बिगड़ते पर्यावरण से बढ़ेगा पलायन

हिमांशु शेखर

तेजी से बिगड़ता पर्यावरण पूरी दुनिया के लिए चिंता का सबब बना हुआ है। यह जलवायु परिवर्तन को लेकर बढ़ती चिंता ही है कि दुनिया के 192 देशों के बड़े नेता कोपेनहेगन में इस मसले पर बातचीत करने के लिए एकत्रित हुए हैं। इस सम्मेलन में आखिर क्या फैसला लिया जाएगा, इसके लिए तो अभी इंतजार करने की जरूरत है लेकिन इतना तो तय है कि बढ़ते प्रदूषण की वजह से दुनिया के समक्ष नई समस्याएं खड़ी होती जा रही हैं। इन्हीं में से एक है पलायन का। दुनिया के कई वैज्ञानिकों ने प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित होने वाले क्षेत्रों का अध्ययन करने के बाद यह नतीजा निकाला है कि आने वाले दिनों में जलवायु परिवर्तन पलायन की एक बड़ी वजह बनने जा रहा है।

प्रदूषण की वजह से कितने लोगों का पलायन होगा, इस बाबत कई तरह के अनुमान सामने रहे हैं। इंटरनेशनल आॅर्गनाइजेशन फाॅर माइग्रेशन ने अनुमान लगाया है कि 2050 तक तकरीबन 20 करोड़ लोगों का पलायन जलवायु परिवर्तन की वजह से हो। वहीं कुछ संगठनों का मानना है कि 2050 तक यह संख्या 70 करोड़ होगी। मालूम हो कि 2050 तक दुनिया की आबादी बढ़कर नौ अरब तक पहुंच जाने का अनुमान लगाया जा रहा है। इसका मतलब यह है कि उस समय तक दुनिया की कुल आबादी में से आठ फीसदी लोग प्रदूषण की वजह से पलायन की मार झेल रहे होंगे।

दरअसल, दुनिया भर में हुए औद्योगिकरण ने कई तरह की अव्यवस्थाओं और असंतुलन को जन्म दिया है। इस असंतुलन को भारत के उदाहरण के जरिए ही समझा जा सकता है। भारत के ज्यादातर शहरों का विकास बगैर किसी योजना के हुआ है। बेतरतीब बसे शहरों के पास तो कचरे के निस्तारण के लिए कोई जरूरी ढांचा है और ही वहां फैल रहे प्रदूषण पर लगाने के लिए कोई बंदोबस्त किया गया है। योजना के बिना बसे शहरों की एक बड़ी खामी यह भी है कि इन शहरों में पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने के लिए हरित पट्टी नहीं विकसित की गई है।

इस वजह से अब कई शहरों में लोगों का जीना बड़ा मुश्किल हो गया है। इस बात को स्वीकार करने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि आने वाले दिनों में इन शहरों की हालत और भी खराब होगी। जाहिर है कि ऐसी स्थिति में शहरों से पलायन शुरू होगा। अभी जहां लोग गांवों से शहरों में रहे हैं वहीं संभव है कि आने वाले दिनों में प्रदूषण की वजह से लोग शहरों से गांवांे का रुख करें। यह जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाली पलायन का एक चेहरा है।

पर्यावरण में पैदा हो रहे असंतुलन की वजह से दुनिया के कई क्षेत्रों में भूजल का स्तर काफी तेजी से नीचे जा रहा है। कई क्षेत्र में तो भूजल स्तर इतना नीचे चला गया है कि वहां लोगों का रहना संभव नहीं है। वहीं कई इलाके ऐसे हैं जो बारबार सूखे की मार झेलने को मजबूर हैं। दूसरी तरफ कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं जिन्हें अक्सर बाढ़ का सामना करना पड़ रहा है। कहा जाए तो जलवायु परिवर्तन रंग बदलबदल कर अलगअलग क्षेत्रों में अलगअलग तरीके से कहर ढाने लगा है। बजाहिर, जब यह कहर और बढ़ेगा तो संबंधित क्षेत्र के लोगों के सामने पलायन के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचेगा।

दुनिया के कई देशों में जलवायु परिवर्तन की वजह से पलायन शुरू भी हो गया है। अभी इस समस्या से अफ्रीकी देशों के कुछ क्षेत्रों के लोग जूझ रहे हैं। उदाहरण उत्तरी कीनिया के तुरकाना लिया जा सकता है। इस इलाके में पहले हर आठ साल पर एक साल सूखा पड़ता था। अब यहां हर तीन साल में एक साल सूखा पड़ रहा है। इस वजह से वहां से लोगों का पलायन शुरू हो गया है। वहां से पलायन करने वाले लोगों की संख्या दिनोंदिन बढ़ते जा रही है। उस क्षेत्र का अध्ययन करने के बाद वैज्ञानिकों ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन की यही गति बनी रही तो इस क्षेत्र से पलायन करनेे वाले लोगों की संख्या 2040 तक दोगुनी हो जाएगी।

प्रदूषण की वजह से समुद्र के जल स्तर में बढ़ोतरी की बात काफी पहले से हो रही है। इस वजह से बड़ी संख्या में विस्थापन होगा और लोग अपने अस्तित्व को बचाने के लिए दरदर की ठोकरें खाने को मजबूर होंगे। वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि अगर समुद्र के जल स्तर में एक मीटर बढ़ोतरी होती है तो 2.4 करोड़ लोग विस्थापित होंगे। यह जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाले पलायन का एक भयावह चेहरा है। समय रहते सियासत छोड़कर समर्पण के साथ पर्यावरण को बचाने की मुहिम दुनिया भर में नहीं चलाई गई तो इसके बुरे नतीजों से बचना किसी के लिए भी संभव नहीं होगा।

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