दिल्ली हाट का ठाट

हिमांशु शेखर
भारत में हाटों की परंपरा नई नहीं है। लंबे समय से देश के विभिन्न भागों में हाट लगते रहे हैं। उस दौर को गुजरे ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब ग्रामीण भारत के लोग खरीदारी के लिए इसी पर आश्रित होते थे। आम तौर पर ‘हाट’ पंचायत या अंचल के स्तर पर सप्ताह में एक या दो दिन लगता रहा है। हाट के आस-पास के गांवों में रहने वाले लोगों द्वारा सप्ताह भर की खरीदारी तो यहां होती ही थी साथ में आपसी मेलजोल भी बढ़ता था। यह हाटों का ही असर है कि आज शहरों में भी हर मुहल्ले में खास दिन हाटनुमा बाजार लगता है।

हाटनुमा बाजार इसलिए कि यहां हाटों की गंवई  खुशबू और  अपनत्व पर  बाजार की माया हावी रहती है। ग्रामीण इलाकों में अब भी हाटों का लगना बदस्तूर जारी है। पर बदलाव की बयार ने वहां के हाटों को भी बाजार बना दिया है। आज भी गांवों से आकर शहरों में बसे लोगों के मन में हाटों के प्रति एक कसक बरकरार है। उनका तन महानगर में जरूर है पर मन हर जगह गांव की महक को तलाशता रहता है। दिल्ली में रह रहे ऐसे लोगों के दर्द को ‘दिल्ली हाट’ एक हद तक दूर कर रहा है। इसके साथ-साथ दिल्ली हाट दस्तकारों को भी एक प्लेटफार्म मुहैया करा रहा है जहां उन्हें अपनी कारीगरी का उचित मेहनताना मिल रहा है।

दिल्ली हाट की शुरूआत 28 मार्च 1994 को हुई थी। इसके स्थापना के मकसद के बारे में पूछे जाने पर दिल्ली हाट के डिप्टी मैनेजर रहे आरके शर्मा कहते हैं कि इसकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य यह था कि बिचैलियों को हटाकर दस्तकारों को उनके उत्पाद का सीधा लाभ दिया जाए। देश के कपड़ा मंत्रालय ने यह निर्णय दस्तकारों की माली हालत सुधारने के लिहाज से लिया था। वे आगे बताते हैं कि इसके अलावा यहां देश के विभिन्न राज्यों के खान-पान को भी एक स्थान पर मुहैया कराने की पहल की गई है।

इसके पीछे यह सोच थी कि अपने प्रदेश के अलावा अन्य प्रदेशों के व्यंजनों से भी लोग परिचित हों। कहना न होगा कि ‘दिल्ली हाट’ की पहचान ही यहां मिलने वाले खांटी देशी उत्पादों और खाने वाले विविध व्यंजनों से बनी है। यहां आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम भी लोगों को आकर्षित करते रहे हैं। ‘दिल्ली हाट’ का बढ़ता आकर्षण ही है कि यहां देशी ग्राहकों के साथ-साथ विदेशी ग्राहकों की भी अच्छी-खासी संख्या खरीदारी में व्यस्त दिखती है।

दक्षिणी दिल्ली में किदवई नगर में आईएनए मार्केट के सामने स्थित ‘दिल्ली हाट’ कुल छः एकड़ में फैला है। यहां देश के हस्तशिल्पियों की शिल्पकारी को देखना एक सुखद अनुभूति है। इसके अलावा हैंडलूम यानी हथकरघा के कपड़े भी यहां उपलब्ध हैं। दिल्ली हाट में कुल 201 स्टाल्स हैं। इनमें से 151 हैंडीक्राफ्टस के हैं और पचास हैंडलूम के।

बनारसी सिल्क साड़ी, मधुबनी पेंटिंग जैसी कई क्षेत्रीय चीजें यहां उपलब्ध हैं। पश्चिम बंगाल की कांथा साड़ियां भी यहां चाहने वालों की पहुंच में है। राजस्थान के पारंपरिक पोशाक की खोज भी यहां आकर पूरी हो जाती है। कहा जा सकता है कि इंसान चाहे कितना भी आधुनिक क्यों न हो जाएं पर जो लगाव देशी वस्तुओं से होता है वो बाहर की चीजों में कहां मिलता है। यहां खरीदे गए सामानों की बेहतर गुणवत्ता का कारण यह है कि राज्य विशेष वेफ स्थानीय उत्पादक खुद आकर माल बेचते हैं।

कपड़ों के अलावा हाथ से बनी अन्य चीजें भी दिल्ली हाट में बहुतायत में उपलब्ध हैं। आम बाजारों में प्लास्टिक की वस्तुओं ने प्राकृतिक चीजों को हाशिये पर डाल दिया है। लेकिन, दिल्ली हाट में बांस से बनाई गई चीजों की महत्ता प्रत्यक्ष दिखती है। कुर्सी, टेबल से लेकर अनेकों वैसी वस्तुएं उपलब्ध हैं जिनका आधुनिक जीवनशैली में धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है। जैसे-बांस का बना छोटा गमला।

यहां मिलने वाले स्वादिष्ट व्यंजन ‘दिल्ली हाट’ को खास बनाते हैं। भारत के विभिन्न प्रांतों के फूड स्टाल्स यहां लगे हैं। 1994 मे जब दिल्ली हाट की शुरूआत हुई थी तब देश के सभी पच्चीस राज्यों को यहां फूड स्टाल मुहैया कराए गए थे ताकि यहां आने वाले लोग दूसरे प्रांतांे के व्यंजनों का भी स्वाद ले सकें। भौगोलिक रूप से विविधताओं का देश तो हिन्दुस्तान है ही यहां के खान-पान में भी काफी विविधता है।

इन विविध व्यंजनों को एक सूत्र में बांधते हुए दिल्ली हाट में देश के सौ से ज्यादा खास व्यंजन उपलब्ध हैं। बात चाहे पंजाब के ‘मक्के दी रोटी सरसों दा साग’ की हो, बंगाल के ‘माछेर-झोल’ और दक्षिण भारत के ‘इडली डोसा’ की। यहां सभी उपलब्ध हैं। इसके अलावा बिहार के मशहूर लिट्टी-चोखा के क्या कहनें। इसके बिना तो खानों की चर्चा ही अधूरी है।

यहां साल भर तरह-तरह वेफ सांस्कृतिक कार्यक्रम चलते रहते हैं। किसी राज्य विशेष की थीम पर भी एक हिस्से में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का प्रदर्शन होता है। सही मायने में कहा जाए तो दिल्ली हाट का होना सभी राज्यों की संस्कृतियों का मिलन होना है। यहां खास त्यौहारों के मौके पर उसी तरह के माहौल और कार्यक्रमों का आयोजन कर लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ने की भी कोशिश रहती है।

बहरहाल, अब जरूरत है कि दिल्ली हाट में स्टाल बुक करने की प्रक्रिया के बारे में जानने की। बताते चलें की यह कार्य कपड़ा मंत्रालय द्वारा किया जाता है। वहां आवेदन करने के बाद नियमित रूप से पंद्रह दिन के लिए स्टाल आवंटित किया जाता है। पंद्रह दिनों के लिए ही स्टाल दिए जाने का कारण यह है कि दिल्ली हाट की विविधता बनी रहे। साथ ही देश के सभी हिस्सों के दस्तकारों को यहां आने का मौका मिल सके। दिल्ली हाट के स्टाल का किराया तीन सौ साठ रुपया प्रतिदिन है।

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