बहादुरी का दमन

हिमांशु शेखर

बीते दिनों श्रीलंका की एक अदालत ने वहां के एक पत्रकार जेएस तिसैनयागम को बीस साल के जेल की सजा सुना दी। तिसैनयागम को उनके दोस्त थिस्सा बुलाते हैं। उन्हें बीस साल कैद की सजा इसलिए सुनाई गई कि उन्होंने दो ऐसे लेख लिखे थे जिसे वहां की सरकार और वहां की न्यायपालिका देश के कानूनों के खिलाफ मानती थी।

उन्होंने ये लेख 2006 और 2007 में नार्थ ईस्टर्न हेराल्ड पत्रिका में लिखे थे। यह पत्रिका अब बंद हो गई है। इन लेखों में उन्होंने एलटीटीई से लडऩे के सरकारी तौर-तरीके पर सवाल खड़ा किया था। इसमें उन्होंने लिखा था कि सरकार एलटीटीई के खिलाफ लड़ाई में आम नागरिकों को शामिल करने के लिए उन्हें प्रलोभन दे रही है।

जाहिर है कि किसी भी सत्ता व्यवस्था के इस रवैये की आलोचना एक सही पत्रकार करेगा ही लेकिन इस आलोचना की ऐसी सजा मिलना उस देश की व्यवस्था के खोखलेपन को सामने लाता है। थिस्सा को 2008 को मार्च में गिरफ्तार किया गया था। इसके पांच महीने बाद उन पर आतंकवाद निरोधी कानून लगा दिया गया।

उन पर आरोप लगाया गया कि उनकी पत्रकारिता देश विरोधी है और आतंकवाद को बढ़ावा देने का काम कर रही है। उन पर एलटीटीई से सांठगांठ का भी आरोप लगाया गया। कहा गया कि वे षडयंत्र में शामिल थे और उन्होंने आपातकाल के दिशानिर्देशों का भी उल्लंघन किया। थिस्सा को सजा सुनाते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि उनके लेख कानूनों का उल्लंघन करते हैं और सांप्रदायिक वैमनस्य बढ़ाने वाले हैं।

इस बीच थिस्सा को दो अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार देने की घोषणा भी हो गई है। कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट थिस्सा को साल 2009 के लिए प्रेस फ्रीडम अवार्ड देगी। वहीं दूसरी तरफ ग्लोबल मीडिया फोरम और रिपोर्टर्स विदाउट बाउंडरी की अमेरिकी शाखा थिस्सा को साहस और सिद्धांतों की पत्रकारिता के लिए पहला पीटर मैकलर अवार्ड देगी।

बताते चलें कि थिस्सा श्रीलंका के प्रमुख अखबार संडे टाइम्स के स्तंभकार थे और एक वेबसाइट भी चलाते थे। उन्होंने दिल्ली के जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की शिक्षा हासिल की थी। दरअसल, श्रीलंका में पत्रकारों का दमन नया नहीं है। थिस्सा को दी गई सजा को भी श्रीलंकाई सरकार के दमनकारी प्रवृत्ति से ही जोड़कर देखा जाना चाहिए।

श्रीलंका में पत्रकारों की हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक 2006 से लेकर इस साल के मध्य तक कम से कम 14 पत्रकारों की हत्या की गई है। बजाहिर, ये हत्याएं उन्हीं पत्रकारों को हुईं जिन्होंने वहां की राजसत्ता के सामने घुटने टेकने से इनकार कर दिया और अपने पत्रकारिता धर्म को निभाया।

श्रीलंका में पत्रकारों की सिर्फ हत्या ही नहीं हो रही है बल्कि जो पत्रकार व्यवस्था विरोधी रहे हैं, उन्हें देश छोडऩे को बाध्य किया जा रहा है। न्यूयॉर्क में एक संस्था है कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट। इसका अनुमान है कि सिर्फ 2008 में कम से कम 11 श्रीलंकाई पत्रकारों को वहां की सरकार ने देश छोडऩे पर बाध्य कर दिया। वहीं कुछ संगठन तो इस संख्या को 40 बताते हैं।

संख्या में थोड़ा फर्क हो सकता है लेकिन इतना तो तय है कि श्रीलंका में पत्रकारों का दमन वहां की स्थापित और खुद को लोकतांत्रिक कहने वाली व्यवस्था ही कर रही है। इसी साल जनवरी में वहां संडे लीडर के संपादक लसांत विक्रमतुंग की हत्या कर दी गई थी और उन्होंने अपनी हत्या की आशंका पहले ही जता दी थी।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या किसी ऐसी व्यवस्था को लोकतांत्रिक व्यवस्था कहा जा सकता है जहां मुक्त प्रेस की बात तो की जाती है लेकिन व्यावहारिक तौर पर ऐसा नहीं हो? क्योंकि किसी भी लोकतंत्र के लिए बुनियादी जरूरतों में मुक्त प्रेस के अस्तित्व को शुमार किया जाता है।

कुछ लोग कह सकते हैं कि मुक्त प्रेस की अवधारणा तो सही है लेकिन इसमें भी कुछ जरूरी बंदिशें होती हैं। यह बात बिल्कुल सही है लेकिन इनकी भी एक सीमा होती है। श्रीलंकाई पत्रकार थिस्सा पर वहां की व्यवस्था ने यह आरोप लगाया कि वह एलटीटीई के लिए प्रोपगंडा पत्रकारिता करते हंै और एलटीटीई उन्हें पैसा देती है। पर सच यह नहीं है।

ऐसा इसलिए कि जब फैसला थिस्सा के लेखन और उनकी पत्रिका में छपे हुए शब्दों के आधार पर किया जा रहा हो तो यह निष्पक्ष होना चाहिए। थिस्सा नार्थ ईस्टर्न हेराल्ड का संपादन करते थे। इस पत्रिका पर भले ही एलटीटीई समर्थक होने का आरोप लगता हो लेकिन इसकी सामग्री से इस आरोप की आधारहीनता का अहसास होता है।

इस पत्रिका में सरकार और उसकी नीतियों का विरोध तो किया ही जाता था लेकिन एलटीटीई को भी नहीं बख्शा जाता था। एलटीटीई ने जब शंकर की फिल्म ब्वायज के प्रदर्शन को बाधित करने की कोशिश की थी तो उस वक्त भी इस पत्रिका ने एलटीटीई के खिलाफ लिखा था। ऐसे मौके कई बार आए।

वहां की व्यवस्था को यह नहीं दिखा और थिस्सा को बीस साल की सजा सुना दी गई। ऐसा करके वहां की सरकार ने यह साबित कर दिया है कि जो भी व्यवस्था और उसमें व्याप्त खामियों के खिलाफ बोलेगा उसका हश्र थिस्सा की तरह ही होगा।

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