पेड न्यूजः सब दल एक समाना

हिमांशु शेखर

2014 के लोकसभा चुनावों में पेड न्यूज की शिकायतों की अंतिम संख्या अभी चुनाव आयोग ने आधिकारिक तौर पर नहीं जाहिर की है लेकिन अनुमान है कि चुनावों के दौरान ऐसी शिकायतों की संख्या हजार से अधिक रही। चुनाव आयोग ने इस बारे में अंतिम आधिकारिक जानकारी चुनाव के आखिरी चरण के तकरीबन दस दिन पहले दी थी। इसके मुताबिक आयोग ने तब तक पेड न्यूज के 854 मामले दर्ज किए थे। इसमें सबसे अधिक 208 मामले आंध्र प्रदेश में दर्ज किए गए। वहीं महाराष्ट्र में ऐसे 118 मामले आयोग के सामने आए। उत्तर प्रदेश में तब तक पेड न्यूज के 98 मामले चुनाव आयोग तक पहुंचे थे। राजस्थान में ऐसे मामलों की संख्या उस वक्त तक 89 थी और पंजाब में 73। आयोग द्वारा यह जानकारी दिए जाने के बाद दो चरण के और चुनाव हुए।

आयोग द्वारा जारी किया जाने वाला अंतिम आंकड़ा चाहे जो भी हो लेकिन ये आंकड़े यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि इस लोकसभा चुनाव में पेड न्यूज का कारोबार बड़े पैमाने पर हुआ। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि यह पहला ऐसा लोकसभा चुनाव था जिसमें आयोग ने पेड न्यूज के मामलों पर निगरानी के लिए जिला स्तर पर बंदोबस्त कर रखा था। यही वजह है कि पेड न्यूज के इतने मामले आयोग तक पहुंचे। हालांकि, पेड न्यूज के बारे में एक आम धारणा यह बनी है कि पेड न्यूज का जितना खुल्लम-खुल्ला कारोबार 2009 के आम चुनावों में हुआ था, उतना खुल्लम-खुल्ला कारोबार इस लोकसभा चुनाव में नहीं हुआ। लेकिन इसके बावजूद पेड न्यूज के तकरीबन हजार मामलों का आयोग तक पहुंचना यह बताता है कि पेड न्यूज की बीमारी कितनी गहरी है।

इस चुनाव में पेड न्यूज को लेकर एक अच्छी बात यह रही कि चुनाव आयोग इस बार पेड न्यूज को लेकर पूरी तरह से मुस्तैद रहा। आयोग ने खुद तक पहुंचने वाली शिकायतों पर संज्ञान तो लिया ही, साथ ही साथ उसे जो भी खबर पेड न्यूज लगी उसका उसने स्वतः संज्ञान लिया। आयोग ने पेड न्यूज की तरह लग रही खबरों को लेकर उम्मीदवारों को तो पहले नोटिस जारी किया और जिन उम्मीदवारों ने नोटिस का जवाब नहीं दिया या जिनके जवाब से आयोग संतुष्ट नहीं हुआ, उनके चुनावी खर्चे में संबंधित खबर को विज्ञापन मानते हुए इसके खर्च को जोड़ दिया।

पेड न्यूज को लेकर यह चुनाव आयोग की ही चुस्ती थी कि उसने केंद्रीय मंत्रियों तक पर पेड न्यूज मामले में कार्रवाई करने में देर नहीं की। केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा मुंबई की एक सीट दक्षिण मुंबई से चुनाव लड़े। जब उनके पक्ष में स्थानीय अखबारों में लगातार खबरें छपने लगीं तो आयोग ने इसका संज्ञान लिया। आयोग ने इस मामले की छानबीन की। इसके बाद आयोग ने माना कि चार अखबारों ने मिलिंद देवड़ा से पैसे लेकर खबरें प्रकाशित की हैं। इनमें तीन मराठी के अखबार हैं। ये हैं- पुढारी, नवकाल और सकाल। वहीं चैथा अखबार गुजराती में छपने वाला मुंबई समाचार है। आयोग महाराष्ट्र में कांग्रेस के दो और नेताओं पर पेड न्यूज प्रकाशित कराने की जांच कर रहा है। इनमें पहले हैं संजय निरूपम और दूसरे हैं पुणे से पार्टी की ओर से चुनाव लड़े विश्वजीत कदम। निरूपम मुंबई की उत्तर मुंबई सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार थे। हालांकि, पुणे में भाजपा के उम्मीदवार अनिल शिरोले पर भी आयोग की ऐसी जांच चल रही है। अगर आयोग की जांच में आरोपों की पुष्टि होती है तो इन उम्मीदवारों के चुनावी खर्च में पेड न्यूज के खर्चों को जोड़ दिया जाएगा। हालांकि, जिन अखबारों की चर्चा ऊपर की गई है, उन अखबारों ने पेड न्यूज के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। इस बीच खबर यह है कि मिलिंद देवड़ा और संजय निरूपम ने पेड न्यूज के मामलों को स्वीकार कर लिया है और जिन खबरों को आयोग ने पेड न्यूज माना था, उन्हें विज्ञापन मानते हुए इसके खर्चों को इन दोनों कांग्रेसी नेताओं के चुनावी खर्च में जोड़ दिया गया है।

पेड न्यूज पर अंकुश लगाने को लेकर जो व्यवस्था की गई है, वह अधूरी है। ऐसा इसलिए कि अभी यह काम सिर्फ चुनाव आयोग के भरोसे छोड़ दिया गया है। इससे समस्या यह हो रही है कि आयोग ने जो जिला स्तरीय समिति पेड न्यूज के मामलों की पहचान और पेड न्यूज की शिकायतों पर कार्रवाई के लिए बनाई है, वह सिर्फ उम्मीदवारों पर ही कार्रवाई कर सकती है। उसके पास यह अधिकार नहीं है कि वह पेड न्यूज मामले में दोषी पाए जाने वाले मीडिया घरानों के खिलाफ कोई कार्रवाई कर सके। कार्रवाई की बात तो दूर इस समिति या यों कहें कि आयोग के पास यह अधिकार भी नहीं है कि वह पेड न्यूज के किसी संभावित मामले में किसी मीडिया संस्थान को नोटिस तक जारी कर सके। ऐसे में पेड न्यूज की इस बीमारी का अंत होता नहीं दिखता। ऐसे मामलों में आयोग बस यह करता है कि अगर किसी अखबार के खिलाफ शिकायत हो तो वह ऐसे मामलों के भारतीय प्रेस परिषद के पास भेज देता है और अगर किसी खबरिया चैनल से संबंधित मसला हो तो वह उसे न्यूज ब्राॅडकास्टर्स एसोसिएशन के पास भेज देता है। इसके बाद मीडिया घरानों के मामले में होने वाली कार्रवाई को लेकर आयोग के हाथ में कुछ नहीं रहता।

अगर सरकार या मौजूदा व्यवस्था को चलाने वाले लोग पेड न्यूज की समस्या को लेकर वाकई गंभीर हैं और चाहते हैं कि मीडिया को लगा यह रोग ठीक हो तो इसके लिए एक समग्र व्यवस्था करनी होगी। जिसके तहत न सिर्फ पेड न्यूज देने वाले लोगों पर कार्रवाई हो सके बल्कि पेड न्यूज के खेल में शामिल मीडिया घरानों पर भी नकेल कसा जा सके। क्योंकि चुनावों के दौरान पेड न्यूज के प्रकाशन से न सिर्फ संबंधित मीडिया घराने और उम्मीदवार के बीच एक भ्रष्ट समझौता होता है बल्कि यह अंततः एक आम पाठक को भ्रमित करता है और चुनाव में मतदान को लेकर उसके निर्णय को भी प्रभावित करता है। इसलिए लोकतंत्र के हित में तो यही है कि पेड न्यूज पर पूरी तरह से रोक लगाने वाली कोई ऐसी व्यवस्था विकसित की जाए जिसके जरिए सभी संबंधित पक्षों पर कार्रवाई हो सके। पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था को पेड न्यूज किस तरह से दुष्प्रभावित कर रहा है, इसे मुख्य चुनाव आयुक्त वीएस संपत कुछ इस तरह व्यक्त करते हैं, ‘पेड न्यूज का भ्रष्ट प्रभाव मीडिया, उम्मीदवारों और आम जनता सभी पर पड़ता है। यह एक ऐसी चीज है जिससे चुनाव प्रक्रिया का सबसे अधिक नुकसान हो रहा है।’

इस बीच पेड न्यूज के एक पुराने मामले में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। बीते दिनों उच्चतम न्यायालय ने महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने पेड न्यूज मामलों की जांच के लिए आयोग के अधिकार को चुनौती दी थी। 2009 में महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनावों में अशोक चव्हाण पर यह आरोप था कि उन्होंने मीडिया घरानों को काफी पैसे देकर अपने पक्ष में पेड न्यूज प्रकाशित कराए हैं। चव्हाण 2009 में महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव नांदेड़ में भोकर सीट से जीते थे। उनके विपक्षी निर्दलीय प्रत्याशी माधव किन्हालकर ने चुनाव आयोग में एक शिकायत दर्ज कर चव्हाण पर एक मराठी दैनिक में पैसे देकर ‘अशोक पर्व’ के नाम से अतिरिक्त परिशिष्ट छपवाने का आरोप लगाया था। हालांकि, चव्हाण और मराठी दैनिक के प्रबंधकों ने इससे इंकार करते हुए कहा था कि परिशिष्ट के लिए भुगतान नहीं किया गया था। इसके बाद चुनाव आयोग ने किन्हालकर के आरोपों की जांच शुरू की। जब उत्तर प्रदेश के एक विधायक उमलेश यादव की सदस्यता आयोग ने पेड न्यूज मामले को आधार बनाकर रद्द कर दिया तो इसके बाद चव्हाण को भी यह डर सताने लगा कि उनकी सदस्यता भी जा सकती है। इसके बाद चव्हाण ने 2010 में दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर निर्वाचन आयोग की जांच प्रक्रिया पर रोक लगाने की अपील की। पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया। इसके बाद चव्हाण ने दिल्ली उच्च न्यायालय के इस फैसले को देश के सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी। लेकिन वहां भी उन्हें मुंह की खानी पड़ी।

देश की सर्वोच्च अदालत ने इस मामले में एक अहम फैसला देते हुए कहा कि चुनाव आयोग को पेड न्यूज के आरोपों की जांच करने का अधिकार है। अदालत ने साफ किया कि अगर किसी उम्मीदवार ने चुनाव के दौरान नामांकन दाखिल करते वक्त अपने चुनावी खर्च में पेड न्यूज पर खर्च की जाने वाली रकम का जिक्र नहीं किया है तो आयोग इसकी जांच कर सकता है। न्यायमूर्ति सुरिंदर सिंह निज्जर और न्यायमूर्ति फक्कीर मोहम्मद इब्राहिम कलिफुल्ला की पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया था कि अगर कोई उम्मीदवार चुनाव के दौरान नामांकन दाखिल करते वक्त अपने चुनावी खर्च में पेड न्यूज पर खर्च की जाने वाली रकम का जिक्र नहीं करता है तो आयोग इसकी जांच कर सकता है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे कांग्रेसी नेता अशोक चव्हाण ने उच्च न्यायालय के इस निर्णय को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि चुनाव आयोग प्रतिदिन इस मामले की सुनवाई कर 45 दिनों के भीतर इस शिकायत का निपटारा करेगा। इस फैसले के बाद आयोग भी हरकत में आ गया है और उसने चव्हाण को नोटिस जारी करते हुए उन्हें 23 मई को आयोग के समक्ष पेश होने को कहा है। आयोग ने ऐसा ही नोटिस झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा को भी जारी किया है। उन पर भी पेड न्यूज प्रकाशित करवाने का आरोप है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *