धुआं कम करने की दरकार

हिमांशु शेखर

कोपनहेगन में पर्यावरण के नाम पर बहस-मुबाहिसों का दौर चल रहा है। जलवायु परिवर्तन के मसले पर हर अखबार में जमकर खबरें प्रकाशित की जा रही हैं और खबरिया चैनल पर विशेष कार्यक्रम प्रसारित किए जा रहे हैं। पर पर्यावरणविद अनुपम मिश्र कहते हैं कि जिस भाषा में जलवायु परिवर्तन की बात लोगों के सामने रखी जा रही है उसे समझना आम लोगों के लिए आसान नहीं है।

यह सवाल पूछने पर कि आखिर कैसे आम लोगों को जलवायु परिवर्तन और इसके प्रभावों को लोगों को समझाया जाए। वे कहते हैं कि हमारे स्वस्थ्य शरीर का तापमान जरा सा भी इधर-उधर हो जाए तो हम पर क्या बीतती है, इसका हमें खूब अंदाज है। अब इसी ढंग से धरती के तापमान बदलने की चिंता उठ खड़ी हुई है। यह तापमान बढ़ा, धरती को बुखार आया तो उसके शरीर पर टिके हम सब लोगों का क्या-क्या होगा, इसकी भयानक तस्वीर नए-नए ढंग से रोज-रोज सामने रखी जा रही है।

अनुपम मिश्र कहते हैं कि कोपनहेगन में दुनिया भर का शीर्ष नेतृत्व, उद्योग जगत के कर्ता-धर्ता और समाज की चिंता में डूबे लोग एकत्र हुए हैं। पहली बात तो यह कि कोपनहेगन सम्मेलन किसी समझौते की और बढ़ता ही नहीं दिख रहा है लेकिन अगर यहां कोई समझौता हो भी जाए तो अनुपम मिश्र उसके बेहद उत्साहजनक होने को लेकर सशंकित हैं। वे कहते हैं कि यहां राजनैतिक खींचतान से कोई न कोई समझौता हो भी जाए, तो भी ऐसा नहीं मानना चाहिए कि इससे हल तुरंत सामने आ जाएंगे।

अनुपम मिश्र मानवता के समक्ष पैदा हुए संकट को अपनी जुबान में बेहद प्रभावी तरीके से समाने रखते हैं। वे कहते हैं कि धरती पर देश बंटे हुए हैं। थोड़ा-बहुत विवाद भले ही हो लेकिन उनकी सीमाएं तय हैं। इसी तरह आकाश तक की सीमाएं हमने बनाई हैं लेकिन धुआं सीमा को नहीं मानता। किसी भी देश का धुआं दूसरे देश में और दूसरे प्रदेश में बराबर आएगा और जाएगा। इसलिए अनुपम मिश्र मानते हैं कि बात कुल मिलाकर धुआं कम करने की जरूरत है।

वे कहते हैं कि इसके दोनों स्तर होंगे। अपने स्तर पर कटौती और विश्व स्तर पर कटौती। इसकी तैयारी में थोड़ा-बहुत लेना और देना ही पड़ेगा। फिलहाल भारत इन दोनों बातों का संतुलन रखने की कोशिश कर रहा है। उसने अपनी तरफ से कटौती करने की इच्छा भी जाहिर की है और विकसित माने गए देशों से भी कटौती की मांग की है।

कार्बन क्रेडिट को अनुपम मिश्र विचित्र समझौता मानते हैं। वे कहते हैं कि इसमें एक की गंदगी को दूसरे की सफाई से तौलकर तराजू बराबर किया जाएगा। यह परिस्थिति लगभग वैसी ही है कि मैं अपने पाप कम न करुं और आपको बेच दूं कि चार पुण्य मेरी तरफ से कर लेना और उन पुण्यों को मैं पैसे देकर खरीद लूंगा। अनुपम मिश्र कहते हैं कि ऐसे लेन-देने से धरती को गर्म होने से नहीं बचाया जा सकता।

2 thoughts on “धुआं कम करने की दरकार

  1. anupam mishr kahte hai apne or viswa dono star par katauti karne ki jaroorat hai. par dusron ke star se kya hona chahiye iski sabko chinta hoti hai par khud kya kar sakte hai iski koi khabar hi nahi hoti. koi is baat par paresaan dikhta bhi hai to use is baat ki samajh hi nahi hoti ki apne star se kya kiya ja sakta hai.. par aisa ho sakta hai kya. taapmaan badhna or paryavaran ka pradooshan ko rokne ke liye kya kiya ja sakta hai iski samajh ek school ke bache ko bhi hoti hai.. agar kisi ko paresaani hai to ghar ke kisi bache se ek class le leni chahiye..

  2. अरूंधति रॉय कहती हैं, आज सभ्य समाज को आदिवासियों से सीखने की ज़रूरत है न कि उन्हें हमला कर खदेड़ने की. आदिवासियों को सभ्य समाज की तरह नैनो चलानी चाहिए या हमें कारों का प्रयोग कम कर देना चाहिए. बड़ा प्रश्न है.

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