ऐसे तो पत्रकारिता बचने से रही

प्रभाष जोशी

 

 कहा जा रहा है कि सारा संसार विश्वग्राम हो गया है। इसमें सभी छोटे हैं और बड़ी है तो सिर्फ टेक्नोलाजी। जिस विज्ञान ने यह कहा कि द वर्ल्ड इज बिकमिंग अ ग्लोबल विलेज, वह ग्लोबल तो जानता था लेकिन विलेज को नहीं जानता था। गांव केवल छोटी सी बस्ती नहीं है बल्कि गांव एक जैविक समाज है। हम जिस टेक्नोलाजी को बढ़ा रहे हैं वह सब चीजों को छोटी करके जैविक समाज को नष्ट करने वाली टेक्नोलाजी है। यानी आदमी छोटा है, उसकी मशीन उससे बड़ी है। 

मोबाइल तो छोटा है। पर अगर उसके कारण मेरा सीधा संबंध पत्नी से होगा तब पत्नी से ज्यादा महत्वपूर्ण तो मोबाइल बन जाएगा। ये टेक्नोलाजी तार को तार से जोड़ने वाली है, दिल को दिल से जोड़ने वाली नहीं। तो जिसने भी यह कहा कि दुनिया एक विश्व ग्राम बनती जा रही है वह छोटी बस्ती बनाना चाहता था जैविक समाज नहीं। इसका संबंध पत्रकारिता से भी है। पत्रकारिता में मुख्य अब ये नहीं है कि हम अपनी बात दूसरे से क्या कह रहे हैं। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि कितनी तेजी से कह रहे हैं और कितनी चमक से कह रहे हैं। यानी फार्म इज मोर इंपार्टेंट दैन कंटेंट। कंटेंट तो हम किसी तरह बना सकते हैं, उसको जितने अच्छे से हम पहुंचाएंगे उतना ही हमारा महत्व है। यह मुख्यत: दो बातों पर निर्भर है। 

मैं किस्से के जरिए अपनी बात कहूंगा। पिछले साल पंद्रह अगस्त के आसपास चेन्नई में जन्मी इंदिरा नूई को पेप्सी ने अपना सीईओ बना दिया। जब इंदिरा पेप्सी की सीईओ हुईं तो टाइम्स नाऊ के प्रधान संपादक अर्णब गोस्वामी ने अपने चैनल पर खबर पढ़ते समय इस घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि वाट एन एचिवमेंट आन इंडिपेंडेंस डेयानी स्वतंत्रता दिवस पर क्या उपलब्धि है। यानी आपने स्वतंत्रता संग्राम इसलिए चलाया कि एक दिन आपके यहां की लड़की पेप्सी बेचने वाली कंपनी की सीईओ हो जाएगी। क्या इसे स्वतंत्रता आंदोलन की उपलब्धि माना जाए? 

अर्णब गोस्वामी ऑक्सफोर्ड में पढ़े विद्वान आदमी हैं। वे हमारे मित्र हैं। उनको एक क्षण भी नहीं लगा कि मल्टीनेशनल्स के खिलाफ 190 सालों तक लड़ाई लड़ने वाले देश की बेटी के पेप्सी जैसे किसी मल्टीनेशनल के सीईओ होने पर नाचना उचित नहीं है। उन्होंने इसे भारत की बहुत बड़ी उपलब्धि माना। आज हमारा मध्यवर्ग पैसे कमाने का पराक्रम करता है तो उसे ही भारतीय स्वतंत्रता का पराक्रम मानकर प्रचारित किया जाता है। यानी भारत इसलिए स्वतंत्र हुआ कि हम एक दिन दुनिया में सबसे अमीर देश होंगे और हमारा डंका अमेरिका में भी बजेगा। ये हमारे पढ़े-लिखे और बहुत ही समझदार वर्ग की धारणा है। 

एक जमाना वह था जब 1946-47 में अजित भट्टाचार्य ने स्टेट्समैन का प्रस्ताव ठुकरा कर हिंदुस्तान टाइम्स से पत्रकारिता शुरू की थी। स्टेट्समैन उस जमाने में बहुत प्रतिष्ठित अखबार था और बहुत ज्यादा पैसे देता था। उन्होंने सोचा कि मैं क्यों देश की स्वतंत्रता के विरूद्ध खड़े रहने वाले अखबार स्टेटसमैन में जाऊं जबकि मेरा देश आजाद हो रहा है। उस समय हिंदुस्तान टाइम्स स्वतंत्रता संग्राम का समर्थक अखबार था। इसलिए स्टेट्समैन की प्रतिष्ठा और पैसा छोड़कर अजित भट्टाचार्य हिंदुस्तान टाइम्स में अप्रेंटिस सब एडीटर हुए। 

मैं इसे देखकर चकित रह गया कि जिस अखबार को अजित बाबू ने काम करने के लिए इसलिए चुना कि वह स्वतंत्रता संग्राम का समर्थक अखबार था, उसी का हिंदी अखबार खुद को बेचने के लिए पुलित्जर पुरस्कार दिलवाने की कामना कर रहा है। अब भला पुलित्जर पुरस्कार का भारतीय पत्रकारिता की परंपरा से क्या लेना-देना। पुलित्जर पुरस्कार सिर्फ अंग्रेजी में और अमेरिकी पत्रकारिता करने वाले को मिल सकता है। भारतीय पत्रकारिता और हिंदी में पत्रकारिता करने वाले को वह पुरस्कार कभी नहीं मिल सकता। लेकिन हिंदुस्तान नाम का हिंदी अखबार पुलित्जर पुरस्कार की ओर इसलिए झुक रहा है कि उसके पाठकों को यह लगे कि ये तो सारे संसार में भारत का डंका पीटने वाला ध्वजावाहक अखबार है। हिंदुस्तान ने हर तरह से यह बताने की कोशिश की है कि इस दौर की रीमिक्स वाली पत्रकारिता ही भविष्य की पत्रकारिता है। पत्रकारिता में देसी परंपरा की बात तो एंग्री ओल्ड मैन टाईप लोग ही करते हैं। 

मैं भारतीय मध्यवर्ग के अमेरिकी प्रेम के बारे मे कह रहा हूं। ये दो उदाहरण मैंने कोई माखौल उड़ाने के मकसद से नहीं दिए हैं। आधी सदी पत्रकारिता में गुजारने के बाद मुझे किसी पर कुल्हाड़ी चलाने या किसी पर खुंदक निकालने की कोई इच्छा नहीं हैं। बाइबल में कहा है कि ये जो घंटी बज रही है, इसको देखकर चिंतित हो जाओ क्योंकि यह किसी और के लिए नहीं बल्कि तुम्हारे लिए बज रही है। पत्रकारिता में मैं जो भी होते हुए देखता हूं तो लगता है कि मेरे लिए घंटी बज रही है। हमने पत्रकारिता में आधी सदी इसलिए गुजारी कि हमें लगता था कि पत्रकारिता के जरिए समाज में थोड़ा-बहुत शुभ्र परिवर्तन कर सकेंगे। ऐसा नहीं होता तो क्रिकेट खेलते और आज दस करोड़ सालाना लेकर टेलीविजन पर मजे से कमेंट्री करते। 

भारतीय पत्रकारिता दुनिया के अन्य देशों की पत्रकारिता से इसलिए भिन्न और श्रेष्ठ है क्योंकि इसने अपने देश को जगाया और उसे आजाद कराने में अहम भूमिका निभाई। इसमें लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी जैसे संपादक हुए, जिन्होंने मानवता को जगाया। महात्मा गांधी ने डरबन में संपादक के नाम पत्र लिखकर शुरूआत की थी। यह पत्र उन्होंने तब लिखा जब उन्हें पगड़ी उतारने को कहा गया था और उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया था। महात्मा गांधी ने अपनी राजनीति की शुरूआत पत्रकारिता के साथ-साथ की। उस समय एक भी नेता ऐसा नहीं था जिसने यह नहीं सोचा हो कि पहले अच्छा अखबार निकालकर लोगों से बात करनी चाहिए, फिर मुझे नेता बनाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता तो अकबर इलाहाबादी नहीं कहता कि जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो। इस तरह की पंक्ति दुनिया की किसी कविता में नहीं मिलेगी। 

अगर हम पत्रकारिता की अपनी परंपरा को छोड़ देंगे तो रेगिस्तान में पानी के लिए तरसने वाले एक जीव की तरह पड़े रहेंगे। क्योंकि प्राणवायु तो इसी परंपरा से मिलेगी। इस देश का पहला अखबार एक अंग्रेज ने निकाला। हिकी ने अखबार इसलिए नहीं निकाला कि उसको अंग्रेजी सरकार का गुणगान करते हुए विज्ञापन प्राप्त करना था। अंग्रेज और अंग्रेजी राज होते हुए भी उसने अखबार इसलिए निकाला क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी में जो घोटाले होते थे, उनका भंडाफोड़ किया जाना उसे आवश्यक लगा। अंग्रेजों को अपने ही आदमी द्वारा निकाले जाने वाला अखबार रास नहीं आया। अंग्रेजी सरकार ने न सिर्फ अखबार बंद करवाया, बल्कि हिकी को तत्काल वापस भेज दिया।

 भारत की मिट्टी में कुछ ऐसा है कि अंग्रेज भी जब राज करने आता है तो उसके साथ आया पत्रकार भंडाफोड़ करने में लग जाता है। इसलिए मैं चकित हूं कि मनमोहन सिंह के साथ काम करने वाले पत्रकार अमेरिका के साथ हो रहे परमाणु करार की क्यों इतनी तारीफ करते हैं। हिकी तक को समझ में आता था कि मेरी सरकार क्या गड़बड़ कर रही है। वह जानता था कि उसका काम इसकी तारीफ करना नहीं, बल्कि भंडाफोड़ करना है। इसके उलट हमारे सारे अंग्रेजी अखबारों को ये समझ में नहीं आता कि  सवा लाख लोगों को उजाड़कर जो सरदार सरोवर बनाया गया है उसकी बिजली सिर्फ पांच कारपोरेशनों को दी जाती है। इसके अलावा पटेलों की एक-आध कालोनियों में ही यह बिजली जाती है। 

जब ओंकारा फिल्म मैं देखने गया तो गौर किया कि कई चैनल और अखबार इसके मीडिया पार्टनर हैं। इसके कुछ दिन बाद मैंने आज तकपर ओंकारा फिल्म पर आधारित आधे घंटे का कार्यक्रम देखा। इसमें रितुल जोशी ने बताया कि ओंकारा शेक्सपियर के उपन्यास ओथेलो पर आधारित है। अब उन्हें कौन बताए कि शेक्सपियर ने सिर्फ नाटक और कविता लिखी थी, एक भी उपन्यास या कहानी नहीं। अगर सारे चैनल और अखबार फिल्मों के मीडिया पार्टनर बनने लगे तो लोगों को फिल्म समीक्षा पढ़ने को नहीं मिलेगी। वे तो फिल्मों को प्रमोट करने में लगे रहेंगे। इस तरह से महान भारतीय पत्रकारिता आलोचना और समीक्षा की अपनी परंपरा को खो देगी। क्योंकि फिल्म की समीक्षा करने की बजाए उसे  प्रमोट करना मजबूरी बन जाएगी। 

भारत में जन्मे और यूरोप में व्यवसाय कर रहे अरुण नायर पिछले साल एलिजाबेथ हर्ले नाम की एक सुंदर महिला को लेकर भारत आए। वे भारतीय पध्दति से भारत में विवाह करना चाहते थे। ईसाई पध्दति से इंग्लैंड में वे शादी कर चुके थे। अरुण नायर और एलिजाबेथ हर्ले का फोटो टाइम्स आफ इंडिया ने छापा और शीर्षक दिया यट अनदर इंडियन टेकओवर।वो बड़े शानदार दिन थे जब मित्तल ने आर्सेलर का अधिग्रहण किया था और टाटा ने कोरस का टेकओवर किया था। 

टाइम्स आफ इंडिया ने इसके जरिए एलिजाबेथ हर्ले को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में बदल दिया। क्योंकि टेकओवर तो बड़ी कंपनी छोटी कंपनी का करती है। यानी एलिजाबेथ हर्ले प्रेम में पड़कर भारतीय पध्दति से शादी करने भारत नहीं आई थी बल्कि एक प्राइवेट कंपनी थी जिसका टेकओवर अरुण नायर नाम की भारतीय कंपनी ने कर लिया। विवाह की परंपरा को उस अखबार ने टेकओवर की व्यावसायिक परंपरा के साथ खड़ा कर दिया। 

जोधपुर में राजस्थानी रस्मो-रिवाज के साथ उनकी शादी हुई। विवाह के बाद अरुण के माता पिता ने यह कहा कि शादी में उनकी अनदेखी हुई है। इस बात को लेकर झगड़ा चला। इस झगड़े में यह बात सामने आई कि एलिजाबेथ हर्ले ने भारतीय पद्धति से ब्याह रचाने को हेलोनाम की लाइफस्टाइल पत्रिका को एक करोड़ चालीस लाख रुपए में पहले ही बेच दिया था। इसलिए भारत में उसका कोई कवरेज नहीं कर सकता था। उस विवाह का पूरा खर्चा एक करोड़ हुआ। यानि एलिजाबेथ हर्ले ने भारतीय पध्दति से ब्याह रचाने में चालीस लाख रुपए बनाए। 

जोधपुर के एक व्यक्ति ने अदालत में केस किया कि इन दोनों ने हमारी विवाह की परंपरा को ठेस पहुंचाया है। कुछ दिन बाद टाइम्स आफ इंडिया में खबर छपी कि भारत की न्यायपालिका पर करोड़ों केस का दबाव पहले से है और इस आदमी ने एक केस और कर दिया। ये आदमी समझता नहीं है कि इस विवाह के जरिए भारतीय पध्दति को दुनिया के अमीरों के हाथों बेचने का कितना अच्छा अवसर मिला था। 

अगर आप अखबारों को प्रकाशन उद्योग में और समाचार चैनलों को विडियो कंपनी में सीमित कर देंगे तो अंदाजा लगा सकते हैं कि पत्रकारिता का क्या होगा? आजकल अखबार वाले पैसा लेकर खबर छापते हैं। चुनावों के दौरान तो उम्मीदवार पन्ने के पन्ने खरीद लेते हैं। इस बाबत एक मालिक ने कहा कि अगर हम पैसे नहीं लेंगे तो हमारे लुच्चे रिपोर्टर पैसा ले लेंगे। पिछले दिनों मैं एक जिला मुख्यालय में किसी कार्यक्रम में गया था। वहां मुझे बताया गया कि फलां अखबार का फलां ब्यूरो पांच लाख रुपए में नीलाम हो गया। 

एक स्वराजनाम का अखबार था अपने यहां। उसके मालिक ने कहा कि जब्त हो जाए लेकिन अंग्रेज सरकार द्वारा मांगा जा रहा पैसा नहीं दूंगा। स्वराजके आठ संपादक जिंदगी भर कालापानी के लिए अंडमान भेज दिए गए। क्योंकि वे झुकने के लिए तैयार नहीं हुए, उन्होंने अंग्रेजी सत्ता की परवाह नहीं की। पर आज यह देश की पत्रकारिता का कैसा दुर्भाग्य है कि पैसा लेकर खबर लिखी और दिखाई जा रही है। ऐसे में पत्रकारिता का बचना मुश्किल है। आने वाले समय में अगर नीर क्षीर विवेक से हम पत्रकारिता नहीं करेंगे तो अपनी पत्रकारिता की परंपरा पर गर्व नहीं कर सकेंगे। 

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