कुपोषण की मार

हिमांशु शेखर

इस देश के आम तबके के बच्चों की राह में रोड़ों की कमी नहीं है। बाल मजदूरी की समस्या से तो वे दो-चार हो ही रहे हैं। इसके अलावा यहां बच्चों में कुपोषण की समस्या काफी गहरी है। यह समस्या किसी एक राज्य या क्षेत्र के बच्चों की नहीं है। बल्कि इस समस्या से देश के तकरीबन आधे बच्चे जूझ रहे हैं। कुपोषण से बच्चों की मौत की खबरें भी आती रहती हैं। इस मामले में मध्य प्रदेश काफी बदनाम रहा है लेकिन कोई भी राज्य ऐसा नहीं है जहां के बच्चे कुपोषण की मार नहीं झेल रहे हैं। पर सबसे दुखद यह है कि सरकारें बार-बार इस समस्या से निजात पाने का दावा तो करती हैं लेकिन सही मायने में वे जमीनी स्तर पर कुछ करती हों, ऐसा कम से कम दिखता तो नहीं है।

कहना न होगा कि देश के बच्चों में कुपोषण आज भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। अनाधिकारिक आंकड़े तो यहां तक कहते हैं कि हर साल कुपोषण की वजह से देश में हजार से ज्यादा बच्चे काल की गाल में समा जाते हैं। सरकारी आंकड़ों को देखते हुए इस बात पर शक करने की गुंजाइश भी नहीं बचती। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में तीन साल से कम उम्र के 46 फीसद बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि ऐसे बच्चों को बचपन की बीमारियों से जान गंवाने का खतरा सामान्य बच्चों की तुलना में आठ गुना अधिक होता है। उल्लेखनीय है कि 1998-99 के अंत में कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या 47 फीसद थी। यानि बीते दस सालों में कुपोषण के स्तर में महज एक फीसद की कमी आई है।

अहम सवाल यह है कि आखिर बच्चों के कुपोषण के पीछे कारण क्या है? सबसे पहले तो यह कहा जा सकता है कि आर्थिक तंगी बच्चों के कुपोषण की बड़ी वजह है। व्यावहारिक धरातल पर इस तर्क की सत्यता चाहे जो भी हो लेकिन आंकडे़ इससे मेल नहीं खा रहे हैं। भारत में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों की संख्या 26 फीसद है। कुपोषित बच्चों की संख्या इसके आसपास न होकर 46 फीसद है। एक बात और कि इस रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात और उत्तर प्रदेश में तय मानक से कम वजन के 47 फीसद बच्चे हैं। गौरतलब है कि गुजरात की प्रति व्यक्ति आय और उत्तर प्रदेश के प्रति व्यक्ति आय में बहुत फर्क है। पर दोनों राज्यों में बच्चों की हालत कम से कम कुपोषण के मामले में समान है।

कुपोषण के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेवार अगर कोई कारण है तो वो यह कि गर्भवती महिलाओं को आवश्यक भोजन और सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। जब मां ही कुपोषण का शिकार हो जा रही है तो फिर वह जिस बच्चे को जनेगी वह भला स्वस्थ्य कैसे हो सकता है। इसलिए सबसे पहले गर्भवती महिलाओं को आवश्यक भोजन और चिकित्सा मुहैया करवाया जाना चाहिए। तब ही कुपोषण के जड़ पर चोट हो पाएगा और समस्या के समाधान की दिशा में आगे बढ़ा जा सकेगा। गर्भवती महिलाओं की खराब स्वास्थ्य की वजह से ही कम वनज वाले बच्चे पैदा होते हैं। एक अनुमान के मुताबिक भारत में पैदा होने वाले बच्चों में से तकरीबन तीस फीसद बच्चे जन्म के वक्त तय मानक से  कम वजन वाले होते हैं।

बच्चों के कुपोषण के पीछे दूसरी बड़ी वजह स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है। आवश्यक टीके भी अपेक्षाकृत कम बच्चों को ही मुहैया हो पा रहे हैं। इस समस्या को गहराने के लिए लोगों में जागरूकता का अभाव भी काफी हद तक जिम्मेवार है। इसके अलावा सरकारी उदासीनता भी इस समस्या को बढ़ाने में कम जिम्मेदार नहीं है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक आधा से ज्यादा बच्चों का जन्म आज भी बगैर किसी चिकित्सीय देखरेख के हो रहा है। बजाहिर, जब ऐसा होगा तो कई खतरों का सामना इन बच्चों को स्वभाविक तौर पर करना पड़ेगा।

बच्चों को मां का दूध नहीं मिल पाना भी कुपोषण की बड़ी वजह है। जानकारों के मुताबिक चार से छह माह के बच्चों को मां के दूध के अतिरिक्त भी कुछ दिया जाना चाहिए। एक अनुमान के मुताबिक छह से नौ माह के मात्र 56 फीसदी बच्चों को ही मां के दूध के अतिरिक्त कुछ खाद्य पदार्थ मिल पा रहा है। इसलिए छह माह से आठ माह के उम्र में ही ज्यादातर बच्चे कुपोषण के शिकार हो रहे हैं। क्योंकि यही वह दौर होता है जब मां का दूध घटने लगता है। जिससे बच्चे को मिलने वाले पोषक तत्वों में भी कमी आती है।

इस समस्या से पार पाने के लिए कई राज्य सरकार फूड पैकेट का बंदोबस्त कर रही हैं। जिस फूड पैकेट का बंदोबस्त किया जा रहा है, वह बहुत महंगा है और उसे किसी विदेशी कंपनी से खरीदा जा रहा है। अब ऐसे सरकारों का क्या किया जाए जो अपने यहां होने वाले अनाज और दूध कुपोषण की मार झेल रहे बच्चों तक पहुंचाने के बजाए विदेशों से आयातित फूड पैकेट पहुंचाने का उपक्रम कर रही हों। जाहिर है कि इस फूड पैकेट की योजना से कई लोगों का बैंक बैलेंस बढ़ रहा होगा, इसीलिए देसी खाद्य पदार्थोंं की जगह पर इसे अपनाया जा रहा है।

बहरहाल, गर्भवती महिलाओं का ‘ौक्षणिक स्तर भी बच्चों के कुपोषण को दूर करने में आड़े आ रहा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक कम से कम दस साल की स्कूली शिक्षा ग्रहण गर्भवती महिलाओं के बच्चों में 26 फीसद कुपोषण के शिकार हैं। जबकि अशिक्षित  महिलाओं के बच्चों में से पचपन फीसद कुपोषण की मार झेल रहे हैं। इसलिए महिलाओं तक स्वास्थ्य संबंधित जानकारियां पहुंचाना बेहद जरूरी है। हालांकि, सरकार की तरफ से जागरूकता के बहुत बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं लेकिन आंकड़े इस बात के प्रमाण हैं कि ये दावे सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं। इसे स्वास्थ्य सुविधाओं की दुर्दशा ही कहना होगा कि अभी भी देश में पांच साल से कम उम्र के हजार बच्चों में से 95 काल के गाल में समा जा रहे हैं। उड़ीसा में यह संख्या सबसे अधिक 98 है तो केरल में सबसे कम चैदह है। बताते चलें कि शिक्षा के मामले में केरल की हालत बेहतर है जबकि उड़ीसा की हालत उतनी अच्छी नहीं है। अगर केरल में पांच साल से कम उम्र के बच्चों के मरने की संख्या कम है तो जाहिर है कि इसमें वहां के शिक्षा स्तर का अहम योगदान है। वहीं उड़ीसा में शिक्षा की हालत उतनी अच्छी नहीं है और इस वजह से वहां इस आयु वर्ग में जान गंवाने वाले बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा है। इसलिए अगर सही मायने में सरकार कुपोषण की समस्या से पार पाने को लेकर प्रतिबद्ध है तो उसे दूसरे जरूरी उपायों के अलावा शिक्षा के प्रसार पर भी विशेष जोर देना चाहिए।

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