दिल्लीवाले नेता: अजय माकन

हिमांशु शेखर

दिल्ली प्रदेश से अपनी सियासी पारी की शुरुआत करने वाले अजय माकन को जब केंद्र की राजनीति करने का मौका मिला तो उन्होंने अपनी एक ऐसी छवि गढ़ी जिसके चलते लोग उनसे अच्छे काम की उम्मीद करते हैं. 2004 में पहली नई दिल्ली लोकसभा सीट जीतकर लोकसभा में पहुंचे माकन ने वैसे तो राजनीति की शुरुआत तब ही कर दी थी जब वे दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ते थे. 1985 में वे दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष बने थे. लोगों में उन्हें लेकर उम्मीदें तब बढ़ीं जब उन्होंने युवा एवं खेल मामलों के मंत्रालय का कार्यभार स्वतंत्र राज्य मंत्री के तौर पर संभाला. इस दौरान उन्होंने खेलों में व्याप्त राजनीति और खेलों से संबंधित पूरी व्यवस्था को साफ-सुथरा बनाने का काम शुरू किया. उन्हें तीखा विरोध झेलना पड़ा. खुद पार्टी के अंदर के कई ऐसे लोग उनके खिलाफ खड़े हो गए जो किसी न किसी खेल संगठन के आला पदों पर काबिज थे. इनके विरोध की वजह से माकन राष्ट्रीय खेल विकास कानून ला तो नहीं सके लेकिन उनकी कोशिशों से खेलों के प्रशासन को साफ-सुथरा बनाने की बहस जरूर छिड़ गई.

अपनी कार्यशैली की वजह से माकन कई बार पार्टी लाइन से अलग जाते दिखने लगते हैं,  लेकिन अच्छी बात यह है कि उनका काम लोगों के हित में दिखता है. राष्ट्रमंडल खेलों की ही बात करें. इन खेलों को सफल बनाने के लिए कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा था. जब इन खेलों के आयोजन में धांधली की बात आई तो न सिर्फ उस समय बल्कि बाद में भी कांग्रेस ने इस पर भरसक पर्दा डालने की कोशिश की. लेकिन तहलका से हुई बातचीत में अजय माकन ने कहा, ‘अगर राष्ट्रीय खेल विकास कानून होता तो कम से कम राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में जो घोटाला हुआ वह नहीं होता. क्योंकि इन खेलों की आयोजन समिति के अध्यक्ष और खजांची आईओए के पदाधिकारी नहीं बन पाते. इसलिए इस कानून की बहुत ज्यादा जरूरत है.’

माकन जो कानून लाना चाह रहे थे उसमें यह प्रावधान है कि देश के सभी खेल संगठनों को राष्ट्रीय खेल संगठन के तौर पर नए सिरे से मान्यता लेनी होगी. कोई भी खेल संघ निजी तौर पर काम नहीं कर सकेगा. सभी खेल संगठन सूचना के अधिकार के तहत आएंगे. उन्हें अपने आय-व्यय का ब्योरा देना होगा. यह नीति खेल संघों के प्रशासन में खिलाड़ियों की 25 फीसदी भागीदारी सुनिश्चित करने की बात भी करती है. खेल संगठनों के पदाधिकारियों की चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की बात भी प्रस्तावित विधेयक में की गई है. पदाधिकारियों के लिए 70 साल की उम्र सीमा तय करने की बात भी प्रस्तावित नीति में है. साथ ही एक स्पोर्ट्स ट्रिब्यूनल के गठन की बात भी है. इस ट्रिब्यूनल में न सिर्फ खेल संघों के झगड़ों का निपटारा होगा बल्कि खिलाड़ी भी अपनी समस्याएं यहां उठा सकते हैं.

अब माकन इस मंत्रालय में नहीं हैं और प्रस्तावित विधेयक को लेकर स्थिति साफ नहीं है. लेकिन राज्य मंत्री से प्रमोशन पाकर कैबिनेट मंत्री बने अजय माकन जिस आवास एवं शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय में गए हैं, वहां भी उनके पास छाप छोड़ने का अच्छा मौका है. गांधी परिवार से करीबी के चलते उन्हें कुछ लोग दिल्ली के भावी मुख्यमंत्री के तौर पर भी देखते हैं. उनका मानना है कि शीला दीक्षित की उम्र को देखते हुए इस साल के चुनाव के बाद अगर नेतृत्व परिवर्तन का सवाल खड़ा होता है तो संभव है कि दिल्ली की जिम्मेदारी माकन को सौंपी जाए.

29 साल की उम्र में 1993 में पहली दफा विधायक बनने वाले अजय माकन के पास सबसे कम उम्र में किसी विधानसभा का स्पीकर बनने का रिकॉर्ड है. 2003 में वे 39 साल की उम्र में इस पद पर पहुंच गए थे. दिल्ली की परिवहन व्यवस्था में सीएनजी लागू करने का श्रेय भी अजय माकन को ही जाता है. हालांकि जब वे दिल्ली के ऊर्जा मंत्री बने तो उन्होंने बिजली का निजीकरण किया. इसकी मार आज भी दिल्लीवासियों पर बढ़े हुए अनाप-शनाप बिलों के रूप में पड़ रही है.

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