जमीन अधिग्रहण कानून पर लगा सियासी ग्रहण

हिमांशु शेखर

विकास के बहाने किसानों से ली जाने वाली जमीन के बदले उन्हें उनका हक देने के मकसद से बनाया जा रहा नया जमीन अधिग्रहण कानून सियासी शह और मात का शिकार होता दिख रहा है। एक तरफ जहां कांग्रेस यह चाहती है कि यह कानून जल्द से जल्द बने वहीं दूसरे दलों के मन में यह भय सता रहा है कि यह कानून जल्दी लाने से कहीं कांग्रेस को चुनावी लाभ न मिल जाए।

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश और कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी बार-बार यह दोहरा रहे हैं कि वे हर हाल में यह चाहते हैं कि नया जमीन अधिग्रहण विधेयक संसद के शीतकालीन सत्र में पारित हो जाए और जल्द से जल्द यह कानून की शक्ल हासिल कर ले। माॅनसून सत्र में यह विधेयक संसद में पेश किया गया था और विपक्षी दलों व सिविल सोसाइटी के लोगों के तमाम आपत्तियों के बीच इस विधेयक को ग्रामीण विकास पर संसद की स्थायी समिति के पास भेज दिया गया था। इस विधेयक पर असल शह और मात का खेल इसी समिति में चल रहा है।

इस समिति की अध्यक्ष हैं इंदौर से भाजपा की सांसद सुमित्रा महाजन। वे कहती हैं, ‘समिति विभिन्न पक्षों की राय ले रही है। हमने ग्रामीण विकास मंत्रालय का पक्ष सुना और हमारी मुलाकात सिविल सोसायटी के लोगों से भी हुई। अभी 16 नवंबर को समिति की बैठक फिर से होने वाली है।’ यह पूछे जाने पर कि क्या शीतकालीन सत्र में समिति अपने सुझावों के साथ विधेयक संसद को वापस भेज देगी, वे कहती हैं, ‘हम अपनी तरफ से तो पूरी कोशिश कर रहे हैं लेकिन मुश्किल लग रहा है। जमीन अधिग्रहण बेहद संवेदनशील मुद्दा है और हम इसमें कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहते।’

संकेत साफ हैं कि राहुल गांधी और जयराम रमेश चाहे कितना भी कहें लेकिन शीतकालीन सत्र में जमीन अधिग्रहण कानून पारित होता नहीं दिख रहा। इसकी पुष्टि समिति के एक वरिष्ठ सदस्य ने बातचीत में की। उन्होंने कहा कि अगर आप ऑफ दि रिकॉर्ड पूछ रहे हैं तो मेरा जवाब यह है कि शीतकालीन सत्र तक हम इस विधेयक को वापस नहीं भेज रहे इसलिए पारित होने का सवाल ही नहीं उठता।

इस समिति के सदस्यों की कुल संख्या 31 है लेकिन अभी एक जगह खाली है। इसमें कांग्रेस, भाजपा, बहुजन समाज पार्टी समेत कई अन्य राजनीतिक दलों के सांसद भी शामिल हैं। यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि जमीन को लेकर हर दल की अपनी एक अलग राजनीति है। कांग्रेस जमीन अधिग्रहण कानून जल्दी से जल्दी इसलिए लाना चाहती है कि उत्तर प्रदेश में चुनाव होने में अब ज्यादा वक्त नहीं बचे हैं और राहुल गांधी ने जिस तरह की सियासत को उत्तर प्रदेश में हवा दी है वह जमीन अधिग्रहण के आसपास ही घूमती है।

खास तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जहां कांग्रेस को अपने लिए काफी संभावनाएं दिखती है। इस इलाके में यमुना एक्सप्रेसवे के आसपास जिस तरह से किसानों की जमीन ली गई है उसे ही बुनियाद बनाकर राहुल गांधी भट्टा-परसौल भी गए और बाद में बरास्ते किसान संदेश यात्रा उन्होंने अलीगढ़ में 9 जुलाई को किसान महापंचायत का भी आयोजन किया।

इस यात्रा को गांव-गांव जाकर कवर करने वाले इस लेखक से भी इलाके के लोगों ने यही कहा कि इस इलाके में सबसे बड़ा मुद्दा जमीन है और अगर राहुल गांधी या उनकी केंद्र की सरकार हमारे हितों की रक्षा करने में सक्षम जमीन अधिग्रहण कानून लाती है तो 2012 में वोट कांग्रेस को ही देंगे। जानकार मानते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जमीन इतना बड़ा मुद्दा इसलिए बन गया कि इलाके के किसानों और पुलिस-प्रशासन के बीच यहां संघर्ष हुए और कुछ किसानों की जान भी गई।

दूसरी वजह है कि किसानों से जिस भाव पर जमीन ली गई उसे कई गुना ऊंची कीमत पर रियल एस्टेट के धुरंधरों के हाथों बेचा गया। यही वजह है कि इलाके के किसानों ने पदयात्रा कर रहे राहुल गांधी को बार-बार यही याद दिलाया कि हमें जमीन के बदले उचित मुआवजा दिलाओ और अगले चुनाव में हमारे वोट ले जाओ।

इसका असर यह हुआ कि 9 जुलाई को अलीगढ़ के नुमाइश मैदान में आसपास के कई जिलों से जमा हुए किसानों को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा, ‘विकास के नाम पर उत्तर प्रदेश में लाखों किसानों की जमीन ली जा रही है गोल्फ क्लब और रेसिंग क्लब बनाने के लिए। जमीन बिल्डर्स को दी जा रही है।

दिल्ली में जमीन ली जाती है तो बेचने वाले को उसके मन के हिसाब से पैसे मिलते हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में ऐसी मांग करने वाले किसानों पर गोली चलाई जाती है। हमारे किसान भाइयों ने कानून की बात उठाई और कहा कि जमीन अधिग्रहण कानून बहुत पुराना है और इसलिए मुश्किलें आ रही हैं। हमारी पूरी कोशिश होगी कि हम इस कानून को बदलें, लोकसभा में आपको एक ऐसा कानून दें जिससे आप सबको फायदा हो, किसानों को फायदा हो और मजदूरों को फायदा हो।’ महापंचायत के नाम पर हुई इस रैली में राहुल गांधी तकरीबन 25 मिनट बोले और उनका पूरा भाषण जमीन अधिग्रहण के आसपास ही घूमता रहा।

अब जरा घटनाक्रम पर ध्यान दीजिए। 9 जुलाई को राहुल गांधी अलीगढ़ में बोले और 12 जुलाई को दिल्ली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल हुआ। ग्रामीण विकास मंत्रालय में सीपी जोशी की जगह ली अपेक्षाकृत तेज-तर्रार माने जाने वाले जयराम रमेश ने। रमेश की पर्यावरण और वन मंत्रालय में रहते हुए अपनी पहचान एक ऐसा मंत्री के तौर पर बनाई जो किसी भी कीमत पर विकास की वकालत नहीं करता बल्कि प्रकृति और प्रभावितों के बीच तालमेल बैठाकर विकास की गाड़ी को आगे ले जाना चाहता है। जब वे पर्यावरण मंत्रालय में थे तो कई औद्योगिक परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी देने से मना किया। इस वजह से उनसे काॅरपोरेट जगत के लोग थोड़े नाराज भी थे। जानकारों का मानना है कि ऐसे में उन्हें ग्रामीण विकास मंत्रालय में लाना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा थी।

इसका अहसास तब हुआ जब नया मंत्रालय संभालने के दो महीने के अंदर-अंदर 7 सितंबर को सालों से लटक रहे जमीन अधिग्रहण कानून के नए मसौदे को संसद में पेश कर दिया गया। कहा गया कि अंग्रेजों के जमाने में यानी 1894 में बनाए गए जमीन अधिग्रहण कानून की जगह नया कानून लेगा। रमेश ने इतनी तेजी इसलिए दिखाई कि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती इससे पहले ही राज्य में जमीन अधिग्रहण को लेकर नई नीतियां लागू कर चुकी थीं। कुछ लोगों ने इसे पुरानी नीतियों की तुलना में अच्छा बताया था। इसलिए राहुल गांधी की उत्तर प्रदेश की राजनीति को संवर्धित करने के लिए यह जरूरी था केंद्र कोई ऐसा कदम उठाए जिससे प्रदेश के लोगों को लगे कि राहुल गांधी और कांग्रेस उनके लिए कुछ कर रहे हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि संसद का सत्र खत्म होते-होते नया जमीन अधिग्रहण विधेयक रमेश ने पेश कर दिया और इसे 13 सितंबर को स्थायी संसदीय समिति में भेज दिया गया।

संसद में विधेयक पेश करने के बाद रमेश ने कहा, ‘यह एक राजनीतिक समस्या का राजनीतिक जवाब है। सिर्फ 55 दिनों के अंदर इस कानून के मसौदे को तैयार करवाने, कैबिनेट से मंजूरी दिलवाने और इसे संसद में पेश करवाने का श्रेय राहुल गांधी को जाता है। उनकी सक्रिय भागीदारी के बिना ऐसा संभव नहीं हो पाता। राहुल गांधी ने न सिर्फ इस विधेयक के बुनियादी सिद्धांतों के बारे में सुझाव दिया बल्कि माॅनसून सत्र में इसे पेश करवाने को लेकर वे प्रधानमंत्री से कई बार मिले।’ जयराम का यह बयान इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त है कि राहुल गांधी की सियासत में इस कानून की कितनी अहमियत है।

इस बीच ग्रामीण विकास को लेकर बनी स्थायी संसदीय समिति का पुनर्गठन हुआ और एक अक्टूबर से नई समिति अस्तित्व में आई। जमीन अधिग्रहण कानून पर सियासी शह और मात का खेल इसी संसदीय समिति में चल रहा है। क्योंकि भाजपा और बसपा को लग रहा है कि अगर जमीन अधिग्रहण कानून संसद के शीतकालीन सत्र में पारित हो गया तो उत्तर प्रदेश में अगले साल मार्च-अप्रैल में होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इसका फायदा उठाने के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा। उत्तर प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस मोटे तौर पर एक ही सियासी जमीन को कब्जाने की कोशिश में जुटे हैं और दोनों पार्टियां चाहती हैं कि कम से कम वे तीसरे स्थान पर तो रहें। वहीं बसपा चाहती है अगर केंद्र किसी तरह जमीन अधिग्रहण कानून लाने में नाकाम रहती है तो वह इसे चुनावी मुद्दा बनाकर राहुल गांधी की सियासत की हवा निकालने का काम करेगी।

संसदीय समिति के एक सूत्र की मानें तो खास तौर पर भाजपा और बसपा के सदस्य यह नहीं चाहते कि मौजूदा सत्र में यह कानून पारित हो जाए। इन दोनों पार्टियों के सदस्य किसी न किसी बहाने विधेयक को इतना लटका देना चाहते हैं कि कम से कम उत्तर प्रदेश के चुनाव निपट जाएं। समिति में कांग्रेस के दस सदस्य हैं और इसमें अगर उसकी सहयोगी दलों की संख्या को जोड़ दें तो संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के सदस्यों की कुल संख्या हो जाती है 13। जबकि अन्य की संख्या है 17। ऐसे में इस विधेयक को संसदीय समिति से जल्दी से जल्दी निकलवाना कांग्रेस के लिए टेढ़ी खीर हो गई है। कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी कहते हैं, ‘कांग्रेस तो चाहती है कि जमीन अधिग्रहण कानून जल्दी से जल्दी पारित हो। लेकिन अब सब कुछ स्थायी संसदीय समिति पर निर्भर करता है। अगर समिति ने मुनासिब समय में विधेयक को दे दिया तो कांग्रेस चाहेगी कि यह कानून शीतकालीन सत्र में पारित हो जाए।’

ऐसा लगता है कि जयराम रमेश को संसदीय समिति के अंदर चल रहे सियासी दांवपेंच का अहसास है। यही वजह है कि उन्होंने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज और राज्यसभा के नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली से मुलाकात कर यह अनुरोध किया कि वे सुमित्रा महाजन वाली स्थायी संसदीय समिति से विधेयक को मंजूर कराने में मदद करें। सूत्रों के मुताबिक रमेश ने इन दोनों नेताओं को यह याद दिलाया कि नए जमीन अधिग्रहण कानून की मांग करने में भाजपा सबसे आगे थी इसलिए अब अगर भाजपा की वजह से देरी होती है तो लोगों के बीच अच्छा संदेश नहीं जाएगा। अरुण जेटली और सुषमा स्वराज रमेश की बात कितना मानेंगे, यह कहना तो मुश्किल है लेकिन इतना तो तय है कि भाजपा राहुल गांधी को सियासी लाभ लेने का कोई मौका नहीं देना चाहेगी।

बताया जा रहा है कि सुमित्रा महाजन ने रमेश को कहा है कि उन्हें 700 से अधिक सुझाव मिले हैं और वे राज्यों से सलाह-मशविरा करने के बाद ही जमीन अधिग्रहण कानून के मसौदे को वापस भेजेंगी। बताते चलें कि नौ राज्यों में भाजपा की सरकार है। वैसे, रमेश को यह पता होना चाहिए कि बसपा भी उनकी राजनीति को आगे नहीं बढ़ने देना चाहेगी। इसलिए बसपा के सदस्य समिति में नए विधेयक के प्रावधानों पर सबसे ज्यादा सवाल उठा रहे हैं। वहीं नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर के साथ स्थायी संसदीय समिति के पास अपना पक्ष रखने गए माटू जनसंगठन के विमल भाई कहते हैं, ‘जब हम अपनी बात रख रहे थे तो सबसे ज्यादा आपत्ति और टीका-टिप्पणी बसपा के सांसद ही कर रहे थे। हमें यह सब देखकर ऐसा लगा कि किसानों के नाम पर कानून बनाने की आड़ में यहां तो दलगत राजनीति चल रही है और इस विधेयक की उन खामियों को दूर करने पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है जो किसान विरोधी हैं।’

इस स्थायी संसदीय समिति की अब तक सिर्फ तीन बैठकें हुई हैं। लेकिन दूसरी तरफ कांग्रेसी नेता अभिषेक मनु सिंघवी की अध्यक्षता वाली उस स्थायी संसदीय समिति की अब तक कई बैठकें हुई हैं जिसके पास लोकपाल कानून का मसौदा है। इसे सीधे तौर पर सियासत से जोड़कर देखा जा रहा है। जब तक समिति की सिफारिशें नहीं आ जातीं तब तक अंतिम मसौदा तैयार होकर कैबिनेट में नहीं जाएगा और न ही इसे संसद से पारित करवाकर कानून का रूप देना संभव होगा।

राजनीति को जानने-समझने वाले लोग मानते हैं कि राहुल गांधी की सियासी उड़ान में पर लगाने का काम उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजे करेंगे और अगर प्रदेश में कांग्रेस तीसरे नंबर पर भी नहीं रही तो केंद्र में अहम भूमिका के लिए राहुल का इंतजार थोड़ा लंबा खिंच सकता है। राहुल गांधी ने प्रदेश के सियासी ताप को जिस तरह से अपनी यात्राओं के जरिए बढ़ाया था उस पर पानी डालने का काम अन्ना हजारे के आंदोलन ने किया। इसलिए जमीन अधिग्रहण कानून जल्दी से जल्दी पारित करवाना और इसका चुनावी लाभ लेना कांग्रेस की रणनीति का अहम हिस्सा है। कांग्रेस ने 2009 के लोकसभा चुनावों में 21 सीटों पर जीत हासिल की।

कांग्रेस को लगता है कि अगर उसने सही रणनीति के साथ राजनीति की और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोक दल के साथ गठबंधन किया तो वह देश की सबसे बड़े सियासी मैदान में अपनी खोयी जमीन वापस पाने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ पाएगी। यह पूछे जाने पर कि कांग्रेस की उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए तो जमीन अधिग्रहण कानून काफी अहम है, राशिद अल्वी कहते हैं, ‘सिर्फ उत्तर प्रदेश के लिए ही क्यों। यह कानून तो पूरे देश के किसानों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। कांग्रेस चाहती है कि पूरे देश के किसानों को जमीन के बदले उनका उचित हक मिले।’

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