धुएं में उड़ गई पाबंदी

हिमांशु शेखर

सार्वजनिक स्थान पर धूम्रपान करने पर लगी पाबंदी के एक साल बीते 2 अक्टूबर को पूरे हुए। ऐसी हालत में यह जरूरी हो जाता है कि इस बात चर चर्चा की जाए कि इस एक साल में इस प्रतिबंध का क्या परिणाम हुआ। पिछले साल जब यह प्रतिबंध लागू हुआ था तो उस समय के स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणी रामदास की तरफ से काफी लंबे-चैड़े दावे किए गए थे। पर तथ्य उन दावों के खोखलेपन की ओर इशारा कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करने पर लगा प्रतिबंध धुएं में उड़ गया।
सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर जब प्रतिबंध लगाया गया था तो उस वक्त यह प्रावधान किया गया था कि इन जगहों पर इस आशय की सूचना लगेगी और कुछ अधिकारियों को इसकी निगरानी का जिम्मा सौंपा गया था। सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करते हुए पकड़े जाने वालों पर जुर्माना लगाने का जिम्मा पुलिस अधिकारियों और गैजटेड अधिकारियों के अलावा डाक्टरों, अध्यापकों, प्राध्यापकों और बैंक अधिकारियों को सौंपा गया था। पर अहम सवाल यह है आखिर इस एक साल में इस कानून पर कितना अमल किया गया?
पहली बात तो यह कि सार्वजनिक स्थानों पर उस वक्त सूचना अवश्य लगी थी कि लेकिन आज ज्यादातर जगहों से ऐसी सूचना वाले बोर्ड नदारद हैं। जहां ऐसी सूचना लगी हुई भी है वहां भी धुम्रपान जमकर किया जा रहा है। बजाहिर, ऐसा जुर्माना लगने के भय से मुक्त होकर किया जा रहा है। ऐसा इसलिए हो रहा है कि इस कानून पर सही तरीके से अमल नहीं किया गया। जिन अधिकारियों पर जुर्माना लगाने का जिम्मा सौंपा गया था, उन्होंने अपने दायित्वों का निर्वहन सही ढंग से नहीं किया। अगर इन्होंने अपने दायित्वों का निर्वाह सही तरीके से किया होता तो आज यह हालत नहीं होती।
इस कानून की नाकामी ने सरकार की मंशा पर भी सवालिया निशान लगाने का काम किया है। पहली बात तो यह कि इस देश में एक ऐसी कुप्रथा चल पड़ी है जिसमें किसी भी समस्या का समाधान का मतलब यह होता है कि एक कानून बना दो। सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर लगे प्रतिबंध को लेकर भी यही हुआ। सरकारी स्तर पर यह समझा गया कि कानून बनाकर उनकी छुट्टी हो गई। अमलीकरण पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता है। सरकार ने इस प्रतिबंध को सही तरह से लागू करने के लिए सरकारी एजेंसियों पर दबाव नहीं बनाया।
अब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सरकार ने धूम्रपान को लेकर कड़ा रुख आखिरकार क्यों नहीं अपनाया? कहीं ऐसा तो नहीं है कि सिगरेट और दूसरे तंबाकू उत्पादों के उत्पादन में बड़े पूंजीपति लगे हुए हैं और यह पूंजीपरस्त सरकार उनके हितों की अनदेखी नहीं करना चाहती है? चाहे ऐसा जनता की सेहत की कीमत पर ही क्यों न किया जाए। ऐसा इसलिए भी लगता है कि सरकार ने सिगरेट के डब्बों पर चित्र के साथ वैधानिक चेतावनी प्रकाशित करना भी अनिवार्य कर दिया है। पर सरकार ने उस चेतावनी के प्रकाशन की गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं की। अगर सरकार सही मायने में लोगों की सेहत को लेकर चिंतित है और कुछ करना चाहती है तो उसे सिगरेट के डब्बों पर प्रकाशित होने वाले चित्रों की स्पष्टता को लेकर कुछ प्रावधान तो करना ही चाहिए था।
सही मायने में कहा जाए तो सरकार लोगों की सेहत को लेकर बहुत फिक्रमंद नहीं है। क्योंकि अगर ऐसा होता तो प्रतिबंध उत्पादन पर लगता न कि उपभोग पर। उपभोग पर प्रतिबंध लगाकर सरकार ने साफ तौर पर यह संदेश दिया है कि हमने तो अपने नैतिक जिम्मेवारियों का निर्वहन कर लिया। सरकार ने अप्रत्यक्ष तौर पर यह संदेश भी दिया है कि ऐसे उत्पादों का उत्पादन तो नहीं रोका जा सकता है लेकिन लोग सरकारी मंशा पर सवाल नहीं उठाएं, इसके लिए एक कानून बना दिया गया है। सरकार इसलिए भी ऐसे उत्पादों का उत्पादन नहीं रोकना चाहती कि इससे कर के तौर पर अच्छी-खासी आमदनी होती है। इसके अलावा पूंजीपतियों को भी सरकार नाराज नहीं करना चाहती है।
 
देखा जाए तो सरकार यह भी नहीं चाहती है कि ऐसे उत्पादों के उपभोग में कमी आए। क्योंकि अगर उपभोग में कमी आती है तो इसका असर उत्पादन में लगे हुए पूंजीपतियों पर पड़ेगा और जाहिर है कि सरकार की आमदनी पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ेगा। इस वजह से भी सरकारी स्तर पर इस कानून को लेकर इस कदर उदासीनता बरती जा रही है। ऐसी हालत में यह सवाल उठना वाजिब है कि जिस देश में तंबाकू सेवन की वजह से हर साल आठ लोग काल की गाल में समा जाते हों, उस देश की सरकार को एक जनता के लिए काम करने वाली सरकार आखिर कैसे कहा जाए?

2 thoughts on “धुएं में उड़ गई पाबंदी

  1. जब तक हम खुद नहीं अपने पर काबू रखते तब तक कानून भी कुछ नहीं कर सकता। हम और कौन से कानून मान रहे हैं हर कानून की सरेआम धज्जियाँ उड रही हैं आलेख अच्छा है आभार्

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