गैरबराबरी का मारा, हिंदोस्तां हमारा

हिमांशु शेखर

कुछ ही दिनों में देश को आजाद हुए 67 साल पूरे हो जाएंगे। इस मौके पर नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले की प्राचीर से भाषण भी देंगे। परंपरा के मुताबिक 15 अगस्त के दिन देश के प्रधानमंत्री लाल किले पर तिरंगा फहराते रहे हैं और सरकार की ओर से देश के विकास के लिए की जा रही कोशिशों और इस दिशा में आगे की योजना की रूपरेखा रखते रहे हैं। मीडिया में आ रही खबरों के मुताबिक नरेंद्र मोदी इस दिन के अपने भाषण के लिए खास तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में उनसे यह उम्मीद रखना गलत नहीं होगा कि देश की आजादी के इस 67 साल में जिस तरह से गैरबराबरी पूरे भारत में बढ़ी है, उसे दूर करने की दिशा में वे कोई ठोस योजना देश के सामने रखेंगे और आम लोगों से ‘अच्छे दिनों’ का किया हुआ चुनावी वायदा निभाने की दिशा में ठोस कदम बढ़ाएंगे।

वैसे कहने को तो देश में विदेशी मुद्रा भंडार और अरबपतियों की संख्या बढ़ रही हो लेकिन दूसरी तरफ एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो दिनोंदिन और गरीब होता जा रहा है। दरअसल, सच्चाई तो यह है कि समाज में बराबरी लाने के नाम पर सियासत होती है और सत्ता में आने पर बदले में विषमता को गति देने वाली नीतियों पर मुहर लगाई जाती है। आज भी देश में लाखों लोग भूखे पेट सो रहे हैं, करोड़ों को भर पेट भोजन नहीं मिल पा रहा है और सत्ता में बैठे लोग अक्सर भारत को महाशक्ति बनाने का दंभ भरते दिख जाते हैं। भारत में आज जितनी आर्थिक असमानता हो गई है, उतनी तो अंग्रेजों के राज में भी नहीं थी।

मानव सभ्यता और आर्थिक असमानता का काफी पुराना साथ रहा है। वर्ग संघर्ष जैसी अवघारणा के उदय के पीछे आर्थिक गैरबराबरी एक बड़ी वजह थी। समय-समय पर इस मसले को लेकर संघर्ष भी होते रहे हैं। पर जैसे-जैसे दुनिया में लोकतांत्रिक व्यवस्था का विकास हुआ, वैसे-वैसे यह आस बंधती गई कि गैरबराबरी पर आघारित व्यवस्था में सुघार होगा। घोषित तौर पर लोकतंत्र में सामाजिक असमानता को पाटना ही मुख्य लक्ष्य होता है। जाहिर है, आर्थिक समता को हासिल किए बगैर, सामाजिक समता की बात भी बेमानी होगी।
समाज में चैतरफा फैल रही विषमता के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार आर्थिक गैरबराबरी ही है। भारत आजादी के बाद मिश्रित अर्थव्यवस्था की राह पर चला। अस्सी के दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था में बदलाव की शुरुआत हुई। इसी दशक में राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने और उन्होंने देश में नई आर्थिक नीतियों को लागू करने का फैसला किया। राजनैतिक अस्थिरता के उस दौर में उनकी नीतियां मूर्त रूप नहीं ले सकीं। 1991 में पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में केन्द्र में कांग्रेस की सरकार बनी। अर्थशास्त्री वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने जुलाई 1991 को भारत में औपचारिक तौर पर नई आर्थिक नीतियों को लागू करने की घोषणा कर दी। यानी सरकार ने जन आधरित अर्थव्यवस्था को बाजार या यों कहें धन आधरित अर्थव्यवस्था में बदलने पर औपचारिक मुहर लगा दी। इसके बाद पूंजीवाद की गाड़ी देश में सरपट दौड़ने लगी और आर्थिक असमानता की खाई चैड़ी होती गई।

आर्थिक असमानता की वजह से समाज में जीवनशैली, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास के अलावा भी कई बुनियादी मोर्चों पर गैरबराबरी बढ़ रही है। इन मोर्चों पर विषमता बढ़ने से स्वभाविक तौर पर सामाजिक असंतुलन पैदा हो रहा है। इनके प्रभाव से व्यवस्था का बचे रहना संभव नहीं है। तेजी से बढ़ती आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए सरकार यह कुतर्क देती है कि अगर अर्थव्यवस्था का विकास हो रहा है तो इसका लाभ नीचे के लोगों तक अवश्य पहुंचेगा।

नोबेल फरस्कार विजेता अमेरिकी अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिगलिट्ज ने अपनी पुस्तक ‘मेंकिंग ग्लोबलाइजेशन वर्क’ में लिखा है कि आर्थिक विकास का लाभ रिसकर समाज के निचले तबके तक पहुंचता है। गौर करने लायक बात ये है कि यह किताबी बात जमीनी हकीकत से काफी अलग है। ऐसी सोच रखने वालों को चीन से सबक लेना चाहिए। 2001 से 2003 के बीच चीन की आर्थिक विकास दर विश्व में सबसे अधिक थी। इन वर्षों में चीन ने सलाना दस फीसदी की दर से आर्थिक विकास किया। यहां रोचक तथ्य यह है कि इस दौरान चीन में आर्थिक तौर पर निचले पायदान पर मौजूद दस फीसदी लोगों की आय ढाई फीसदी घट गई। इससे साफ है कि आर्थिक विकास की तेज गति से आम लोगों के हालत में सकारात्मक बदलाव लाने के दावे कितने खोखले हैं।

देशी-विदेशी पत्र-पत्रिकाओं के जरिए बार-बार यह बताया जा रहा है कि भारत में अरबपतियों की संख्या बढ़ती जा रही है। पर अहम सवाल बरकरार है कि मुट्ठी भर लोगों के बढ़ते धन से आम जन को क्या हासिल हो रहा है? देश में व्याप्त भयानक आर्थिक असंतुलन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के सबसे धनी व्यक्ति की आय और औसत प्रतिव्यक्ति आय में 90 लाख गुना का अंतर है। कहने को देश के 26.1 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने को अभिशप्त हैं। पर इससे कहीं ज्यादा लोग गरीबी रेखा के ठीक ऊपर हैं। भारत में गरीबी रेखा को कैलोरी की उपलब्धता से जोड़ा गया है। यानी कहा जा सकता है कि गरीबी रेखा के नीचे के लोगों को दो वक्त की रोटी भी नहीं मिल पा रही है। नेशनल सैंपल सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक आज भी भारत के बीस करोड़ से ज्यादा लोग बारह रुपए रोज से अपना गुजारा करने को विवश हैं। राज्यवार देखा जाए तो उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में 55 से 57 प्रतिशत ग्रामीण घर चलाने के लिए रोजाना केवल बारह रुपए खर्च कर पाते हैं। मध्य प्रदेश के 47 प्रतिशत लोग इस हालत से रूबरू हो रहे हैं। गांवों में रहने वाले दस प्रतिशत लोग तो ऐसे भी हैं जो हर दिन सिर्फ नौ रुपए ही खर्च कर पाते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक झारखंड और राजस्थान के आदिवासी इलाकों में रहने वाले 99.8 प्रतिशत परिवारों को पूरे साल में महीने भर भी दो वक्त की रोटी नहीं मिल पा रही है। इनमें से 76.6 फीसदी परिवार ऐसे थे जिन्होंने महीनों से किसी भी तरह की दाल या दूध का प्रयोग नहीं किया था।

कई लोग गाहे-बगाहे यह कहते रहे हैं कि आज यह देश ‘भारत’ और ‘इंडिया’ में बंट गया है। इंडिया दिनोंदिन संपन्न होता जा रहा है, जबकि भारत पर विपन्नता की मार गहराती जा रही है। इंडिया के लिए भारत के लोग महज वोट देने और मजदूरी करने के लिए ही बने हैं। देश का बड़ा वर्ग बुनियादी आवश्यकताओं से महरूम है। वहीं राष्ट्र के नए साम्राज्यवादी रुपयों की होली खेलने में मशगूल हैं। विश्व बैंक के एक अध्ययन के मुताबिक भारत का धनी वर्ग विश्व के सबसे ज्यादा खर्च करने वाले लोगों में पांचवें स्थान पर है। इस सर्वेक्षण के मुताबिक स्विट्जरलैंड जैसे महंगे पर्यटन स्थल पर जाने वाले सैलानियों में भारतीयों की संख्या एक चैथाई से अधिक होती है। आज दुनिया की हर लक्जरी कार की खपत भारत में हो रही है। कुछ साल पहले के एक सरकारी अनुमान के मुताबिक इस देश में पच्चीस हजार लोग ऐसे हैं जिनके पास 70 लाख या उससे अधिक कीमत की एक या उससे ज्यादा मोटर गाडि़यां हैं। देश में तकरीबन दस लाख लोग ऐसे हैं जिनके हाथों में ढाई लाख से लेकर पच्चीस लाख तक की घडि़या बंधी हुई हैं। इस देश में तकरीबन एक लाख लोग ऐसे हैं जो हर साल पांच लाख के गहने खरीदते हैं। इन तथ्यों से देश में व्याप्त आर्थिक विषमता का जायजा आसानी से लिया जा सकता है। दरअसल, भारत और इंडिया के बीच अन्तर उपयोग और उपभोग का है। भारत के पास जहां उपयोगी चीजों का भी टोटा है वहीं इंडिया के जीवन स्तर का पैमाना ही उपभोग बन गया है। एक तरफ लोग भूखे मर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ धनी तबका मोटापे से छुटकारा पाने के लिए मजे-मजे में लाखों रुपये खर्च कर रहा है।

देश में शेयर बाजार की तेजी तो खबर बनती है लेकिन भूख और गैरबराबरी पर कोई कुछ नहीं कहता। दरअसल, आर्थिक बदलावों की बयार का फायदा देश के पूंजीपतियों तक ही सिमट कर रह गया है। इस वर्ग की आमदनी में ही तेजी से बढ़ोतरी हुई है। एक अनुमान के मुताबिक 1989-90 की तुलना में आज देश के धनी वर्ग के खर्च करने की ताकत में चालीस प्रतिशत का इजाफा हुआ है। गैरबराबरी की खाई इतनी चैड़ी हो गई है कि कुछ लोगों के पास महानगरों में कई-कई बंगले हैं तो ऐसे अनगिनत लोग भी हैं जो हर मौसम में खुले में सोने को अभिशप्त हैं। जिनके सर पर न तो छत है और न ही तन ढकने के लिए पर्याप्त कपड़े।

देश में ऐसे अभागे लोग भी हैं जिनके पास उपचार करवाने तक के लिए पैसे नहीं हैं। इसके चलते हर साल देश में हजारों लोग काल के गाल में समा जा रहे हैं। यूएनडीपी के मुताबिक अभी भी इस देश के हर एक लाख लोगों में से 199 की मौत टीबी की वजह से हो जाती है। इनकी मौत के लिए आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं का अभाव ही सर्वाधिक जिम्मेदार है। स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर भी भारत के शहरी और ग्रामीण इलाकों में भारी असमानता है। एक अध्ययन के मुताबिक एक लाख की शहरी आबादी पर 4.48 अस्पताल, 6.16 डिस्पेंसरी और 308 बिस्तर हैं। जबकि एक लाख ग्रामीण लोगों पर 0.77 अस्पताल, 1.37 डिस्पेंसरी, 3.2 जन स्वास्थ्य केन्द्र और महज 44 बिस्तर हैं। हालांकि, इन आंकड़ों से एक बात तो साफ है कि शहरों की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है। लेकिन गांवों की गत तो और बुरी है।

दरअसल, आर्थिक असमानता के बीज अवसर की असमानता में छुपे हैं। जिनके पास अच्छे अवसर हैं, उन्होंने सफलता की राह पर तेजी से कदम बढ़ाया और उनकी आमदनी भी तेजी से बढ़ी। गांवों और शहरों के बीच गहराती खाई के लिए अवसर की असमानता काफी हद तक जिम्मेदार है। 1993-94 में ग्रामीण भारत के शीर्ष दस प्रतिशत लोगों की औसत वार्षिक आमदनी 61,655 रुपए थी। जबकि शीर्ष दस प्रतिशत शहरी लोगों की औसत वार्षिक आमदनी 1,37,256 रुपए थी। अभी गांव के शीर्ष दस प्रतिशत लोगों की औसत वार्षिक आमदनी 1,94,044 रुपए है जबकि शहरों के दस प्रतिशत शीर्ष लोगों की औसत वार्षिक आमदनी 4,97,583 रुपए है। 1993-94 में गांवों के निचले तबके के दस प्रतिशत लोगों की औसत वार्षिक आय 2,807 रुपए थी जबकि ऐसे शहरी लोगों की आमदनी 4,747 रुपए थी। अभी इस ग्रामीण तबके की औसत वार्षिक आमदनी 8,907 रुपए और शहरी तबके की 16,292 रुपए है। भारत में वेतन पाने वालों में शीर्ष के बीस प्रतिशत लोगों का कब्जा कुल वेतन के 56 प्रतिशत पर है। जबकि नीचे के 20 प्रतिशत लोग महज 3.6 फीसदी वेतन ही पाते हैं। यानी बीस फीसदी लोग ही आधे से ज्यादा वेतन पा रहे हैं।

अगर असमानता इसी तेजी के साथ बढ़ती रही तो इससे पैदा होने वाले असंतुलन से निपटना काफी मुश्किल होगा। असंतोष झेल रहे लोगों के हिंसक हो जाने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। कई हिंसक समस्याओं के उभार में कहीं न कहीं आर्थिक और सामाजिक असमानता ही जिम्मेदार रही है। सरकार अगर समय रहते आर्थिक असमानता पर लगाम लगाने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाती है तो समाज को इसके गंभीर परिणाम निश्चित तौर पर भुगतने होंगे। ऐसे में लोग यह देखना चाहेंगे कि नरेंद्र मोदी सरकार इस समस्या से निपटने के लिए किस तरह की योजना बनाती है और इस दिशा में कितना कामयाब होती है। जाहिर तौर पर इस सरकार ने देश के लोगों को काफी उम्मीदें बंधाई है और नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा को स्पष्ट जनादेश भी जनता ने संभवतः इसी उम्मीद में दिया है कि वे देश का कायाकल्प करेंगे। यहां यह समझना जरूरी होगा कि देश के समग्र विकास के लिए गैरबराबरी को दूर करना एक बुनियादी शर्त है।

1 thought on “गैरबराबरी का मारा, हिंदोस्तां हमारा

  1. आपके विचार बहुत गम्भीर और संतुलित लगे। अत्यन्त महत्व के विषयों पर आपने अपने विचार लिखे हैं। मेरा निवेदन है कि हिन्दी विकि पर भी अपनी रुचि के कुछ विषयों पर पाँच-दस लेख लिखने का कष्ट करें। इससे हिन्दी और समाज दोनों का हित होगा।

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