पेड न्यूज का चुनावी पेंच

हिमांशु शेखर

जब पिछला लोकसभा चुनाव 2009 में हुआ था तो पहली बार पेड न्यूज के मामले को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का काम जाने-माने पत्रकार और संपादक प्रभाष जोशी ने किया था। जब उन्होंने मीडिया को लगी पेड न्यूज नामक बीमारी को लेकर पत्र-पत्रिकाओं में लिखना शुरू किया तो मीडिया के कर्ताधर्ता स्तब्ध थे। क्योंकि हर व्यवस्था की खामियों को उजागर करने वाली मीडिया में इस बात पर मौन सहमति थी कि चुनाव अधिक से अधिक पैसा कमाने का एक अवसर है और इसके लिए मीडिया घरानों द्वारा जो भी कदम उठाए जा रहे हैं, उसके सही या गलत होने को लेकर कोई सवाल नहीं उठाएगा। लेकिन जब प्रभाष जी ने इस मसले को उठाया तो और भी कई जगह इस पर बात हुई और काफी हो-हल्ले के बाद इस मामले की जांच के लिए समिति बनी और उसकी रिपोर्ट आई। चुनाव आयोग ने चुनाव के दौरान पेड न्यूज पर निगरानी रखने का बंदोबस्त किया। इन उपायों के बाद पहली बार लोकसभा चुनाव 2014 में हो रहा है। अब ऐसे में यह जिज्ञासा पैदा होना स्वाभाविक है कि इतने हो-हल्ले और उपायों के बाद हो रहे पहले लोकसभा चुनाव में पेड न्यूज जैसी गंभीर बीमारी का हाल क्या है?

इस चुनावी मौसम में अगर कोई अखबारों को देखे और 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान इन्हीं अखबारों की प्रतियों को देखें तो उसे एकबारगी लग सकता है कि मीडिया को पेड न्यूज नाम का जो रोग लगा था, वह ठीक हो गया है। 2009 में पेड न्यूज का हाल यह था कि एक ही अखबार के एक ही पन्ने पर कई बार दो और कई बार तो दो से अधिक उम्मीदवारों की सुनिश्चित जीत वाली खबर प्रकाशित हो जाती थी। एक ही पन्ने पर प्रकाशित हो रही खबरों का फाॅन्ट भी अलग-अलग दिखता था। इससे भी साफ मालूम चल जाता था कि दाल में कुछ काला है। कई बार तो ऐसा भी दिखता था कि विभिन्न अखबारों में एक ही खबर एक ही शीर्षक के साथ अलग-अलग बाईलाइन से छपती थी। अगर इन पैमानों को आधार बनाकर कोई अभी के अखबारों को देखेगा तो उसे यह लग सकता है कि पेड न्यूज की बीमारी खत्म हो गई है।

लेकिन हकीकत कुछ और है। दरअसल, जो लोग यह समझेंगे कि पेड न्यूज जैसी गंभीर बीमारी से मीडिया को मुक्ति मिल गई है, वे इस रोग की गंभीरता को समझने में चूक करेंगे। इस चुनाव में पेड न्यूज का क्या हाल है, यह जानने से पहले इसकी जानकारी जरूरी है कि पेड न्यूज से मीडिया घरानों को किस तरह के फायदे हैं। याद कीजिए जब 2009 के चुनाव हो रहे थे। यह वह दौर था जब पूरी दुनिया ने आर्थिक मंदी से जूझना शुरू किया था। लेकिन यही वह दौर था जब भारत के निजी क्षेत्र को 1991 में बोए गए आर्थिक उदारीरकरण के बीज का फल खाने का मिल रहा था। काॅरपोरेट घरानों की मुनाफे की भूख लगातार बढ़ती जा रही थी। मीडिया भी काॅरपोरेट घरानों की पूरी तरह से गिरफ्त में होने की वजह से मुनाफे की लत से अछूता नहीं रहा। आर्थिक मंदी की वजह से पारंपरिक विज्ञापनदाताओं से होने वाली आमदनी में कमी 2008 के अंत तक मीडिया को चुभने लगी थी।

ऐसे में जब 2009 में आम चुनाव का अवसर आया तो मीडिया घरानों की आर्थिक नीतियां निर्धारित करने वाले लोगों ने इसे एक ऐसे मौके के तौर पर देखा जिसके जरिए आर्थिक नुकसानों की भरपाई की जा सके। 2009 के आम चुनावों में पेड न्यूज को संस्थागत स्वरूप देने की एक बड़ी वजह यही थी। लेकिन प्रभाष जोशी जैसे पत्रकारों ने जिस तरह से पेड न्यूज का मसला उठाया उससे मीडिया घरानों के इस कारोबारी माॅडल पर कुठाराघात हुआ। 2012 से चुनाव आयोग ने पेड न्यूज पर नजर रखने के लिए जिला स्तरीय समिति बनाने की व्यवस्था की है। इसमें जिला अधिकारी के अलावा कुछ और अधिकारियों के साथ किसी पत्रकार या प्रबुद्ध नागरिक को रखने का प्रावधान है। इस आम चुनाव में भी ऐसी समितियां हर जिले में बनी हैं। 2013 में हुए विधानसभा चुनावों में मध्य प्रदेश में 165, राजस्थान में 81, छत्तीसगढ़ में 32 और दिल्ली में 25 मामले पेड न्यूज के पाए गए। वहीं 2012 में पंजाब में 523 और गुजरात विधानसभा चुनावों में 414 मामले पेड न्यूज के पाए गए थे।

इसका परिणाम इस बार के आम चुनावों में दिख रहा है। 2009 में मीडिया घरानों ने छिटपुट पत्रकारों द्वारा की जाने वाली वसूली को संस्थागत रूप देते हुए अपने पत्रकारों को वसूली का टार्गेट दे दिया था। लेकिन 2014 में इसे थोड़ा और संस्थागत बनाते हुए पेड न्यूज को लेकर होने वाले सौदों को मुख्यालय केंद्रित बना दिया गया है। ऐसा नहीं है कि स्थानीय स्तर पर वसूली को लेकर कोई रोक है, लेकिन आम तौर पर इस बार पेड न्यूज में शामिल अखबारों ने अपने-अपने लिए किसी न किसी खास पार्टी से मुख्यालय के स्तर पर ही सौदा कर लिया है।

बिहार से प्रकाशित होने वाले एक प्रमुख अखबार में काम करने वाले एक पत्रकार ने पहचान उजागर नहीं करने की शर्त पर यह बताया कि इस चुनाव में उनका अखबार पेड न्यूज के काम को किस तरह अंजाम दे रहा है। यहां जिस अखबार की बात हो रही है, वह दिल्ली समेत देश के कई और राज्यों में प्रकाशित होता है। लेकिन बिहार के इसके संस्करण काफी मुनाफा देने वाले माने जाते हैं। इस पत्रकार की मानें तो इनके अखबार ने बिहार की सत्ताधारी पार्टी जनता दल यूनाइटेड के साथ तालमेल करके पेड न्यूज की अपनी एक व्यवस्था बना ली है। इस व्यवस्था के संचालन की जिम्मेदारी पटना के ब्यूरो प्रमुख को दी गई है। व्यवस्था के तहत होता यह है कि अगर कोई भी संवाददाता कोई भी राजनीतिक खबर फाइल करेगा तो वह सीधे ब्यूरो प्रमुख के पास जाएगी और वह उसे जनता दल यूनाइटेड के अनुकूल बनाकर ही प्रकाशित होने के लिए भेजेंगे। अगर किसी संवाददाता की खबर अनुकूल नहीं हो सकती तो वह प्रकाशित नहीं हो पाएगी। इस व्यवस्था में स्थानीय संपादक की कोई भूमिका नहीं है। अखबार में उनकी भूमिका गैर-राजनीतिक खबरों के चयन मात्र की ही है।

यह व्यवस्था पेड न्यूज जैसे अपराध के संस्थागत होने की कहानी बयां करती है। दरअसल, इस बार हो यह रहा है कि अखबारों ने हर पक्ष से पैसा वसूलने के बजाए किसी एक खास पार्टी को पकड़ने की तरजीह दी है। दिल्ली से प्रकाशित होने वाले एक बड़े हिंदी अखबार को अगर कोई ध्यान से देखे तो यह साफ पता चलता है कि उसमें भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनाए गए नरेंद्र मोदी के खिलाफ कोई भी खबर प्रकाशित नहीं होती। नरेंद्र मोदी की अगुवाई में केंद्र की सत्ता में वापसी करने में जुटी भाजपा ने भी पेड न्यूज के लिए बिल्कुल नए तरह का बंदोबस्त किया है। इसकी जानकारी भी बिहार में ही सक्रिय एक ऐसे व्यक्ति ने दी जो भाजपा के लिए पेड न्यूज लिखने का काम कर रहे हैं। इन्हें पार्टी की ओर से हर महीने 35,000 रुपये पार्टी की ओर से पगार के तौर पर दिए जाते हैं। इसके अलावा इन्हें एक गाड़ी, ड्राइवर, खाने-पीने का खर्चा और जिस शहर में जाएं वहां के सबसे अच्छे होटल में ठहरने का खर्च भी दिया जाता है। इनका काम यह है कि किसी एक जिले में जाएं, वहां के लोगों से बात करें, पार्टी कार्यकर्ताओं से बात करें और उस लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र की स्थिति को नरेंद्र मोदी के अनुकूल दिखाते हुए विश्वसनीय लगने वाले तथ्यों के साथ एक रिपोर्ट लिखें। इसके बाद इनका काम खत्म हो जाता है। उसे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपवाने का काम पार्टी करती है।

भाजपा से संबंधित पेड न्यूज का ही एक और मामला है। जिसका संज्ञान चुनाव आयोग ने भी लिया है। दिल्ली, पंजाब और हरियाणा समेत कई राज्यों में प्रकाशित होने वाला प्रमुख अखबार है पंजाब केसरी। इसके मालिक अश्विनी कुमार हरियाणा के करनाल में भाजपा प्रत्याशी हैं। इसलिए इस अखबार में उनके और उनकी पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने वाली खबरों की भरमार है। पंजाब केसरी यहीं नहीं रूक रहा है बल्कि अश्विनी कुमार के निर्वाचन क्षेत्र में इसकी प्रतियां मुफ्त में बंटवाई जा रही हैं। इसे गलत और अखबार में प्रकाशित खबरों को पेड न्यूज की श्रेणी में मानते हुए जिला निर्वाचन अधिकारी ने अश्विनी कुमार को नोटिस जारी किया है। यह उन्हें पेड न्यूज मामले में मिलने वाला दूसरा नोटिस है। हरियाणा में ही हरियाणा जनहित कांग्रेस के प्रत्याशी कुलदीप बिश्नोई और भारतीय राष्ट्रीय लोकदल के प्रत्याशी दुष्यंत चैटाला को भी पेड न्यूज मामले में नोटिस थमाया गया है।

पूर्वी दिल्ली से चुनाव लड़ रहे भाजपा प्रत्याशी महेश गिरी, कांग्रेस प्रत्याशी संदीप दीक्षित और आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार राजमोहन गांधी को भी पेड न्यूज मामले में नोटिस थमाया गया है। वहीं अरुणाचल प्रदेश से खबर यह है कि वहां के पत्रकारों ने खुद यह शिकायत की है कि कांग्रेस ने अपना चुनाव घोषणापत्र जारी करते हुए उन्हें पैसे देने की कोशिश की। इन पत्रकारों का यह कहना है कि उन्हें पार्टी की प्रेस विज्ञप्ति के साथ एक लिफाफा दिया गया जिसमें पैसे थे। चुनाव आयोग ने इस मामले में कांग्रेस को नोटिस जारी किया है।

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