फैसले का फलसफा

हिमांशु शेखर

हाल ही में यूपीए सरकार ने जब एक झटके में कई आर्थिक फैसले लिए और तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी ने इन फैसलों को वापस लेने के लिए अल्टीमेटम दिया तो किसी ने भी उन्हें खास गंभीरता से नहीं लिया. न राजनीतिक वर्ग ने और न ही मीडिया ने. वजह यह थी कि कांग्रेसनीत सरकार की सबसे बड़ी सहयोगी ममता पहले भी कई बार गरजी थीं और फिर बगैर बरसे ही शांत हो गई थीं. इस बार भी यही माना जा रहा था. कहा जा रहा था कि ज्यादा होगा तो ममता केंद्रीय मंत्रिमंडल से अपने मंत्रियों को वापस बुला लेंगी. लेकिन हुआ उलटा. ममता ने केंद्र सरकार की नीतियों को जनविरोधी बताते हुए अपना समर्थन वापस ले लिया. पश्चिम बंगाल में वे कांग्रेस के सहयोग से सरकार चला रही थीं. हालांकि तृणमूल कांग्रेस के पास वहां खुद ही बहुमत था लेकिन दोनों दलों का चुनाव से पहले का गठबंधन बाद में भी बना रहा. अब कांग्रेस ने भी बंगाल में सरकार से समर्थन वापस ले लिया है.

अब सवाल यह है कि ममता का केंद्र सरकार से अलग होने का मतलब उनके प्रदेश के लिए क्या हैं. इस सवाल का जवाब देने के लिए पश्चिम बंगाल की राजनीति को समझना बहुत जरूरी है. पूर्वी भारत के इस राज्य में 30 साल से अधिक समय तक वाम दलों की सरकार रही है. बड़ी मुश्किल से ममता ने इन्हें 2011 में राज्य की सत्ता से बेदखल किया. वे राज्य में भाजपा के साथ मिलकर भी चुनाव लड़ी हैं, लेकिन उन्हें कामयाबी मिली कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के बाद. प. बंगाल में कांग्रेस और भाजपा यानी दोनों राष्ट्रीय पार्टियों की हालत खराब है. दोनों सहयोगी की भूमिका में ही रह सकती हैं. इसलिए ममता जानती हैं कि राज्य में उनका असल मुकाबला वाम दलों से है. उन्हें यह भी पता है कि अगर उन्होंने कोई सियासी गलती की तो पश्चिम बंगाल में वाम दल मजबूत होंगे और इसका राजनीतिक खमियाजा उन्हें भुगतना पड़ेगा.

अब सवाल यह है कि आखिर इसका केंद्र से समर्थन वापस लेने से क्या संबंध है. वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता कहते हैं, ‘ममता ने केंद्र सरकार से समर्थन वापस लेकर राजनीतिक स्तर पर दो मकसद साधे हैं.  प. बंगाल में चुनावी मुद्दे गरीबों से हमदर्दी के आस-पास केंद्रित रहते हैं. वाम दलों ने तीन दशकों तक इन्हीं मुद्दों के सहारे राज किया. ममता को पता है कि अगर उन्होंने कोई गलती की तो इसका सीधा फायदा वाम दलों को होगा. इसलिए उन्होंने खुदरा में विदेशी निवेश, डीजल और रसोई गैस के दाम बढ़ाने के मसले पर समर्थन वापस लेकर यह संदेश दिया है कि राज्य के गरीबों की चिंता वाम दलों को नहीं बल्कि तृणमूल कांग्रेस को भी है.’ वे आगे कहते हैं, ‘समर्थन वापस लेकर ममता ने बतौर मुख्यमंत्री अपने तकरीबन डेढ़ साल के कार्यकाल में जो गलतियां की थीं उन्हें ठीक करने की कोशिश की है. इस दौरान कई तरफ यह बात चलने लगी थी कि ममता बंगाल के लिए कुछ नहीं कर पा रही हैं. लेकिन संप्रग से अलग होने के बाद उन्हें उम्मीद है कि जनता का भरोसा उन पर बना रहेगा.’

पहले भी ममता बनर्जी ने कुछ ऐसे काम किए हैं जिससे ऐसा लगता है कि वे किसी भी कीमत पर अपनी गरीबपरस्त छवि के साथ समझौता नहीं करना चाहती हैं. जब पिछले साल दिसंबर में केंद्र सरकार ने खुदरा में विदेशी निवेश को हरी झंडी दे दी थी तो उस वक्त भी ममता अड़ गई थीं. उस वक्त उत्तर प्रदेश में चुनाव होने थे इसलिए केंद्र सरकार को बचाने के लिए मुलायम सिंह यादव और मायावती की सेवाएं उपलब्ध नहीं थीं. यही वजह है कि केंद्र सरकार को ममता के आगे झुकना पड़ा और खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश का निर्णय टालना पड़ा. तब भी ममता ने यह संदेश देने की कोशिश की थी कि गरीबों की असली हितैषी वे ही हैं. डीजल और पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर भी ममता  केंद्र सरकार से कई बार टकराती हुई दिखीं. यह बात तो कांग्रेस को रेल बजट के वक्त ही समझ में आ जानी चाहिए थी कि वे किसी कीमत पर अपनी गरीबपरस्त छवि से समझौता नहीं करेंगी. रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने जब बजट में यात्री किराया बढ़ाने का प्रस्ताव किया तो इसका सबसे अधिक विरोध उन्हीं की पार्टी तृणमूल ने किया. अंततः दिनेश त्रिवेदी को इस्तीफा देना पड़ा और किराये में प्रस्तावित बढ़ोतरी नहीं हो पाई.

ममता बनर्जी जब से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनी हैं तब से लगातार इस कोशिश में हैं कि राज्य को विशेष पैकेज मिल जाए क्योंकि इसकी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा मोटे कर्ज का ब्याज देने में ही चला जाता है. जब प्रणब मुखर्जी केंद्रीय वित्त मंत्री थे तो ममता ने इसके लिए काफी कोशिशें कीं लेकिन नतीजा सिफर रहा. जब तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें केंद्र से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा था तो ममता की नाराजगी स्वाभाविक है. जानकार बताते हैं कि केंद्र  द्वारा पश्चिम बंगाल को आर्थिक सहयोग देने की राह में सबसे बड़ी अड़चन थी ममता की राजनीति की शैली. केंद्र जिस तरह के आर्थिक बदलाव पश्चिम बंगाल में चाह रहा था उसके लिए ममता तैयार नहीं थीं. इस नाते देखा जाए तो उनको केंद्र सरकार के साथ रहने का कोई फायदा नहीं मिल रहा था. बंगाल की जनता में यह बात होने लगी थी कि ममता राज्य में भी हैं और केंद्र में भी लेकिन सूबे का विकास नहीं हो पा रहा है. ठाकुरता कहते हैं, ‘कांग्रेस के साथ रहते हुए ममता के पास यह विकल्प नहीं था कि वे जिस ढंग से वाम दलों पर हमला करती हैं उसी तरह से कांग्रेस पर भी कर सकें. लेकिन अब वे कांग्रेस पर प. बंगाल के साथ भेदभाव का आरोप लगा सकती हैं. वे जनता को यह संदेश दे सकती हैं कि केंद्र सरकार अपने वादे से मुकर रही है और राज्य को उसका हक नहीं दे रही है. अगर ममता इस संदेश को सही ढंग से लोगों के बीच पहुंचाने में कामयाब हुईं तो 2014 के चुनावों में उन्हें और मजबूती मिल सकती है. चाहे राज्य सरकार का प्रदर्शन कैसा भी रहे.’

दरअसल, कई राजनीतिक जानकार केंद्र से अलग होने के ममता के फैसले को अगले लोकसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़कर देखते हैं.  संगठन के लिए काम कर रहे एक बड़े कांग्रेसी नेता कहते हैं, ‘ममता जब केंद्र पर भेदभाव का आरोप लगाएंगीं तो उन्हें वैसे मुख्यमंत्रियों का स्वाभाविक समर्थन मिलेगा जो पहले से ही केंद्र पर ऐसा आरोप लगा रहे हैं. ये मुख्यमंत्री इसलिए भी ममता का समर्थन करेंगे कि अगले लोकसभा चुनाव से पहले उनसे इनके रिश्ते ठीक रहें. पता नहीं कब किसे किसकी जरूरत पड़ जाए.’ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक केंद्र सरकार पर भेदभाव बरतने का आरोप लगाते रहे हैं. एनसीटीसी के मसले पर ममता, नीतीश और नवीन ने एकजुटता भी दिखाई थी. उस वक्त यह बात भी चली थी कि ममता चाहती हैं कि पूर्वी भारत के राज्यों के मुख्यमंत्री केंद्र की भेदभावपूर्ण नीति के खिलाफ एक साथ मिलकर काम करें. जानकारों की मानें तो अब ममता इस विकल्प की व्यावहारिकता परखने का काम भी करेंगी.

जानकार यह भी बताते हैं कि ममता एक साथ कई राजनीतिक संभावनाएं टटोल रही हैं. एक तरफ वे पूर्वी भारत के मुख्यमंत्रियों का समूह बनाकर नई राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश में हैं तो दूसरी तरफ शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और करुणानिधि की डीएमके से भी उनकी नजदीकियां बढ़ रही हैं. सूत्र बताते हैं कि इन तीनों दलों के प्रतिनिधियों के बीच दो दौर की बातचीत हुई भी है. ऐसे में एक संभावना यह भी है कि ये तीनों दल मिलकर किसी राजनीतिक प्रयोग की योजना बना रहे हों. तीसरी संभावना यह बनती है कि ममता भाजपा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल हो जाएं. वे इस गठबंधन में न सिर्फ पहले रह चुकी हैं बल्कि गठबंधन की सरकार में रेल मंत्री भी रही हैं. हालांकि इसकी संभावना काफी कम बताई जा रही है. एक कांग्रेसी नेता कहते हैं, ‘ममता को पता है कि पश्चिम बंगाल में कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां जीत-हार में मुसलमान वोटों की बड़ी भूमिका होती है. अगर ममता भाजपा के साथ जाती हैं तो यह वोट उनसे अलग होगा. इसलिए ममता ऐसी गलती नहीं करेंगी. 2014 के चुनाव के बाद भी इसकी संभावना इसलिए नहीं दिखती क्योंकि इसके कुछ ही समय बाद राज्य में विधानसभा के चुनाव होंगे. ‘ऐसे में एक संभावना यह भी बनती है कि अगले लोकसभा चुनाव में वाम दलों और कांग्रेस का विरोध करते हुए ममता राज्य में अधिक से अधिक सीटें हासिल करें और अगर संप्रग के तीसरी बार सत्ता में आने की कोई स्थिति बनती है तो वे फिर से कांग्रेस के साथ खड़ी दिखें.

हालांकि, तृणमूल के लिए भी कांग्रेस से अलग होने का फैसला आसान नहीं था. यही वजह है कि जिस बैठक में अलग होने का फैसला किया गया वह बैठक तीन घंटे से अधिक देर तक चली. यह बात हर कोई जानता है कि क्षेत्रीय दलों में फैसले कैसे लिए जाते हैं. ममता की छवि भी खुद ही निर्णय लेने वाली नेता की रही है. लेकिन इसके बावजूद इतनी लंबी बैठक करके यह फैसला किया गया है. इस बैठक में शामिल ममता बनर्जी के एक सहयोगी बताते हैं, ‘इस बैठक में भी और इसके पहले भी पार्टी में दो राय थी. कुछ लोग यह चाहते थे कि सिर्फ मंत्री वापस लिए जाएं और समर्थन वापस नहीं लिया जाए. कांग्रेस के साथ रिश्ते बरकरार रखने की वकालत करने वाले नेताओं में प्रमुख नाम है राज्य के वित्त मंत्री अमित मित्रा का. इन नेताओं की चिंता यह भी थी कि बंगाल के लिए चलाई जा रही केंद्र की तकरीबन एक लाख करोड़ रुपये की परियोजनाओं का भविष्य अधर में लटक जाएगा. लेकिन हर कोई यह मान रहा था कि दीदी जो फैसला करेंगी वही सही होगा.’

तो क्या यह फैसला सिर्फ दीदी का है? वे कहते हैं, ‘बैठक में दीदी ने हर किसी की बात सुनी. उन्होंने पहली बार चुनकर आए विधायकों की बात को भी गंभीरता से सुना. जब बैठक शुरू हुई तो उन्होंने सबसे पहले पूर्व रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी को बोलने के लिए कहा. इसके बाद पार्टी सांसद हाजी नुरुल इस्लाम बोले. पहली बार विधायक बनाकर आए बेचराम मन्ना को भी बोलने का अवसर मिला. एक केंद्रीय मंत्री का कहना था कि समर्थन वापस लेने से राज्य की रेल परियोजनाएं लटक जाएंगी. लेकिन ज्यादातर नेताओं ने कहा कि केंद्र से समर्थन वापस लेने का वक्त आ गया है. दीदी अंत में बोलीं और समर्थन वापसी का फैसला सुनाया.’ इस बैठक में ममता ने पार्टी नेताओं को यह भरोसा दिलाया कि समर्थन वापसी से उन्हें कोई राजनीतिक नुकसान नहीं बल्कि फायदा ही होगा.

बहरहाल, केंद्र सरकार से अलग होने की वजह से पश्चिम बंगाल की तकरीबन एक लाख करोड़ रुपये की परियोजनाओं पर आशंकाओं के बादल मंडराने लगे हैं. राज्य में 70,000 करोड़ रुपये की रेल परियोजनाओं पर काम चल रहा है. इसके अलावा तकरीबन 5,000 करोड़ रुपये की मेट्रो रेल परियोजना का मामला भी अब लटक सकता है. साथ ही 16,000 करोड़ रुपये के प्रस्तावित पैकेज में भी अब देरी हो सकती है. हालांकि, रेल मंत्रालय का कार्यभार संभालने वाले सीपी जोशी ने  कहा है कि प. बंगाल के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा और सभी परियोजनाओं पर काम आगे बढ़ेगा. लेकिन खबर लिखे जाने तक रेलवे द्वारा जारी की गई दुर्गा पूजा स्पेशल ट्रेनों की लिस्ट में पश्चिम बंगाल के लिए कोई गाड़ी शामिल न होने से संकेत कुछ और दिख रहे हैं. हालांकि ठाकुरता कहते हैं कि केंद्र राज्य की परियोजनाओं को टालने का जोखिम नहीं ले पाएगी क्योंकि उसे पता है कि अगले लोकसभा चुनाव के बाद फिर से कांग्रेस को ममता की जरूरत पड़ सकती है.

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