नया चुनाव, पुराना भाव

हिमांशु शेखर

1971 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि उस वक्त देश की कुल आबादी 54.81 करोड़ थी. वहीं 2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि देश की आबादी बढ़कर 121.01 करोड़ हो गई है. इसका मतलब यह हुआ कि बीते 40 साल में देश की आबादी दोगुनी से भी अधिक बढ़ गई. इसके बावजूद राष्ट्रपति चुनाव में वोट देने वाले जनप्रतिनिधियों के मतों का निर्धारण 1971 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही किया जा रहा है. कुछ ही दिनों बाद होने वाला राष्ट्रपति चुनाव भी 40 साल पुरानी जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाकर ही होने वाला है. अगर आधार वर्ष को 1971 के बजाए 2011 कर दिया जाए तो पिछले 40 साल में बढ़ी आबादी को देखते हुए कई राज्यों के विधायकों के मतों की संख्या काफी बढ़ जाएगी और कुल मतों में उनकी हिस्सेदारी में भी बढ़ोतरी हो जाएगी. संविधान के जानकारों का मानना है कि 1971 की आबादी के आधार पर राष्ट्रपति चुनाव करवाए जाने से इस चुनाव में उन राज्यों को वाजिब प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाएगा जिनकी आबादी इस दौरान दूसरे राज्यों की तुलना में तेजी से बढ़ी है. दरअसल, संविधान में राष्ट्रपति चुनाव के लिए जनप्रतिनिधियों के मतों के निर्धारण को लेकर यह साफ था कि यह काम सबसे नई जनगणना के आंकड़ों के आधार पर होगा. इसलिए 1952 का राष्ट्रपति चुनाव 1951 की जनगणना के आधार पर हुआ. जबकि 1961 की जनगणना के आंकड़े समय पर नहीं उपलब्‍ध नहीं होने की वजह से 1962 में राष्ट्रपति का चुनाव भी 1951 की जनगणना के आधार पर ही हुआ. इसके बाद 70 के दशक में हुए राष्ट्रपति चुनावों का आधार बनी 1971 की जनगणना.

1971 की जनगणना को आधार बनाकर ही लोकसभा और विधानसभा के निर्वाचन क्षेत्रों का परिसिमन हुआ. 2004 तक के आम चुनाव उसी परिसिमन के आधार पर हुए और इस बीच हुए विधानसभा चुनाव का आधार भी 1971 की आबादी के आधार पर हुआ परिसिमन ही रहा. इस दौरान हुए सभी राष्ट्रपति चुनाव 1971 की जनगणना के आधार पर ही होते रहे. जबकि संविधान में यह प्रावधान था कि सबसे नई जनगणना को आधार बनाया जाएगा. लेकिन परिसिमन का आधार पुराना होने की वजह से राष्ट्रपति चुनाव भी पुराने आधार पर ही होता रहा. जब इस गड़बड़ी की ओर कुछ लोगों ने 2001 में सरकार का ध्यान आकृष्ट कराना चाहा तो उस वक्त केंद्र की सत्ता पर काबिज अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार ने संविधान संशोधन करके यह तय कर दिया कि 2026 तक होने वाले सभी राष्ट्रपति चुनाव 1971 की जनगणना के आधार पर ही होगा. जबकि उस वक्त यह मांग की जा रही थी कि बढ़ती आबादी को देखते हुए राष्ट्रपति चुनाव का आधार भी नई जनगणना के आंकड़ों को बनाया जाए.

अब सवाल यह उठता है कि इसके बावजूद वाजपेयी सरकार ने इसके उलट संविधान संशोधन क्यों लाया? इस रहस्य पर से पर्दा उठाते हुए संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा के महासचिव रहे सुभाष कश्यप तहलका को बताते हैं, ‘उस वक्त जब राष्ट्रपति चुनावों के प्रावधानों में बदलाव की बात चली तो यह बात सामने आई कि नया आधार वर्ष लेते ही राष्ट्रपति चुनाव में तमिलनाडु और केरल जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों के मतों की हिस्सेदारी घट जाएगी और उत्तर भारत के कुछ राज्यों के मतों की हिस्सेदारी बढ़ जाएगी. इसके बाद दक्षिण भारत के राज्यों ने केंद्र सरकार से यह कहा कि हमने जनसंख्या नियंत्रण वाले कार्यक्रमों का क्रियान्वयन सफलता से किया है इसलिए नया आधार वर्ष लेने से हमारे साथ अन्याय हो जाएगा क्योंकि हमारे मतों में हमारी हिस्सेदारी कम हो जाएगी. इन राज्यों ने कहा कि जनसंख्या नियंत्रण का काम सफलता से करने का पुरस्कार उन्हें इस रूप में मिलना चाहिए कि राष्ट्रपति चुनाव का आधार वर्ष पुराना ही रखा जाए. इसलिए उस समय की केंद्र सरकार ने संविधान संशोधन करके न सिर्फ पुराने आधार वर्ष को ही बनाए रखने का फैसला किया बल्‍कि यह भी प्रावधान कर दिया कि 2026 तक के चुनाव ऐसे ही होंगे.’

जानकार बताते हैं कि उस वक्त केंद्र सरकार के इस फैसले का ज्यादा विरोध इसलिए भी नहीं हुआ कि उस वक्त तक विधायकों और सांसदों का निर्वाचन भी 1971 के परिसिमन के आधार पर ही हो रहा था. लेकिन 2008 से विधानसभाओं के चुनाव नए परिसिमन के आधार पर शुरू हुए. नए परिसिमन के लिए आधार बनी 2001 की जनगणना. 2009 का लोकसभा चुनाव भी नए परिसिमन के आधार पर हुआ. इस आधार पर होना तो यह चाहिए था कि इस बार के राष्ट्रपति चुनाव के लिए भी 2011 को न सही 2001 की जनगणना को आधार बनाया जाता. क्योंकि राष्ट्रपति चुनाव में मत डालने वाले ज्यादातर जनप्रतिनिधि 2001 की जनगणना के आधार पर हुए परिसिमन के तहत निर्वाचित हुए हैं. लेकिन सरकारी स्तर पर राष्ट्रपति चुनाव में व्याप्त इस खामी को दूर करने के लिए कोई सुगबुगाहट नहीं हुई.

संविधान के कई जानकारों द्वारा इस गड़बड़ी के दुष्परिणामों को समझाए जाने के बाद सोसायटी फॉर एशियन इंटीग्रेशन ने इस बाबत चुनाव आयोग के पास शिकायत की. लेकिन जानकारों का मत है कि इस बारे में चुनाव आयोग के हाथ बंधे हुए हैं और नए आधार वर्ष के लिए संसद को संविधान संशोधन करना पड़ेगा. संविधान विशेषज्ञ सीके जैन तहलका को बताते हैं, ‘2002 में हुए संविधान संशोधन में 2026 तक के लिए आधार वर्ष 1971 तय कर दिया गया है. अब अगर नए परिसिमन का आधार यानी 2001 की जनगणना को राष्ट्रपति चुनाव का भी आधार बनाना है तो इसके लिए संविधान में फिर से संशोधन करना होगा.’ चुनाव आयोग के पास भेजी गई शिकायत की एक प्रति लेकर जब कुछ लोग जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष शरद यादव से मिले तो उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की बैठक में वे इस मसले पर चर्चा करने के बाद इस मामले को उठाएंगे.

सूत्र बताते हैं कि जब शरद यादव ने यह मामला राजग की बैठक में उठाया तो भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि यह संशोधन तो अपनी ही सरकार ने किया था इसलिए इस मामले को लोगों के बीच उठाना ठीक नहीं है. भाजपा नेताओं ने राष्ट्रपति चुनाव पर कई मोर्चे पर चल रही लड़ाइयों का हवाला देते हुए शरद यादव को यह सलाह दी कि एक नया मोर्चा खोलने का यह सही वक्त नहीं है. इसके बाद राष्ट्रपति चुनाव में समर्थन को लेकर भाजपा और जदयू दोनों अलग-अलग राह चल पड़े और यह मामला जहां था वहीं रह गया. इस गड़बड़ी की वजह से हो रहे भेदभाव की ओर ध्यान दिलाते हुए सोसायटी फॉर एशियन इंटीग्रेशन ने अपनी शिकायत में लिखा है, ‘बिहार और उत्तर प्रदेश राज्यों की अनदेखी करके दक्षिण भारतीय राज्यों के विधायकों के मतों को अधिक महत्व मिलना जनप्रतिनिधित्व की जमीनी हकीकतों के अनुरुप नहीं है.’

संविधान और राजनीति के जानकार मानते हैं कि राष्ट्रपति के चयन प्रक्रिया में व्याप्त इस खामी का असली प्रभाव उस वक्त दिखेगा जब कभी दो उम्मीदवारों के बीच कांटे की टक्कर हो. इस बार ‌अगर प्रणव मुखर्जी के खिलाफ एपीजे अब्दुल कलाम चुनाव मैदान में उतर जाते तो फिर इसका असर तुरंत दिखता. क्योंकि कांटे की टक्कर की स्‍थिति में कुछ सौ वोट भी बने खेल को बिगाड़ने और बिगड़े खेल को बनाने की कुव्वत रखते हैं. ऐसी स्‍थित पैदा होने पर वह उम्मीदवार फायदे में रहेगा जिसे दक्षिण भारत के राज्यों के विधायकों के समर्थन हासिल हों. जबकि उत्तर भारतीय राज्यों के विधायकों के समर्थन वाला उम्मीदवार घाटे में रहेगा. 1971 की आबादी के हिसाब से राष्ट्रपति चुनाव में पड़ने वाले कुल मतों में राजस्‍थान, उत्तर प्रदेश और बिहार की हिस्सेदारी क्रमशः 4.69 फीसदी, 15.25 फीसदी और 7.65 फीसदी है. जबकि अगर 2001 की जनगणना को आधार बनाया जाए तो इन तीनों राज्यों की कुल मतों की संख्या तकरीबन दोगुनी हो जाएगी और हिस्सेदारी बढ़कर क्रमशः 5.5 फीसदी, 16.19 फीसदी और 8.08 फीसदी हो जाएगी. नया आधार वर्ष तय होने के बाद घाटे में रहने वाले तीन प्रमुख राज्य होंगे तमिलनाडु, केरल और आंध प्रदेश. 1971 की जनगणना के हिसाब से इन राज्यों की हिस्सेदारी क्रमशः 7.49 फीसदी, 3.87 फीसदी और 7.91 फीसदी थी. जो 2001 की जनगणना के आधार पर घटकर क्रमशः 6.04 फीसदी, 3.09 फीसदी और 7.39 फीसदी रह जाएगी.

कश्यप कहते हैं, ‘राष्ट्रपति चुनाव में राज्यों के विधायकों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाना संविधान के एक व्यक्‍ति-एक वोट की मूल भावना के खिलाफ है. राष्ट्रपति चुनाव के मतों में जिन राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ रही है उन्हें सिर्फ यह कहकर इससे वंचित रखना उनके साथ अन्याय है कि उन्होंने आबादी नियंत्रण के कार्यक्रम ठीक से नहीं चलाए. अगर आबादी नियंत्रण ही आधार है तो फिर उन राज्यों की सांसदों की संख्या भी बढ़ा दीजिए जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के कार्यक्रमों को अच्छे से लागू किया है.’

ऐसे चुने जाते हैं महामहिम
भारत के संविधान में राष्ट्रपति के निर्वाचन की जो व्यवस्‍था की गई है उसमें साफ तौर पर यह कहा गया है कि चुनाव में अलग-अलग राज्यों के प्रतिनिधित्व में जितना संभव हो उतनी एकरूपता होगी. इसे आसान शब्दों में समझें तो इसका मतलब यह हुआ कि हर राज्य की आबादी को आधार बनाकर जिस तरह वहां विधायकों और सांसदों का निर्वाचन क्षेत्र तय किया गया है उसी आधार पर राष्ट्रपति चुनाव में उनके वोट की कीमत यानी महत्व तय होगा. इसलिए अलग-अलग राज्यों के विधायकों की वोट की कीमत राष्ट्रपति चुनाव में अलग-अलग होती है. राज्यों में विधायकों के वोट की कीमत तय करने के लिए राज्य की कुल आबादी को हजार से विभाजित किया जाता है. इसके बाद जो संख्या आती है उसे राज्य के कुल विधायकों की संख्या से विभाजित किया जाता है. इसके बाद जो संख्या आती है वही संबंधित राज्य के एक विधायक के वोट की कीमत होती है. जबकि सांसदों के वोट की कीमत तय करने का आधार यह है कि राज्यों के सभी वोटों को जोड़कर उसे संसद के दोनों सदनों के सदस्यों की संख्या से विभाजित किया जाता है और इसके बाद जो संख्या आती है वह एक सांसद के वोट की कीमत होती है. इसका मतलब यह हुआ कि अलग-अलग राज्यों से चुनकर आने के बावजूद हर सांसद के वोट की कीमत एक ही होगी.

विधायकों और सांसदों के चुनाव में यह होता है कि जिसे सबसे अधिक वोट मिलता है उसे निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है. भले ही यह कुल पड़े मतों के आधे से कम ही क्यों न हो. लेकिन राष्ट्रपति चुनाव में ऐसा नहीं होता. राष्ट्रपति बनने के लिए कुल वोटों के आधे से एक अधिक वोट के कोटे को हासिल करना जरूरी होता है. इस चुनाव में सांसदों और विधायकों को चुनाव मैदान में मौजूद सभी उम्मीदवारों को वरीयता देनी होती है. दो से अधिक उम्मीदवार होने की स्‍थिति में पहले चक्र की गिनती के बाद अगर किसी उम्मीदवार को कोटा नहीं मिलता तो सबसे कम वोट पाने वाले के दूसरी वरीयता के वोटों को बाकी सभी उम्मीदवारों में बांटा जाता है और यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक किसी उम्मीदवार को कोटा नहीं हासिल हो जाए. राष्ट्रपति चुनाव में कुल वोटों की संख्या 10,98,882 है और कोटा 5,49,442 वोटों का है.

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