‘दस्तखत फर्जी हुए तो राज्यसभा से इस्तीफा दे दूंगा’

जब भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह अमेरिका में जाकर वहां की सरकार से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अमेरिकी वीजा नहीं देने की नीति पर पुनर्विचार करने की मांग कर रहे थे उसी वक्त भारतीय सांसदों का एक पत्र सामने आया. यह पत्र अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को भेजा गया था. हालांकि, यह पत्र 26 नवंबर, 2012 यानी गुजरात में हो रहे विधानसभा चुनावों के दौरान लिखा गया था. लोकसभा और राज्यसभा के 65 सांसदों की ओर से भेजे गए इस पत्र मे. अमेरिका से यह मांग की गई थी कि वे मोदी को अमेरिकी वीजा नहीं देने की नीति को बरकरार रखे. पत्र के सामने आने के बाद कई विवाद उभरे. ओबामा को पत्र लिखने की पहल करने वाले राज्यसभा सांसद मोहम्मद अदीब से इन विवादों पर हिमांशु शेखर की बातचीत के खास अंशः

एक लोकतांत्रिक व्यवस्था मे. अलग-अलग राजनीतिक विचार के लोगों में विरोध हो सकता है. ऐसे में एक आंतरिक मामले को दूसरे देश की सरकार के सामने ले जाना क्या बाहरी दखल आमंत्रित करना नहीं है?
हमने यह पत्र इस मकसद से नहीं लिखा. दरअसल, यह पत्र तब लिखा गया था जब गुजरात में विधानसभा चुनाव चल रहे थे. आपको याद होगा कि उस वक्त यूरोपीय यूनियन और यहां तक की अमेरिका के कुछ अधिकारी भी नरेंद्र मोदी से मिलने आए थे. इसके बाद मोदी, उनकी पीआर एजेंसी एपको और अमेरिका ने मिलकर लोगों के बीच यह संदेश देने की कोशिश की कि अगर मोदी एक बार फिर से चुनाव जीत जाते हैं तो उन्हें अमेरिका और यूरोप का पूरा समर्थन रहेगा. इसलिए हमने पत्र के जरिए अमेरिका से स्पष्टीकरण मांगा था कि अगर आप अपनी वीजा नीति में कोई बदलाव कर रहे हैं तो यह काम पारदर्शी तरीके से होना चाहिए. भ्रम बनाकर लोगों को ठगा नहीं जाना चाहिए.

लेकिन आप लोगों ने जो पत्र भेजा है उसमें तो साफ-साफ मांग की है कि अमेरिका मोदी को अपने यहां नहीं आने देने की नीति को बरकरार रखे.
देखिए, यह उनका मामला है कि वे किसे अपने यहां आने देना चाहते हैं और किसे नहीं. हमने तो सिर्फ स्थितियों को सामने रखने का काम किया है. हमने यह बताया है कि स्थितियां 2002 में काफी भयावह थीं जब नरसंहार करवाया गया था. अब भी स्थितियां बहुत बुरी हैं. आज नरेंद्र मोदी के 14 पुलिस अधिकारी जेल में हैं.

मोदी लोकतांत्रिक ढंग से और संविधान में जिस व्यवस्था का उल्लेख किया गया है उससे चुनकर आए हुए मुख्यमंत्री हैं. बतौर सांसद आपने भी संविधान की रक्षा की शपथ ली है. ऐसे में क्या संवैधानिक तौर पर चुने गए मुख्यमंत्री के खिलाफ एक बाहरी मंच पर मोर्चा खोलना संविधान की भावना के खिलाफ नहीं है?
संवैधानिक तौर पर चुने जाने का मतलब यह नहीं होता कि कोई लोगों को बांटने की राजनीति करे और इसके लिए नरसंहार और दंगे का सहारा ले. नरेंद्र मोदी को अगर इस देश के संविधान का खयाल होता तो वे अपनी सभाओं में मुसलमानों को मियां मुशर्रफ कहकर नहीं चिढ़ाते. वे ऐसा कहकर हमें पाकिस्तानियो. के साथ खड़ा कर देते हैं. तो क्या देश मे. रहने वाले सभी मुसलमानों को अपनी देशभक्ति को बार-बार प्रमाणित करना होगा. इसके लिए कोई प्रमाण पत्र देना होगा. संवैधानिक व्यवस्था में किसी महत्वपूर्ण पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा भारत के प्रति मुसलमानों की निष्ठा पर सवाल खड़ा किया जाना बेहद अपमानजनक है और इसका विरोध जताने का हक हमसे छीना नहीं जा सकता.

विदेश मामलों के कई जानकारों का कहना है कि एक आंतरिक मामले को दूसरे देश की सरकार के सामने ले जाने से हमारी विदेश नीति को झटका लगेगा. आप क्या कहेंगे?
दुनिया में जहां भी नाइंसाफी हुई है, उसका विरोध मैंने किया है. दुनिया के अलग-अलग देशों में हो रहे अत्याचारों को लेकर मैंने संसद में कई बार बोला है. इसमें मैंने किसी खास मजहब के लोगों का खयाल नहीं रखा बल्कि जिनका भी शोषण हुआ, उनका मसला मैंने उठाया है. ऐसे में अगर गुजरात में हुए अत्याचारों को मैं उठा रहा हू. तो इसमें गलत क्या है. मंच चाहे जो भी है, मैं नाइंसाफी के खिलाफ लड़ता रहूंगा. नरेंद्र मोदी के बारे में खुद अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि 2002 में गुजरात में जो हुआ उसके बाद मैं दूसरे देशों में मुंह दिखाने लायक नहीं हूं. इसका मतलब तो यही हुआ न कि देश में जो होता है उसका विदेश नीति पर असर पड़ता है.

पूरी दुनिया में अमेरिका की पहचान मुसलिम विरोधी देश की है और आप उसी के सामने भारत के एक तथाकथित मुसलिम विरोधी नेता का विरोध जता रहे हैं. क्या यह विरोधाभास नहीं है?
हमने न तो अपने पत्र में और न ही कहीं और ये कहा है कि अमेरिका मानवाधिकारों का सबसे बड़ा हितैषी है. हमारा तो यह मानना है कि पूरी दुनिया में जितना आतंकवाद है, उसका जिम्मेदार अमेरिका है. हमने इस पत्र के जरिए एक तरह से अमेरिका को आईना दिखाने की कोशिश की है. मोदी की वीजा का मामला अमेरिका से जुड़ा हुआ है. इसलिए स्वाभाविक है कि पत्र भी अमेरिका को ही लिखना पड़ता.

आपने जो पत्र भेजा है उसमें माकपा सांसद सीताराम येचुरी के भी दस्तखत हैं लेकिन उन्होंने ऐसे किसी पत्र पर दस्तखत से इनकार किया है. आखिर मामला क्या है?
सीताराम येचुरी बेहत प्रतिष्ठित सांसद हैं. वे मेरे अच्छे मित्र भी हैं. इस बारे में मैंने पहले भी कहा था कि उन्होंने दस्तखत किए हैं. उन्होंने जो बयान दिया है उसके बारे में मेरा कहना है कि इस खत को उन्होंने कोई दूसरा खत समझ लिया है और इस गलतफहमी में उन्होंने बयान दिया है.

क्या आपकी उनसे इस बारे में कोई बातचीत हुई?
वे अभी देश से बाहर हैं. जैसे ही वे लौटेंगे, मैं उनसे मिलूंगा और मुझे यकीन है कि वे इस पत्र और अपने दस्तखत को देखकर सही बात को लोगों के सामने रखेंगे.

लेकिन भाजपा का तो यह आरोप है कि आपने सांसदों के फर्जी दस्तखत करवाए.
मैं इस तरह के आरोपों से आहत हूं. अमेरिका की एक फोरेंसिक लैब ने यह बात प्रमाणित कर दी है कि सारे दस्तखत असली हैं. इसके बाद तो मेरे ऊपर फर्जीवाड़े का आरोप लगाकर मेरा चरित्र हनन करने वाले भाजपा प्रवक्ताओं को माफी मांगनी चाहिए. मैं अपने उस बयान पर कायम हूं कि अगर कोई यह साबित कर दे कि दस्तखत फर्जी हैं तो मैं राज्यसभा से इस्तीफा दे दूंगा.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *