कैसे थमेगा पलायन का सिलसिला

हिमांशु शेखर
देश के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देसीविदेशी मंचों पर भारत की आर्थिक विकास दर की चर्चा करते हुए नहीं अघाते। वे यह बताते हैं कि मंदी जैसे मुश्किल दर में भी उनकी सरकार ने देश की विकास दर को बनाए रखा और भारत विकसित होने की राह पर कदम दर कदम आगे बढ़ रहा है। पर जमीनी हालत तो कुछ और ही कहानी बयां करती है। अगर सचमुच देश में हर तरफ विकास की बयार बह रही होती तो क्या देश में हो रहे पलायन थमने का नाम नहीं लेती? आज भी बड़ी संख्या में लोग रोजीरोटी की तलाश में देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से का रुख करने को मजबूर हैं। वहीं बेहतर शिक्षा पाने की ललक लिए बड़ी संख्या में छात्रों का भी पलायन हो रहा है।
हर किसी की चाहत होती है कि वह अपने घरपरिवार के नजदीक रहे। अपनी जन्मभूमि से दूर रहना किसी को नहीं सुहाता। जीवन गुजारने के लिए जिन बुनियादी सुविधाओं की दरकार है, अगर वे व्यक्ति के आसपड़ोस में ही उपलब्ध हों तो बड़ी संख्या में लोग पलायन की मार झेलने से बच जाएं। पर भारत जैसे गांव में बुनियादी सुविधाओं का भी टोटा है। हालांकि, सत्ताधीश विकास की राग अलापने से बाज नहीं आते और लगातार उन आंकड़ों को लोगों के सामने रखते हैं जिसके जरिए एक गुलाबी तस्वीर बनती हुई दिखती है।
इस बात से हर कोई वाकिफ है कि भारत में बेरोजगारों की तगड़ी फौज तैयार हो गई है। दिनोंदिन इस फौज में इजाफा ही हो रहा है। जाहिर है कि ग्रामीण भारत में इन जरूरतमंदों के लिए रोजगार की उम्मीद बेमानी सी हो गई है। वैसे सरकार ने कहने को रोजगार गारंटी योजना चला रखी है लेकिन इस योजना के कार्यान्वयन में भ्रष्टाचार का घुन इस कदर लगा हुआ है कि इससे जरूरतमंदों की जरूरत पूरी नहीं हो रही है और उन्हें रोजगार की तलाश में दरदर की ठोकरें खाने को मजबूर होना पड़ रहा है। गांवों में आज भी देश की 72.22 फीसदी आबादी रहती है।
दरअसल, शहरी भारत और ग्रामीण भारत के बीच चैड़ी होती हुई खाई भी पलायन की एक अहम वजह है। शहरी भारत दिनोंदिन सुविधा संपन्न होता जा रहा है वहीं ग्रामीण भारत तमाम सरकारी दावों के बावजूद आज भी विकास की मुख्यधारा से काफी दूर है। यह कोई कोरी कल्पना नहीं बल्कि इस बात की गवाही सरकारी आंकड़े ही दे रहे हैं। शहरों में जहां 77.70 फीसदी लोग पक्के के मकान में रहते हैं वहीं ग्रामीण भारत के महज 29.20 फीसदी लोगों के पास यह सुविधा उपलब्ध है। शहरों के 81.38 फीसदी लोगों को पीने का पानी उपलब्ध है। वहीं गांवों के 55.34 फीसदी लोगों को ही पीने का पानी नसीब हो रहा है। शहरों के 75 फीसदी लोगों की पहुंच में बिजली है। वहीं गांवों के सिर्फ 30 फीसदी लोग ही बिजली का लाभ उठा पा रहे हैं। देश के छह लाख गांवों में साक्षरता दर 59 फीसदी है। जबकि देश के 5,161 शहरों के 80 फीसदी लोग साक्षर हैं।
भारत के एक राज्य से दूसरे राज्य में सबसे ज्यादा पलायन रोजगार प्राप्त करने के लिए हो रहा है। खासतौर पर पूर्वी भारत से देश के औद्योगिक केंद्रों की ओर पलायन काफी तेजी से हो रहा है। भारत में पलायन का दो चेहरा है। पहला का पहला रूप तो वह है जिसके तहत लोग बस काम करने के मकसद से दूसरे राज्यों का रुख कर रहे हैं। दूसरी स्थिति में लोग स्थायी तौर पर पलायन कर परदेसी बन दूसरें राज्यों में ही बस जा रहे हैं। देश में औद्योगिकरण कुछ खास क्षेत्रों तक ही सीमित रहा है। इस वजह से इन क्षेत्रों में ग्रामीण भारत से आने वाले लोगों की संख्या काफी तेजी से बढ़ी है।
दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों पर बढ़ते बोझ के लिए पलायन काफी हद तक जिम्मेदार है और गहराई से सोचें तो पलायन की मूल वजह असंतुलित विकास नजर आता है। सरकारी नीतियां कुछ इस तरह बनीं कि कुछ खास क्षेत्रों का विकास तो हुआ लेकिन दूसरे क्षेत्र इस दौड़ में दिनोंदिन पिछड़ते गए। इसका परिणाम यह हुआ कि पिछड़ने वाले क्षेत्र के आसपास के लोग दिल्लीमुंबई जैसे केंद्रों की ओर आने लगे। जाहिर है कि इनके आने से बड़ें केंद्रों की लिए अपनी व्यवस्था को बनाए रखना आसान नहीं होता लेकिन इसके लिए पलायन करने वाले लोग भी जिम्मेदार नहीं है। इसके लिए तो सही मायने में जिम्मेदारी पूंजीपरस्त सरकारी नीतियां हैं।
पूंजीपरस्त नीतियों ने उन्हीं क्षेत्रों का विकास किया जहां से पूंजीपतियों को ज्यादा से ज्यादा लाभ मिल सके। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश के दिल्ली से सटे क्षेत्र का विकास तो हो गया लेकिन पूर्वांचल की हालत जस की तस बनी हुई है। ऐसे में आम लोगों के लिए रोजगार की तलाश में पलायन की मजबूरी से बच पाना असंभव सरीखा है। इसके बावजूद ऐसे लोगों को दिल्ली मेंबिहारी’ होने का उलाहना सुनना पड़ता है तो मुंबई में राज ठाकरे के गुंडों के गुस्से का शिकार होना पड़ता है। कभी शीला दीक्षित कोबाहरी’ लोग दिल्ली के लिए बोझ नजर आते हैं तो कभी असम के गैर हिंदी भाषी मजदूरों पर कहर बरसाया जाता है। किसी को भी अपने घर से हजारों किलोमीटर दूर रहना अच्छा नहीं लगता है। पलायित लोगों की समस्याओं का सिलसिला तो घर की देहरी से बाहर कदम रखते ही शुरू हो जाता है। नए जगह में जाना, वहां काम तलाशना और फिर अनजान जगह पर रहने का प्रबंध करना निश्चित तौर पर बेहद कठिन काम है। इसके अलावा सौतेला व्यवहार से तो ऐसे लोगों को दोचार होना आम बात है। इसके बावजूद अगर लोग अपना घरबार छोड़कर पलायन को मजबूर हो रहें हैं तो यह पूरी व्यवस्था के लिए बेहद शर्मनाक है। यह पूरी व्यवस्था की प्रासंगिकता पर भी सवाल खड़े करता है।
अहम सवाल यह है कि क्या भारी तादाद में लोगों को अन्य राज्यों में जाने से रोका नहीं जा सकता है? क्या इनके लिए गृह राज्य में ही रोजगारों का सृजन नहीं किया जा सकता है? इस संदर्भ में राज्य सरकारें नई योजनाओं की घोषणा तो समयसमय पर करती रहती हैं लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ हो नहीं पाता है और रोजीरोटी के लिए लोगों को पलायन करना ही पड़ता है। दरअसल, अभी सरकार जिन नीतियों को प्रोत्साहन दे रही है उससे तो पलायन जैसी समस्या पर काबू पाना बेहद मुश्किल मालूम पड़ता है। क्योंकि जब से देश की अर्थव्यवस्था का चरित्र पूंजीवादी हुआ है तब से आर्थिक व्यवस्था विकेंद्रित नहीं रही। इस वजह से विकास कुछ खास केंद्रों का ही किया गया। जब तक विकास की बयार छोटेछोटे शहरों और गांवों तक नहीं बहाई जाएगी तब तक तो पलायन थमने से रहा।

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