किसानों के लिए मिलाजुला बजट

हिमांशु शेखर

जब नरेंद्र मोदी की सरकार ने मई के आखिरी दिनों में राजकाज संभाला तो देश के कई अन्य तबकों की तरह किसानों ने भी इस सरकार से खासी उम्मीद लगा रखी थी। किसानों की इस सरकार से अधिक उम्मीदों की एक बड़ी वजह यह भी रही कि जब भी नरेंद्र मोदी चुनावी सभा को संबोधित करते या किसी अन्य माध्यम से अपने विचार व्यक्त करते तो उसमें अपने विकास के माॅडल में वे किसानों को अहम हिस्सा बताते थे। जब उन्होंने केंद्र की सत्ता संभाली उसके बाद किसानों के लिए एक और मुश्किल आ खड़ी हुई। यह मुश्किल है खराब माॅनसून से उपजे सूखे की आशंका की। हालांकि, इसका सरकार से कोई लेना-देना नहीं है लेकिन फिर भी इस पृष्ठभूमि में जब मोदी सरकार का पहला आम बजट देश के नए वित्त मंत्री अरुण जेटली पेश करने वाले थे तो किसानों को यह उम्मीद थी कि उनकी समस्याओं के समाधान की स्पष्ट चिंता और कोशिश नए सरकार के बजट में दिखेगी। किसानों की उम्मीदों पर यह बजट कितना खरा उतरा, इसमें जाने से पहले खराब माॅनसून की आशंका की पृष्ठभूमि में देश की किसानी के हालत को समझना जरूरी है।

मौसम का अध्ययन करने वाली सरकारी एजेंसियों के अलावा निजी एजेंसियों ने अब तक यह बात बार-बार दोहराई है कि इस बार में देश में खराब माॅनसून की आशंका है। एक निजी एजेंसी स्काईमेट ने तो यहां तक कहा है कि भारत में सूखे की आशंका 60 फीसदी है। इसके बावजूद देश के वित्त मंत्री अरुण जेटली और केंद्र के अन्य मंत्रियों ने भी देशवासियों को आश्वस्त किया है कि इसमें हायतौबा मचाने की जरूरत नहीं है और सरकार ऐसी किसी परिस्थिति से निपटने में पूरी तरह सक्षम है। यहां सरकार की सक्षमता से मतलब यह है कि सरकार के पास अनाज का इतना भंडार है कि सूखे की हालत में अगर अनाज उत्पादन में कमी आती है तब भी सरकार अनाज आपूर्ति में कमी नहीं आने देगी। ऐसी स्थिति में सरकार अपने भंडारों से अनाज बाजार में उतारेगी और अनाज की कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश करेगी।

हालांकि, इन दावों की पोल तब-तब खुलती नजर आती है जब-जब एक आम आदमी बाजार में जाकर सब्जी या फल खरीदना चाहता है। बाजार में या सब्जी की रेहड़ी पर जाने के बाद उसे मालूम चलता है कि नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के पहले वह जिस भाव पर सब्जियां खरीदता था आज उसे इसके बदले दोगुना से तीन गुना तक पैसा चुकाना पड़ रहा है। सूखे की आशंका भर से अनाज की कीमतें चढ़ने लगी हैं। दालों की कीमतों में तेजी से भी आम उपभोक्ताओं को दो-चार होना पड़ रहा है। ऐसे में आम आदमी के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अगर सिर्फ सूखे की आशंका भर से बेलगाम हुए बाजार पर सरकार नकेल नहीं कस पा रही है तो अगर दुर्भाग्य से सूखा पड़ गया और अनाज उत्पादन कम हो गया तो फिर उनके लिए गुजर-बसर करना दूभर हो जाएगा। अगर सरकार ने समय रहते किसान और किसानी की चिंता नहीं की तो देश के आम किसानों के मन में भी सरकार की भूमिका को लेकर इसी तरह के सवाल उठने लगेंगे।

सूखे को लेकर मौजूदा स्थिति को खुद सरकार की आर्थिक समीक्षा व्यक्त करती है। बजट के एक दिन पहले आर्थिक समीक्षा भी संसद में वित्त मंत्री ही पेश करते हैं। इसमें कहा गया है कि अल नीनो प्रभाव की वजह से अनाजों के उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका है और इससे कीमतों पर दबाव पैदा होगा। यहां यह जानना जरूरी है कि अल नीनो है क्या। दरअसल, जब प्रशांत महासागर में समुद्र का तापमान कई महीनों तक औसत से अधिक बना रहता है तो इससे अल नीनो प्रभाव पैदा होता है और इसका नतीजा खराब मौसम के तौर पर दुनिया के कई हिस्सों में दिखता है। यहां यह भी जानना जरूरी है कि देश के कुल अनाज उत्पादन में 60 फीसदी योगदान खरीफ फसल का है और यह फसल काफी हद तक माॅनसून से होने वाली बारिश पर निर्भर करता है। क्योंकि देश में खरीफ फसल का जो कुल रकबा है उसमें से सिर्फ 35 फीसदी पर ही बारिश के अलावा दूसरी सिंचाई सुविधाएं उपलब्ध हैं। इससे भारत के लिए अच्छे माॅनसून की अनिवार्यता का अंदाजा लगाया जा सकता है। मौसम विभाग की मानें तो पिछले पांच साल में बारिश के मामले में इस साल की हालत सबसे बुरी है। अभी तक जितनी बारिश सामान्य तौर पर होनी चाहिए थी, उससे 43 फीसदी कम बारिश हुई है। इस वजह से 4 जुलाई तक खरीफ फसल की जितनी बुवाई होनी चाहिए थी, उससे 43 फीसदी कम ही हो पाई है।

अब ऐसे मंे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह सरकार किसान और किसानी की बेहतरी के लिए क्या करना चाहती है? इसका कुछ स्पष्ट संकेत आर्थिक समीक्षा और आम बजट से मिलता है। आर्थिक समीक्षा में खेती को लेकर जो बातें सरकार ने की है उससे लगता है कि सरकार कृषि को बाजार से पहले की तुलना में और मजबूती से जोड़ने की कोशिश करेगी। इसके लिए सरकार एक राष्ट्रीय समान कृषि बाजार विकसित करना चाहती है। आर्थिक समीक्षा यह संकेत भी दे रही है कि आने वाले दिनों में सरकार ठेका आधारित खेती को भी बढ़ावा देगी। हालांकि, इसका पहले से काफी विरोध होता रहा है। ऐसे में यह देखने वाली बात होगी कि नई सरकार इसे किस रूप में जमीन पर उतारती है। सरकार ने कृषि और कृषि उत्पादों से संबंधित कई कानूनों में संशोधन का संकेत भी आर्थिक समीक्षा में दे रही है। जानकारों का मानना है कि अभी कुछ कानूनी प्रावधान ऐसे हैं जिनका लाभ उठाकर बिचैलिये कृषि उत्पादों की कीमतों में अनाप-शनाप बढ़ोतरी करा देते हैं और बढ़ी हुई कीमतों का लाभ किसानों तक पहुंचने के बजाए बिचैलियों के हाथों में सिमट कर रह जाता है।

आम बजट में वित्त मंत्री ने किसानी को लेकर जो घोषणाएं की हैं, उन्हें इस क्षेत्र की बदहाली को देखते हुए कम कहा जा सकता है कि लेकिन जानकारों की मानें तो नई सरकार ने इस क्षेत्र की सेहत की सुधारने की दिशा में अपने पहले बजट के जरिए कदम तो बढ़ा दिए हैं। नई सरकार ने चालू वित्त वर्ष में किसानों को आठ लाख करोड़ रुपये कर्ज देने का प्रावधान किया है। अगर इस कर्ज के वितरण में ईमानदारी सरकार सुनिश्चित करे तो इससे बड़ी संख्या में छोटे किसानों का भला हो सकता है। क्योंकि इसके तहत समय पर कर्ज का भुगतान करने वाले किसानों को सिर्फ चार फीसदी की सालाना दर से ब्याज चुकाना होता है। इसके अलावा सरकार ने अपने बजट में ग्रामीण इलाकों में बुनियादी ढांचा दुरुस्त करने के लिए 5,000 करोड़ रुपये आवंटित करने की घोषणा की है। यह रकम देश के तकरीबन छह लाख गांवों की भारी-भरकम संख्या को देखते हुए कम लग सकती है लेकिन इसे एक सही दिशा में उठाया गया कदम ही समझा जाना चाहिए। क्यांेकि इस रकम से कम से कम कुछ सकारात्मक शुरुआत तो होगी। इसके अलावा कृषि से संबंधित बुनियादी ढांचा को दुरुस्त करने के लिए भी 500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। यह आवंटन निश्चत तौर पर जरूरत के मुकाबले काफी कम है।

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने बजट में मिट्टी की सेहत को लेकर भी चिंता जताई है। उन्होंने मिट्टी परीक्षण के लिए विशेष कार्ड जारी करने की घोषणा की है। यह एक ऐसी समस्या है जिससे देश के कई इलाकों के किसान जूझ रहे हैं। लेकिन इस समस्या के समाधान के लिए अब तक संस्थागत प्रयास की कमी महसूस की जा रही थी। इस आम बजट ने इस दिशा में एक कदम बढ़ाया है। देश में सिंचित रकबा को बढ़ाने के मकसद से सरकार ने अपने पहले बजट में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना शुरू करने की घोषणा की है। यह एक सराहनीय कदम है लेकिन इसके लिए सिर्फ 1,000 करोड़ रुपये का प्रावधान करके अरुण जेटली ने यह सवाल पैदा कर दिया है कि जिस देश के अधिकांश हिस्से तक सिंचाई का वैकल्पिक साधन उपलब्ध नहीं है, उसमें सिंचाई क्रांति लाने के लिए इतने रकम में क्या हो पाएगा।

किसानी को लेकर सरकार ने बजट में एक अच्छा काम यह भी किया है कि कई ऐसे संस्थानों की घोषणा की है जहां कृषि और इससे संबंधित पहलूओं को लेकर अध्ययन और शोध होगा। अरुण जेटली ने असम, झारखंड, आंध्र प्रदेश और राजस्थान में कृषि विश्वविद्यालय खोलने की घोषणा की है। इसके अलावा उन्होंने तेलंगाना और हरियाणा में वानिकी विश्वविद्यालय खोलने की घोषणा की है। जानकार इसे दीर्घकालिक तौर पर खेती-किसानी के लिए सही दिशा में उठाया गया कदम मान रहे हैं। इस बजट में सरकार ने कृषि क्षेत्र में भी विदेशी पूंजी लाने के संकेत दिए हैं। ठेका आधारित खेती की तरह यह भी एक चिंता का विषय है। सरकार ने कृषि क्षेत्र के लिए सालाना चार फीसदी विकास का लक्ष्य रखते हुए हरित क्रांति और प्रोटीन क्रांति की बात अपने बजट में की है लेकिन इसके लिए जितना बजटीय प्रावधान होना चाहिए था, उतना है नहीं। इससे इन मोर्चों पर सरकार की गंभीरता को लेकर सवाल पैदा होता है।

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