पुलिस अधिकारी से बने नेता: अजय कुमार

हिमांशु शेखर

अजय कुमार उस दौर में बिहार में एसपी बने जब लालू प्रसाद यादव ने राज्य की सत्ता संभाली थी. भले ही लालू प्रसाद ने राज्य के एक बड़े वर्ग को आत्मविश्वास देने का काम किया हो लेकिन उनके कार्यकाल का एक दूसरा सच यह भी है कि बिहार में अपराधियों का बोलबाला बढ़ा और राजनीतिक दबाव ने कानून-व्यवस्था को भोथरा बनाना शुरू कर दिया. इसका नतीजा यह हुआ कि प्रशासन और व्यवस्था पर से लोगों का भरोसा उठने लगा. ऐसे समय में अजय कुमार जैसे अधिकारियों ने आकर जिस तरह से अपराधियों के खिलाफ काम करना शुरू किया उससे लोगों में आत्मविश्वास पैदा हुआ.

भारतीय पुलिस सेवा के 1986 बैच के अधिकारी अजय कुमार पटना के सिटी एसपी बने. दो साल के अपने कार्यकाल के दौरान वे कई ऐसे आपराधिक मामलों से सख्ती से निपटे जिनमें उन पर राजनीतिक दबाव होने की बात बिहार में की जाती है. इसके बाद उन्हें जमशेदपुर भेज दिया गया. उस समय बिहार का बंटवारा नहीं हुआ था.

बिहार के ईमानदार अधिकारियों के बीच जमशेदपुर की नियुक्ति को सजा माना जाता था. जमशेदपुर के बारे में यह प्रचलित था कि वहां काफी बड़े-बड़े और रसूख वाले कारोबारी हैं और अगर किसी अधिकारी के काम से उसके हित प्रभावित होते हैं तो संबंधित अधिकारी को कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. लेकिन यहां भी अजय कुमार ने बढ़िया काम किया. हालांकि, कुछ लोग यह भी कहते हैं कि टाटा समूह के आग्रह पर लालू यादव ने ही अजय कुमार को जमशेदपुर भेजा था ताकि वहां कानून-व्यवस्था दुरुस्त की जा सके. मूलतः कर्नाटक के रहने वाले अजय कुमार को बिहार में बतौर पुलिस अधिकारी अच्छे काम के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिल चुका है.

हालांकि, औपचारिक तौर पर तो वे नहीं मानते लेकिन बिहार-झारखंड में इस बात की चर्चा होती है कि जमशेदपुर जाने के बाद ही उनका भारतीय पुलिस सेवा से मोहभंग हो गया. इसके बाद उन्होंने टाटा कंपनी के साथ काम करना शुरू किया. लंबे समय तक वे टाटा के साथ जुड़े रहे. जब 2011 में जमशेदपुर सीट के लिए उपचुनाव होना था तो भाजपा से अलग होकर झारखंड विकास पार्टी बनाने वाले और झारखंड के पहले मुख्यमंत्री रहे बाबूलाल मरांडी ने उन्हें इस सीट से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया. अजय कुमार डेढ़ लाख से अधिक वोट से यह चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंच गए.

एसपी की भूमिका में अजय कुमार जिस तरह की उम्मीद लोगों में जगाते थे, उसी तरह की उम्मीद वे बतौर सांसद भी जगा रहे हैं. अब तक जितनी बार भी उन्होंने संसद में किसी मुद्दे पर बोला है, उसे सुनकर यह लगता है कि उनके पास समस्याओं के समाधान के लिए नए विचार हैं. विषयों को बारीकी से उठाने का उनका कौशल कई मौकों पर दिखता रहता है. 22 मार्च, 2012 को संसद में उन्होंने इस मामले को उठाया कि आखिर एकीकृत कार्ययोजनाओं में स्थानीय सांसदों से राय क्यों नहीं ली जाती. उनका तर्क था कि स्थानीय सांसद अपने यहां की स्थिति से अच्छी तरह से वाकिफ होता है, इसलिए उसकी राय ली जानी चाहिए.

जब एयर इंडिया को बचाने को लेकर संसद में बहस चल रही थी तो उस दौरान भी अजय कुमार ने बिल्कुल अलग बात कही. उन्होंने कहा, ‘इस नतीजे पर मत पहुंचिएगा कि हम एयर इंडिया को बचाना नहीं चाहते. लेकिन तीन-चार मुख्य बिंदु मैं आपके सामने रखना चाहता हूं. पहले तो 2006-07 में एयर इंडिया का घाटा 770 करोड़ रुपये था. उसके बाद यह 7,200 करोड़ हो गया. 2009 में एयर इंडिया तीन प्लेन्स बेच देती है. वह बेचती है हर प्लेन सौ-सौ करोड़ रुपये में. एयर इंडिया एक प्लेन 4000 करोड़ रुपये में खरीदती है. 30,000 करोड़ रुपये देने की बात चल रही है. 1000 करोड़ रुपये में एक ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस स्थापित हो जाता है. इस आधार पर इतने में 30 एम्स स्थापित हो जाएंगे. अगर आप हिसाब लगाएं तो इतने पैसे में डेढ़ लाख गांवों में सड़क बनाई जा सकती है.’

अजय कुमार सप्ताह में तीन दिन दिल्ली रहते हैं और चार दिन अपने क्षेत्र यानी जमशेदपुर में. संभवतः प्रबंधन का यह गुर उनके अंदर उसी समय से है जब उन्होंने पांडिचेरी विश्वविद्यालय से एमबीए किया था. कुमार ने डॉक्टरी की पढ़ाई पांडिचेरी मेडिकल कॉलेज से की है लेकिन जिस तरह से वे हर मुद्दे को उठाते हैं उससे लगता है कि वे सामाजिक डॉक्टर बन गए हैं. हालांकि बतौर सांसद अब तक संसद में अच्छा प्रदर्शन करने वाले अजय कुमार को सांसद विकास निधि के जरिए अपने क्षेत्र के लोगों के कल्याण के मामले में अधिक ध्यान देने की जरूरत है. जब से वे सांसद बने हैं तब से लेकर अब तक उन्हें सांसद विकास निधि के तहत जितनी रकम मिली है, वे उसका 57 फीसदी ही इस्तेमाल कर पाए हैं.

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