नदी को मिली नई जिंदगी

हिमांशु शेखर

अगर कोई यह जानना चाहता हो कि किसी नदी को मौत की मुंह से वापस निकालकर कैसे उसे नई जिंदगी दी जा सकती है तो फिर उसे दिल्ली से तकरीबन 450 किलोमीटर की दूरी तय करके पंजाब के कपूरथला जिले में पहुंचना पड़ेगा. इस जिले से होकर काली बेई नदी गुजरती है. इस नदी का सिख धर्म के लिए बड़ा धार्मिक महत्व है. यही वह नदी है जिसके किनारे पर सिखों के पहले गुरू नानन देव जी ने 14 साल 9 महीने और 13 दिन गुजारे थे. इसके बाद उन्होंने इसी नदी के तट पर सिख धर्म के मूल मंत्र ‘एक ओंकार सतनाम’ का सृजन किया था. लेकिन यह बात बहुत पुरानी है. आजादी के बाद में तेजी से औद्योगीकरण हुआ. इसकी वजह से एक खास वर्ग की आमदनी तो बढ़ी लेकिन इसकी काफी कीमत प्रदेश की नदियों ने चुकाई. इन नदियों में से ही एक है काली बेई.

साल 2000 आते-आते इस नदी की हालत बदतर हो गई थी. हर तरफ से गंदा पानी गिरने से नदी में भारी मात्रा में गाद जमा हो गया था. किनारों पर भी गंदगी के ढेर थे. नदी बिल्कुल सूख गई थी. 160 किलोमीटर लंबी इस नदी के किनारों पर 50,000 एकड़ से अधिक जमीन पर खेती होती है. होशियारपुर, जालंधर और कपूरथला जिले में बहने वाली यह नदी होशियारपुर के धनोआ गांव के पास से ब्यास नदी से निकलती है और फिर ‘हरि के छंब’ में जाकर ब्यास में ही मिल जाती है. इसलिए नदी के सूखने से इसके आसपास के इलाके की खेती के लिए संकट पैदा हो गया था. यह संकट बड़ा इसलिए भी था क्योंकि इलाके के लोगों के लिए रोजगार का मुख्य जरिया ही खेती थी. उसी साल जालंधर में एक सभा हुई और उसमें काली बेई नदी की बदहाली पर कई लोगों ने चिंता जताई. इस सभा में मौजूद कई लोगों में एक थे संत बलबीर सिंह सीचेवाल. कपूरथला जिले के सीचेवाल गांव के संत सीचेवाल 1991 से समाज के लिए काम कर रहे थे और इस वजह से इलाके में उनकी ठीक-ठाक पहचान भी थी. जालंधर की उस सभा में जब सब लोग नदी की बदहाली तथ्यों के सहारे बयां करते हुए चिंता जता रहे थे तो संत सीचेवाल ने कहा कि सिर्फ चिंता करने से कुछ नहीं होगा और अगर सब लोग चाहते हैं कि इस मरती हुई नदी को जिंदा करना है तो सुबह से ही काम पर लगते हैं.

इसके बाद शुरू हुआ असली काम. धुन के पक्के संत सीचेवाल अगली सुबह फावड़ा और ट्रैक्टर लेकर अपने सहयोगियों के साथ काली बेई के तट पर पहुंच गए और सफाई का काम शुरू कर दिया. सरकार जिस काम को असंभव घोषित कर चुकी थी उसे एक अंजाम तक पहुंचाना आसान काम नहीं था. लेकिन बलबीर सिंह सीचेवाल ने जब नदी में उतरकर खुद ही हाथसिंघ उखाड़ना और जमी गंदगी को फावड़े से हटाना शुरू किया तो उनका हाथ बंटाने वाले लोगों की संख्या हर दिन के साथ बढ़ती गई. हालांकि, बीच-बीच में कई तरह के विरोध का सामना भी संत सीचेवाल को करना पड़ा लेकिन साथ आने वालों की संख्या इतनी अधिक थी कि ये विरोध टिक नहीं पाए.

कुछ समय बाद संत सीचेवाल ने नदी में औद्योगिक इकाइयों द्वारा डाली जा रही गंदगी का रास्ता रोक दिया. जब प्रशासन ने दखल दिया तो उन्होंने पंजाब सरकार के 1976 के उस कानून का हवाला दिया जिसके तहत नदी को प्रदूषित करने को अपराध घोषित किया गया है. औद्योगिक इकाइयों के साथ कई गांवों से नदी में आ रही गंदगी का रास्ता रोकने का काम भी उन्होंने किया. अब समस्या यह थी कि इस गंदे पानी का आखिर क्या किया जाए. इसके लिए उन्होंने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने का आह्वान किया. इसके बाद कई गांवों में ऐसे प्लांट लग गए और गंदे पानी को साफ करके उसका इस्तेमाल दोबारा खेती में होने लगा.

संत सीचेवाल और उनके साथ काम करने वाले लोगों के अथक परिश्रम का नतीजा यह है कि काली बेई एक बार फिर से निर्मल हो गई है. फिर से यहां लोग धार्मिक मौकों पर डुबकी लगाने लगी है. जिस नदी में बच्चे हॉकी खेलने लगते थे उसमें अब पूरे साल पानी बहती है. नदी में जलचर वापस आ गए हैं. और तो और जो नदी कभी नाले से भी बदतर हालत में था उस नदी का पानी इलाके के हैंडपंप के पानी से अधिक शुद्ध हो गया है. पानी की शुद्धता मापने की इकाई है टीडीएस. यह स्तर जितना कम होता है वह पानी उतना ही शुद्ध होता है. जिस दिन यह संवाददाता काली बेई के तट पर पहुंचा उस दिन वहां के हैंडपंप के पानी का टीडीएस 201 था वहीं काली बेई के पानी का टीडीएस 114 था. नदी के दोबारा जिंदा होने से इलाके में तेजी से गिरता जलस्तर सुधरने लगा है. इस वजह से खेती में सुविधा हो गई है और उत्पादन भी बढ़ गया है. जो खेती सिंचाई सुविधाओं के अभाव में घाटे का काम बनती जा रही थी वही एक बार फिर मुनाफे के काम में तब्दील हो गई है. नदी के किनारों पर हरियाली तो बढ़ी ही है साथ में जलस्तर सुधरने से पूरे इलाके की हरियाली को भी जीवनदान मिला है.

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