टीआरपी से टकराने में क्‍यों डर रही है सरकार?

हिमांशु शेखर

खबरिया चैनलों के पथभ्रष्ट होने का सारा दोष टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट यानी टीआरपी पर मढ़ा जाता है। इन चैनलों को चलाने वाले यह कहते हुए नहीं अघाते कि जिस कार्यक्रम को ज्यादा टीआरपी मिलती है, उसे ही वे दिखाएंगे। टीआरपी के ज़्यादा होने का सीधा-सा मतलब ज़्यादा दर्शक संख्या होने से लगाया जाता है। पर सही मायने में देखा जाए तो जिस टीआरपी के नाम पर जम कर गंध घोला जा रहा है, उसकी व्यवस्था में ही भयानक दोष है। टीआरपी तय करने वाली पूरी व्यवस्था बिल्कुल उसी तरह है, जिस तरह से दो लोगों की पसंद-नापसंद को एक बड़े तबके की पसंद-नापसंद बता दिया जाए।

आज देश के ज़्यादातर हिस्से में टीवी की सुविधा उपलब्ध है। ऐसा अनुमान है कि देश के तकरीबन बारह करोड़ घरों में टेलीविजन है। इस आधार पर देखा जाए तो टीवी एक बड़ी आबादी तक पहुंचने का अहम जरिया बन गया है। इस रास्ते का इस्तेमाल विज्ञापन देने वाले भी कर रहे हैं। विज्ञापन देने का आधार टीआरपी को बनाया जाता है। टीआरपी की शुरुआत 1993 में हुई थी। इसी के आधार पर ये तय हो पाता है कि किस चैनल या किस कार्यक्रम को ज्यादा लोग देख रहे हैं। इसी के आधार विज्ञापन मिलने की वजह से चैनलों के बीच ज़्यादा से ज़्यादा टीआरपी हासिल करने के लिए ज़बर्दस्त प्रतिस्पर्धा बनी रहती है। ऐसे में टीआरपी की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। क्योंकि अगर सामाजिक ताने-बाने के हिसाब से किसी ख़राब कार्यक्रम को ज्यादा टीआरपी मिल जाती है तो उसी तर्ज पर दूसरे लोग भी कार्यक्रम बनाने लगते हैं। इसके बाद ऐसे कार्यक्रमों को ही सही ठहराने की मुहिम चल पड़ती है।

बहरहाल, कुछ दिनों पहले संसद ने टीआरपी और इससे जुड़े कई पहलुओं की पड़ताल करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति का गठन किया। इस समिति को दी गयी जानकारी में सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने भी यह स्वीकार किया है कि एजेंसियों द्वारा तैयार की जाने वाली टीआरपी में कई कमियां हैं। दरअसल, ये कमियां किसी एक स्तर पर नहीं हैं बल्कि टीआरपी तैयार करने की मौजूदा व्यवस्था में हर स्तर पर स्पष्ट तौर पर दिखती हैं। इसके बावजूद इस व्यवस्था का अभी तक चलन में बने रहना कई तरह के सवाल खड़े करता है।

इसमें सबसे बड़ी कमी है सैंपल के आकार की। टीआरपी कुछ ही शहरों के आधार पर तय कर दिया जाता है। इसे तैयार करने की प्रक्रिया में छोटे शहरों और गांव के दर्शकों का प्रतिनिधित्व नहीं है। जबकि वे भी टेलीविजन देखते हैं। टीआरपी तय करने के लिए एक खास तरह के बक्से का इस्तेमाल किया जाता है। इसे कुछ चुनिंदा घरों में लगा दिया जाता है। उसमें ये दर्ज होता चलता है कि किस चैनल को किस समय पर कितना देर देखा गया। इन्हीं आंकड़ों को जमा करके मुंबई की एजेंसी टैम यानी टेलीविजन आडिएंस मेजरमेंट टीआरपी जारी करती है। इस व्यवस्था में खोट ये है कि बक्सा लगाये जाने वाले घरों के चयन में पारदर्शिता नहीं बरती जाती है। जहां ये बक्से लगाये जाते हैं, उनके बारे में पूरी गोपनीयता बरती जाती है। इसका मतलब ये हुआ कि आंकड़ों से छेड़छाड़ की संभावना को बरकरार रहने दिया जाता है।

इस पूरी व्यवस्था में एक खामी यह भी है कि एक खास वर्ग में टीआरपी मीटर लगाकर उसी वर्ग की पसंद-नापसंद को पूरे देश की पसंद-नापसंद बता दिया जाता है। टैम किसी को यह जानकारी नहीं देती कि उसने जो टीआरपी मीटर लगाये हैं वे किन घरों में हैं या फिर वे किस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि अगर बक्से उच्च वर्ग के घरों में लगाये जाएं तो जाहिर है कि टीवी कार्यक्रमों को लेकर उस वर्ग की पसंद देश के आम तबके से थोड़ी अलग होगी ही। पर इसके बावजूद टीआरपी की मौजूदा व्यवस्था में उसे ही सबकी पसंद बता दिया जाता है और इसी के आधार पर उस तरह के कार्यक्रमों की बाढ़ टीवी पर आ जाती है।

इसके अलावा टीआरपी की मापन विधियों में भी वैज्ञानिकता का अभाव है। रेटिंग के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा नहीं होने की वजह से एक ही एजेंसी जो आंकड़े जारी करता है, उसे ही मानना मजबूरी है। हालांकि, 2004 में दूसरी एजेंसी ए-मैप ने भी रेटिंग की शुरुआत की थी। पर अभी भी टैम के आंकड़ों को ही बाजार ज्यादा तवज्जो देता है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने भी यह स्वीकार किया है कि टीआरपी की व्यवस्था में दर्शकों की पसंद-नापसंद पर बहुत ध्यान नहीं दिया जाता है। इसका मतलब यह हुआ कि सरकार इस बात से गाफिल नहीं है कि टीआरपी के नाम पर चलाये जा रहे धंधे से दर्शकों का हित नहीं जुड़ा हुआ है – इसके बावजूद सरकार ने टीआरपी के कारोबरियों को अपना खुला खेल खेलने से रोक नहीं पा रही है।

भारत में टीआरपी की बात करते इस बात का उल्लेख करना आवश्यक हो जाता है कि शुरू में दर्शक संख्या के लिए दूरदर्शन रेटिंग प्वाइंट यानी डीआरटी ही एकमात्र उपलब्ध आंकड़ा था। इसे दूरदर्शन के दर्शक अनुसंधान ईकाईं द्वारा अपने 40 केंद्रों और सौ आकाशवाणी केंद्रों द्वारा एकत्रित किया जाता था। उस वक्त इतने निजी चैनल भी नहीं थे। इसलिए इन आंकड़ों का इस्तेमाल सामान्यतः दूरदर्शन ही करता था। पर जैसे-जैसे भारत में टीवी का विस्तार हुआ, वैसे-वैसे यहां रेटिंग की ज़रूरत भी महसूस हुई। इसी ज़रूरत को समझते हुए टीवी रेटिंग के लिए 1994 में ओआरजी-मार्ग ने भारतीय राष्‍ट्रीय टेलीविजन दर्शक मापन की स्थापना की। 1998 में टैम की शुरुआत हुई। 2001 में इन दोनों का औपचारिक विलय हो गया। टैम एसी निलसन और कंटर मीडिया रिसर्च और आईएमआरबी की एक संयुक्त उद्यम कंपनी है।

जब रेटिंग का बाज़ार बढ़ा, तो स्वाभाविक तौर पर इस दिशा में दूसरे कारोबारी को तो आना ही था। हुआ भी ऐसा ही। 2004 में दूसरी रेटिंग एजेंसी आडिएंस मेजरमेंट ऐंड एनालाइटिक्स लिमिटेड यानी ए-मैप की शुरुआत हुई। वैसे इसका परिचालन 2007 के फरवरी से ही शुरू हो पाया। इस तरह देखा जाए तो अभी देश में टेलीविजन रेटिंग तैयार करने वाली दो कंपनियां काम कर रही हैं। पर हालत यह है कि इन दोनों कंपनियों की टीआरपी तैयार करने की प्रक्रिया बहुत विश्वसनीय नहीं है। दोनों की व्यवस्था में खामी है। इसके बावजूद टीवी और मनोरंजन उद्योग इन्हीं की रेटिंग के आधार पर अपने व्यावसायिक फैसले लेते हैं। कहा जा सकता है कि इस उद्योग की बुनियाद ही ऐसी व्यवस्था पर टिकी हुई है, जिसमें ज़बर्दस्त खामियां हैं। इसके बावजूद अभी तक उद्योग द्वारा टीआरपी तैयार करने की एक स्वस्थ व्यवस्था नहीं कायम करना कई तरह के सवाल खड़े करती है।

टैम आधिकारिक तौर पर ये मानती है कि वह एक लाख से अधिक आबादी वाले 148 कस्बों में 6917 मीटर के जरिए सैंपल एकत्रित करती है। इस प्रक्रिया में हर मिनट में तीस हजार लोगों की प्रतिक्रिया को ध्यान में रखा जाता है। टैम टीआरपी तय करने के लिए तीन सौ से ज़्यादा चैनलों की मॉनीटरिंग करती है। टैम अपनी रेटिंग सप्ताह में एक बार जारी करती है। वहीं ए-मैप का कहना है कि उसके मीटर एक लाख से ज्यादा आबादी वाले 87 शहरों में लगे हुए हैं। ए-मैप हर रोज़ चैनलों की रेटिंग जारी करती है। टैम कहती है कि उसके मीटर मुंबई, कोलकाता, दिल्ली, चेन्नई, बंगलोर और हैदराबाद में लगे हुए हैं। टैम के तहत आंध्रप्रदेश, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान को कवर किया जाता है। वहीं ए-मैप कहती है कि उसकी रेटिंग में टैम द्वारा कवर किए जा रहे शहरों और राज्यों के अलावा बिहार, झारखंड, जम्मू-कश्मीर और असम भी शामिल हैं। ये मीटर शहरी क्षेत्र में हैं, इसलिए इसमें ग्रामीण क्षेत्र का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। कहना न होगा कि ग्रामीण भारत की पसंद-नापसंद को दर्शाये बगैर कोई भी रेटिंग पूरी तरह सही नहीं हो सकती है।

रेटिंग तय करने के लिए टैम एक खास तरह का उपकरण टीवी सेट के साथ लगाती है। इसमें टीवी को चालू और बंद करने का समय दर्ज होता है। इसके अलावा इसमें ये भी दर्ज होता है कि किस वक्त किस चैनल को देखा गया। इसके एक मीटर की लागत 75,000 से एक लाख के बीच है। वहीं ए-मैप रेटिंग तय करने के लिए स्विस प्रसारण निगम के द्वारा दिये गये लाइसेंस के तहत टेलीकंट्रोल एजी से प्राप्त टेलीकंट्रोल आठ और जीएसएस मॉडम के जरिए आंकड़े एकत्र करती है। टेलीकंट्रोल ईकाइयों को टीवी से जोड़ दिया जाता है और ये टीवी सेट पर देखे जा रहे चैनल की जानकारी जमा कर लेता है। इसमें सप्ताह भर के आंकड़े जमा रह सकते हैं। इस रेटिंग में देश भर के छह हज़ार घरों को शामिल किया जाता है। इसके एक मीटर की लागत तकरीबन तीस हज़ार रुपये है। अहम सवाल यह भी है कि जो मीटर किसी घर में लगाये जाते हैं, वे कितने समय तक वहां रहते हैं और मीटर लगाने वाले घरों में बदलाव की क्या स्थिति है? इस बाबत टैम ने कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी है। जबकि ए-मैप का कहना है कि उसके बीस प्रतिशत पैनल हर साल नये घरों में लगाये जाते थे। पर अब हर महीने औसतन दस प्रतिशत घरों में पैनल बदला जाता है।

बहरहाल, टीआरपी तय करने की प्रक्रिया में डीटीएच और एचडीटीवी जैसे आधुनिक तकनीक पर आधारित टीवी दर्शकों की गणना भी नहीं हो पा रही है। इसके अलावा टीवी रेटिंग की एक बड़ी समस्या इस क्षेत्र में एकाधिकार का होना है। किसी एक चश्मे से देखकर पूरे भारत का मिजाज नहीं तय किया जा सकता है। इसलिए किसी एक कंपनी की रेटिंग से भी पूरे देश के पसंद-नापसंद का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता है। देश के 11.2 करोड़ टेलीविजन वाले घरों में 6.2 करोड़ घर गांव में हैं और गांवों को टीआरपी तय करने की प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया है। पिछले कुछ सालों में डीटीएच का इस्तेमाल करने वालों की संख्या और गांवों में टेलीविजन की संख्या में काफी बढ़ोत्तरी हुई है। ऐसे में इनकी उपेक्षा करके तैयार की जाने वाली रेटिंग तो अधूरी ही है। इसके बावजूद अगर चैनल चलाने वाले इसे ही आधार मानकर गंध घोल रहे हैं तो इसे टीआरपी की आड़ में अपनी मर्जी को दर्शकों पर थोपना ही कहा जाएगा।

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