‘गठबंधन टूटना बिहार के हित में नहीं’

हाल तक बिहार के उपमुख्यमंत्री रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता और अब बिहार विधानपरिषद में नेता प्रतिपक्ष सुशील कुमार मोदी से हिमांशु शेखर  की बातचीत के खास अंशः

भाजपा के साथ रहने से नीतीश कुमार सरकार को आप जैसे सक्षम सहयोगियों की सेवा मिल रही थी। अब आप लोग साथ नहीं हैं तो क्या इससे सरकार के कामकाज पर कोई असर पड़ेगा?
निश्चित तौर पर गठबंधन टूटने से सरकार के कामकाज पर नकारात्मक असर पड़ेगा। प्रशासनिक स्तर पर इसका सबसे अधिक असर दिखेगा। हमने अब तक के कार्यकाल में सरकार के लिए कोई अड़चन नहीं पैदा की। लेकिन अब यह सरकार कमजोर हो गई है और इस वजह से जोड़-तोड़ की राजनीति शुरू हो गई है। ऐसे में सरकार उतनी मजबूती से काम नहीं कर पाएगी जिस तरह से पहले कर रही थी।

जदयू-भाजपा की सरकार ने बिहार के विकास को लेकर लोगों में एक नई उम्मीद जगाई थी। विकास की दृष्टि से गठबंधन टूटने को आप कैसे देखते हैं?
इस गठबंधन का टूटना बिहार के हित में नहीं है। बिहार में विकास का जो माहौल बना था, वह कहीं न कहीं प्रभावित होगा। दूसरे कार्यकाल के बारे में वैसे ही लोगों में यह धारणा बन रही है कि इस बार कम काम हो रहा है। बड़ी मुश्किल से हम लोगों ने मिलकर बिहार में निवेश को लेकर एक सकारात्मक माहौल बनाने की कोशिश की थी। जिसका नतीजा अब दिखने लगा था। बाहर की कंपनियां बिहार में निवेश करने लगी थीं और कई बड़ी कंपनियों ने दिलचस्पी दिखाई थी। लेकिन बिहार में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बनने से निवेश पर भी बुरा असर पड़ेगा। क्योंकि निवेशक निवेश से पहले सबसे अधिक अहमियत जिस बात को देते हैं वह है राजनीतिक स्थिरता।

आप बिहार की राजनीति में तकरीबन चार दशक से सक्रिय हैं। अगले लोकसभा चुनावों को लेकर आपका अनुभव क्या कहता है?
इस बात से नीतीश कुमार भी सहमति व्यक्त करेंगे कि कांग्रेस के प्रति लोगों में गुस्सा है और जनता चाहती है कि केंद्र की सत्ता से कांग्रेस बेदखल हो। नरेंद्र मोदी के तौर पर भाजपा एक बेहतर विकल्प देश की जनता के सामने रख रही है। वे आज देश के सबसे लोकप्रिय राजनीतिक चेहरा हैं। इसका फायदा भाजपा को देश भर में मिलेगा और बिहार में भी हम उम्मीद कर रहे हैं कि लोकसभा चुनावों में हमारी सीटों की संख्या में बढ़ोतरी होगी।

गठबंधन टूटने पर भाजपा कहती है विश्वासघात और जदयू गठबंधन धर्म की याद दिलाती है। आखिर इनमें से किस दावे पर यकीन किया जाए?
जिन नरेंद्र मोदी को लेकर नीतीश जी को इतनी आपत्ति है, 2003 में तो वे उनकी तारीफ कर रहे थे। नरेंद्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री का उम्मीदवार तो घोषित नहीं किया था, उन्हें तो सिर्फ चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाया गया था। इसलिए इस मामले को इतना तूल देना वाजिब नहीं था। गठबंधन धर्म की बात वे करते हैं लेकिन इसी गठबंधन धर्म का तकाजा यह है कि सहयोगियों के आंतरिक मामलों में दखल नहीं दिया जाए। वे तो भाजपा को टर्म डिक्टेट कर रहे थे। पार्टी के सबसे लोकप्रिय चेहरे के प्रति उनकी आपत्ति का मतलब तो यह हुआ कि वे नहीं चाहते कि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे। मुझे ऐसा लगता है कि नीतीश जी के मन में कहीं न कहीं प्रधानमंत्री बनने की इच्छा है।

बिहार को तथाकथित जंगल राज से मुक्त कराने का जनादेश मांगने के लिए नीतीश-सुशील की जोड़ी एक साथ जनता के दरबार में गई थी। इस जोड़ी ने एक टीम के तौर पर अच्छा काम भी किया लेकिन अब ये दोनों आने वाले दिनों में एक दूसरे के खिलाफ दिखेंगे। क्या यह लोगों को थोड़ा अटपटा नहीं लगेगा?
आप ठीक कह रहे हैं। एक टीम के तौर पर हमने बिहार को आगे ले जाने का सपना देखा था और हम उस पर काम कर रहे थे। इस सफर को बीच में छोड़ने का दुख न सिर्फ हमें है बल्कि बिहार की जनता और बिहार से बाहर रहने वाले प्रदेश के लोग भी इससे दुखी हैं। अब हम रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएंगे। आने वाले दिनों में हमारी कोशिश यह होगी कि प्रदेश में भाजपा को एक विकल्प के तौर पर पेश करें।

विश्वासमत के दौरान भाजपा के वाकआउट का क्या मतलब है? कुछ लोग यह कह रहे हैं कि भाजपा के कुछ विधायक सदन में मौजूद नहीं थे इसलिए भाजपा ने अपने आंतरिक मतभेद को छुपाने के लिए वाकआउट का सहारा लिया।
नहीं, ऐसा नहीं है। भाजपा पूरी तरह से एकजुट है। हमने कभी भी नीतीश जी के बहुमत को चुनौती नहीं दी। हमने वाकआउट इसलिए किया कि जनादेश साझा था। हम कोई भी ऐसा काम नहीं करना चाहते जिससे यह सरकार अस्थिर हो। हां, अगर सरकार खुद गिरती है तो उसमें हम कुछ नहीं कर सकते। हम कोई भी ऐसा काम नहीं करेंगे जिससे बिहार की जनता पर मध्यावधि चुनाव का बोझ पड़े।

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