क्या देश अब भी मारुति में घर लौटना चाहता है?

हिमांशु शेखर

‘मैं चाहती हूं कि यह कार भारत के आम लोगों के काम आए और इस कार को लेकर उनकी कोई शिकायत नहीं रहे. मैं उम्मीद करती हूं कि राष्ट्र निर्माण में इससे हर तरह से मदद मिलेगी और भारत के लोगों को इससे सुविधा होगी.’

इंदिरा गांधी

14 दिसंबर 1983 को गुड़गांव की कंपनी से निकलने वाली पहली मारुति 800 कार की चाबी सेना में काम करने वाले हरपाल सिंह को सौंपते हुए यह बात भारत के तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कही थी. इंदिरा गांधी के लिए मारुति को लाॅन्च करना एक भावुक लम्हा था. क्योंकि मारुति कंपनी के जरिए आम आदमी का कार बनाने का सपना उनके बेटे संजय गांधी ने देखा था. एक दुर्घटना में संजय गांधी के मारे जाने के बाद एक समय ऐसा लगा था कि उनका यह सपना शायद हकीकत न बन पाए लेकिन 14 दिसंबर 1983 को संजय के जन्मदिन के मौके पर उनका सपना हकीकत बन रहा था और इंदिरा गांधी भावुक हो गई थीं.उस दिन से शुरू हुआ मारुति का सफर किस कदर आगे बढ़ा, यह एक इतिहास है.

कहना गलत न होगा कि मारुति ने भारत में कारों को लेकर क्रांतिकारी परिवर्तन किया. कई अंदेशों के साथ शुरू हुई यह कंपनी कई बेहतरीन और कामयाब कार देने में सफल हुई. इस कंपनी ने भारत में कार की सवारी करने वाली जमात को कार की कई वैसी खूबियों से वाकिफ कराया जिससे लोग अनजान थे. देश में ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है जो मारुति से भावनात्मक तौर पर जुड़े हुए हैं और मारुति की पुरानी कारों खास तौर पर मारुति 800 से जुड़ी कई यादें उनके पास हैं. समय के साथ कंपनी ने अपनी कारों में बदलाव करके अपने प्रतिस्पर्धियों को अपने आसपास भी नहीं फटकने दिया.

हालांकि, पिछले कुछ सालों में उद्योग जगत और खास तौर पर वाहनों के क्षेत्र में ऐसी स्थितियां बनी हैं जिसका ताप अब मारुति को भी सहना पड़ा है. दुनिया की कई बड़ी कंपनियों ने पिछले कुछ सालों में भारतीय बाजार में आक्रामक तरीके से दस्तक दी है. वहीं कुछ देसी कंपनियों ने भी कार के बाजार में कदम रखा है. बजाहिर, इससे मारुति के लिए बाजार में अपने दबदबे को बनाए रखने पहले की तरह आसान नहीं रहा. लेकिन पिछले छह महीने में मारुति को सबसे बड़ी चुनौती कंपनी के अंदर से ही मिल रही है.

पिछले छह महीने में कंपनी में हो रहे लगातार हड़ताल ने न सिर्फ उत्पादन पर प्रतिकूल असर डाला है बल्कि ब्रांड मारुति पर भी नकारात्मक असर पड़ने की बात भी इन मामलों के जानकार कर रहे हैं.इस छह महीने के दौरान मारुति के मानेसर इकाई में चार बार हड़ताल हुआ है. जबकि मारुति के 1981 से लेकर 2011 के 30 साल के इतिहास में कुल सात मर्तबा हड़ताल हुआ है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर वे कौन सी परिस्थितियां हैं जिनकी वजह से पिछले छह महीने में मारुति में चार दफा हड़ताल हुए और ऐसा लगा कि कभी भारतीय उद्योग जगत में सितारे की तरह चमकने वाली कंपनी की चमक अब फीकी पड़ती जा रही है.

मारुति में काम करने वालों ने इस साल पहली बार हड़ताल की शुरुआत चार जून को की और जब 21 अक्टूबर को हालिया और साल का चैथा हड़ताल खत्म हुआ तब तक कंपनी के 63 कामकाजी दिन हड़ताल की भेंट चढ़ गए थे. बाजार के जानकारों और खुद मारुति कंपनी ने इतने कामकाजी दिन के बर्बाद होने की वजह से कंपनी को होने वाले नुकसान को तकरीबन 2,000 करोड़ रुपये आंका. ब्रांडिंग के लिहाज से मारुति को हुए नुकसान, अन्य आर्थिक नुकसान और इससे किन कंपनियों को फायदा मिल रहा है, यह जानने से पहले हड़ताल की मूल वजहों को जानना जरूरी है.

उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के अंतराम शर्मा पिछले चार साल से मारुति में काम कर रहे हैं. मारुति के मानेसर इकाई के गेट नंबर तीन के बाहर टेंट लगाकर कंपनी के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करने वाले सैंकड़ो मजदूरों में शर्मा भी शामिल हैं. वे कहते हैं, ‘मानेसर इकाई में तकरीबन 3,500 लोग काम करते हैं. इनमें से आप किसी से भी पूछ लो, हर कोई यही कहेगा कि वह शोषण से त्रस्त है. नौ घंटे की शिफ्ट में हमें आधे घंटे का लंच ब्रेक दिया जाता है. कैंटिन ऐसी जगह पर बनाया गया है कि कई लोगों को वहां पहुंचने में ही सात-आठ मिनट लग जाते हैं. आने में भी इतना ही वक्त लगता है. बिल्कुल समय पर पहुंचना होता है. ऐसे में हम ठीक से खाना भी नहीं खा पाते.’

मूलतः दिल्ली के रहने वाले और पिछले पांच साल से मारुति की मानेसर इकाई में काम करने वाले गजेंद्र सिंह कहते हैं, ‘नौ घंटे की शिफ्ट में साढ़े सात मिनट के दो ब्रेक मिलते हैं. इसी में आपको पेशाब भी करना है और चाय-बिस्कुट भी. ज्यादातर मौकों पर तो ऐसा होता है कि हमारे एक हाथ में चाय होती है और एक हाथ में बिस्कुट और हम शौचालय में खड़े होते हैं.’ पास ही खड़े राजस्थान के अलवर से आकर मारुति में पिछले छह साल से काम करने वाले राजेंद्र सिंह बोल पड़ते हैं, ‘कई बार तो ऐसा होता है कि घंटी बजने के बाद वर्क स्टेशन से हटने में एक मिनट लग जाता है. क्योंकि अगर आपके सामने कन्वेयर मशीन पर कोई कार आ गई हो तो आपको उसका काम करना ही पड़ता है. घंटी बजने का मतलब यह नहीं है कि आप उसे छोड़ देंगे. वहीं काम दोबारा शुरू करने के लिए मशीन के पास एक मिनट पहले पहुंचना पड़ता है ताकि ग्लव्स पहना जा सके. इस तरह से देखा जाए तो हमारे पास चाय-बिस्कुट और पेशाब करने के लिए सिर्फ पांच मिनट का ही वक्त बचता है. आप अगर कभी इस ब्रेक के दौरान वहां मौजूद रहेंगे तो अफरा-तफरी का माहौल खुद अपनी आंखों से देख सकेंगे. इस ब्रेक में हम सब दौड़ रहे होते हैं.’

मजदूरों की इस बात समेत कई और आरोपों पर कंपनी के राय लेने के लिए ने कंपनी के चेयरमैन आरसी भार्गव से संपर्क साधने की कोई बार कोशिशें कीं. लेकिन हर बार उनके कार्यालय से यह कहा गया कि वे अभी उपलब्‍ध नहीं हो पाएंगे. हालांकि, कुछ दिन पहले एनडीटीवी से बातचीत में उन्होंने साढ़े सात मिनट के ब्रेक को सही ठहराते हुए यह कहा था कि यह जापानी कार्यपद्घित का हिस्सा है और इसे 1983 में ही अपनाया गया था इसलिए मजदूरों को इस पर कोई आपत्‍ति नहीं होनी चाहिए. उन्होंने मजदूरों पर आरोप लगाया कि वे आठ घंटे की शिफ्ट में पांच घंटे से ज्यादा काम ही नहीं करना चाहते.

ये वही भार्गव हैं जिन्होंने अगस्त के आखिरी दिनों में वित्त वर्ष 2010-11 की सालाना रिपोर्ट पेश करते हुए कंपनी के कर्मचारियों को सबसे बड़ा संसाधन और धरोहर कहा था. उन्होंने कहा था, ‘हमारे सबसे बड़े संसाधन और धरोहर हमारे कर्मचारी हैं. हम हमेशा से इस संसाधान की संभावनाओं को विकसित करने के लिए प्रतिबद्घ रहे हैं क्योंकि ये न सिर्फ अपने और कंपनी के लिए फायदे की स्‍थिति बनाते हैं बल्‍कि निवेशकों को भी लाभ पहुंचाते हैं. जून 2011 में मानेसर में दुर्भाग्यपूर्ण स्‍थितियां पैदा हो गई थीं लेकिन हम इससे सबक लेकर अपने श्रमिकों के साथ उत्पादक और लाभकारी रिश्ते विकसित करने के लिए अपने प्रयासों को दोगुना करेंगे.’ भार्गव के इन दोनों बयानों के बीच का फर्क प्रबंधन के इरादे की एक झलक देता है.

बहरहाल, छुट्टियों और मेडिकल सुविधाओं को लेकर भी मारुति के मानेसर इकाई में काम करने वाले मजदूरों में असंतोष है. प्रबंधन के खिलाफ चले अभियान में मजदूरों के बीच समन्वय का काम कर रहे सुनिल कुमार कहते हैं, ‘कागजी तौर पर तो हमें कई छुट्टियां दिए जाने का प्रावधान है लेकिन एक कैजुअल लीव लेने पर कंपनी प्रबंधन 1,750 रुपये पगार में से काट लेती है. वैसे यह प्रबंधन पर निर्भर करता है कि वह कितना पैसा काटेंगे. इसका कोई हिसाब नहीं है. महीने में आठ हजार रुपये तक छुट्टी करने के काट लिए जाते हैं. अगर आपने चार दिन की छुट्टी ली और यह इस महीने की 29 तारीख से लेकर अगले महीने की 2 तारीख तक की है तो आपके दो महीने के पैसे यानी 16,000 रुपये तक कट जाएंगे. आखिर यह कहां का न्याय है?’

दरअसल, कंपनी ने एचआर पॉलिसी इस तरह बनाई है कि पगार का एक बड़ा हिस्सा ‘अटेंडेंस रिवॉर्ड’ में डाल दिया गया है और अगर कोई एक दिन गैरहाजिर होता है तो इसमें 25 फीसदी तक की कटौती कंपनी कर लेती है. गजेंद्र कहते हैं, ‘अगर कोई कंपनी में बीमार हो गया या फिर कार बनाते समय किसी को चोट लग गई तो कंपनी वहां उसका फस्र्ट एड कर देगी उसके बाद जो भी इलाज होगा वह खुद ही कराना पड़ेगा और अगर इस वजह से कोई छुट्टी ली तो कंपनी उसके पैसे काटेगी.’कंपनी की मानेसर इकाई में नियमित और ठेका पर काम करने वाले मजदूरों के बीच कई स्तर पर होने वाला भेदभाव भी विवाद की एक वजह है. इस इकाई में तकरीबन 3,500 मजदूर काम करते हैं. इनमें से तकरीबन 2,000 ठेका पर काम करने वाले हैं.

उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के मनोज कुमार वर्मा इस कंपनी में ठेका पर काम करने वाले मजदूरों में से एक हैं. वे पिछले तीन साल से यहां काम कर रहे हैं. नियमित किए जाने की बाबत पूछे जाने पर उनका जवाब होता है कि तीन साल में यहां मजदूरों को नियमित किया जाता है लेकिन तीन साल पूरा होने के बाद भी मुझे नियमित नहीं किया गया है. नियमित और ठेका मजदूरों के बीच भेदभाव की बाबत पूछने पर वर्मा कहते हैं, ‘नियमित मजदूरों की मासिक पगार 16,000 रुपये है. जबकि ठेका पर काम करने वाले हम जैसे लोगों को हर महीने सिर्फ 6,500 रुपये मिलते हैं. वहीं अप्रेंटिस के तौर पर काम करने वालों को 4,200 रुपये मासिक मिलते हैं. इसके अलावा मेडिकल और बस की सुविधा भी हमें नहीं मिलती.’

ठेका मजदूर के तौर पर काम कर रहे हरेंद्र कहते हैं, ‘हम जैसे मजदूरों से काम लेने वाले प्रबंधन के लोग भी हमसे भेदभावपूर्ण बर्ताव करते हैं. उन्हें लगता है कि इन्हें तो कभी भी निकाला जा सकता है इसलिए इन्हें कुछ भी कहा जा सकता है. ये लोग हमसे काफी गाली-गलौज भी करते हैं.’ एक अनुमान के मुताबिक भारत के वाहन उद्योग में काम करने वाले कुल मजदूरों में 80 फीसदी ठेका पर काम करने वाले मजदूर ही हैं.इन्हीं सब वजहों से धीरे-धीरे मारुति के मानेसर इकाई में मजदूरों के बीच असंतोष बढ़ता गया और उन्हें लगने लगा कि अगर वे मजदूर यूनियन बना लेंगे तो उनकी सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा.

मजदूरों के इस अभियान को आगे बढ़ाने के लिए गठित समिति के सदस्य सुनील दत्त कहते हैं, ‘हमने 3 जून 2011 को हरियाणा सरकार के श्रम विभाग के पास मजदूर यूनियन बनाने के लिए आवेदन किया. वहां से कंपनी प्रबंधन को इस बात की सूचना मिल गई. इसके तुरंत बाद उसी दिन कंपनी प्रबंधन ने मजदूरों को नौकरी से निकालने की धमकी देने की शुरुआत कर दी. कंपनी प्रबंधन ने एक हरियाणा सरकार के नाम एक पत्र तैयार किया जिसमें यह लिखा हुआ था मानेसर इकाई के मजदूर कोई यूनियन नहीं चाहते और गुड़गांव के यूनियन से ही खुश हैं. जब मजदूरों ने इस पर दस्तखत करने से मना कर दिया तो प्रबंधन की धमकी और बढ़ गई. मजबूरन हमें चार जून से हड़ताल पर जाना पड़ा.’

यह हड़ताल 13 दिनों तक चली और मानेसर इकाई में उत्पादन पूरी तरह से बंद हो गया.बीच-बचाव के बाद यह हड़ताल खत्म हुई. इसके बाद एक दिन अचानक से प्रबंधन ने मजदूरों से ‘उत्तम आचरण का शपथ पत्र’ पर दस्तखत कराना शुरू किया. कंपनी की ओर से कहा गया कि मजदूर जान-बूझकर धीरे-धीरे काम करते हैं और बात-बात पर हड़ताल पर जाने की धमकी देते हैं, इससे कंपनी का माहौल खराब हो रहा है. कंपनी ने कहा कि मजदूरों के इस तरह के ब्लैकमेल को रोकने के लिए इस शपथ पत्र को लाया गया है.

धीमा काम करने के आरोप को खारिज करते हुए अंतराम शर्मा कहते हैं, ‘यह बिल्कुल बचकाना आरोप है. वाहन कंपनियों के कामकाज से वाकिफ कोई भी व्यक्ति ऐसे आरोप पर हंसेगा ही. किसी भी वाहन कंपनी में जिस मशीन पर मजदूर काम करते हैं उसे कन्वेयर कहा जाता है. यह एक ऐसी मशीन होती है जो हर मजदूर के प्लेटफॉर्म के सामने से होकर गुजरती है. हर व्यक्ति का काम निश्चित होता है. एक निश्चित समय तक वहां पर मशीन रुकती है और कार के ढांचे में जिसका जो काम होता वह उसे करना पड़ता है. इस मशीन की गति हमेशा प्रबंधन का अधिकारी तय करता है. वह काम शुरू होने से पहले ही मशीन में फीड कर देता है कि आज कितनी कारें बननी हैं. फिर उसी हिसाब से वह मशीन काम करती है. कंपनी अपनी गलतियों को ढंकने के लिए मजदूरों पर धीमा काम करने का आरोप लगा रही है.’

कंपनी के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक मानेसर इकाई की उत्पादन क्षमता सालाना पांच लाख कार बनाने की है लेकिन यहां हर साल छह लाख कार तैयार की जा रही हैं. 2008-09 की तुलना में 2010-11 में मानेसर इकाई की उत्पादन क्षमता में 40 फीसदी बढ़ोतरी हुई है. इससे भी यही बात साबित होती है कि धीमा काम करने का आरोप गलत है. मजदूरों का आरोप है कि यह शपथ पत्र एकतरफा है और इस पर दस्तखत करने के बाद मजदूरों के पास प्रबंधन के किसी भी गलत फैसले का विरोध करने का अधिकार नहीं बचता. इस पर दस्तखत करने के लिए प्रबंधन की ओर से बनाए जा रहे दबाव के बीच 29 अगस्त 2011 से कंपनी के मानेसर इकाई में एक बार फिर हड़ताल शुरू हो गई. यह हड़ताल 33 दिनों तक चली.

इस दौरान पास के सुजूकी पावर ट्रेन, सुजूकी कास्टिक और सुजूकी मोटरसाइकिल के मजदूरों ने भी मारुति के मजदूरों के समर्थन में 15 सितंबर से दो दिनों की हड़ताल की. समझौता इस बात पर हुआ कि कंपनी निलंबित मजदूरों को वापस काम पर बहाल करेगी.

सुनील दत्त कहते हैं, ‘जब पहली अक्टूबर को हड़ताल खत्म होने के बाद हम सब काम पर गए तो कंपनी ने 94 निलंबित मजदूरों को काम पर वापस लेने से इनकार कर दिया. वहीं ठेके पर काम करने वाले 1,200 मजदूरों को भी काम पर वापस लेने से मना कर दिया गया.’ सुनिल कुमार बताते हैं, ‘हमसे कंपनी ने हड़ताल खत्म कराते वक्त कहा कुछ और काम शुरू करने के वक्त किया कुछ. कंपनी की तरफ से धोखा दिए जाने के बाद हमने सात अक्टूबर से एक बार फिर हड़ताल पर जाने का फैसला किया.’

यह हड़ताल 15 दिनों तक चली. इस हड़ताल ने मारुति के गुड़गांव इकाई में भी उत्पादन ठप कर दिया. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मानेसर में सुजूकी की अन्य तीन कंपनियां सुजूकी पावर ट्रेन, सुजूकी कास्टिक और सुजूकी मोटरसाइकिल के मजदूर भी मारुति के अपने साथियों के समर्थन में हड़ताल पर चले गए. इनमें मारुति के उत्पादन के लिहाज से सबसे ज्यादा अहमियत रखती है सुजूकी पावर ट्रेन. क्योंकि इसी कंपनी में मारुति के कारों में इस्तेमाल होने वाला ईंजन बनता है. इसलिए यहां के हड़ताल के बाद मारुति का गुड़गांव इकाई भी बंद हो गया और कुछ दिन तो ऐसे भी रहे जब कंपनी से एक भी कार बनकर नहीं निकल पाई.

सुजूकी कास्टिक के गेट के सामने सैंकड़ो मजदूरों के साथ प्रदर्शन कर रहे सुजूकी पावर ट्रेन मजदूर यूनियन के अध्यक्ष सुबेर सिंह यादव कहते हैं, ‘आपके यहां पहुंचने के कुछ देर पहले पास के खोगांव के सरपंच को गुंडों के साथ कंपनी के प्रबंधन ने हमें भगाने के लिए भेजा था. 50 से अधिक की संख्या में वे लाठी-डंडे लेकर आए थे लेकिन मजदूरों की संख्या देखकर भाग गए. उन्होंने धमकी दी कि जल्दी हड़ताल खत्म करो नहीं तो ठीक नहीं होगा. कंपनी अपने ही मजदूरों के खिलाफ आसामाजिक तत्वों का इस्तेमाल कर रही है.’ वे कहते हैं, ‘कंपनी कोई पहली दफा ऐसा नहीं कर रही है. सुजूकी मोटरसाइकिल के बाहर प्रदर्शन कर रहे मजदूरों पर कंपनी असामाजिक तत्वों द्वारा 9 अक्टूबर को हमले करवा चुकी है. वहां तो गुंडों ने चार गोलियां भी चलाई थीं और शराब की बोतलों से मजदूरों पर हमला किया था. उस घटना के वक्त हुई मारपीट में हमारे कुछ साथी घायल भी हुए.’

मारुति प्रबंधन की इन्हीं गलतियों की वजह से मजदूरों को मिल रहे समर्थन का दायरा बढ़ता गया. आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक), सेंटर फॉर इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) और हिंद मजदूर सभा जैसे मजदूर संगठन भी मारुति के संघर्षरत मजदूरों के समर्थन में आ गए. दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों और कुछ अन्य प्रबुद्ध नागरिकों ने इन मजदूरों का सहयोग करने के लिए ‘नागरिक मंच’ का गठन किया और मानेसर जाकर मजदूरों को संघर्ष आगे बढ़ाने में मदद की.

मंच की ओर से मानेसर जाकर मजदूरों का समर्थन कर रहे जय पुष्प बताते हैं, ‘हमने मारुति मजदूरों के समर्थन में दूसरी कंपनियों के मजदूर यूनियनों से संपर्क साधा. इसके अलावा हमने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठनों को भी मारुति की स्‍थिति से अवगत कराया. इसका नतीजा यह हुआ कि सुजूकी के गृह देश जापान में रेलवे के मजदूरों ने सुजूकी के मुख्यालय के सामने प्रदर्शन किया.’ अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में इंटरनैशनल डिस्कशन फोरम और लेबर वीडियो प्रोजेक्ट के साथ काम करने वाले राजेंद्र सहाय मारुति मजदूरों की कहानी अंतरराष्ट्रीय संगठनों तक पहुंचाने के मकसद से मानेसर पहुंचे.  वे कहते हैं, ‘मानेसर के प्रदर्शन की अमेरिका में काफी चर्चा है. वहां के विभिन्न श्रम संगठन अपने-अपने ढंग से मारुति मजदूरों के संघर्ष का समर्थन कर रहे हैं. मुझे मारुति मजदूरों से बातचीत करके यह लगा कि ये अपने अधिकारों को हासिल करने को लेकर प्रतिबद्घ हैं.’

मानेसर और धौराहेड़ा इलाके की विभिन्न कंपनियों में काम करने वाले मजदूरों ने मारुति मजदूरों के समर्थन में 15 अक्टूबर को आयोजित रैली में हिस्सा लिया. इन मजदूरों का समर्थन करने मानेसर पहुंचे भाकपा सांसद और एटक के महासचिव गुरुदास दासगुप्ता कहते हैं, ‘कंपनी लगातार देश के सभी ट्रेड यूनियन कानूनों का उल्लंघन कर रही है. मजदूरों को अपने मन से अपना संगठन नहीं बनाने दिया जा रहा है. कंपनी प्रबंधन अपनी शर्तों को जबरन मजदूरों पर थोपने की कोशिश कर रही है.’ वे आगे कहते हैं, ‘अगर प्रबंधन ऐसा करती रही तो मजदूरों का असंतोष बढ़ता जाएगा और आने वाले दिनों में इस तरह के संघर्ष और दिख सकते हैं.’ उन्होंने यह भी कहा कि जिस तरह से देश में पूंजीपति काम कर रहे हैं उसमें मानेसर जैसी स्‍थितियां देश के अन्य औद्योगिक हिस्सों में भी दिख सकती हैं.

कई दौर की वार्ता के बाद हरियाणा सरकार के प्रतिनिधियों की मौजूदगी प्रबंधन और मजदूर नेताओं के बीच जो समझौता हुआ उसकी जानकारी देते हुए मजदूरों के अभियान का नेतृत्व कर रहे सोनू गुर्जर कहते हैं, ‘कंपनी ने 64 निलंबित मजदूरों को बहाल करने का फैसला किया. 30 मजदूरों के बारे में कंपनी ने अभी फैसला नहीं किया है. लेकिन इन पर फैसला प्रबंधन और मजदूरों के प्रतिनिधि मिलकर दस दिनों के भीतर लेंगे. ठेके पर काम करने वाले 1,200 मजदूरों को भी कंपनी काम पर वापस रखेगी.’ मजदूर यूनियन की मांग के बारे में वे कहते हैं, ‘इस पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ लेकिन एक शिकायत निवारण समिति बनाने पर सहमति बनी है. इस समिति में प्रबंधन और मजदूरों के प्रतिनिधि शामिल होंगे. वहीं प्रबंधन और मजदूरों के बीच बेहतर रिश्ते विकसित करने के मकसद से एक मजदूर कल्याण समिति बनाने पर भी दोनों पक्षों में सहमति बनी है. इसमें भी दोनों पक्षों के प्रतिनिधि शामिल होंगे.’ तो क्या अब मारुति में आने वाले दिनों में हड़ताल की आशंका खत्म हो गई, इस पर गुर्जर कहते हैं सब कुछ प्रबंधन के रवैये पर निर्भर करता है.

इस समझौते के बाद मारुति की मानेसर इकाई में एक बार फिर से उत्पादन शुरू हो गया है लेकिन बार-बार हुए हड़ताल से कंपनी को आर्थिक तौर पर नुकसान उठाना पड़ा है. इसकी पुष्टि खुद कंपनी ने और बाजार के कई जानकारों ने की है. वहीं विज्ञापन और ब्रांड की दुनिया से जुड़े हुए लोगों का कहना है कि अगर इसी तरह से कंपनी में आगे भी हड़ताल होते रहे तो इससे ब्रांड मारुति पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा. लेकिन पहले बात हड़ताल की वजह से मारुति के बिक्री पर पड़े नकारात्मक प्रभाव की.

कंपनी के चेयरमैन आरसी भार्गव ने हड़ताल खत्म होने के बाद अपने बयान में कहा कि कंपनी को इस वजह से 2,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. सितंबर को पूरा महीना और अक्टूबर में 15 दिन कंपनी के मानेसर इकाई में हड़ताल चली. पिछले एक साल में कार बाजार में मारुति की हिस्सेदारी में 12 फीसदी की कमी आई है. पिछले सितंबर में जहां कार बाजार में मारुति की हिस्सेदारी 52 फीसदी थी वहीं इस साल सितंबर में यह घटकर 40 फीसदी रह गई. जनवरी से लेकर अब तक कंपनी के शेयरों की कीमत में भी तकरीबन 27 फीसदी गिरावट आई है.

कंपनी के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक सितंबर 2010 के मुकाबले सितंबर 2011 में घरेलू बाजार में कंपनी की गाडि़यों की बिक्री में 17.2 फीसदी की कमी आई. सितंबर 2010 में मारुति ने 95,148 गाडि़यों की बिक्री की थी जबकि इस साल सितंबर में यह संख्या घटकर 78,816 रह गई. कंपनी को इस दौरान निर्यात के मोर्चे पर काफी नुकसान उठाना पड़ा. सितंबर महीने में निर्यात में 47.5 फीसदी कमी दर्ज की गई. पिछले साल सितंबर में कंपनी ने 12,858 गाडि़यां देश के बाहर भेजी थीं लेकिन इस साल यह संख्या घटकर 6,749 रह गई. इसी साल अगस्त में कंपनी ने 14,356 गाडि़यों का निर्यात किया था. चालू वित्त वर्ष में 30 सितंबर तक कंपनी ने कुल 5,33,833 गाडि़यां बेचीं. यह पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 10.6 फीसदी कम है. पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में कंपनी ने 5,96,978 गाडि़यों की बिक्री की थी.

गौरतलब है कि कंपनी का एक बेहद लोकप्रिय माॅडल है एसएक्स4. यह गाड़ी मानेसर इकाई में ही बनती है. मानेसर इकाई में हड़ताल की वजह से सितंबर महीने में इस गाड़ी की बिक्री में 90 फीसदी की कमी आई. पिछले साल सितंबर में जहां एसएक्स4 माॅडल की 1,965 गाडि़यों की बिक्री हुई थी वहीं इस साल यह संख्या घटकर 196 रह गई. इसी साल अगस्त में इस माॅडल की 1,893 गाडि़यां बिकी थीं.

मारुति की गाड़ियों की बिक्री में आई कमी पर एंजल ब्रोकिंग के ऑटो विश्लेषक यारेश कोठारी कहते हैं, ‘मानेसर में मजदूरों की हड़ताल की वजह से उत्पादन में आई कमी को मारुति की गाड़ियों की बिक्री में आई कमी का मुख्य वजह माना जा सकता है. क्योंकि इस महीने में दूसरी कंपनियों के बिक्री के आंकड़ों में बढ़त दर्ज की गई.’मारुति के लिहाज से ये दोनों हड़तालें इसलिए अधिक नुकसानदेह साबित हुई क्योंकि यह त्योहारों का मौसम है और इस दौरान कारों की बिक्री सबसे अधिक होती है. हर कंपनी आकर्षक प्रस्तावों के साथ इस वक्त तैयार होती है और अपने ओर अधिक से अधिक ग्राहकों को आकर्षित करना चाहती है. इस दौरान दूसरी कार कंपनियों को फायदा हुआ और उनकी बिक्री बढ़ी. मारुति को अगर थोड़ी-बहुत चुनौती किसी कंपनी से मिल रही है तो वह हयूंदई ही है. कंपनी ने हाल ही में इयाॅन माॅडल लाॅन्च किया और जानकारों का मानना है कि मारुति की हड़ताल ने इसे परोक्ष रूप से फायदा पहुंचाया. अब तक इस माॅडल की 7,500 कारें बिक गई हैं. सितंबर में कार बाजार में हयूंदई की हिस्सेदारी तीन फीसदी बढ़कर 21.7 फीसदी हो गई. इस दौरान कंपनी की बिक्री 13.3 फीसदी बढ़कर 35,955 पर पहुंच गई.

मारुति की हड़ताल का फायदा फाॅक्सवैगन को भी मिला. इस साल सितंबर में पिछले साल सितंबर के मुकाबले कंपनी की गाडि़यों की बिक्री में 39 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की गई. कंपनी ने इस दौरान सबसे अधिक पोलो और वेंटो माॅडल बेचे. सितंबर में टोयटा की गाडि़यों की बिक्री भी लगभग दोगुनी 12,807 हो गई. वहीं जनरल मोटर्स के शेवरले बीट और शेवरले स्पार्क की बिक्री में भी सितंबर में तेजी दर्ज की गई. कोठारी कहते हैं, ‘हयूंदई और जनरल मोटर्स के बिक्री आंकड़ों में बढ़ोतरी की दो वजहे हैं. एक तो मारुति के उत्पादन में कमी. दूसरी वजह यह है कि इस महीने में इन दोनों कंपनियों ने नए मॉडल लॉन्च किए.’

वाहन कंपनियों के संगठन सोसाइटी आॅफ इंडियन आॅटोमोबाइल मैन्युफैक्चर्स (एसआईएएम) की मानें तो मारुति की हड़ताल की वजह से देश के पूरे वाहन क्षेत्र पर नकारात्मक असर पड़ सकता है. एसआईएएम का कहना है कि देश में 35 फीसदी सालाना की दर से विकसित हो रहा वाहन उद्योग की विकास दर में इस साल काफी कमी आएगी. हालांकि, इस संगठन ने बिक्री में कमी के लिए वैश्विक आर्थिक स्थिति, ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी और ब्याज दरों को खलनायक बताया है लेकिन इसके अधिकारियों ने यह भी कहा है कि मारुति में होने वाली किसी भी गतिविधि से वाहन उद्योग अछूता नहीं रह सकता. क्योंकि अब भी कारों के 40 फीसदी बाजार पर मारुति का ही कब्जा है.हड़ताल की वजह से उत्पादन में आई कमी का नतीजा यह हुआ कि मारुति के कई माॅडल की बुकिंग के बाद डिलीवरी का समय बढ़ गया.

कंपनी की बेहद लोकप्रिय कार स्विफ्ट के लिए इंतजार करने का समय छह महीने से बढ़कर आठ महीने और कुछ जगहों पर तो दस महीने तक हो गया. इस गाड़ी के लिए बुकिंग कराने के बाद इंतजार करने वाले लोगों की संख्या एक लाख के पार पहुंच गई है. हालांकि, कुछ कार डीलरों के हवाले से यह खबर भी आई कि लोग लंबे इंतजार से बचने के लिए स्विफ्ट और एसएक्स4 की बुकिंग रद्द करा रहे हैं. इंतजार का वक्त बढ़ते जाने से होने वाले नुकसान का अंदेशा शायद कंपनी को था.

यही वजह है कि कंपनी के मैन्युफैक्चरिंग विभाग के प्रमुख एमएम सिंह ने इस साल अप्रैल में ‘फोर्ब्स इंडिया’ को दिए एक साक्षात्कार में कहा था, ‘क्षमता में कमी की वजह से बाजार हिस्सेदारी को खोना किसी भी वाहन बनाने वाली कंपनी के लिए खतरे की घंटी है.’यह खतरे की घंटी किसी भी कंपनी को उस वक्त अधिक खौफनाक लगने लगती है जब इंतजार के लंबे वक्त की वजह से बुकिंग रद्द होने लगे और बिक्री घटने लगे. इससे ब्रांड पर भी नकारात्मक असर पड़ता है.

एक ब्रांड के तौर पर मारुति भारत में कितना मजबूत है इसकी गवाही कार बाजार में मारुति की हिस्सेदारी देते हैं. हाल तक इस बाजार की आधे से अधिक हिस्सेदारी कंपनी के पास थी. लेकिन आंकड़ों से अधिक मारुति को एक चहेता ब्रांड बनाने का काम इसकी सेवाओं ने किया है. कोठारी के मुताबिक मारुति ने सिर्फ अपनी कारें नहीं बेचीं बल्‍कि इतने सर्विस सेंटर खोले की मारुति की सवारी करने वालों को कोई परेशानी नहीं हो. इस मोर्चे पर दूसरी कार कंपनियां मारुति से अभी काफी पीछे हैं.

कुछ साल पहले तक भारत में कार और मारुति एक दूसरे के पर्याय थे. कुछ उसी तरह जैसे स्कूटर और बजाज. मारुति 800 ने अपनी सवारी करने वालों से भावनात्मक रिश्ता जोड़ा. यही वजह है कि जब कंपनी इस बेहद सफल मॉडल को बंद करने की योजना बना रही थी तो ग्राहकों की ओर से कई स्तर पर आवाज उठे थे.

उसी दौरान इंटरनेट पर मारुति 800 के नाम से बनाए गए एक फोरम पर टीचए विपुल ने इस कार को कुछ इस तरह याद किया: मेरे गैराज में 1994 मॉडल सफेद मारुति 800 अब भी खड़ी है. हालांकि, कई बार यह लौरा, इनोवा, आई-10 और पल्सर के बीच खोयी हुई मालूम पड़ती है लेकिन फिर भी मेरे लिए इसकी काफी अहमियत है. यह कार मेरी मां चलाती थीं. उन्होंने आखिरी बार इसे जहां खड़ा किया था आज भी यह कार वहीं खड़ी है. वाष्प बनकर जब इसकी टंकी में से तेल उड़ जता है तो हम इसकी टंकी में दोबारा तेल भर देते हैं. बाहर और अंदर से रोज इसकी सफाई की जाती है और आज भी यह दूर से ही चमकती है. इसकी चाबी मेरे पिता के पास है लेकिन किसी को भी इसे चलाने की अनुमति नहीं है. जब भी मुझे मेरी मां की याद आती है तो मैं इस मारुति 800 में जाकर थोड़ी देर बैठ जाता हूं और यह मुझे मां की गोद का अहसास देती है. मैं इस गाड़ी से भावनात्मक तौर पर इस कदर जुड़ा हुआ हूं कि इसी मॉडल की एक नई कार खरीदने जा रहा हूं ताकि गर्व से कह सकूं कि मेरे पास भी मारुति 800 है.

मारुति 800 को याद करते हुए अंजान लिखते हैं, ‘इस कार के साथ मेरा रिश्ता कुछ उसी तरह का है जैसे कोई बहुत पुराना प्रेम संबंध जिसकी खुशबू आप हर वक्त महसूस करते हैं. 1987 मॉडल की मारुति 800 ने हर कदम पर मेरा साथ दिया. इस कार से मैंने रेस भी लगाई और इसी कार में मेरा प्रेम संबंध भी परवान चढ़ा. कुछ मौकों पर मैं अपनी प्रेमिका के साथ इस कार में पकड़ा भी गया. शादी के बाद मैंने 1997 में नई मारुति 800 खरीदी. शुरुआत में पत्नी और अब बच्चों के साथ इस कार से मैं कई बार छुट्टियां मनाने गया. यह कार हमारे परिवार के एक सदस्य की तरह है.’

बाला लिखते हैं, ‘मैं नौ साल का था. तीन-तीन कार रखने वाले परिवारों से आने वाले मेरे अमीर सहपाठी जब मुझसे पूछते थे कि तुम्हारे घर में कितनी कार है तो मेरे पास कोई जवाब नहीं होता था. 1992 की गर्मियों में मेरे पापा ने लाल रंग की मारुति 800 खरीदी और मुझे मेरा जवाब मिल गया. दिल्ली में शायद ही कोई ऐसी प्रमुख जगह बची हो जहां मेरा परिवार इस कार पर सान से सवार होकर नहीं पहुंचा हो. जब मेरा परिवार चेन्नई जाने लगा तो हम इस कार को भी वहां ले गए. वहां से हम इस कार से तिरुपति, पांडिचेरी और ऊटी की यात्रा पर निकल जाते थे. कई सालों बाद कार में कई समस्या आने लगी और एक समय ऐसा आया जब मैकेनिक ने कह दिया कि अब इसे ठीक नहीं किया जा सकता. मेरा पूरा परिवार परेशान था. हमने मारुति के कई सर्विस सेंटर से संपर्क साधा. मारुति के मैकेनिकों ने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और इसका चेसिस बदल डाला. मेरे पापा के चेहरे की चमक देखने लायक थी.’

हालांकि, अब मारुति और कार एक दूसरे के पर्याय नहीं रहे. इसकी वजह कोठारी बताते हैं, ‘तेजी से बढ़ते भारत के कार बाजार में पिछले कुछ सालों में कई वैश्‍विक कंपनियों के दस्तक दी है. पहले ये सिर्फ बड़ी गाड़ियां बनाते थे. जबकि मारुति के लोकप्रिय ब्रांड छोटी कारों की श्रेणी में थे. लेकिन पिछले कुछ साल में इन कंपनियों ने कई छोटी कारें भारतीय बाजार में उतारी हैं. इसका नतीजा यह हुआ है कि मारुति की बाजार हिस्सेदारी घटी है. इस वजह से अब कार और मारुति एक-दूसरे के पर्याय नहीं रहे हैं.’

ब्रांड और विज्ञापन की दुनिया के जानकारों का मानना है कि पिछले कुछ महीने से लगातार हो रहे हड़ताल से अब तक तो मारुति को बहुत ज्यादा नुकसान नहीं हुआ लेकिन अगर आने वाले दिनों में कंपनी में हड़ताल और इस वजह से उत्पादन में कमी आती है तो निश्‍चित तौर पर इससे ब्रांड मारुति को काफी नुकसान उठाना पड़ेगा. ब्रांड गुरू और हरीश बिजूर कंसल्ट्स इंक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हरीश बिजूर बताते हैं, ‘भले ही बिक्री में कमी देखी जा रही हो लेकिन ब्रांड मारुति पर अब तक कोई खास असर नहीं पड़ा है. लेकिन अगर आने वाले दिनों में फिर से मारुति में इसी तरह से मजदूरों का असंतोष पनपता है तो निश्‍चित तौर पर हाल की घटना को ब्रांड मारुति के लिए एक अशुभ शुरुआत के तौर पर गिना जाएगा.’ कुछ ऐसी ही राय प्रमुख विज्ञापन कंपनी क्रायोन्स के अध्यक्ष रंजन बरगोत्रा की है. वे कहते हैं, ‘अगर हड़ताल मारुति की कार्यशैली का हिस्सा बन जाए तो फिर भारत के बेहद प्रतिस्पर्धी कार बाजार में ब्रांड मारुति के लिए अपनी जगह को बचाए रखना बेहद कठिन साबित होगा.’

इंतजार का समय बढ़ने से ब्रांड पर पड़ने वाले असर की बाबत बरगोत्रा कहते हैं, ‘कुछ हफ्तों के इंतजार को कार बाजार के लिए अच्छा संकेत माना जाता है. लेकिन असल दिक्कत तब होती है जब आपको यह कहा जाए कि चार महीने बाद आपके सपनों की कार मिल जाएगी लेकिन जब आप समय पूरा होने पर अपने डीलर के पास जाएं तो वह कहे कि अभी आपको दो महीने और इंतजार करना पड़ेगा. ऐसे में फिर ब्रांड को कोई नहीं बचा सकता.’

बरगोत्रा जिस स्‍थिति की ओर इशारा कर रहे हैं, उस स्‍थिति का आना काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि मारुति की इकाइयों में उत्पादन की गति क्या रहती है. अगर मजदूरों का असंतोष बढ़ा और उत्पादन ठप हुआ तो फिर इंतजार का समय बढ़ना और पहले से तय समय पर कार की डिलीवरी नहीं देने जैसी स्‍थितियां उत्पन्न हो सकती हैं.

कोठारी कहते हैं, ‘अगर ऐसी स्‍थिति बनती है तो मारुति को चाहने वालों के ब्रांड की छवि खराब होगी और इसका फायदा दूसरी कंपनियों को मिलेगा.’आखिर क्या किया जाए कि ऐसी स्‍थिति नहीं पैदा हो? जवाब बिजूर देते हैं, ‘आप किसी भी रेस्टोरेंट में अगर खाना खाने जाते हैं और अगर आपको वहां का वेटर चेहरे पर मुस्कान के साथ खाना परोसता है तो खाना अधिक तृप्‍ति देता है. वेटर के चेहरे पर मुस्कान तब ही रहेगी जब उसका पेट भरा हुआ हो. ऐसे ही अगर कार खरीदने वालों के मन में यह बात घर कर गई कि वह जिस कार को खरीदने जा रहा है उसे बनाने वाले मजदूर बेहद दुखी मन से इस कार को बनाकर बाजार में भेज रहे हैं तो यकीन मानिए ग्राहक उस कार को नहीं खरीदेगा. इसलिए मारुति प्रबंधन को हर हाल में मजदूरों को संतुष्ट करना होगा.’

बकौल बरगोत्रा, ‘कोई भी ब्रांड एक दिन में नहीं बनता. आज मारुति अगर कार की सवारी करने वालों का चहेता ब्रांड है तो इसके लिए कंपनी की सालों की मेहनत और सर्विस जिम्मेदार है. मारुति ने शुरुआत से ही भारत में कार चलाने वालों के सामने ऐसी चीजों को लाया जिससे वे अनजान थे. कारों में रंग मारुति ने भरा. पावर स्‍टियरिंग, पावर विंडो और अन्य एक्सेसरीज से लोगों को वाकिफ मारुति ने कराया. मारुति ने वैश्‍विक मानकों के हिसाब से हमेशा अपनी गाड़ियों में जरूरी बदलाव किया. अपने कारों के मॉडल को अपग्रेड किया. यही रुख मारुति को अब अपने यहां काम करने वाले लोगों के साथ भी अपनाना चाहिए. क्योंकि आज मारुति जिस ऊंचाई पर है, वहां तक पहुंचाने में इसके मजदूरों का अहम योगदान रहा है.’

मारुति का सफर

भारतीय कार बाजार पर राज करने वाली कंपनी मारुति के बारे में यह तथ्य बहुत कम लोगों को ही पता होगा कि 16 नवंबर, 1970 में इसकी शुरुआत भी एक निजी कंपनी के तौर पर हुई थी. इसका शुरुआती नाम था मारुति टेक्‍निकल सर्विसेज लिमिटेड और इसके मालिक थे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी. इस कंपनी की शुरुआत देसी कार बनाने के मकसद से हुई थी.

उस वक्त संजय गांधी की मां इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं और केंद्र सरकार ने इस कंपनी को कई तरह की सुविधाएं दे रखी थी. इस पर इंदिरा गांधी पर काफी निशाना भी साधा गया. इस बीच 23 जून, 1980 को संजय गांधी की एक दुर्घटना में मौत हो गई. इसके बाद इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली उस समय की केंद्र सरकार ने कंपनी का राष्ट्रीयकरण कर दिया और इसका नया नाम हो गया मारुति उद्योग लिमिटेड.

इस कंपनी के कामकाज को गति देने के मकसद से एक वैश्‍विक साझेदार की तलाश शुरू हुई. कंपनी को गति देने की जिम्मेदारी सौंपी गई अरुण नेहरू को. क्योंकि भारत में कार बनाने को लेकर विशेषज्ञता नहीं थी. बताया जाता है कि भारत सरकार की इस कंपनी का साझीदार बनने में दुनिया की सभी बड़ी कार कंपनियां दिलचस्पी ले रही थीं. क्योंकि भारत के कार बाजार का उस समय तक दोहन नहीं हुआ था.

हालांकि, फॉक्सवैगन के साथ सरकार की बातचीत अंतिम स्तर में पहुंच कर टूट गई थी. ज्यादातर कंपनियां इस बात पर तैयार नहीं हो रही थीं कि इस नई कंपनी में उनकी हिस्सेदारी 40 फीसदी होगी. उस समय भारत में इतना निवेश करने को कोई तैयार नहीं हो रहा था. हर कंपनी के अधिकारी भारत सरकार के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत कर रहे थे. पर एक कंपनी ऐसी थी जिसके मालिक खुद सभी बैठकों में हिस्सा ले रहे थे.

यह कंपनी थी जापान की सुजूकी और इसके मालिक का नाम ओसामू सुजूकी. यह कंपनी 20 फीसदी की शुरुआती हिस्सेदारी और बाद में इसे बढ़ाकर 40 फीसदी करने के शर्त पर भारत में काम करने को तैयार थी. इस कंपनी को साझीदार बनाने पर भारत सरकार तैयार हो गई और दोनों पक्षों के बीच 2 अक्टूबर, 1982 को समझौते पर दस्तखत हुआ.

इसके 13 महीने के अंदर 14 दिसंबर, 1983 को संजय गांधी के जन्मदिन पर इस कंपनी की पहली कार मारुति 800 खुद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लॉन्च की और पहले ग्राहक हरपाल सिंह को अपने हाथों से चाबी दी. जब यह पहली कार बनकर आई तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नारायण दत्त तिवारी ने कहा था कि जीप की छत पर सामान रखने के लिए जिस तरह का कैरियर होता है वह तो कार के ऊपर है ही नहीं. इसके बाद कंपनी ने कैरियर लगवाया लेकिन लोगों को यह पसंद नहीं आया और बाद में कैरियर को हटा लिया गया.

मारुति 800 बेहद सफल कार साबित हुई. शुरुआती दिनों में इस मॉडल में इस्तेमाल होने वाले कल-पु्र्जों में से 97 फीसदी देश के बाहर से आते थे. हालांकि, कुछ ही सालों में देसी कल-पुर्जों की हिस्सेदारी बढ़ाकर 93 फीसदी कर दी गई. 1984 में मारुति ने ओमनी लॉन्च किया और यह भी बेहद सफल साबित हुई. अगले ही साल मारुति जिप्सी लेकर आई और यह भी लोगों की चहेती बन गई.

1987 का साल मारुति के लिए काफी मायने रखता है. इस साल कंपनी ने पहली दफा कारों का निर्यात किया. कंपनी ने 500 कार हंगरी भेजे. इससे कार बाजार में भारतीय योग्यता को मान्यता मिली. 1992 में सुजूकी ने कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 50 फीसदी कर दी. मारुति की जेन और एस्टीम को लोगों ने खूब सराहा. 1999 में भारतीय कार बाजार में हयूंदई अपने सैंट्रो के साथ और डेवू मोटर्स मटिज के साथ आई.  छोटे कारों की श्रेणी में खास तौर पर सैंट्रो ने मारुति को नुकसान पहुंचाया. नतीजा यह हुआ कि फायदे की फसल काट रही मारुति को 2000 में 269 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा.

फिर मारुति ऑल्टो लेकर आई और कंपनी फायदे की पटरी पर वापस लौट आई. इस बीच मारुति ने अपने ग्राहकों को बेहतरीन सेवा देने के लिए अपने सर्विस सेंटरों का काफी विस्तार किया.2002 में सरकार ने मारुति में अपनी हिस्सेदारी का विनिवेश किया और सुजूकी की हिस्सेदारी बढ़कर 54.2 फीसदी हो गई. अगले साल मारुति बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और नैशनल स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्घ हुई.

2005 में कंपनी स्‍विफ्ट लेकर आई जो जल्द ही सफल कारों में शुमार की जाने लगी. 2007 में कंपनी ने एसएक्स-4 उतारी. 2010 में मारुति को पहचान देने वाली मारुति 800 बनाना कंपनी ने बंद कर दिया. अब इस कंपनी में भारत सरकार की कोई हिस्सेदारी नहीं है. 36.94 फीसदी अन्य संस्‍थागत निवेशकों और 8.85 फीसदी हिस्सेदारी गैर संस्‍थागत निवेशकों के पास है. इन निवेशकों में एलआईसी (8.95 फीसदी) और एचएसबीसी ग्लोबल इंवेस्टमेंट (5.17 फीसदी) प्रमुख हैं.

अब तक हुई हड़तालें

मारुति सुजूकी में पिछले 16 साल में सात बार मजदूरों ने हड़ताल की है.

अप्रैल, 1995

मजदूरी बढ़ाने की मांग को लेकर तीन दिन की हड़ताल मजदूरों ने की. गुड़गांव की इकाई में हड़ताल की वजह से उत्पादन ठप हो गया था.

25 मार्च, 1998

स्थानीय मजदूरों के मसले पर दो दिनों की यह हड़ताल कंपनी के गुड़गांव इकाई में हुई थी. इससे उत्पादन में कमी दर्ज की गई थी.

12 अक्टूबर, 2000

पगार बढ़ाने की मांग करने वाली मजदूरों की यह हड़ताल 89 दिनों तक चली थी. यह मारुति के इतिहास में अब तक की सबसे अधिक दिनों तक चलने वाली हड़ताल है. इससे गुड़गांव इकाई में उत्पादन पूरी तरह ठप हो गया था.

4 जून, 2011

मानेसर इकाई की यह हड़ताल मजदूर यूनियन बनाने की मांग को लेकर हुई. 13 दिनों की इस हड़ताल की वजह से मानेसर इकाई में उत्पादन बंद करना पड़ा.

29 अगस्त, 2011

‘उत्तम आचरण का शपथ पत्र’ पर मजदूरों द्वारा दस्तखत नहीं किए जाने से उपजी स्थितियों और नए यूनियन की मांग को लेकर यह हड़ताल 33 दिनों तक चली. इस वजह से मानेसर इकाई में उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ.

15 सितंबर, 2011

सुजूकी पावर ट्रेन के मजदूरों ने दो दिनों की यह हड़ताल मारुति के अपने साथियों के समर्थन में की. मारुति की गाडि़यों के लिए ईंजन बनाने वाली इस कंपनी में हड़ताल की वजह से कंपनी के सभी इकाइयों में उत्पादन ठप हो गया.

7 अक्टूबर, 2011

पिछली हड़तालों में शामिल होने की वजह से निकाले गए मजदूरों को वापस बहाल करने, ठेका मजदूरों को काम पर वापस लेने और मजदूर यूनियन को मान्यता देने की मांग के साथ शुरू हुई यह हड़ताल 15 दिनों तक चली. इसमें मानेसर की सुजूकी की अन्य तीनों कंपनियों के मजदूर भी शामिल हो गए. इसका नतीजा यह हुआ कि मारुति सुजूकी की सभी कंपनियों में उत्पादन पूरी तरह से बंद हो गया.

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