबित करते हैं कि एक ही पते पर गलत ढंग से कई प्रशिक्षण केंद्र चलाए जा रहे हैं. ऐसा ही एक मामला सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल आनंद प्रकाश सिंह ने रक्षा मंत्री एके एंटोनी को पत्र लिखकर उनके ध्यान में लाया था. लेकिन अब तक उनकी शिकायत पर कुछ नहीं हुआ. आनंद प्रकाश सिंह ने रक्षा मंत्री को 10 अप्रैल, 2012 को लिखे पत्र में बताया, ‘पिछले तीन महीने में दिल्ली के नांगल राय के डब्‍ल्यूजेड-289 के पते पर सात प्रशिक्षण केंद्रों को डीजीआर ने मान्यता दी. इनमें से दो कंपनियों में निदेशक के तौर पर गुरिंदर कौर का नाम है. वहीं तीन कंपनियों में निदेशक के तौर पर नवदीप सिंह का नाम है.’ इस पत्र में यह भी बताया गया है कि कई प्रशिक्षण केंद्र रिहायशी पतों से चल रहे हैं और इनमें बेडरूम और ड्राइंग रूम को क्लास रूम के तौर पर दिखाया जा रहा है. डीजीआर में चल रही गड़बड़ियों की पड़ताल के दौरान फर्जी पते पर प्रशिक्षण संस्‍थान और कागजी प्रशिक्षण संस्‍थान चलाने के भी कई मामले भी सामने आए. ऐसा ही एक प्रशिक्षण संस्‍थान है किंग मैनपावर सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड. डीजीआर के दस्तावेजों में इस प्रशिक्षण संस्‍थान का यह पता दर्ज हैः 7डी/1369, सेक्टर-9, सीडीए कॉलोनी, मार्केट नगर, कटक, ओडिशा, पिन- 753014, टेलीफोन नंबर- 0671-2309522. जबकि बीएसएनएल की टेलीफोन डायरेक्टरी बताती है कि यह फोन नंबर और पता न्यू इंडिया अश्योरेंस कंपनी लिमिटेड का है. सेना से सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर अजय कोहली के नाम पर एस्कलेड सिक्यूरिटी सर्विसेज के नाम से ओडिशा में एक प्रशिक्षण संस्‍थान पंजीकृत है. लेकिन कंपनी ने प्रोविडेंट फंड कार्यालय में दिल्ली के जनकपुरी का पता दर्ज कराया है. आश्चर्य की बात यह है कि जनकपुरी के इसी पते पर एक और प्रशिक्षण संस्‍थान को मान्यता डीजीआर ने दे रखा है. इस संस्‍थान का नाम है एस्कलेड एंटरप्राइजेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड. नियमों को ताक पर रखने की कहानी यहीं नहीं खत्म होती बल्‍कि जिस अजय कोहली के नाम पर ये दोनों प्रशिक्षण संस्‍थान चल रहे हैं वह खुद तेजस नेटवर्क नाम की कंपनी में बतौर निदेशक काम कर रहे हैं.

डीजीआर में व्याप्त अराजकता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि सेना से सेवानिवृत्त अधिकारियों को डीजीआर ने अपनी सुविधाएं उनके पंजीयन से पहले ही मुहैया करा दीं. सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल सी मेधी का पंजीयन डीजीआर कार्यालय में 23 जून, 2007 को हुआ. लेकिन इसके पहले 26 अक्टूबर, 2006 को ही मेधी की कंपनी इगल्स आई सिक्यूरिटीज को तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में टोल प्लाजा चलाने का काम मिल गया. ऐसे ही सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल एसके मेहता का पंजीयन डीजीआर में 29 दिसंबर, 2006 को हुआ लेकिन यह डीजीआर की ही माया है कि उन्हें टोल प्लाजा चलाने का काम 7 नवंबर, 2006 को ही मिल गया.

जिन लोगों को टोल प्लाजा डीजीआर ने आवंटित कर रखा है उनमें से कई के बारे में यह शिकायत है कि वे आवंटित तो किसी सेना के अधिकारी के नाम पर हुए हैं लेकिन उसे चला कोई और रहा है. इस बारे में सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल नवीन कुमार आनंद ने बाकायदा हलफनामा देकर शिकायत दर्ज कराई. इसके बाद रक्षा मंत्रालय ने कर्नल आनंद की शिकायतों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया. इस समिति की रिपोर्ट की एक प्रति तहलका के पास है. यह रिपोर्ट बताती है, ‘टोल प्लाजा के मामले में किसी के नाम पर आवंटन और किसी और द्वारा चलाया जाने (सबलेटिंग) के कई उदाहरण हैं. यह बात सिक्यूरिटी एजेंसी के मामलों में भी सही है. सबलेटिंग के इस खेल में संबंधित एजेंसी या कंपनी के अलावा डीजीआर के अधिकारी और सेना से सेवानिवृत्त लोगों के अलावा दूसरे आम लोग भी शामिल हैं.’

डीजीआर से मान्यता प्राप्त कई सुरक्षा एजेंसियां के जिम्मे सामरिक लिहाज से अहम परमाणु केंद्रों और रिफाइनरियों की सहयोगी इकाइयों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है. ऐसे में अगर कोई चूक होती है तो इसका काफी नुकसान उठाना पड़ सकता है. रक्षा मंत्रालय की इस समिति ने सिक्यूरिटी एजेंसियों की सबलेटिंग के खतरों से आगाह करते हुए कहा है, भी इस पर चिंता जताते हुए अपनी रिपोर्ट में कहा है, ‘अगर समाज के किसी गलत तत्व को कोई सुरक्षा एजेंसी सबलेट की जाती है तो इसके खतरों का अंदाजा लगाया जा सकता है. सबलेटिंग की वजह से अगर पीएसयू और परमाणु केंद्रों और रिफाइनरियों की सहयोगी इकाइयों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसी राष्ट्र विरोधी तत्व के हाथों में चली जाती है तो इसके परिणाम देश के लिए काफी भयावह हो सकते हैं.’

दरअसल, डीजीआर से मान्यता प्राप्त सुरक्षा एजेंसियों के मामले में सबलेटिंग के अलावा और भी कई ऐसी समस्याएं हैं जो नियमों के खिलाफ हैं. डीजीआर से मान्यता प्राप्त सुरक्षा एजेंसियों की संख्या अभी 2719 है. डीजीआर से मान्यता प्राप्त इन एजेंसियों के जरिए देश भर में दो लाख से अधिक सुरक्षाकर्मी अलग-अलग जगहों पर नियुक्त हैं. डीजीआर के नियमों के तहत एक एजेंसी को 300 से अधिक सुरक्षाकर्मी रखने का अधिकार नहीं है. यानी एक तरह से देखा जाए तो डीजीआर ने अधिक से अधिक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों को लाभ पहुंचाने के मकसद से 300 सुरक्षाकर्मियों का कोटा तय किया है. लेकिन हकीकत यह है कि यह नियम भी सिर्फ कहने के लिए है. कई ऐसी एजेंसियां हैं जिनके सुरक्षाकर्मियों की संख्या इस कोटे से कई गुना अधिक है. टीसी राव की स्काईलार्क सिक्यूरिटी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. आज इस एजेंसी के पास हजारों की संख्या में सुरक्षाकर्मी हैं. डीजीआर से मान्यता प्राप्त एजेंसियों पर एक आरोप यह भी है कि ज्यादातर एजेंसियां उस नियम का उल्लंघन कर रही हैं जिसके मुताबिक अनिवार्य तौर पर हर एजेंसी के 90 फीसदी सुरक्षाकर्मी सेवानिवृत्त जवानों को रखना है. रक्षा मंत्रालय के ही अधिकारी बताते हैं कि अगर सिर्फ इसी नियम को आधार बनाकर सभी एजेंसियों की जांच कराई जाए तो ज्यादातर एजेंसियों की मान्यता रद्द करनी पड़ेगी.

डीजीआर से सुरक्षा एजेंसियों की सेवा का लाभ लेने के लिए अधिकतम उम्र सीमा 63 साल की है. यानी इस उम्र तक सेना से सेवानिवृत्त कोई अधिकारी अपनी सुरक्षा एजेंसी बनाकर डीजीआर से मान्यता ले सकता है. लेकिन नियम यह भी है कि कोई भी सेना का सेवानिवृत्त अधिकारी 65 साल से अधिक उम्र तक डीजीआर से मान्यता प्राप्त एजेंसी का संचालन नहीं कर सकता. लेकिन इस नियम को भी डीजीआर के अधिकारियों और सुरक्षा एजेंसियों के संचालक आपस में सांठगांठ करके खुलेआम ठेंगा दिखा रहे हैं. इसका एक उदाहरण है दीक्षा सिक्यूरिटी सर्विसेज. इस एजेंसी को चलाते हैं सेना से सेवानिवृत्त अधिकारी केसी चड्ढा. सेना के दस्तावेजों में इनकी जन्म की तारीख दर्ज है 17 दिसंबर, 1944. इस लिहाज से देखा जाए तो 2009 में इनका 65 साल पूरा होता है. लेकिन अब तक ये अपनी सुरक्षा एजेंसी चला रहे हैं. दिल्ली के कई प्रमुख सरकारी कार्यालयों में इनकी एजेंसी के सुरक्षाकर्मी सुरक्षा का जिम्मा संभाले हुए हैं. इस तरह के कई उदाहरण हैं. ऐसा नहीं है कि इन मामलों की शिकायत डीजीआर के पास नहीं पहुंची है. सच तो यह है कि डीजीआर के अधिकारियों की मिलीभगत से चल रहे भ्रष्टाचार के इस पूरे खेल को समय-समय पर हर सक्षम एजेंसी के सामने उठाया गया है लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई. तहलका के पास ऐसे दर्जनों शिकायतों की प्रतियां हैं जो इस बात की गवाही दे रही हैं. डीजीआर के महानिदेशक और रक्षा मंत्री एके एंटोनी से लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के यहां तक इस लूट की जानकारी पहुंचाने वाले सेना से सेवानिवृत्त विजय शर्मा कहते हैं, ‘मैंने डीजीआर के महानिदेशक, रक्षा मंत्री, केंद्रीय सतर्कता आयोग, प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के यहां भी की. लेकिन अब तक इस मामले में कुछ खास हुआ नहीं. इन शिकायतों पर कार्रवाई की बात तो दूर ठीक से जांच भी नहीं कराया गया.’

सेना से सेवानिवृत्त कुछ अधिकारियों का आरोप है कि डीजीआर से मान्यता प्राप्त सुरक्षा एजेंसियों का ढांचा कुछ इस तरह से तैयार किया गया है कि पीएसयू को अधिक पैसे खर्च करने पड़ें. इससे एजेंसियों को सर्विस चार्ज के नाम पर अधिक पैसा मिल रहा है और आरोप है कि इसका एक हिस्सा डीजीआर अधिकारियों तक भी पहुंच रहा है. हालांकि, एक तथ्य यह भी है कि जिस वेतन ढांचे को सेना के कुछ अधिकारी दोषपूर्ण बता रहे हैं उसका सबसे अधिक फायदा सुरक्षाकर्मियों को अधिक पगार के तौर पर मिल रहा है. दोषपूर्ण वेतन ढांचे की शिकायत सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल एसके वोहरा ने रक्षा मंत्री एके एंटोनी को 6 फरवरी, 2012 को पत्र लिखकर की थी. इसमें उन्होंने लिखा, ‘केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने वेतन का जो ढांचा बनाया है उसके मुताबिक पगार के बेसिक में ही रहने और खाने का भत्ता शामिल होता है. लेकिन डीजीआर ये दोनों भत्ते अलग से दे रही है. इस लिहाज से देखा जाए तो प्रति सुरक्षाकर्मी पीएसयू को 3,392 रुपये अधिक चुकाना पड़ रहा है. देश भर में तकरीबन डेढ़ लाख सुरक्षाकर्मी डीजीआर के जरिए तैनात हैं. इस तरह से देखें तो हर साल देश के पीएसयू को 610 करोड़ रुपये अतिरिक्त चुकाने पड़ रहे हैं.’ वोहरा आगे लिखते हैं, ‘कायदे से तो सर्विस चार्ज 1,973 रुपये प्रति गार्ड होना चाहिए लेकिन कई एजेंसियां प्रति गार्ड 4,600 रुपये तक बचा रही हैं.’

वोहरा की शिकायत के बाद रक्षा मंत्रालय ने डीजीआर के लिए नए वेतन ढांचे का प्रस्ताव तैयार किया है. इसमें इस बात की सिफारिश की गई है कि सर्विस चार्ज को मौजूदा 14-20 फीसदी से घटाकर 8-10 फीसदी किया जाए. डीजीआर की योजनाओं से अच्छी तरह वाकिफ सेना से सेवानिवृत्त एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ‘कर्नल वोहरा ने जिन बातों का उल्लेख अपनी शिकायत में किया है और रक्षा मंत्रालय के प्रस्तावित दिशानिर्देशों को मिलाकर देखा जाए तो प्रति गार्ड पीएसयू को 6,482 रुपये अधिक चुकाने पड़ रहे हैं. पीएसयू को अभी एक गार्ड के लिए 17,721 रुपये चुकाने पड़ रहे हैं. लेकिन वोहरा की शिकायत के बाद रक्षा मंत्रालय की ओर से भेजे गए प्रस्तावों को मंजूरी मिल गई तो प्रति गार्ड पीएसयू का खर्च घटकर 11,237 रुपये हो जाएगा. अगर प्रति गार्ड 6,482 रुपये अधिक चुकाने को आधार बनाएं तो पता चलता है कि देश भर में डीजीआर के जरिए तैनात दो लाख सुरक्षाकर्मियों के लिए हर साल पीएसयू को 1555.77 करोड़ रुपये अतिरिक्त चुकाने पड़ रहे हैं. पिछले 20 साल से डीजीआर चल रहा है और मोटा अनुमान लगाएं तो अब तक सिर्फ इस गड़बड़ी की वजह से सरकारी खजाने को तकरीबन 30,000 करोड़ रुपये का चूना लग चुका है. अन्य गड़बड़ियों को भी जोड़ दें तो डीजीआर के जरिए पिछले 20 साल में सरकारी खजाने को तकरीबन एक लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है.’

मौत के बाद भी सुविधाएं बरकरार
डीजीआर में अराजकता का आलम है कि सेना से सेवानिवृत्त अधिकारियों को इस एजेंसी द्वारा दी जाने वाली सुविधाएं उनकी मौत के बाद भी बरकरार हैं. जबकि कायदे-कानून यह कहते हैं कि डीजीआर से सुविधा पाने वाले किसी अधिकारी या जवान की मौत हो जाए तो उसे मिलने वाली सुविधा बंद हो जानी चाहिए. लेकिन अगर किसी ने डीजीआर के अधिकारियों को खुश करके रखा है तो उनके संबंधियों को ये सुविधाएं संबंधित व्यक्ति के मौत के बाद भी मिलती रह सकती हैं.

डीजीआर के दस्तावेजों को खंगालने और थोड़ी सी पड़ताल करने पर ऐसे दर्जनों उदाहरण मिल जाएंगे. मौत के बाद भी सुविधाएं मुहैया कराने के खेल को समझने के लिए कुछ उदाहरणों को जानना जरूरी है. सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद लेफ्टिनेंट कर्नल पीएस चौधरी ने डीजीआर में अपनी सुरक्षा एजेंसी के मान्यता के लिए आवेदन किया. इसके बाद उनकी एजेंसी विजिल इंडिया सिक्यूरिटी को गुजरात में काम करने की मंजूरी मिल गई. सेना में चौधरी के साथ काम करने वाले एक अधिकारी बताते हैं कि तीन-चार साल की बीमारी के बाद 2007 की गर्मियों में बीआर चौधरी की मौत दिल्ली कैंट के आरआर हॉस्पिटल में हो गई. कायदे से चौधरी की मौत के बाद डीजीआर को उनकी दे जा रही सुविधाएं बंद करते हुए उनकी सुरक्षा एजेंसी की मान्यता वापस ले लेनी चाहिए थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. पीएस चौधरी की मौत के साल भर बाद तक उनकी एजेंसी चलती रही और उनके परिजन पैसा बनाते रहे.

ऐसा ही एक दूसरा उदाहरण है सेना से सेवानिवृत्त मेजर हरजीत सिंह का. सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद हरजीत सिंह ने भी सुरक्षा एजेंसी के लिए डीजीआर में आवेदन किया और उनकी एजेंसी लॉक जॉ वन को डीजीआर से मान्यता मिल गई. इसके बाद उन्हें कई काम मिले. 2005 में हरजीत सिंह की मौत हो गई. लेकिन इसके बावजूद उनके नाम से चल रही एजेंसी न तो बंद हुई और न ही डीजीआर ने उनकी एजेंसी की मान्यता रद्द की. आश्चर्य की बात यह है कि हरजीत सिंह की मौत के तकरीबन डेढ़ साल बाद 27 दिसंबर, 2006 को उनके दस्तखत के साथ एक चिट्ठी पश्‍चिम बंगाल के डिप्टी लेबर कमीशनर को मिली. इस पत्र के जरिए एजेंसी के बकाया रकम के भुगतान का आग्रह किया गया था. यह पत्र साबित करता है कि कोई ऐसा व्यक्ति है जो हरजीत सिंह के फर्जी दस्तखत करके उनकी एजेंसी को उनकी मौत के बाद चला रहा है. लेकिन डीजीआर का ध्यान इस ओर नहीं गया.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *