क्या गडकरी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में भाजपा की राह का रोड़ा बन गए हैं?

हिमांशु शेखर

किसी भी सत्ताधारी दल के लिए अपनी कमजोरियों पर पर्दा डालने के लिहाज से सबसे सुखद स्थिति क्या होती है? सियासत को जानने-समझने वाले लोग इस सवाल का जो अलग-अलग जवाब देते हैं उन सबमें एक बात समान है. ये सभी लोग कहते हैं कि अगर लचर और कमजोर विपक्ष हो तो सत्ताधारी दल चतुराई से अपने कमजोरियों पर पर्दा डाल देती है. अभी देश की राष्ट्रीय राजनीति में कुछ ऐसी ही स्थिति है. कांग्रेस की अगुवाई वाली केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार 2010 के मध्य से ही लगातार किसी न किसी विवाद में घिर रही है. लेकिन देश की प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने कभी भी ऐसा माहौल नहीं बनाया जिससे यह लगे कि मनमोहन सिंह सरकार खतरे में है. जब-जब भ्रष्टाचार के मसले पर सरकार को घेरने की बारी आई तब-तब कोई न कोई ऐसी बात सामने आई जिससे भाजपा को रक्षात्मक रुख अख्तियार करना पड़ा. कई राजनीतिक जानकार मानते हैं कि विपक्षी दल के रूप में भाजपा की नाकामी की प्रमुख वजहों में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के कई फैसले और उनके कारोबारी रिश्ते शामिल हैं. दबी जुबान में ही सही भाजपा के कुछ नेता भी इस बात को स्वीकार कर रहे हैं.

सोनिया गांधी के दामाद और प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा का मामला आजकल अखबारों की सुर्खियों में छाया हुआ है. लेकिन भाजपा इस मामले में बहुत आक्रामक रुख नहीं अपना पा रही है. इसके पीछे भी गडकरी को ही वजह बताया जा रहा है. रॉबर्ट वाड्रा का मामला इंडिया अगेंस्ट करप्‍शन ने उठाया है. इस संगठन ने संकेत दिए हैं कि अगली बारी नितिन गडकरी की है. ऐसे में भाजपा इस असमंजस में है कि अगर वह रॉबर्ट वाड्रा का मामला उठाकम आईएसी की बातों का वैधता देगी तो फिर गडकरी के मामले में यही काम कांग्रेस करेगी. हालांकि, इस बात में सबकी दिलचस्पी है कि आईएसी गडकरी के खिलाफ क्या सामने लेकर आती है.

लेकिन इसके पहले भी अब तक कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिनके आधार पर न सिर्फ गडकरी पर सवाल उठ रहे हैं बल्‍कि उनकी पार्टी भाजपा को रक्षात्मक रुख अख्‍तियार करना पड़ रहा है. सबसे ताजा मामला है महाराष्ट्र के सिंचाई घोटाले का है. 70,000 करोड़ रुपये से अधिक का यह घोटाला जब कुछ महीने पहले सामने आया तो महाराष्ट्र की राजनीति में काफी हलचल हुई. वहां सरकार चला रहे कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के बीच चली तनातनी और उसके बाद हुए समझौते में राज्य के उपमुख्यमंत्री और एनसीपी प्रमुख शरद पवार के भतीजे अजित पवार को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा. इसके बाद राज्य की प्रमुख विपक्षी दल शिव सेना और भाजपा ने सरकार पर हमलावर रुख अपनाया. विपक्षी दलों का यह विरोध राज्यव्यापी होता इससे पहले ही इस मामले को उजागर करने में अहम भूमिका निभाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि दमानिया ने यह कहकर सनसनी फैला दी कि जब वे इस मामले को लेकर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के पास गईं तो गडकरी ने उन्हें यह कहते हुए लौटा दिया कि उनके शरद पवार से कारोबारी रिश्ते हैं इसलिए वे इस मामले को नहीं उठा सकते. दमानिया ने यह बात उसी दिन कही जिस दिन दिल्ली से सटे सूरजकुंड में आयोजित भाजपा कार्यकारिणी और कार्य परिषद में बतौर भाजपा अध्यक्ष गडकरी को दूसरा कार्यकाल देने के मकसद से पार्टी का संविधान संशोधित हो रहा था. गडकरी और पूरी भाजपा ने इन आरोपों को खारिज किया और जवाबी कार्रवाई करते हुए दमानिया को कानूनी नोटिस भेज दिया. इसके बावजूद दमानिया अड़ी रहीं.

दमानिया कहती हैं, ‘मैंने नोटिस का जवाब नितिन गडकरी को भेज दिया है लेकिन अब तक उनकी तरफ से आगे कोई पत्र नहीं आया. वे चाहते हैं कि मैं माफी मांगूं लेकिन मैं अदालत में उनका सामना करने के लिए तैयार हूं.’ गडकरी के साथ हुई अपनी मुलाकात के बारे में दमानिया बताती हैं, ‘हम लोगों ने सिंचाई परियोजनाओं में घोटाले को लेकर एक जनसुनवाई याचिका (पीआईएल) दायर की थी. हम चाहते थे कि विपक्षी दल भाजपा भी इस मामले को उठाए. हमें यह भी पता चला था कि भाजपा नेता किरीट सोमैया भी इस मामले में एक पीआईएल दायर करना चाहते हैं. लेकिन गडकरी उन्हें ऐसा करने से मना कर रहे हैं. जब मैंने गडकरी से ये जानना चाहा कि सोमैया को पीआईएल करने से क्यों रोक रहे हैं तो वे नाराज हो गए.’ बकौल अंजलि दमानिया गडकरी कहने लगे, ‘किरीट जी को अगर लगता है तो इस मामले पर उन्हें एक प्रेस वार्ता बुला लेनी चाहिए. पीआईएल करना राजनीतिक दल का काम नहीं है. यह तो एनजीओ का काम है. हम इस मामले को कैसे उठाएं. अजित पवार के चाचा शरद पवार के साथ हमारा उठना-बैठना है. वे हमारे चार काम करते हैं और हम उनके चार काम करते हैं. राजनीति में किसी को कुछ नहीं पता. हो सकता है कि अगला चुनाव हमें शरद पवार के साथ मिलकर लड़ना पड़े. इसलिए इस मामले में हम आपकी कोई मदद नहीं कर सकते.’

दमानिया के आरोपों के कुछ ही दिनों बाद गडकरी का एक सिफारशी पत्र सार्वजनिक हो गया और इसने महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ भाजपा के पूरे अभियान की हवा निकाल दी. इस पत्र में गडकरी ने महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में विकसित की जा रही गोसीखुर्द परियोजना के ठेकेदारों के 400 करोड़ रुपये के भुगतान में तेजी लाने की सिफारिश की थी. यह जानकर कोई भी अचरज में पड़ सकता है कि इस परियोजना में काम कर रहे ठेकेदारों पर गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए भाजपा के ही एक सांसद ने इनका भुगतान रोकने की सिफारिश की थी. सांसद हरिभाई जवाले ने गडकरी से पहले ही केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय को पत्र लिखकर परियोजना विकसित करने में लगी कंपनियों की शिकायत की थी. मालूम हो कि जवाले जल संसाधन पर संसद की स्थायी समिति के सदस्य भी हैं. महाराष्ट्र में भाजपा की सहयोगी शिव सेना के सांसद आनंदराव अडसुल ने भी एक ऐसा ही पत्र केंद्र सरकार को भेजा था. लेकिन गडकरी ने न तो अपनी पार्टी के सांसद की आपत्तियों को अहमियत दी और न ही अपनी सहयोगी पार्टी के सांसद की. गडकरी ने तो केंद्रीय मंत्री पवन कुमार बंसल को भेजे पत्र में यहां तक लिखा कि उनके सांसदों की शिकायतों को दरकिनार करते हुए ठेकेदारों को पैसे का भुगतान तुरंत कराया जाए.

अब सवाल यह उठता है कि आखिर गडकरी गोसीखुर्द परियोजना के ठेकदारों के भुगतान को लेकर इतने चिंतित क्यों हैं कि उन्होंने अपनी और सहयोगी पार्टी के सांसदों को भी दरकिनार कर दिया? इंडिया अगेंस्ट करप्शन के जिन लोगों ने गडकरी के इस पत्र को सार्वजनिक किया उनका यह कहना है कि गडकरी के सहयोगी और भाजपा के राज्यसभा सांसद अजय संचेती की कंपनी भी गोसीखुर्द परियोजना में काम कर रही है. संचेती के अलावा भाजपा विधायक मितेश बंगाडि़या की कंपनी भी परियोजना का काम कर रही है. दमानिया समेत इंडिया अगेंस्ट करप्शन के अन्य कई लोगों ने यह कहा कि गडकरी को चिंता इस परियोजना की नहीं है बल्कि वे अपनी पार्टी के लोगों की कंपनियों को बकाया पैसा दिलाना चाहते हैं और ये कंपनियां खुद सिंचाई परियोजनाओं में घोटाले को लेकर आरोपों के घेरे में हैं. जबकि इन आरोपों पर जवाब देते हुए गडकरी ने कई बार यह बात दोहराई कि उन्होंने यह पत्र विदर्भ के किसानों के हितों की चिंता करते हुए लिखा था. गडकरी यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने यह भी कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो वे ऐसे और सौ पत्र लिखेंगे. गडकरी ने अपने बचाव में यह भी कहा कि महाराष्ट्र के कई कांग्रेसी नेताओं ने भी गोसीखुर्द परियोजना के लिए ऐसे पत्र लिखे हैं. गोसीखुर्द परियोजना की विडंबना यह है कि 24 साल पहले इंदिरा गांधी के शासनकाल में जब इस परियोजना की रूपरेखा तैयार की गई थी तो उस वक्त इसका बजट था 372 करोड़ रुपये. अब यह बढ़ता हुआ 14,000 करोड़ रुपये को पार कर गया है. लेकिन जानकारों की मानें तो अब तक इस परियोजना का आधा काम भी नहीं हो पाया है.

विदर्भ जनआंदोलन समिति के प्रमुख किशोर तिवारी विदर्भ में लंबे समय से किसानों के बीच काम कर रहे हैं. वे कहते हैं, ‘नितिन गडकरी को यह नहीं कहना चाहिए था कि उन्होंने विदर्भ के किसानों के हितों को देखते हुए ठेकेदारों को तुरंत भुगतान का पत्र लिखा था. इस इलाके में कई ऐसे नेता है जिन्होंने ऐसे पत्र लिखे हैं. ये नेता किसी एक दल के नहीं है. ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के मामले में महाराष्ट्र में दलों की दूरी मिट गई है. क्योंकि हर पार्टी से जुड़े हुए लोग इस तरह के काम में हैं. गडकरी को यह बात ईमानदारी से स्वीकारनी चाहिए कि उन्होंने ठेकेदार को ध्यान में रखकर यह पत्र लिखा था.’ तिवारी आगे कहते हैं, ‘गडकरी समेत कई नेता यह दावा करते हैं कि गोसीखुर्द परियोजना से विदर्भ के किसानों की समस्याओं का समाधान हो जाएगा. लेकिन सच्चाई यह नहीं है. सिंचाई की सौ फीसदी सुविधा उपलब्ध होने के बाद भी इसका फायदा इलाके के 20 फीसदी किसानों को ही मिल पाएगा.’ वे कहते हैं, ‘अगर गडकरी को सही में किसानों की चिंता है तो इस परियोजना के ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई की मांग उन्हें करनी चाहिए थी. राष्ट्रीय स्तर पर महाराष्ट्र की सिंचाई परियोजनाओं में धांधली का मामला भले ही अब उठा हो लेकन स्थानीय स्तर पर ये बातें तो बहुत पहले से चल रही हैं. नितिन गडकरी इससे अनजान नहीं हैं.’

दरअसल, यह एक तथ्य है कि गडकरी के सहयोगी अजय संचेती और उनकी ही पार्टी के एक विधायक की कंपनियां गोसीखुर्द परियोजना में काम कर रही हैं. लेकिन अपने बचाव में किसानों का आड़ लेने वाले गडकरी यह बताना भूल गए कि इस परियोजना से उनका निजी हित किस तरह से जुड़ा हुआ है. गोसीखुर्द परियोजना विदर्भ के लिए है. इसी इलाके में एक जगह हैं भंडारा. भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने अपनी चीनी मिल भंडारा के उमरेड में लगाई है. इसका नाम है पूर्ति साखर कारखाना. मराठी में चीनी को साखर बोलते हैं. अब विदर्भ समेत दिल्ली में भी यह बात चल रही है कि गोसीखुर्द परियोजना को लेकर गडकरी की चिंता की असली वजह कहीं उनका खुद का कारोबार तो नहीं. कई लोग यह बात कर रहे हैं कि गडकरी की चीनी मिल का कारोबार तभी चमकेगा जब इसे पानी मिलेगा और इस तक पर्याप्त मात्रा में पानी गोसीखुर्द परियोजना से ही पहुंचना है. इस मिल का कारोबार आगे बढ़े इसलिए इसके कर्मचारी इलाके के किसानों को गन्ना उगाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं. इस इलाके में गडकरी इथनॉल और बिजली तैयार करने की कंपनी भी चला रहे हैं. विदर्भ में पिछले तीन साल में गडकरी ने चार नई चीनी मिलें खरीदी हैं. ये सभी नदी के किनारे या फिर प्रस्तावित सिंचाई परियोजनाओं से करीब हैं. इसका मतलब यह हुआ कि सबसे पहले पानी इन्हें मिलना चाहिए. न कि आत्महत्या के खतरे से जूझ रहे विदर्भ के किसानों को. ये तथ्य किसानों के हितों को आधार बनाकर अपना बचाव करने वाले गडकरी की प्राथमिकत को स्पष्ट कर रहे हैं.

यहीं पर न सिर्फ गडकरी घिर गए बल्कि मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने भी विरोध करने का नैतिक हक खो दिया. ऐसे में उसकी प्राथमिकता कांग्रेस को घेरने की नहीं रही बल्कि पार्टी खुद को या यों कहें कि अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष को बचाने में जुटी हुई है. पहले भी कई मौके ऐसे आए हैं जब गडकरी की वजह से पार्टी की कांग्रेस विरोधी मुहिम को बीच में ही रोककर बचाव का मुद्रा अख्तियार करना पड़ा है. ताजा मामला है कोयला ब्लाॅक आवंटन का. नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट आने के बाद भाजपा की अगुवाई में विपक्ष ने संसद का सत्र नहीं चलने दिया. कोयला ब्लॉक आवंटन को लेकर पूरे देश में हो-हल्ला हो रहा था और इसमें भाजपा अहम भूमिका निभा रही थी. लेकिन इसी बीच एक दिन कांग्रेस की तरफ से यह आरोप लगाया गया कि गडकरी के सहयोगी और भाजपा सांसद अजय संचेती को कोयला ब्लाॅक आवंटन से 500 करोड़ रुपये का लाभ हुआ. संचेती की कंपनी एसएमएस इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड को छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने कोयला ब्लाॅक आवंटित किया है. आरोप लगाने वाले दिग्विजय सिंह को गडकरी ने कानूनी नोटिस भेजा.

संचेती की साझेदारी वाली कंपनी को छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार ने सरगुजा जिले में दो कोयला खदान भटगांव-दो और भटगांव एक्सटेंशन में आवंटित किए हैं. अनुमान है कि इन कोयला खदानों में आठ करोड़ टन कोयला है. इन दोनों में से एक खदान के लिए संचेती की कंपनी से 552 रुपये प्रति टन और दूसरे के लिए 129.6 रुपये प्रति टन की दर से सरकार ने पैसे लिए. बताया जा रहा है कि जिस खदान के लिए सरकार ने कम पैसे लिए उसके कोयले की गुणवत्ता ऊंची कीमत वाले खदान के कोयले की गुणवत्ता से अधिक है. सीएजी की रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया गया है कि इन दोनों खदानों के आवंटन से सरकारी खजाने को 1,052 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. ये दोनों खदान संचेती की साझीदारी वाली कंपनी को 32 साल के लिए दिए गए हैं. अगर आज की दर पर संचेती की कंपनी इन दोनों खदानों के कोयले बेचे तो उसे 8,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त लाभ होगा. लेकिन इन खदानों का कोयला अगले 32 साल में बेचा जाना है. इस दौरान कोयले का भंडार घटेगा और कीमतें बढ़ेंगी. इस आधार पर हिसाब लगाया गया है कि संचेती की कंपनी को सस्ता खदान मिलने की वजह से 25,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त फायदा होगा. सीएजी ने नुकसान का आकलन दोनों खदानों की कीमतों के फर्क को आधार बनाकर किया है. संचेती की जिस कंपनी को ये दोनों खदान मिले हैं उसकी दूसरी साझीदार सोलार एक्सप्‍लोजिव ने इन खदानों को अपनी वेबसाइट पर ‘खजाने’ की संज्ञा दी है.

संचेती की कंपनी को ये दोनों कोयला खदान बाजार भाव की तुलना में काफी कम पर दिए गए हैं. रमन सिंह सरकार पर ये दोनों खदान गलत ढंग से संचेती की कंपनी को आवंटित करने का आरोप लग रहा है. इसमें छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम का इस्तेमाल रमन सिंह सरकार ने औजार की तरह किया. पहले निगम को खदानों के आवंटन के लिए कंसल्टेंट नियुक्त करने को कहा गया. निगम ने गडकरी के गृह शहर नागपुर की कंसल्टेंसी कंपनी जायक्नो कैपिटल सर्विसेज लिमिटेड को कंसल्टेंट नियुक्त किया. कंसल्टेंट नियुक्त करने के लिए निविदा मंगाने का काम तक नहीं किया गया. लेकिन इसी कंसल्टेंट ने कोयला खदान आवंटित करने की पूरी प्रक्रिया की रूपरेखा तैयार की. इसी आधार पर गडकरी के चहेते संचेती की साझेदारी वाली कंपनी को छत्तीसगढ़ की सरकार ने दो कोयला खदान बाजार भाव से काफी कम पर आवंटित कर दिए. संचेती के इस साझा उपक्रम के दूसरे साझेदार सत्यानारायण नुवाल भी गडकरी के गृह शहर नागपुर के ही हैं. नुवाल की कंपनी का नाम है सोलार एक्सप्लोजिव. कंसल्टेंट पर यह आरोप है कि उसने जान-बूझकर संचेती की कंपनी के दस्तावेजों की खामियों को नजरअंदाज किया. संचेती की कंपनी के पास खनन का पर्याप्त अनुभव नहीं होने के बावजूद इसे खदान आवंटित कर दिए गए. ये दोनों खदान ऐसे हैं जिन्हें खनन के लिहाज से सबसे उपयुक्त और आसान माना जाता है. ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर क्या वजह है छत्तीसगढ़ सरकार ने इन दोनों खदानों से कोयला निकालने का काम निजी कंपनी को दे दिया?

संचेती की साझेदारी वाली कंपनी को सस्ती दर और गलत ढंग से कोयला खदान आवंटित करने को लेकर जितने सवाल छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह पर उठ रहे हैं उतने ही सवाल गडकरी को लेकर भी उठ रहे हैं. संचेती को लाभ पहुंचाने का आरोप गडकरी पर लगने का इतना असर हुआ कि कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाले में कांग्रेस पर आक्रामक रुख अपनाने वाली भाजपा अब बचाव की मुद्रा में आ गई है. कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाले को देशव्यापी मुद्दा बनाने की भाजपा की रणनीति धरी की धरी रह गई. भाजपा में भी इस बारे में कानाफूसी हो रही है. बताया जा रहा है कि गडकरी के कहने पर संचेती ने एक पत्र लिखकर अपने ऊपर लगे आरोपों को लेकर स्‍थिति साफ करने की कोशिश की है. भाजपा के मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष पर गंभीर आरोप एक ऐसे समय में लगे जब पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे बंगारू लक्ष्मण रक्षा सौदे कराने के नाम पर पैसा लेने की वजह से जेल में थे. तहलका के चर्चित स्टिंग आॅपरेशन के बाद चले मुकदमे में दोषी पाए जाने के बाद बंगारू लक्ष्मण को अप्रैल के आखिरी दिनों में जेल हुई थी और तकरीबन पांच महीने तक जेल में रहने के बाद अब जाकर उन्हें जमानत मिली है.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान भी कुछ ऐसा ही हुआ. मायावती सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के रोज नए-नए मामले सामने आ रहे थे. भाजपा भी भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा बनाए हुए थी. लेकिन जब मायावती ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) घोटाले के मुख्य आरोपित और सूबे के स्वास्थ्य मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा को बहुजन समाज पार्टी से निकाला तो भाजपा ने उन्हें लपक लिया. सिर्फ बाबू सिंह कुशवाहा ही नहीं बल्कि गडकरी ने आपराधिक पृष्ठभूमि वाले बादशाह सिंह को भी पार्टी में शामिल कराया. मायावती सरकार में श्रम मंत्री रहे बादशाह सिंह को कुछ ही दिनों पहले एक घोटाले में पुलिस ने गिरफ्तार किया है. ऐसा नहीं है कि इन दोनों को पार्टी में शामिल करने को लेकर गडकरी के फैसले की आलोचना नहीं हुई.

भाजपा नेता रामाशीष राय ने तो यहां तक आरोप लगाया कि कुशवाहा को पार्टी में शामिल कराने के लिए वरिष्ठ नेताओं ने पैसे खाए हैं. बाद में उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया. रामाशीष राय कहते हैं, ‘कुशवाहा को पार्टी में शामिल कराने के लिए विनय कटियार और उस समय भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे सूर्यप्रताप शाही ने पैसे खाए. इसकी शिकायत मैंने पार्टी के आला नेताओं से की. राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी और वरिष्ठ नेता लाल कृष्‍ण आडवाणी को पत्र लिखकर यह सब बताया. लेकिन दोनों नेताओं ने कोई कदम उठाना तो दूर पत्र का जवाब देना भी जरूरी नहीं समझा. मैंने अपने पत्र में लिखा था कि पार्टी का अगर यही हाल रहा तो उत्तर प्रदेश में अगले लोकसभा चुनाव में पार्टी का बचा-खुचा भी खत्म हो जाएगा.’ वे कहते हैं, ‘सिर्फ कुशवाहा ही नहीं बल्‍कि प्रदेश में कई सीटों पर टिकट देने के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने पैसे लिए. मैं यह नहीं मान सकता कि इसकी जानकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष को नहीं होगी. लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया.’

गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ ने भी कुशवाहा को पार्टी में शामिल करने का विरोध किया. वहीं पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी भी इस बात से आहत थे कि भ्रष्टाचार के आरोपितों को पार्टी में शामिल कराया जा रहा है. क्योंकि उन्हें यह लगता था कि अपनी जनचेतना यात्रा के जरिए उन्होंने जो माहौल बनाया है उसका फायदा भाजपा को मिलता लेकिन कुशवाहा और बादशाह सिंह को पार्टी में शामिल करके यह अवसर गंवा दिया गया. यह आडवाणी और कुछ वरिष्ठ नेताओं का ही दबाव था कि गडकरी ने कुशवाहा को चुनाव नहीं लड़ाने का फैसला किया और उनकी सदस्यता स्थगित कर दी. वहीं बादशाह सिंह को पार्टी में शामिल किए जाने को लेकर सबसे अधिक विरोध उमा भारती कर रही थीं. मालूम हो कि उमा भारती को उत्तर प्रदेश में गडकरी ने विशेष रणनीति के तहत लगाया था. उत्तर प्रदेश में पार्टी के एक नेता कहते हैं कि बादशाह सिंह के मामले में दोनों नेताओं के बीच यह स्थिति आ गई कि उमा भारती ने प्रचार अभियान से अलग हटने के विकल्प पर विचार करना शुरू कर दिया था लेकिन बीच-बचाव के बाद स्थिति सुधरी.

कुशवाहा और बादशाह सिंह के अलावा मायावती की पार्टी के कुछ और वैसे नेताओं को गडकरी ने भाजपा शामिल करवाया जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप थे. ऐसा करते ही पार्टी ने मायावती सरकार के भ्रष्टाचार का विरोध करने का नैतिक अधिकार खो दिया. उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा नेताओं को मीडिया के इस सवाल का जवाब नहीं सूझ रहा था कि मायावती सरकार के दागी मंत्रियों को पार्टी में शामिल कराके आखिर भाजपा कैसे राज्य की जनता से मायावती के खिलाफ वोट मांगेगी. कुशवाहा के मामले में पार्टी के वरिष्ठ नेता कितने असहाय थे, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पार्टी के एक बड़े नेता ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि कुशवाहा अब भाजपा में शामिल होकर ‘व्हिसल ब्लोअर’ का काम करेंगे.

अब ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से भाजपा के ‘पुनर्निर्माण’ के लिए भेजे गए नितिन गडकरी भ्रष्टाचार के आरोपितों को पार्टी में लाकर आखिर भाजपा को कहां ले जा रहे हैं? इस बारे में पार्टी के कई नेताओं से अलग-अलग बात करने पर यह बात उभरकर सामने आती है कि भाजपा में एक तरह का भ्रम है. पार्टी चुनावी जीत और स्वस्थ्य राजनीतिक प्रयोग में संतुलन साधने को लेकर भ्रम की स्थिति में है.

उत्तर प्रदेश में पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘पार्टी में यह बात लंबे समय से चल रही है कि हमारी प्राथमिकता किसी भी कीमत पर चुनावी जीत हासिल करने की नहीं होनी चाहिए. उत्तर प्रदेश चुनावों से पहले भी यह सुझाव आया था कि हमें चुनावी जीत-हार के चक्कर में नहीं पड़ते हुए मुद्दों के आधार पर चुनाव लड़ना चाहिए. लेकिन हर बार की तरह इस बार भी टिकट बंटवारे के समय चुनावी जीत ही लक्ष्य बन गया. ऐसे में कुशवाहा और बादशाह सिंह जैसे लोगों को शामिल किया जाना भी पार्टी के सीटों के आंकड़ों में सुधार से जुड़ गया.’ वे कहते हैं, ‘कुछ क्षेत्रों में कुशवाहा मतदाताओं की अच्छी-खासी संख्या और इन पर बाबू सिंह कुशवाहा का प्रभाव होने की बात मानकर पार्टी ने मायावती सरकार में मंत्री रहे इस नेता को शामिल किया. बादशाह सिंह के बारे में भी पार्टी ने माना कि वे जीतकर आ सकते हैं.’ इन नेताओं को शामिल करने से भ्रष्टाचार के खिलाफ पार्टी के अभियान पर पड़े असर के बारे में वे कहते हैं, ‘असर तो पड़ता ही है. यह बात तो हर तरफ चली ही कि कल तक जब यही नेता मायावती सरकार में मंत्री थे तो भाजपा इन्हें कोस रही थी और आज भाजपा इनके लिए वोट मांग रही है.’ गडकरी ने भले ही पार्टी की सीटों में इजाफे के मकसद से इन नेताओं को पार्टी में शामिल किया हो लेकिन हकीकत यह है कि इससे भाजपा की सीटें बढ़ने के बजाए 51 से घटकर 47 रह गईं. मतलब साफ है कि उत्तर प्रदेश के लोगों ने इस बात को समझा कि भाजपा कोई अलग राजनीति नहीं कर रही है.

गडकरी की वजह से तब भी पार्टी मुश्किल में पड़ गई थी जब राज्यसभा में विपक्ष के उपनेता एसएस अहलूवालिया का टिकट काटकर उन्होंने झारखंड से एनआरआई कारोबारी अंशुमान मिश्रा को राज्यसभा भेजना चाहा था. भाजपा में अंशुमान मिश्रा की पहचान पार्टी के लिए पैसे जुटाने वाले एक कारोबारी की है. यह आरोप भी लगा कि मिश्रा को राज्यसभा भेजने के गडकरी के फैसले के पीछे पैसे का खेल है. अंशुमान मिश्रा को राज्यसभा भेजने के गडकरी के फैसले का सबसे पहले पार्टी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने विरोध किया. इसके बाद उन्हें आडवाणी खेमे का परोक्ष समर्थन मिला. मसला ऐसा था कि संघ भी गडकरी का बचाव नहीं कर सकता था. इसलिए गडकरी को अपना फैसला बदलना पड़ा और अंशुमान मिश्रा की उम्मीदवारी वापस लेनी पड़ी. इसके बाद अंशुमान मिश्रा ने सार्वजनिक तौर पर लाल कृष्ण आडवाणी, अरुण जेटली, मुरली मनोहर जोशी और यशवंत सिन्हा के खिलाफ काफी कुछ कहा. मिश्रा ने आडवाणी को राजनीति छोड़कर घर बैठने की सलाह तक दे डाली. लेकिन गडकरी चुप रहे. भले ही अंशुमान मिश्रा ने पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को सार्वजनिक तौर पर बेईज्जत किया हो लेकिन जानकार बताते हैं कि अब भी वे गडकरी के करीब बने हुए हैं. पार्टी के एक नेता बताते हैं कि गडकरी ने अंशुमान मिश्रा को यह आश्वासन दे रखा है कि अगले लोकसभा चुनाव में उन्हें उत्तर प्रदेश के देवरिया से पार्टी का टिकट दिया जाएगा.

अब ऐसे में कोई भी यह सोच सकता है कि अगर सही अर्थों में कोई पार्टी लोकतांत्रिक है तो वह पार्टी के कई अभियानों को कुंद करने वाले अध्यक्ष को खुद पर बोझ मानते हुए उससे निजात पाना चाहेगी. भाजपा कांग्रेस से अधिक लोकतांत्रिक होने का दावा कर सकती है क्योंकि इसका संचालन गांधी परिवार की तरह किसी खास परिवार के हाथ में नहीं है. लेकिन यह जानना आश्चर्यजनक है कि पार्टी में गडकरी को लेकर ज्यादातर नेताओं को कोई खास दिक्कत नहीं है. पार्टी के एक पदाधिकारी कहते हैं, ‘गडकरी पर जो आरोप लग रहे हैं, वैसे आरोप तो सार्वजनिक जीवन में रहने वाले नेताओं पर लगते ही रहते हैं. जहां तक सिफारशी पत्र का मामला है तो ऐसा पत्र तो हर सांसद लिखता है. उत्तर प्रदेश में भी उन्होंने जो किया वह पार्टी के लिए ही किया. इससे उनका कोई निजी हित नहीं जुड़ा हुआ था.’ हालांकि, आडवाणी ने उत्तर प्रदेश में गडकरी के फैसले की आलोचन अपने ब्लाॅग पोस्ट के जरिए की थी. उन्होंने लिखा, ‘पार्टी में अभी उत्साह का माहौल नहीं है. उत्तर प्रदेश में जिस तरह से बसपा के मंत्रियों का स्वागत पार्टी ने किया और जो झारखंड व कर्नाटक में हुआ उससे भ्रष्टाचार के खिलाफ पार्टी का अभियान कमजोर पड़ा है.’ उन्होंने सुषमा स्वराज और अरुण जेटली की तारीफ करने के बाद गडकरी पर परोक्ष निशाना साधते हुए लिखा, ‘मैंने कोर समिति की बैठक में कहा था कि आज अगर लोग संप्रग सरकार से नाराज हैं तो हमने भी उन्हें निराश किया है. अभी की स्थिति में आत्ममंथन करने की जरूरत है.’ सूरजकुड में भी आडवाणी ने यह संकेत दिया कि पार्टी में सब ठीक नहीं चल रहा और इसे ठीक करने की जरूरत है.

लेकिन जिस सूरजकुंड में आडवाणी यह कह रहे थे उसी सूरजकुंड में गडकरी के दोबार अध्यक्ष बनने का रास्ता साफ किया गया. हालांकि, भाजपा के कई बड़े नेता सह सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय हैं कि संविधान संशोधन होने के बावजूद गडकरी को दूसरा कार्यकाल नहीं मिल पाए. जिस दिन अंजलि दमानिया ने गडकरी पर आरोप लगाया उसके दो-तीन दिन पहले से ही भाजपा के कुछ नेताओं के बीच यह बात चल रही थी कि गडकरी के खिलाफ कोई खुलासा होने वाला है. लेकिन गडकरी के दूसरे कार्यकाल के राह में रोड़ा अटकाने की कोशिश कर रहे नेताओं की सबसे बड़ी समस्या यह है कि संघ गडकरी के साथ खड़ा है. इसलिए कोई भी खुलकर गडकरी का विरोध नहीं कर रहा. तहलका ने इस स्टोरी के क्रम में भाजपा के कई नेताओं से बातचीत की लेकिन कोई भी अपने नाम के साथ कुछ बोलने को तैयार नहीं हुआ. इससे भी पार्टी पर गडकरी के प्रभाव का संकेत मिलता है. भाजपा में गडकरी के खिलाफ कुछ बोलने का मतलब संघ के खिलाफ बोलना हो गया है. पार्टी के एक पदाधिकारी कहते हैं, ‘गडकरी पार्टी के लिए काफी पैसे भी ला रहे हैं. लंबे-चैड़े दावे करने वाले पार्टी के कई ऐसे वरिष्ठ नेता है जो पार्टी के लिए पैसा नहीं जुटा पाते. उत्तर प्रदेश के चुनावों में भी राज्य के कई बड़े नेताओं ने चुनाव लड़ने के लिए पार्टी या यों कहें कि गडकरी से पैसे मांगे.’

तो क्या पार्टी के लिए पर्याप्त पैसा जुटाने वाले गडकरी पर लगातार आरोप लगते रहने के बावजूद कोई खतरा नहीं है? वे कहते हैं, ‘अगर कोई आरोप ठोस सबूतों के आधार पर प्रमाणित हो जाएगा तो फिर संघ के लिए भी गडकरी का बचाव करना आसान नहीं रहेगा. ऐसे में उन नेताओं को सफलता मिल सकती है जो गडकरी का कार्यकाल विस्तार नहीं चाहते. ये ऐसे नेता है जो किसी राष्ट्रीय पहचान वाले नेता को पार्टी अध्यक्ष बनाने की वकालत कर रहे हैं.’

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