बढ़ता धंधा पानी का

हिमांशु शेखर

इंसानी जीवन की बुनियादी जरूरतों में पानी को शुमार करना गलत नहीं होगा। लोगों को अगर भोजन नहीं मिले तो वे कुछ दिन तक जिंदा रह सकते हैं लेकिन पानी के बगैर कुछ घंटे काटना भी बेहद मुश्किल होता है। भारत में आजादी के बाद से कई क्षेत्रों में जल संकट गहराता जा रहा है। देश के एक बड़े तबके को पीने का साफ पानी नहीं मिल पा रहा है। हालांकि, कई क्षेत्र वैसे भी हैं, जहां पीने के पानी की कोई दिक्कत नहीं है। इसके बावजूद बड़े-बड़े महानगरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में पीने के पानी का संकट गहराता ही जा रहा है। एक स्तर तक तो सरकार ने भी मान लिया है कि अब वह पीने का साफ पानी आम लोगों को मुहैया नहीं करा सकती है।

इस संकट की आड़ में कई कारोबारों में बहुत ज्यादा चमक आई है। पानी के संकट ने पानी के कारोबार का काफी बढ़ा दिया है। जब सरकारी स्तर पर यह बात आने लगी कि पीने का साफ पानी नहीं मिल सकता है तो पानी के कारोबारियों के मन के हिसाब से माहौल बन गया। इसका नतीजा यह हुआ कि पानी से संबंधित कारोबारों में उफान आने लगा। इनमें सबसे ज्यादा कारोबार बढ़ा पानी शुद्ध करने का दावा करने वाली मशीन बनाने वाली कंपनियों का और बोतलबंद पानी का। इन दोनों का कारोबार आज अरबों में पहुंच गया है और दिनोंदिन इसमें बढ़ोतरी हो रही है। पर कई वैज्ञानिक अध्ययनों में यह बात साबित हो गई है कि जिन दावों के आधार पर इन दोनों कारोबारों का खड़ा किया गया है वे काफी हद तक खोखले हैं।

अध्ययनों में यह बात प्रमाणित हुई है कि पानी शुद्ध करने का दावा करने वाली मशीनें काफी हद तक असरहीन हैं। बोतलबंद पानी के मामले में तो और भी भयावह बातंे सामने आ रही हैं। कई मामलों में यहां तक कहा गया है कि बोतलबंद पानी सामान्य पानी की तुलना में कहीं ज्यादा खतरनाक है। दरअसल, भारत मंे इन दोनों कारोबारों के तेजी से बढ़ने की मूल वजह बाजारवाद को माना जा सकता है। भूमंडलीकरण की आंधी भारत में 1991 से नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद काफी तेजी से चली और इसने कई स्थापित धारणाओं को धराशाई किया और नई बाजारवादी धारणाएं विकसित कीं।

इस बात में तो किसी को कोई संदेह नहीं है कि जल प्रदूषण काफी तेजी से फैल रहा है। सरकारी आंकड़े भी बताते हैं कि शहरी घरों से जितना कचरा निकल रहा है उसके 80 फीसद से ज्यादा की निस्तारण की क्षमता भारत के पास नहीं है। इसके अतिरिक्त औद्योगिक कचरे और भी चिंता बढ़ा रहे हैं। इसमें से ज्यादातर कचरा किसी न किसी तरह से पानी में ही मिल रहा है और जल प्रदूषण काफी तेजी से फैल रहा है। कचरे का निस्तारण नहीं होने की वजह से जमीन के अंदर का पानी भी दूषित हो रहा है।

तेजी से बढ़ते जल प्रदूषण को पानी के कारोबारियों ने हथियार की तरह इस्तेमाल किया। इसी हथियार के बूते लोगों के मन में यह भय बैठाया गया कि जो पानी नल से आ रहा है, वह पीने लायक नहीं है। इसलिए अगर स्वस्थ्य रहना हो तो बोतलबंद पानी का इस्तेमाल करो। जिनकी आर्थिक हैसियत बोतलबंद पानी के लायक नहीं थी उनके लिए पानी को शुद्ध करने का दावा करने वाली मशीने आ गईं। इन मशीनों के प्रति संस्थाओं का भी आकर्षण बढ़ाया गया। भूमंडलीकरण के बाद तो सत्ता व्यवस्था हमेशा से ही इस ताक में रही है कि कब उसे किसी जिम्मेवारी से मुक्ति मिले। पानी के मामले में भी यही हुआ।

सरकार ने मान लिया कि वह देश के सभी नागरिक को पीने का साफ पानी मुहैया नहीं करा सकती है। खुद सरकार पानी के धंधे में उतर गई। भारतीय रेल ने रेल नीर के नाम से खुद का बोतलबंद पानी बाजार में उतार दिया। जिस भारतीय रेल को सभी स्टेशनों और रेलगाड़ियों में पीने का स्वच्छ पानी उपलब्ध करवाना चाहिए था वह भारतीय रेल पीने का पानी बोतल में बंद करके बेचना लगा। जब भारतीय रेल ने बोतलबंद पानी बेचना शुरू कर दिया उसी वक्त इस बात पर मुहर लग गई कि सरकार की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। यह बात साफ हो गई कि सरकार भारतीय रेल को एक कंपनी मानती है और रेल नीर उसका एक उत्पाद है जिसके जरिए सरकार ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाती है। जब पैसा कमाना ही मकसद हो जाए तो फिर ग्राहक तैयार करने की कवायद भी कंपनियां करती हैं। ऐसे में जेहन में इस सवाल का उभरना स्वाभाविक है कि क्या भारतीय रेल ने जानबूझ कर पेयजल ढांचा ध्वस्त किया?

खैर, जब लोगों को यह लग गया कि सरकार या व्यवस्था तो साफ पानी की आपूर्ति कर ही नहीं सकती तो लोगों ने अपने-अपने स्तर पर साफ पानी के लिए बंदोबस्त करना शुरू किया। इसी वजह से पानी शुद्ध करने का दावा करने वाली मशीनों का कारोबार काफी तेजी से बढ़ा। इन मशीनों के कारोबार में 2000 के बाद काफी तेजी आई। 2005 का ही एक अध्ययन बताता है कि उस वक्त देश के हर 40 घर में से एक घर में इन मशीनों का इस्तेमाल हो रहा था। यह आंकड़ा चार साल पहले का है और इस बीच पानी को लेकर जिस तरह का भय लोगों के मन में पैदा किया गया है, उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि अब यह आंकड़ा काफी बढ़ गया होगा।

यही वजह है कि इन मशीनों के बाजार का आकार भी काफी बढ़ गया है। इसमें सही आंकड़े को लेकर एजंसियों में मतभेद है। एक एजंसी का दावा है कि अभी इनका कारोबार तकरीबन हजार करोड़ रुपए का है तो दूसरी एजेंसी कहती है कि इन मशीनों के कारोबार का आकार 1,400 करोड़ रुपए का है। इतना तो तय है कि ये कारोबार अरबों रुपए का है और इसमें काफी तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। भारत में इस कारोबार की बड़े नाम केंट, यूरेका फोर्बिस, उषा ब्रिटा और आयन एक्सचेंज हैं।

ये मशीनें दो पद्धति आरओ और यूवी पर काम करती हैं। इन दोनों पद्धतियों की अपनी-अपनी खामियां हैं। यूवी के बारे में जानकारों का कहना है कि इस पद्धति के जरिए जब पानी को शुद्ध करने का काम किया जाता है तो पानी में मौजूद कई तत्व भी उसमें से निकल जाते हैं। इसके अलावा इस पद्धति में पानी की भी बहुत बर्बादी होती है। जानकारों का कहना है कि इस पद्धति में 60 से 75 फीसद तक पानी बर्बाद हो जाता है। इसलिए इस पद्धति की वैश्विक स्तर पर आलोचना होती रही है। साफ है कि इस पद्धति के जरिए लोगों को शुद्ध पानी मुहैया कराने का दावा काफी हद तक खोखली है।

रही बात आरओ यानी रिवर्स आॅस्मोसिस पद्धति की तो इसके बारे में तो विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी नकारात्मक बातें कही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि आरओ पद्धति लिंडेन जैसी कीटनाशकों को पानी से निकालने में सक्षम नहीं है। जबकि भारतीय घरों में पानी शुद्ध करने का दावा करने वाली मशीने लगी हुई हैं उसमें सबसे ज्यादा संख्या उन मशीनों की है जो आरओ पद्धति पर काम करती हैं। तकरीबन 42 फीसद घरों में इसी पद्धति पर काम करने वाल मशीनें लगी हुई हैं। कई अध्ययनों में तो यहां तक कहा गया है कि इस पद्धति पर काम करने वाली मशीनें पानी में से नमक और जरूरी तत्व भी बाहर निकाल देती हैं। यानी वैज्ञानिक अध्ययन इस बात को साबित करते हैं कि इस पद्धति से यह सुनिश्चित नहीं होता है कि आपको पीने के लिए शुद्ध पानी मिल पाएगा। आरओ पद्धति में भी तकरीबन 60 फीसदी पानी बर्बाद होता है। इसलिए इन मशीनों की सबसे बड़ी खामी तो यही है कि इसमें बड़ी मात्रा में पानी बर्बाद होता है।

अब बात बोतलबंद पानी की। वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो बोतलबंद पानी का कारोबार खरबों में पहुंच गया है। शुद्धता और स्वच्छता के नाम पर बोतलों में भरकर बेचा जा रहा पानी भी सेहत के लिए खतरनाक है। यह बात कई अध्ययनों में उभरकर सामने आई है। इसके अलावा बोतलबंद पानी के इस्तेमाल के बाद बड़ी संख्या में बोतल कचरे में तब्दील हो रहे हैं और ये पर्यावरण के लिए गंभीर संकट खड़ा कर रहे हैं।

अमेरिका की एक संस्था है नेचुरल रिसोर्सेज डिफेंस काउंसिल। इस संस्था ने अपने अध्ययन के आधार पर यह नतीजा निकाला है कि बोतलबंद पानी और साधारण पानी में कोई खास फर्क नहीं है। मिनरल वाटर के नाम पर बेचे जाने वाले बोतलबंद पानी के बोतलों को बनाने के दौरान एक खास रसायन पैथलेट्स का इस्तेमाल किया जाता है। इसका इस्तेमाल बोतलों को मुलायम बनाने के लिए किया जाता है। इस रसायन का प्रयोग सौंदर्य प्रसाधनों, इत्र, खिलौनों आदि के निर्माण में किया जाता है। इसकी वजह से व्यक्ति की प्रजनन क्षमता पर नकारात्मक असर पड़ता है। बोतलबंद पानी के जरिए यह रसायन लोगों के शरीर के अंदर पहुंच रहा है।

यह रसायन उस वक्त बोतल के पानी में घुलने लगता है जब बोतल सामान्य से थोड़ा अधिक तापमान पर रखा जाता है। ऐसी स्थिति में बोतल में से खतरनाक रसायन पानी में मिलते हैं और उसे खतरनाक बनाने का काम करते हैं। अध्ययनों में यह भी बताया गया है कि चलती कार में बोतलबंद पानी नहीं पीना चाहिए। क्योंकि कार में बोतल खोलने पर रासायनिक प्रतिक्रियाएं काफी तेजी से होती हैं और पानी अधिक खतरनाक हो जाता है।

बोतल बनाने में एंटीमनी नाम के रसायन का भी इस्तेमाल किया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बोतलबंद पानी जितना पुराना होता जाता है उसमें एंटीमनी की मात्रा उतनी ही बढ़ती जाती है। अगर यह रसायन किसी व्यक्ति की शरीर में जाता है तो उसे जी मचलना, उल्टी और डायरिया जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इससे साफ है कि बोतलबंद पानी शुद्धता और स्वच्छता का दावा चाहे जितना करें लेकिन वे भी लोगों के लिए परेशानी का सबब बन सकती हैं।

बोतलबंद पानी के खतरनाक होने की पुष्टि कैलीफोर्निया के पैसिफिक इंस्टीटयूट के एक अध्ययन से भी होती है। इस संस्थान ने अध्ययन करके यह बताया है कि 1990 से लेकर 2007 के बीच कम से कम एक सौ मौके ऐसे आए जबं बोतलबंद पानी बनाने वाली कंपनियों ने ही अपने उत्पाद को बाजार से हटा लिया। वह भी बगैर उपभोक्ताओं को सूचना दिए। कंपनियों ने ऐसा इसलिए किया कि इन मौकों पर बोतलबंद पानी प्रदूषित था।

इसके अलावा बोतलबंद पानी तैयार करने में भारी मात्रा में जल की बर्बादी हो रही है। एक लीटर बोतलबंद पानी तैयार करने में दो लीटर सामान्य पानी खर्च होता है। यानी एक तरफ तो जल संरक्षण की बात चल रही है और दूसरी तरफ शुद्ध पेयजल तैयार करने के नाम पर पानी की बर्बादी की जा रही है। पानी की बर्बादी शुद्ध पेयजल देने वाली मशीनें भी भारी मात्रा में कर रही हैं।  बोतलबंद पानी तैयार करने के नाम पर भूजल का दोहन जमकर किया जा रहा है। इसके बावजूद जो पानी तैयार हो रहा है वह स्वच्छ नहीं है।

2 thoughts on “बढ़ता धंधा पानी का

  1. बिल्कुल सही कह रहे हैं आप …आज दिल्ली जैसे महानगरों में भी ऐसी हालत हो गई है कि यहां तो बाकायदा पानी माफ़िया तक पैदा हो गए हैं । अफ़सोस कि सरकार और समाज अभी तक पानी के प्रति गंभीर नहीं हो पाए हैं

  2. Aapaka yah lekh prenanadayak hai. Mere vichar se “Ubala huaa Paanee”(Boiled Water) prayag karane se behatar koie viklp nahee hai.

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